NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विधानसभा नतीज़े: भाजपा को एससी/एसटी और शहरी मतदाता ले डूबे
विस्तृत परिणामों के विश्लेषण से पता चलता है कि इन वर्गों के बीच बीजेपी वोट शेयर में उल्लेखनीय रूप से गिरावट आई है, जो इन वर्गों से भाजपा के अलगाव को दर्शाता है।
सुबोध वर्मा
15 Dec 2018
Translated by महेश कुमार
dalit protest

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर बुरी तरह से हार गई है, जो 2013 के विधानसभा चुनावों के बाद इन चुनावों  में एक नाटकीय परिवर्तन को दर्शाती है। इससे भी ज़्यादा मारक बात यह है कि शहरी और अर्ध शहरी सीटों में भी उसकी ज़मीन खिसकी है, यह भी तीनों राज्यों में स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि शहरी मध्य वर्ग में भी इसका पारंपरिक आधार तेज़ी से खत्म हो रहा है। इससे यह भी पता चलता है कि बीजेपी का सांप्रदायिक प्रचार इन वर्गों के मतदाताओं को आकर्षित करने में ना कामयाब रहा है जो पहले इस तरह की रणनीति से काफी प्रभावित होते थे।

निम्नलिखित अनुभागों में उपयोग किये गए डेटा को चुनाव आयोग के डेटा कई साथ विश्लेषण उपकरण के माध्यम से किया गया है जिसे विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है और यहां न्यूज़क्लिक द्वारा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया गया है।

दलित और आदिवासी गुस्सा 
मध्य प्रदेश में, बीजेपी ने 2013 में 82 आरक्षित सीटों में से 59 पर जीत दर्ज़ की थी। लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में, इन सीटों में इसका आंकड़ा सिर्फ 34 हो गया – यानि 25 सीटों का नुकसान। इन सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर 4 प्रतिशत कम हो गया। राजस्थान में, राज्य की 59 आरक्षित सीटों में बीजेपी का आंकड़ा 2013 में 50 से कम होकर 21 रह गया। यहां 29 सीटों का नुकसान और लगभग 6 प्रतिशत वोट कम हुए। छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से आदिवासी बहुल राज्य में, 39 आरक्षित सीटों में बीजेपी का आंकड़ा पिछली बार के मुकाबले 5 रह गया, जबकि इसका वोट शेयर 8 प्रतिशत से अधिक गिर गया।

लित और आदिवासी समर्थन में इस तरह की गंभीर गिरावट क्यों? उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति रोकथाम अधिनियम (पीओए) को बेअसर करने में बीजेपी की मिलिभगत और जल्द ही इसके सम्बंध में कानूनी उपाय लाने में इसकी द्विपक्षीयता सबसे तात्कालिक कारण था। लेकिन इससे पहले दलितों और आदिवासियों के बीच बीजेपी और संघ परिवार के प्रति संदेह बढ़ रहा था क्योंकि संघ परिवार ने जैसे उनके खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था । जैसे कि अत्याचारों की बढ़ती संख्या, गाय रक्षा के नाम पर हमले, वन के लिए कार्यान्वयन अधिकार अधिनियम (एफआरए) को लागू न करना  इन समुदायों के लिए विशेष बजटीय आवंटन में कटौती इत्यादि करना शामिल है। चूंकि बीजेपी द्वारा इन वर्गों से समर्थन पाने के प्रयासों में ऐसे पारदर्शी रूप से तुच्छ और संवेदनात्मक कृत्य शामिल थे, जैसे कि उनके सांसदों द्वारा दलित परिवार के साथ भोजन करने या और ऐसे अन्य स्टंट जैसे रात बिताना आदि शामिल थे, इससे अलगाव बढ़ना जारी रहा और बढ़ता गया। इसका असर अगले साल होने वाले लोक सभा चुनावों पर भी होगा । 

शहरी और अर्ध शहरी अलगाव 

मोदी सरकार की नीतियों का एक अन्य नुकसान यह रहा कि इन तीनों राज्यों में शहरी और अर्ध शहरी मतदाताओं में बीजेपी के खिलाफ असंतोष बढ़ा है। यह एक अप्रत्याशित घटना है क्योंकि इस महत्वपूर्ण मध्यम वर्ग वाले शहरी क्षेत्रों को हमेशा सांप्रदायिक विचारधारा से ओत-प्रोत रहे हैं और साथ ही उदार आर्थिक नीतियों (जैसे निजीकरण) के बीजेपी ब्रांड के समर्थन के रूप में देखा जाता था। लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि यह गढ़ टूट रहा है।

मध्य प्रदेश में, बीजेपी ने 2013 में 22 शहरी सीटों में से 20 पर जीत दर्ज़ की थी। यह आंकड़े लगभग आधा हो गया क्योंकि वह इनमें से 9 सीटें हार गईं। इसका शहरी वोट शेयर 6 प्रतिशत तक गिर गया है। राजस्थान में भी, बीजेपी ने शहरी इलाकों में 2013 में 19 सीटों में से 18 पर जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार, इनमें से 8 सीटें हार गईं, जबकि वोट में 9 प्रतिशत की कमी आई है। छत्तीसगढ़ में, 8 शहरी सीटों में से, बीजेपी ने 2013 में 6 जीती थी, लेकिन इस बार उनमें से चार में हार गई, और 6 प्रतिशत से अधिक मत भाजपा से टूट गए I

अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में, कहानी समान है हालांकि बिल्कुल वही नहीं है। छत्तीसगढ़ में, कुल 19 अर्द्ध शहरी सीटों में से, बीजेपी ने 5 सीटें गंवा दीं हैं, 2013 के मुकाबले 12 सीट से 7 हो गईं है, और इसके वोट शेयर में लगभग 7 प्रतिशत की कमी आई। यह शहरी सीटों में होने वाले वोटों के नुकसान के सम्बंध में मोटे तौर पर तुलनीय है। लेकिन 25 अर्ध शहरी सीटों में से राजस्थान में, बीजेपी को 2013 में मिली 19 सीटों में से 13 की गिरावट आई थी। मध्य प्रदेश में 23 अर्ध शहरी सीटें हैं, जिनमें से भाजपा 2013 में 18 मिली थी। इनमें से इसने  2018 में 5 सीट खो दी हैं, और इसके वोट शेयर में लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट आई है।

स्पष्ट रूप से, अर्द्ध शहरी खंडों में, भाजपा के नुकसान असमान हैं, छत्तीसगढ़ वोट शेयर के मामले में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, और सीटों के मामले में, एमपी और राजस्थानमें कम असंतोष दिखाता हैं। यह छत्तीसगढ़ की अर्द्ध शहरी सीटों में बड़े ग्रामीण प्रभाव के कारण हो सकता है।

जो कुछ भी हो, शहरी इलाकों में बीजेपी का नुकसान राजस्थान और मध्य प्रदेश में अर्द्ध शहरी या यहां तक कि ग्रामीण इलाकों के मुकाबले ज्यादा रहा है। यह संभवतः नोटबंदी और गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के जुड़वां आपदाओं के प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, जिस पर व्यापारियों और छोटे व्यवसायों पर बहुत अधिक दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा है। दलित / आदिवासी वोटों के साथ-साथ शहरी / अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी गिरावट यह इंगित करता है कि सांप्रदायिक कार्ड – जिसे बीजेपी के मुख्य प्रचारक योगी आदित्यनाथ सबसे अच्छा खेलते है – ने लोगो के इन वर्गों में काम नहीं किया है। वास्तविक जीवन के मुद्दे - अत्याचार, भेदभाव, नोटबंदी, जीएसटी - असली मुद्दे हैं, न कि वादे किया गया राम मंदिर।

Assembly elections 2018
BJP Defeat
SC/ST Act
Dalits
Adivasi
Madhya Pradesh
Rajasthan

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

परिक्रमा वासियों की नज़र से नर्मदा

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

कड़ी मेहनत से तेंदूपत्ता तोड़ने के बावजूद नहीं मिलता वाजिब दाम!  

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

15 राज्यों की 57 सीटों पर राज्यसभा चुनाव; कैसे चुने जाते हैं सांसद, यहां समझिए...

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?


बाकी खबरें

  • आज का कार्टून
    आम आदमी जाए तो कहाँ जाए!
    05 May 2022
    महंगाई की मार भी गज़ब होती है। अगर महंगाई को नियंत्रित न किया जाए तो मार आम आदमी पर पड़ती है और अगर महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश की जाए तब भी मार आम आदमी पर पड़ती है।
  • एस एन साहू 
    श्रम मुद्दों पर भारतीय इतिहास और संविधान सभा के परिप्रेक्ष्य
    05 May 2022
    प्रगतिशील तरीके से श्रम मुद्दों को उठाने का भारत का रिकॉर्ड मई दिवस 1 मई,1891 को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरूआत से पहले का है।
  • विजय विनीत
    मिड-डे मील में व्यवस्था के बाद कैंसर से जंग लड़ने वाले पूर्वांचल के जांबाज़ पत्रकार पवन जायसवाल के साथ 'उम्मीदों की मौत'
    05 May 2022
    जांबाज़ पत्रकार पवन जायसवाल की प्राण रक्षा के लिए न मोदी-योगी सरकार आगे आई और न ही नौकरशाही। नतीजा, पत्रकार पवन जायसवाल के मौत की चीख़ बनारस के एक निजी अस्पताल में गूंजी और आंसू बहकर सामने आई।
  • सुकुमार मुरलीधरन
    भारतीय मीडिया : बेड़ियों में जकड़ा और जासूसी का शिकार
    05 May 2022
    विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय मीडिया पर लागू किए जा रहे नागवार नये नियमों और ख़ासकर डिजिटल डोमेन में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों और अवसरों की एक जांच-पड़ताल।
  • ज़ाहिद ख़ान
    नौशाद : जिनके संगीत में मिट्टी की सुगंध और ज़िंदगी की शक्ल थी
    05 May 2022
    नौशाद, हिंदी सिनेमा के ऐसे जगमगाते सितारे हैं, जो अपने संगीत से आज भी दिलों को मुनव्वर करते हैं। नौशाद की पुण्यतिथि पर पेश है उनके जीवन और काम से जुड़ी बातें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License