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भारत
राजनीति
कांग्रेस का कार्ड, अखिलेश की तस्वीर, लेकिन लाभार्थी सिर्फ़ भाजपा के साथ?
मोदी सरकार ने जिस राशन को गरीबों के लिए फ्री किया है, वह राशन पहले से लगभग न के बराबर मूल्य पर गरीबों को मिल रहा था। तो क्या वजह रही कि लाभार्थी समूह सिर्फ़ भाजपा के साथ गया।
शशि शेखर
23 Mar 2022
Akhilesh yadav

इस स्टोरी के साथ लगी अखिलेश यादव की यह तस्वीर भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प तस्वीरों में से एक हो सकती है। यह अकेली तस्वीर मतदाताओं के मिजाज और राजनीतिक दलों के कामकाज को समझाने के लिए काफी है। अभी उत्तर प्रदेश में जिस लाभार्थी समूह की बात की गयी (फ्री राशन), क्या वह लाभार्थी समूह वाकई फ्री राशन के कारण भाजपा के साथ चला गया? क्या लाभार्थी समूह वाकई इतना नासमझ है, जो फ्री राशन के खेल को नहीं समझ सका? और क्यों भाजपा, कांग्रेस की बनाई नीतियों के सहारे ही चुनाव-दर-चुनाव जीतती जा रही हैं, लेकिन कांग्रेस अब तक यह नहीं समझ सकी कि हर प्रोपेगेंडा का एक एंटी-प्रोपेगेंडा भी हो सकता है? 

कांग्रेस का कार्ड, आम आदमी के साथ 

मसलन, यह तस्वीर एक राशन कार्ड की है। यह कार्ड राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत बना हुआ है। गौरतलब है कि राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को यूपीए सरकार ने संसद द्वारा पारित किया था। राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013, 10 सितम्‍बर, 2013 को अधिसूचित किया गया था। इसका उद्देश्‍य एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए लोगों को कम कीमत पर अच्‍छी गुणवत्‍ता के खाद्यान्‍न की पर्याप्‍त मात्रा उपलब्‍ध कराते हुए उन्‍हें खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रदान करना है। 

इसके तहत, 75% ग्रामीण आबादी और 50% शहरी आबादी के कवरेज का प्रावधान है। पात्र व्‍यक्‍ति चावल/ गेहूं/मोटे अनाज क्रमश: 3/ 2/1 रुपए प्रति किलोग्राम के मूल्‍य पर 5 किलोग्राम खाद्यान्‍न प्रति व्‍यक्‍ति प्रति माह प्राप्‍त करने का हकदार है। मौजूदा अंत्‍योदय अन्‍न योजना परिवार,जिनमें निर्धनतम व्‍यक्‍ति शामिल हैं, 35 किलोग्राम खाद्यान्‍न प्रति परिवार प्रति माह प्राप्‍त करते रहेंगे। 

दरअसल, यह क़ानून राईट टू फ़ूड (भोजन का अधिकार) आन्दोलन को देखते हुए और गरीबों को भोजन मिलता रहे, इसे ध्यान में रखते हुए बनाया गया था। तब कांग्रेस के जमाने में जानने के अधिकार, रोजगार के अधिकार, जमीन के अधिकार, जंगल के अधिकार, खाने के अधिकार जैसे मुद्दों पर भी जनआन्दोलन हो जाया करते थे और कमोबेश सरकार इन मांगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मान भी लेती थी। मसलन, वनाधिकार कानून, सूचना का अधिकार कानून, खाद्य सुरक्षा क़ानून आदि। तो अब तक यह स्पष्ट हो गया कि उत्तर प्रदेश में जिस लाभार्थी समूह के बारे में कहा जा रहा है कि इन्हीं की बदौलत भाजपा फिर से सत्ता में वापस आई, उस लाभार्थी समूह के पास कांग्रेस द्वारा पारित क़ानून के तहत बने हुए राशन कार्ड हैं। इस क़ानून के तहत ऐसे कार्डधारियों को 1 से 3 रुपये किलो अनाज मिलता है। (यह कितना फ्री है, आगे देखते है)। 

अखिलेश की तस्वीर  

चुनावी राजनीति में जब तस्वीरों का ही महत्व है, प्रोपेगेंडा ही सत्य है, तो अगर आप गौर से देखेंगे तो इन कार्ड्स पर आपको तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तस्वीरें मिलेंगी। चूंकि, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून को राज्य सरकारों के द्वारा क्रियान्वित किया जाता है और इसमें राज्य सरकार अपनी तरफ से भी रियायतें दे सकती है, इसलिए राज्य के मुखिया अपनी तस्वीर लगा सकते हैं। तो 2012 में यूपी में अखिलेश यादव सत्ता में आए थे, 2013 में यह क़ानून पास हुआ था, इसलिए अगले 4 साल तक यूपी में अखिलेश यादव ने बड़ी संख्या में अन्त्योदय राशन कार्ड्स पर अपनी तस्वीरें लगवाई। 

तो सवाल है कि क्या अखिलेश यादव को इसका फ़ायदा क्यों नहीं हुआ? क्या तस्वीरों का फ़ायदा नहीं होता? लेकिन यह भी सत्य है कि भाजपा ने जो फ्री राशन (नमक समेत) बटवाया, उस पर भी तो प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की तस्वीरें लगी थी? तो जब उनकी तस्वीरों ने चुनावी फ़ायदा पहुंचाया तो अखिलेश यादव को ये फ़ायदा क्यों नहीं मिला? 

यह सवाल इसलिए है कि मीडिया से ले कर अधिकतर राजनीतिक विश्लेषकों ने उत्तर प्रदेश में लाभार्थी नाम से एक मतदाता समूह की पहचान की थी। तो फिर ये लाभार्थी समूह क्या इतने अनजान और अज्ञानी थे, जिन्हें समझ नहीं आया कि उन्हें ये फ्री राशन क्यों और किस वजह से मिल पा रहा है? या कार्ड पर लगी अखिलेश यादव की तस्वीर भी लाभार्थी समूहों को अपनी तरफ खींचने में नाकामयाब रही। असल में मुद्दा ये है कि अगर तस्वीरें नियम बन चुकी हैं, तो भाजपा के लिए यह नियम सफल, अखिलेश यादव के लिए असफल कैसे रहा?

फ्री राशन और लाभार्थी समूह 
 

एक और कमाल की बात है। यह सच है कि राशन की चोरी अब पहले के मुकाबले घटी है। राशन अब ज्यादातर पात्र परिवारों को मिल पा रहा है और यह सब मुमकिन हुआ है थम इम्प्रेशन (अंगूठा निशान) तकनीक की वजह से, जो सीधे आधार कार्ड से जुडा है। यह वही आधार कार्ड है, जिसके खिलाफ संघ के मुखपत्रों में लंबे-लंबे आर्टिकल छपा करते थे। हालांकि बहुत से जनवादी लोगों और संगठनों ने भी आधार और अंगूठा निशान तकनीक पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि इसकी वजह से बहुत बुजुर्ग और अशक्त लोग राशन से वंचित भी रह गए।

खैर, मोदी सरकार ने जिस राशन को गरीबों के लिए फ्री किया है, वह राशन पहले से लगभग न के बराबर मूल्य पर गरीबों को मिल रहा था। मसलन, अन्त्योदय योजना के तहत 20 किलो गेहूं और 15 किलो चावल क्रमश: 2 और 3 रुपये किलो के हिसाब से मिलता है। अब अगर किसी परिवार को साल भर भी यह फ्री दिया जाए तो अधिकतम उस परिवार को 12 महीने में 85 रूपये प्रति महीने के हिसाब से 1020 रूपये देने होंगे। एक साल में 1020 यानी हर महीने 85 रूपये। इसी तरह पात्र गृहस्थी योजना के तहत प्रति कार्ड प्रति यूनिट 3 किलो गेहूं, 2 किलो चावल दिया जाता है। अब मान लीजिए, एक परिवार में 5 लोग है, तो उन्हें इस वक्त फ्री राशन योजना के तहत 25 किलो अन्न मिल रहा है, जिसकी कीमत 60 रुपये प्रति माह होगी। यानी, एक साल में एक परिवार को औसतन 720 रुपये का फ्री राशन मिल रहा है। तो क्या वाकई उत्तर प्रदेश के लाभार्थी समूह ने साल के 720 रुपये के फायदे के लिए अपने अन्य किसी भी समस्या (गरीबी-बेरोजगारी-महंगाई) को किनारे कर दिया, वह भी तब जब लाभार्थी समूह यह भी देख रहा था कि कार्ड कांग्रेस का बनाया हुआ है, तस्वीर अखिलेश यादव की है? 

निष्कर्ष: 

उपरोक्त तथ्यों को किनारे करते हुए “लाभार्थी समूह” ने भाजपा को सिर्फ और सिर्फ साल के 720 रुपये के फायदे के लिए वोट दिया होगा, ऐसा मानना न सिर्फ गलत होगा, बल्कि उस सच्चाई से मुंह फेरना भी होगा, जिसे शायद हम अब तक न देख पा रहे है या न स्वीकार कर पा रहे हैं। यह राजनीतिक खेल “फ्री राशन” से कहीं आगे जा कर “मानसिकता” के स्तर तक पहुँच चुका है। ऐसे में, अपनी ही उपलब्धियों को लोगों तक सही ढंग से न पहुंचा सकने वाली कांग्रेस क्या “मानसिकता” के स्तर तक पहुँच चुके इस राजनीतिक खेल में टिकी रह पाएगी? 

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Uttar pradesh
AKHILESH YADAV
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Welfare Schemes
up govt
Yogi Adityanath

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