NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
कोविड-19
नज़रिया
मज़दूर-किसान
समाज
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
मृत्यु महोत्सव के बाद टीका उत्सव; हर पल देश के साथ छल, छद्म और कपट
गुजरे सप्ताह आई बैंक ऋणों के "समझौतों" की खबरों में दर्ज आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इन कर्ज माफी ने बैंकों को (मतलब जनता और सरकार को) 2 लाख 79 हजार 971 करोड़ रुपयों का चूना लगा दिया है।
बादल सरोज
25 Jun 2021
Modi

महामारी की तीसरी लहर के आने की आशंकाओं, जिनकी अब डेल्टा वैरिएंट के नाम पर पहचान तथा अधिकृत पुष्टि भी हो गयी है, के बीच जनता को किसी भी तरह की राहत देने से मोदी सरकार ने ठोक के मना कर दिया है। मोदी सरकार की कुव्यवस्था, ऊपर से उसके राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन क़ानून के बाध्यकारी प्रावधानों से मुकरने के कारण जनता को काफी नुकसान झेलना पड़ा  है। कोरोना को बाहर से आयी और लगातार आने वाली विपदा बताकर एक तरह से उसने इसे महामारी या राष्ट्रीय आपदा तक मानने से भी इंकार कर दिया है। जिस देश में इस महामारी के कालखण्ड में करीब 50 लाख से ज्यादा मौतें हुयी हों (गुजरात से मध्यप्रदेश तक मौतों की असली संख्या को छुपाने के आपराधिक धतकरम हर रोज उजागर हो रहे हैं किन्तु इसके बाद भी सरकारी आंकड़ा अभी 4 लाख तक भी नहीं पहुंचा है)। 

घर के कमाने वालों की मौतों के चलते लाखों परिवारों को दो जून के खाने और जिंदगी बचाने के लाले पड़े हों, दसियों हजार बच्चे-बच्चियां अनाथ और बेसहारा हो गए हों, जिस देश में मात्र एक साल की महामारी में गरीबी रेखा के नीचे जीवन काटने को अभिशप्त नागरिकों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ गयी हो, उस देश की सरकार का नकद राहत और मुआवजा देने को लेकर अपनाया गया यह निर्मम रवैया सभ्य समाज को हतप्रभ करने वाला है।  खासतौर से उसका यह दावा कि प्रत्येक मौत पर 4-5 लाख रुपयों का मुआवजा देने की वित्तीय क्षमता उसकी नहीं है क्योंकि राजकोष में इतना पैसा ही नहीं है; खुद उसके हालिया बर्ताव और कुछ चुनिन्दा कामों, लोगों के लिए खैरात बांटने के जाहिर उजागर कारनामों से मेल नहीं खाता है।     

राजधानी दिल्ली की प्रतीक पहचान रही मजबूत इमारतों को तोड़कर मोदी-महल सहित सेन्ट्रल विस्टा बनाने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये फूंकने की बात पुरानी हो चुकी है।  हर रोज इसी तरह के अपव्यय और अमानत में खयानत के नए हादसे सामने आते रहते हैं। गुजरे सप्ताह आई बैंक ऋणों के "समझौतों" की खबरों में दर्ज आंकड़े चौंकाने वाले हैं।  पूरी सूची की माफ़ की गयी रकम के विस्तार में न जाएं और सिर्फ 12 बड़े बड़ों की ही बात करें तो उनकी कर्ज माफी ने बैंकों को (मतलब जनता और सरकार को)  2 लाख 79 हजार 971 करोड़ रुपयों का चूना लगा दिया।  इन 12 कंपनियों पर कुल बकाया था 4 लाख 42 हजार, 827 करोड़ रुपया - जिसमे से कुल जमा 1 लाख 62 हजार 856 करोड़ रुपये देने पर बाकी को माफ़ करने का समझौता कर लिया गया। ध्यान रहे कि यह रकम 2019 में कॉरपोरेट कंपनियों के माफ़ किये गए कर्जों की करीब दो लाख करोड़ रुपयों की राशि से अलग है।  यह घपला कितना विराट है इसे एक कम्पनी - शिवा इंडस्ट्रीज - के उदाहरण से समझा जा सकता है।  इस कंपनी पर बैंकों का बकाया था 4,863 करोड़ - "समझौते" में निर्णय हुआ कि कम्पनी सिर्फ 323 करोड़ चुकायेगी बाकी माफ़ कर दिए जाएंगे।  ये 323 करोड़ रुपये बकाया रकम का मात्र 6.5%  हैं, जो एक साल की ब्याज से भी कम हैं। यह समझौता या बाकी ऐसे सभी समझौते भागते भूत की लंगोटी भली जैसी कहावतों को भी पीछे छोड़ उन्हें चोर को तिजोरी थमाने और उसे भी खुद अपने कन्धों पर लादकर उसके घर तक पहुंचाने वाले हैं।  स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के विरोध के बावजूद इन बड़ी कारपोरेट कंपनियों को इतनी विराट राशि की "छूट"  बिना राजनीतिक नेतृत्व; मोदी-शाह और निर्मला के अनिर्मल अनुमोदन के बिना संभव नहीं है।  अचरज की बात नहीं है कि किसानों की कर्जामुक्ति और सब्सिडी की इनकी तुलना में ज़रा सी राशि पर रो रोकर आकाश गुंजाने वाले इस तरह की लूट पर सुबकते भी नहीं हैं। आखिर उन्हें राजा का बाजा बजाने के लिए ही तो छोड़ा गया है।  इसकी कीमत छोटे और मंझोले उद्योग धंधों को भी चुकानी पड़ रही हैं। इन रोजगार सघन उद्यमों को मिलने वाला बैंक ऋण लगातार घटता जा रहा है।   

जिस देश की सरकार के पास आपदा के शिकार भारतीयों को राहत और मुआवजे के रूप में देने के लिए अठन्नी तक नहीं है उस देश में लुटेरी कमाई की बाढ़ आयी हुयी है।  यह अम्बानी की दौलत का 90 करोड़ और अदानी की सम्पदा का 120 करोड़ रुपया  प्रति घंटा तक पहुंच जाने तक ही नहीं रुकी है। इसकी रिसन ने अब स्विस बैंक की तिजोरियों को भी लबालब भर दिया है।  अवैध कमाई को छुपाने का स्वर्ग मानी जाने वाली स्विस बैंक में भारतीय व्यक्तियों और फर्मों की जमा राशि में जबरदस्त उछाल आया है और सारी मदों को जोड़ लिया जाए तो यह 13 वर्ष की सबसे बड़ी रकम बन गया है।  काले धन को वापस लाने की घनगरज-ज्यों ज्यों दिन की बात की गयी त्यों त्यों रात हुई की गत में पहुंच कर काले धन का भण्डार बढ़ाने की स्थिति तक आ गयी है। 

ठीक इस बीच कोरोना की तीसरी लहर के आने की आशंका क्या कहर ढाएगी यह समझा जा सकता है। पहली लहर में ताली-थाली बजाने और दूसरी के वक़्त आंखें चुराकर मौतें बुलाने वाले  तीसरी की आशंका के समय खाली जेब और सूना खजाना दिखा रहे हैं। यह शुद्द आदमखोरी नरसंहारी मानसिकता है। 

गोयबल्सी गुरुकुल में शिक्षित दीक्षित गिरोह ने इस सबके खिलाफ उठने वाले जन-रोष की जो  काट ढूंढ़ निकाली है वह दोमुंही है।  पहली हेल हिटलर की तर्ज पर  उसकी खराब कार्बन कॉपी "वाह मोदी जी वाह"  से आकाश गुंजाने की है।  फ़ौरन वैक्सीन दिए जाने की अनेक राज्य सरकारों की मांगों और वैक्सीनेशन के लिए बजट में रखे गए 35 हजार करोड़ रुपयों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा किये गए  जवाबतलब के दबाव में मोदी सरकार मुफ्त टीकाकरण की घोषणा करने के लिए मजबूर हुयी।  इसका ऐलान करने के लिए टेलीविज़न पर अवतरित हुए प्रधानमंत्री ने फ्री शब्दों को इतनी बार दोहराया जैसे वाकई सब कुछ फ्री होने वाला है। उत्सवी मानसिकता का विद्रूप प्रदर्शन करते हुए होर्डिंगों-विज्ञापनों से सारा देश पाट दिया और अब तक की नाकामियों को भुलाने के लिए लोगों को मंत्रबिद्ध करने के सारे उपाय आजमा लिए। लेकिन अपराध इतने बड़े और जघन्य तथा महामारी इतनी  निरंतर और अनन्य हैं कि उन्हें सहज ही नहीं भुलाया जा सकता। दूसरी साम्प्रदायिक और अन्य आधारों पर अपने ही देश के लोगों को बांटने और ध्रुवीकरण करने की अनेकों बार आजमायी हुयी कुटिलता है।  इसे उत्तर प्रदेश से हरियाणा तक प्रायोजित हत्याओं और उपद्रवों में देखा जा सकता है।  

मगर इस बार लोग झांसे में आते नहीं दिख रहे।  जिस तरह दर्द जब हद से गुजरता है तो दवा हो जाता है, जिस तरह काठ की हांड़ी बार बार नहीं चढ़ती, उसी तरह अब भारत के अधिकांश नागरिक चाल-चरित्र-चेहरे की बात करने वाली भाजपा-आरएसएस के छल-छद्म और कपट  को समझ चुके हैं। कुछ महीनों बाद होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर शासक गिरोह की फूंक सरकी हुयी है।  यह समय है जब जनता के आंदोलनों ने अपनी रफ़्तार तेज की है।  किसान आंदोलन नए आह्वानों के साथ आया है, मजदूर कर्मचारियों ने उनका साथ देते हुए नए नए मोर्चे खोले हैं।  रक्षा उत्पादक उद्योगों से लेकर प्रोजेक्ट कर्मियों तक संघर्ष नयी ऊंचाई पर पहुंचा है। रोजगार के सवाल पर बिहार और उत्तरप्रदेश से युवाओं की स्वतःस्फूर्त हलचल लगातार तेज से तेजतर हो रही है।  ईंधन वाले और खाने वाले तेलों की आपस में होड़ करती दौड़ से आसमान छूती महंगाई के विरुद्ध जगह-जगह विरोध कार्रवाई लोगों के बीच दिखाई दे रहे इन्हीं जागरणों के उदाहरण हैं। 

दीवार पर साफ़ साफ़ लिखा है कि आने वाले दिन हुक्मरानों के नहीं, जनता के अच्छे दिन होने जा रहे हैं।

Narendra modi
Covid-19 Vaccination
COVID-19
Coronavirus
Central Vista
black money
bad loans

Related Stories

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

क्या पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर के लिए भारत की संप्रभुता को गिरवी रख दिया गया है?

क्या चोर रास्ते से फिर लाए जाएंगे कृषि क़ानून!

“भारत के सबसे लोकतांत्रिक नेता” के नेतृत्व में सबसे अलोकतांत्रिक कानून-निर्माण पर एक नज़र

फादर स्टेन की मौत के मामले में कोर्ट की भूमिका का स्वतंत्र परीक्षण जरूरी

संपत्ति अधिकार और महामारी से मौतें

पीएम का यू-टर्न स्वागत योग्य, लेकिन भारत का वैक्सीन संकट अब भी बरकरार है

राज्य लोगों को स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए संविधान से बाध्य है

ग़ैर मुस्लिम शरणार्थियों को पांच राज्यों में नागरिकता

कोविड सिलसिले में दो हाई कोर्ट के तीन आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट की सिलसिलेवार रोक


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License