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यूपी के नए राजनीतिक परिदृश्य में बसपा की बहुजन राजनीति का हाशिये पर चले जाना
किसी भी राजनीतिक दल के पराजित होने या फिर उसके वोट प्रतिशत में बड़ी गिरावट आने का अर्थ यह नहीं होता है कि हम तुरंत उसकी राजनीतिक मृत्यु की घोषणा कर दें। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उतनी ही मज़बूती के साथ जुड़ा है कि वह दल अपनी राजनीतिक प्रवृत्ति में किस तरफ बढ़ रहा है।
कृष्ण सिंह
11 Mar 2022
यूपी के नए राजनीतिक परिदृश्य में बसपा की बहुजन राजनीति का हाशिये पर चले जाना

आज अगर आप राजनीतिक रूप से जागरूक एक सामान्य व्यक्ति से यह प्रश्न पूछें कि वह कौन सी पार्टी है जो चुनाव में स्वयं को ही पराजित करने के लिए परिश्रम करती है, तो इसका उत्तर आपको तुरंत मिलेगा – कांग्रेस। अब थोड़ा प्रश्न को बदलते हैं और इसको उत्तर प्रदेश के राजनीतिक जमीन से जोड़ते हैं। वह कौन सा राजनीतिक दल है जो राजनीतिक रूप से आत्मघाती प्रवृत्ति की ओर बढ़ रहा है, तो उत्तर मिलेगा – बहुजन समाज पार्टी (बसपा)। यहां कांग्रेस को इसलिए शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन से उसकी जड़ें काफी पहले ही उखड़ चुकी हैं।

सन 1984 में अपनी स्थापना के समय से ही बसपा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनी रही और धीरे-धीरे उसने अपने को बहुजन आंदोलन की एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया। लेकिन बीते दस वर्षों में यानी 2012 के बाद से उसकी राजनीतिक जमीन धीरे-धीरे खिसकनी शुरू होती है और 2022 के विधानसभा चुनाव तक आते-आते वह राजनीतिक रूप से स्पष्ट तौर पर हाशिये की तरफ पहुंचती दिख रही है।

सन 2007 में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी। उसको 206 सीटें मिलीं और उसका वोट प्रतिशत 30.43 था। सन 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे 80 सीटें मिलीं और उसका वोट प्रतिशत 25.88 था। सन 2017 में बसपा को 19 सीटें मिलीं और उसका वोट प्रतिशत गिरकर 22.27 हो गया। वर्तमान 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा के वोट प्रतिशत में जो गिरावट आई है वह अभूतपूर्व है। इस बार उसे मात्र एक सीट मिली है और उसका वोट प्रतिशत गिरकर 12.88 हो गया है। यह लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट है।

महत्वपूर्ण यह है कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा का यूपी में बहुत ही खराब प्रदर्शन था, उसे एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन इसके बावजूद उसका वोट प्रतिशत 19.77 था। इस बार के विधानसभा चुनाव के परिणामों और उसके जो आंकड़े और तथ्य सामने आ रहे हैं वह बता रहे हैं कि बसपा का कोर वोटर भी काफी हद तक उसका साथ छोड़ चुका है।

इस बार के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में मीडिया रिपोर्टों में वोट प्रतिशत के जो चरणवार आकड़े सामने आए हैं वह स्वयं ही मायावती की पार्टी बसपा की राजनीतिक स्थिति का हाल बयां कर देते हैं। पिछली बार (2017) के मुकाबले इस बार के पहले चरण में उसके वोटों में 8.89 प्रतिशत, दूसरे चरण में 8.20 प्रतिशत, तीसरे चरण में 7.73 प्रतिशत, चौथे चरण में 11.32 प्रतिशत, पांचवें चरण में 11.93 प्रतिशत, छठे चरण में 8.65 प्रतिशत और सातवें चरण में 8.78 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) की 86 सीटों के वोट प्रतिशत को देखें तो पिछली बार के मुकाबले इस बार बसपा के मतों में 10.3 प्रतिशत की गिरावट आई है।

 राजनीतिक निष्क्रियता

किसी भी राजनीतिक दल के पराजित होने या फिर उसके वोट प्रतिशत में बड़ी गिरावट आने का अर्थ यह नहीं होता है कि हम तुरंत उसकी राजनीतिक मृत्यु की घोषणा कर दें। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उतनी ही मजबूती के साथ जुड़ा है कि वह दल अपनी राजनीतिक प्रवृत्ति में किस तरफ बढ़ रहा है।

सन 2014 के बाद से भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आया है। अब राजनीतिक दलों का मुकाबला उस भाजपा से है जिसकी केंद्र में प्रचंड बहुमत वाली सरकार है। जिसका शीर्ष नेतृत्व हमेशा चुनावी मोड में रहता है और उसका हर कदम पार्टी की जीत को सुनिश्चित करने के लिए उठता है। जिसने अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से गांव-गांव तक अपनी पैठ बना ली है। भाजपा के पास न धन की कमी है, न ही कार्यकर्ताओं की। कॉरपोरेट घराने और मीडिया उसके साथ खड़े हैं। उसके पास प्रोपगेंडा की एक मजबूत मशीनरी है। ऐसे दल की राजनीति के सामने अगर किसी पार्टी का नेतृत्व निष्क्रिय हो जाए, तो उसके भविष्य के बारे में आकलन करना कोई जटिल काम नहीं है।

सन 2019 के बाद से बसपा की नेता मायावती राजनीतिक रूप से सक्रिय दिखने के बजाय निष्क्रिय ज्यादा नजर आती हैं। जिसका असर इस बार के विधानसभा चुनावों के परिणामों में बसपा के प्रदर्शन से साफ दिखाई देता है। सवाल लौटकर फिर वहीं पर आ जाता है कि बसपा की बहुजन राजनीति की वर्तमान स्थिति क्या है और उसकी दिशा किस तरफ जा रही है? आज बहुजन आंदोलन कहां पर खड़ा है? कांशीराम ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़ी जातियों, अन्य पिछड़ी जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलाकर एक बहुजन राजनीति का खाका तैयार किया था और उस राजनीति को साकार करने के लिए बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। लेकिन बहुजन राजनीति का ढांचा अब पूरी तरह से बिखर चुका है। अब दलितों में जो जाटव समुदाय अभी तक मायावती को कोर वोटर बना हुआ था उसमें भी बिखराव शुरू हो गया है। और जो बचा है वह दोराहे पर है। अगर मायावती आगे भी राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं होती हैं, तो आने वाले वक्त में बसपा के बचे हुए कार्यकर्ता, समर्थक और उसका कोर वोटर, सभी नए राजनीतिक ठिकानों की तलाश में निकल पड़ेंगे।

यहां यह बात गौर करने लायक है कि जिस हिंदुत्व की परिकल्पना भाजपा और संघ परिवार करता है उसमें बहुजन आंदोलन या बहुजन राजनीति जैसे प्रयोगों को वे अपने रास्ते का रोड़ा मानते हैं। बसपा जिस तरह राजनीतिक रूप से अप्रासंगिकता की ओर बढ़ रही है उसने भाजपा और संघ परिवार को सुनहरा मौका दे दिया है कि वह दलितों को अपनी राजनीतिक धारा में पूरी तरह से समाहित कर लें। भाजपा ने इस चुनाव में उत्तराखंड की राज्यपाल रहीं बेबी रानी मौर्य को आगरा ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा। वह 76 हजार से अधिक मतों से चुनाव जीती हैं। बेबी रानी मौर्य दलितों की उसी उपजाति से आती हैं जिससे मायावती आती हैं यानी जाटव समुदाय से। जाहिर है, भाजपा उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों के बीच एक नए नेता के रूप में खड़ा करके अपनी रणनीति को अंजाम देगी। 

कुछ मीडिया रिपोर्टें इस ओर इशारा करती हैं कि इस चुनाव में जिस तरह से मायावती ने आखिरी वक्त में उम्मीदवार बदले और उम्मीदवारों के चयन की उनकी जो रणनीति रही है उससे कई जगहों पर भाजपा को फायदा मिला है। राजनीति में हर पार्टी वक्त के हिसाब से अपनी रणनीतियों में बदलाव करती है लेकिन अगर वह अपने लक्ष्य को किनारे करके यह सब करती है तो वह एक समय के बाद अप्रासंगिक हो जाती है। अगर आप संघ परिवार की पूरी राजनीति को बारीकी से देखें तो उसने जन संघ से लेकर भाजपा तक अपनी रणनीतियों में कई तरह के बदलाव किए लेकिन उसने अपने केंद्रीय मुद्दों और लक्ष्य से कभी भी किनारा नहीं किया। उल्टा उसने अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए रणनीतियों का बखूबी इस्तेमाल किया है। क्या बसपा ने ऐसा कुछ किया है? कांशीराम के समय में बहुजन आंदोलन में भूमिका निभा चुके कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि मायावती ने कांशीराम की विचारधारा के साथ विश्वासघात किया है और पिछड़ी जातियों के नेताओं को किनारे करके ऊंची जाति के लोगों को आगे बढ़ाया है। इसी की ही मायावती ने कीमत चुकाई है। शायद बसपा की वर्तमान दशा-दिशा को देखकर इन आरोपों का मात्र अनर्गल प्रचार करके अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यह भी बिडंबना है कि मायावती ने बसपा में दूसरी पंक्ति के नेताओं को तैयार ही नहीं किया। न ही उन्होंने ऐसे चेहरों को आगे किया जो भविष्य में कांशीराम के बहुजन आंदोलन की राजनीति को आगे ले जा सकें।

चंद रोज पहले मायावती ने पार्टी की नई कार्यकारी समिति की जो घोषणा की है उससे बसपा की राजनीतिक दशा-दिशा के बारे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इस नई कार्यकारी समिति में वह स्वयं पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनका भतीजा आकाश आनंद राष्ट्रीय समन्वयक है। उनके भाई आनंद कुमार राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। और जो छह राष्ट्रीय महासचिव हैं उनमें एक सतीश मिश्र हैं, बाकी ऐसा कोई नाम नहीं है जो राजनीतिक रूप से जाना-पहचाना हो।     

दलित आंदोलन और उसके नेता

बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की मृत्यु के बाद रिपब्लिकन पार्टी से लेकर दलित पैंथर्स और फिर बहुजन समाज पार्टी तक जो भी दलित आंदोलन और दलित राजनीति की परिघटनाएं सामने आईं और जिन्होंने दलित मुक्ति के प्रश्न पर दलितों में उम्मीद की नई आशा संचार किया, अगर इस तरह की तमाम परिघटनाओं पर बारीकी के नजर डाली जाए तो अधिकतर मामलों में यही देखने को आता है कि दलित आंदोलन को किसी और से ज्यादा उसके नेताओं ने ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने भौतिक मुद्दों से जुड़े प्रश्नों के स्थान पर एक समय के बाद भावनात्मक मुद्दों पर ही ज्यादा जोर दिया और एक समय के बाद वे बिखराव का शिकार हो गए। दलित नेताओं में ऐसे लोगों की संख्या काफी रही है जिन्होंने बाबा साहेब के क्रांतिकारी विचारों और उनके सिद्धातों की अपने हितों के हिसाब से व्याख्या की और सत्ता की अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए दलितों की भावनाओं का धूर्तता पूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया। शासक वर्ग की पार्टियों के लिए यह सुखद था और है। शासक वर्ग की पार्टियां भी दलित मतों को हासिल करने के लिए आंबेडकर का गुणगान तो करती हैं लेकिन दलित मुक्ति के उनके विचारों और सिद्धांतों को परे रखकर। बाबा साहेब ने बहुत ही स्पष्टता के साथ कहा था कि पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद उनके आंदोलन के लिए जुड़वा दुश्मन हैं। लेकिन आज बसपा से यह पूछा जाना चाहिए कि जिस पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद को बाबा साहेब अपने आंदोलन के लिए जुड़वा दुश्मन मानते थे उसके बारे उसके क्या विचार हैं और इस मामले में वह कहां खड़ी है। उल्टा आज, मायावती और उनकी पार्टी बसपा पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद की पोषक ताकतों के साथ खड़ी नजर आ रही हैं। बहुजन राजनीति के लिए इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि उसका नेतृत्व आज उसी हिंदुत्ववादी राजनीति के ध्वजवाहकों की बी-टीम के रूप में चिह्नित किया जा रहा है जो कभी उसी हिंदुत्ववादी राजनीति के खिलाफ खड़ा हुआ था।

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विचार व्यक्तिगत हैं)

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