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वास्तव में 5 प्रतिशत से भी कम है जीडीपी की दर?
हमारे आर्थिक विकास दर के आंकड़ों की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें असंगठित क्षेत्र की स्थिति को शामिल करने का तरीका स्पष्ट नहीं है। इसकी वजह से सही निष्कर्ष नहीं निकलते हैं।
अजय कुमार
17 Sep 2019
GDP
Image courtesy: Prabhasakshi

पिछली पांच तिमाही से आर्थिक वृद्धि की दर में लगातार गिरावट हो रही है। यह 8 फीसदी से गिरकर 7 फीसदी हुई, 7 फीसदी से गिरकर 6.6 फीसदी हुई, 6.6 फीसदी से गिरकर 5.8 फीसदी हुई और 5.8 फीसदी से गिरकर मौजूदा समय में 5 फीसदी पर पहंच चुकी है। फिर भी बहुत सारे विशेषज्ञों का कहना है कि इस वित्त वर्ष के अंत तक आर्थिक वृद्धि दर तकरीबन 7 फीसदी पहुँच जायेगी।

इसी तरह इकनोमिक सर्वे का भी कहना था कि इस साल आर्थिक वृद्धि दर तकरीबन 7 फीसदी रह सकती है।आरबीआई ने अपने अगस्त के नीतिगत प्रपत्र में यह बताया कि यह तकरीबन 6.9 फीसदी रह सकता है। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो यह वृद्धि दर ऐसी है, जिसमें देश में निवेश भी होना चाहिए और खपत भी होना चाहिए। यानी अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक होनी चाहिए। लेकिन क्या ऐसा है ? इस समय अर्थव्यवस्था की बुरी हालत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आंकड़ें सही तस्वीर पैदा नहीं कर रहे है।

आर्थिक वृद्धि दर की मौजूदा स्थिति और अर्थव्यवस्था से जुड़े प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा साल के अंत तक इस तरह के आर्थिक वृद्धि दर के आकलन पर न्यूज़क्लिक से बात करते हुए अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि अर्थव्यवस्था से जुडी सारी संस्थाएं सरकार की यानी आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल करती है। इनके पास कोई स्वतंत्र आंकड़ों का स्रोत नहीं होता है। सरकार अपनी छवि को बेहतर दिखाने के लिए आंकड़ों के साथ हेर-फेर करती रहती है। इसलिए जिस तरह से यह आंकड़ें अपनी व्याख्या करते हैं, उसी तरह के निष्कर्ष निकलकर सामने आते हैं।

इसलिए सवाल उठता है कि 5 से 6 फीसदी की आर्थिक वृद्धि दर के बावजूद देश में निवेश क्यों नहीं हो रहा है? खपत यानी खर्चा रुक क्यों रुक गया है? आखरिकार यह विकास दर जा कहाँ रही है। इसलिए इसकी दूसरी व्याख्या तो यही हो सकती है कि विकास दर 5 फीसदी से नीचे है। पिछले कई सालों से निवेश दर 30 फीसदी के आसपास ही रहा है। जो पहले 30 फीसदी से अधिक हो होता था। यानी पिछले कुछ सालों अर्थव्यवस्था में केवल 30 फीसदी ही निवेश हो रहा है और बाकी रोजाना के काम या यूँ कहें कि वर्किंग कैपिटल के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। फिर भी इस निवेश का केवल 75 फीसदी ही उपयोग किया जा रहा है। यानी निवेश बहुत सालों से रुका हुआ है और इसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

आसान शब्दों में कहें तो मारुती अगर 100 कार बना सकती है तो वह मौजूदा समय में केवल 75 कार बना रही है। कहने का मतलब है कि कंपनियों के पास मौजूदा क्षमताओं का पहले से ही उपयोग नहीं हो रहा है। यानी पूंजी का पूरा इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इसलिए मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी प्राइवेट लिमिटेड भी दर्शाता है कि इस समय निवेश के प्रस्ताव पिछले 14 साल में सबसे कम है।

निवेश दर के कम होने से और निवेश का पूरी तरह से इस्तेमाल न हो पाने की वजह से यह बात तो साफ है कि जिस तरह से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा आर्थिक प्रोत्साहन ( Economic Stimules) का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे अर्थव्यवस्था की मूल परेशानियों का हल नहीं निकल सकता है। क्योंकि जब यह बात साफ तौर पर सामने है कि पहले से लगाए गए पैसे यानी निवेश का ही जब पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है तो आर्थिक प्रोत्साहनों को क्यों कोई कम्पनी लगाना चाहेगी ? और अगर लगाती भी है तो न ही उसके मौजूदा क्षमता का दोहन होगा और न ही वह वह मुनाफा कमा पाएगी। यानी मारुति अपने 100 कारों को ही नहीं बेच पा रही है तो अधिक कारों का उत्पादन क्यों करेगी। सीधे सीधे कहा जाए तो अर्थव्यवस्था में मांग की कमी है। सरकार अर्थव्यवस्था के उस स्रोत पर हमला नहीं कर रही है, जहां से परेशानियां पैदा हो रही है।

हमारे आर्थिक विकास दर के आंकड़ों की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें असंगठित क्षेत्र की स्थिति को शामिल करने का तरीका स्पष्ट नहीं है। इसकी वजह से सही निष्कर्ष नहीं निकलते हैं। यहाँ से देश की तकरीबन 94 फीसदी जनताा अपना जीवन चलाती है और देश की जीडीपी में जिसकी 45 फीसदी भागीदारी है।  असंगठित क्षेत्र के आंकड़े पांच साल में एक बार इकट्ठा किये जाते हैं। क्योंकि यहां लाखों इकाई काम करती हैं, इसलिए तिमाही, छमाही और सालाना समय में इनके आंकड़ें इकठ्ठा करना मुश्किल होता है। इसलिए इस क्षेत्र के अनुमान मौजूदा आर्थिक मान्यताओं और प्रवृत्तियों पर आधारित होता है।

असंगठित क्षेत्र में आर्थिक मान्यताओं और प्रवृत्तियों के लिए चूँकि संगठित क्षेत्र से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इन आंकड़ों से ही समझा जाता है कि असंगठित क्षेत्र की स्थिति क्या होगी?

असंगठित क्षेत्र के मुद्दे पर अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि चूँकि पिछले तीन सालों से अर्थव्यवस्था की गति ढलान पर है। नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र की स्थिति और बदतर हुई। इसलिए संगठित क्षेत्र के आंकड़ों से मिली प्रवृतियों से असंगठित क्षेत्र का अनुमान करना बहुत मुश्किल है। और यह सही तस्वीर भी प्रस्तुत नहीं करते हैं। असंगठित क्षेत्र की स्थिति समझने के लिए दूसरी जगहों से मिली प्रवृत्तियों की तरफ ध्यान देना जरूरी है। कामगारों की संख्या में हो रही कमी, मनरेगा के तहत रोजगार पाने की बढ़ती चाह, कृषि क्षेत्र में आमदनी में हो रही गिरावट इस तरफ इशारा करती है कि असंगठित क्षेत्र में 10 फीसदी से भी अधिक की गिरावट हुई है। और अगर इसे जोड़ लिया जाए तो जीडीपी की दर और 5 फीसदी से भी कम हो सकती है।

इससे पहले सरकार के मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी कहा था कि जीडीपी की गणना का नया तरीका विकास दर को काफ़ी हद तक बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के लिए है। वास्तव में, यह दर्शाता है कि 2011-2016 की अवधि की विकास दर सभी कई अन्य संकेतकों के तहत है, इसकी वजह से जीडीपी बढ़ती हुई नज़र आ रही है। जबकि सच्चाई यह थी कि दूसरे अन्य संकेतकों में गिरावट हो रही थी। इसके आधार पर सुब्रमण्यन ने अनुमान लगया था कि जीडीपी  ओवरएस्टिमेशन की डिग्री लगभग 2.5 प्रतिशत की रही है। आधिकारिक तौर पर दावा किए गए 7 प्रतिशत की विकास दर के बजाय, सही वृद्धि दर लगभग 4.5 प्रतिशत की है, वास्तव में यह 3.5 प्रतिशत और 5.5 प्रतिशत के बीच कहीं भी ठहर सकती है।

मौजूदा स्थिति में यह साफ है कि जीडीपी के आंकड़ें सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं। जब तक आंकड़ें सही नहीं मिलेंगे तब तक मंदी से उबरने की सरकार की स्पष्ट रणनीति नहीं बनेगी। मौजूदा समय में राजकोषीय घाटे को 3.3 फीसदी तक रखने के लिए सरकार सारे उपाय कर रही है। इसलिए रिज़र्व बैंक के 1.76 लाख करोड़ रुपये का भी इस्तेमाल हुआ है। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि राज्यों और पब्लिक सेक्टर यूनिटों का कुल राजकोषीय घाटा इस समय तकरीबन 9 फीसदी के  आसपास है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने सिद्धांत दिया था कि मंदी के दौरान सरकारों को घाटे की चिंता छोड़ कर खर्च बढ़ाना चाहिए। सरकार के खर्च से मांग बढ़ेगी और निजी निवेश आएगा। लेकिन मौजूदा आंकड़ें बताते हैं कि स्थिति बदतर है।  बीते  सप्ताह वित्त राज्‍य मंत्री अनुराग ठाकुर यह कहते सुने गए कि मांग बढ़े इसके लिए राज्यों को टैक्स कम करना चाहिए। अगर मंदी से लड़ने का सरकार का यही तरीका है तो मंदी की मार अर्थव्यवस्था को और खराब कर सकती है। मंदी से उबरने के लिए सरकार को इससे ज्यादा खर्च करने की जरूरत होगी।  इसके लिए राजनितिक इरादे की तो जरूरत होगी ही साथ ही साथ उन आंकड़ों की भी जरूरत होगी जिनसे जीडीपी की सही तस्वीर निकलकर सामने आये।   

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