NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
विशेष : स्कीम वर्कर बदल सकते हैं चुनाव 2019 की तस्वीर
इस बार सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियन के साथ ही स्कीम वर्कर फेडरेशन ने भी भाजपा और मोदी हटाने का ऐलान किया है। इसके लिए सभी आंगनवाड़ी और आशाकर्मी घर घर जाकर लोगों को बताएंगे कि कैसे मोदी सरकार ने सभी सामाजिक सुरक्षा की योजना को खत्म करने की साज़िश की है।
मुकुंद झा
19 Mar 2019
स्कीम वर्कर
संकेतिक तश्वीर

देशभर में तकरीबन एक करोड़ स्कीम वर्कर हैं। मुख्यतया तीन तरह के स्कीम वर्कर जो आज ट्रेड यूनियन के द्वारा संगठित हैं। आशा,आंगनवाड़ी और मिड-डे मील वर्कर। इनकी संख्या तकरीबन 65  से 70  लाख होगी। इतनी बड़ी संख्या किसी भी चुनाव को प्रभावित करने के लिए काफी है, यही नहीं ये जो कर्मचारी हैं इनका कार्यस्वरूप ऐसा है  जिस कारण  इनकी पहुंच शहर  और गाँवो के घर-घर तक रहती है। इस लिहाज़ से चुनावों में इनकी अहमियत या भूमिका और अहम हो जाती है। 

यह बात सभी राजनीतिक दलों के  साथ ही  सत्ताधारी दल  भाजपा भी समझती है इसलिए  कोई भी इन्हें नाराज़ नहीं करना चाहता है। यह एक तरह की अदृश्य सेना है और ये जिसकी तरफ से लड़ेगी उसकी जीत और जिसके खिलाफ लड़ेगी उसकी हार लगभग तय दिख रही है।इन्होंने अपनी ताकत पिछले कई सालों में सड़कों पर उतर कर दिखाई भी है। इनके संघर्षों और आंदोलन का ही नतीजा है कि भाजपा सरकार जिसने अपने शासन के साढ़े चार सालो में इन कर्मचारियों के लिए कुछ नहीं किया लेकिन अपने आखिरी  अंतिरम  बजट में अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने आंगनवाड़ी और आशा कर्मियों के मानदेय में 50% की बढ़ोतरी की बात कही है। वो इसे ऐलान से इनके गुस्से को नियंत्रित करना चाहती थी लेकिन  इन कर्मचारियों ने साफ कहा की सरकार के इस बहकावे और झांसे में इसबार हम नहीं आएंगे। इसबार इस मज़दूर और कर्मचारी विरोधी सरकार को किसी भी कीमत में नहीं आने देंगे।

इसे भी पढ़े ;- कामकाजी महिलाओं ने जारी किया अपना घोषणापत्र

स्कीम वर्कर में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तथा सहायिका, मिड-डे-मील रसोइए, ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा (ASHA) तथा शहरी क्षेत्रों की स्वास्थ्य कार्यकर्ता ऊषा (USHA), तथा सरकार के कई अन्य योजनाओं में संलग्न कार्यकर्ता शामिल हैं। स्कूलों में कार्यरत शिक्षा मित्र समेत एएनएम योजना के कार्यकर्ता एवं आजीविका मिशन श्रमिक आदि मिलाकर विभिन्न योजनाओं से जुड़े हुए हैं। ऐसे लोग 43 साल से स्कीम  वर्कर काम कर रहे हैं लेकिन आजतक नौकरी की सुरक्षा नहीं है, यही नहीं अभी  तक इन्हे श्रमिक का दर्जा नहीं मिला है।

2 अक्तूबर 1975 को भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिल कर आईसीडीएस स्कीम (समन्वित बाल विकास योजना) शुरू की थी और उस समय माना गया था कि पूरे विश्व के एक तिहाई कुपोषित बच्चे और गर्भवती महिलाएं भारत में हैं।

पहले इसे यूनिसेफ़ की मदद से शुरू किया गया था। बाद में इसे केंद्र और राज्य सरकारों की 70-25 हिस्सेदारी में लाया गया। मोदी सरकार ने इसमें अपनी जिम्मेदारी को कम करते हुए राज्यों की हिस्सेदारी को बढ़ा कर 60-40 कर दिया है यानी इसमें काम के लिए 60 फ़ीसदी धन केंद्र और 40 फ़ीसदी राज्य सरकार देगी। 

जब आईसीडीएस के तहत स्कीम वर्कर को काम पर रखा गया था तब उनकी ज़िम्मेदारी 6 साल तक के बच्चों और महिलाओं के लिए काम करने की थी, लेकिन आज इसे अंब्रेला स्कीम बना दिया गया है। इसके अंदर मातृत्व सहयोग योजना, किशोरी योजना, पोषण अभियान, बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ अभियान सब जोड़ दिए हैं। 

इसे भी पढ़े ;- मज़दूर विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ आधी रात से देशव्यापी हड़ताल

कई और काम होते हैं जैसे वेलफ़ेयर स्कीम के सर्वे, धर्म, एनआरआई, किन्नरों का सर्वे, पशुओं की गणना, गांवों में शौचालयों के निर्माण की संख्या, गांव के भीतर पेंशन फ़ॉर्म भरना, कई राज्यों में राशन कार्ड बनाने के काम, बीपीएल का रिकॉर्ड भी इन्ही को रखना होता है। इसी के साथ इन्हें बीएलओ का काम भी सौंपा जाता है। काम के कुछ घंटे सरकार तय ज़रूर करती है लेकिन काम उन घंटों से कहीं अधिक होता है। या यूँ कहें कि स्कीम वर्कर का काम 24  घंटे होता है। 

यदि किसी  आशा या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के कार्य दिवस को देखें तो इनके अन्याय पूरी तरह स्पष्ट हो जाते हैं। किसी आशा से उम्मीद की जाती है कि वह अपने क्षेत्र के अंतर्गत गांवों के सभी निवासियों की स्वास्थ्य स्थिति की जांच करे। वह रोजाना चक्कर लगाती है और तत्काल चिकित्सा या अन्य सुविधाएं मुहैया कराती हैं। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य तथा सुरक्षित प्रसव में इनकी प्रमुख भूमिका है, आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को उचित समय पर अस्पताल पहुंचाती हैं। आशा कार्यकर्ता से गर्भनिरोधक व्यवस्था, बच्चों के प्रतिरक्षण तथा पोलियो ड्रॉप या डी-वर्मिंग टैबलेट जैसी नियमित अभियान वाली दवाओं के वितरण की उम्मीद की जाती है। अपने क्षेत्र में हर प्राधिकारियों के साथ बैठक में भाग लेने के अलावा वह दर्जनों रजिस्टरों में सभी गतिविधियों का पूरा रिकार्ड रखती हैं।

इसे भी पढ़े ;- मिड डे मील कर्मियों का दिल्ली में संसद मार्च, न्यूनतम वेतन और कर्मचारी का दर्जा मांगा

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तथा सहायिकाओं का काम सिर्फ डे-केयर सेंटर में शिशुओं की देखभाल करना है लेकिन उनका काम किशोर बच्चों,गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं की देखभाल, पोषण आदि तक बढ़ जाता है। मिड-डे-मील बनाने वाली कार्यकर्ता स्कूल में न केवल खाना बनाती हैं बल्कि स्कूलों में आवश्यक खाद्य वस्तुओं के संचयन, स्कूलों की सफाई और अन्य प्रकार के कामों में सहायता करती हैं।

क्या यह अंशकालिक स्वयंसेवक (वॉलिंटिर्स) के रूप में किया जा सकता है? 4500 और 2250 रुपये प्रतिमाह में कोई अपना गुज़ारा कैसे कर सकता है?"

आंगनवाड़ी में काम करने वालों को (जिनमें अधिकतर महिलाएं होती हैं) आज तक कर्मचारी ही नहीं माना गया बल्कि उन्हें स्वेच्छासेवी माना जाता है।  

अखिल भारतीय आंगनवाड़ी सेविका एवं सहायिका फेडरेशन (AIFAWH) की महासचिव एआर सिंधु बताती हैं कि स्कीम वर्कर का अपने अपने राज्यों में संघर्ष काफी समय से रहा है लेकिन पिछले 5  साल में जिस तरह से स्कीम वर्कर की मांगों  को नाकारा गया है, उनके ऊपर नीतिगत हमले बढ़े है वैसा पहले कभी नहीं हुआ। उनके मुताबिक आज़ाद भारत में मोदी की सरकार ही है जिसने पहली बार स्कीम वर्कर्स के  बजट में कटौती की है, इसके साथ ही इन स्कीम चाहे वो आंगनवाड़ी हो या मिड-डे मील सभी को निजी हाथों में देने की भी कोशिश की लेकिन हमारे संघर्षों के कारण सरकार यह नहीं कर सकी। 

उन्होंने कहा कि 5 साल पहले 2014  में लोगों ने भाजपा सरकार के वादों को देखखर उनका समर्थन किया था लेकिन इसबार उनके किये गए वादों को तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन करने के बाद  उनसे सवाल किए जाएंगे कि सरकार में रहते हुए हमारी मांगों और अपने वादों को लेकर कोई कदम क्यों नहीं उठाया? 

इसलिए चुनाव से पहले सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियन के साथ ही स्कीम वर्कर फेडरेशन ने भी भाजपा और मोदी हटाने का ऐलान किया है। 

इसके लिए सभी आंगनवाड़ी और आशाकर्मी घर घर जाकर लोगों को बताएंगे कि कैसे मोदी सरकार ने इन सभी सामाजिक सुरक्षा की योजना को खत्म करने की साज़िश की  है। अपने इस संघर्ष में सभी लाभार्थी को भी शामिल करेंगे। 

इसे भी पढ़े ;- बिहार और पंजाब में हज़ारों महिला कर्मचारियों का ज़ोरदार प्रदर्शन

इसके अलावा सरकार ने 2009  में मिड डे मेल कर्मियों को लिखित में आश्वासन दिया था कि उनका मानदेय 1500 से बढ़ाकर 3000 करेगी लेकिन सरकारों ने अभी तक एक रुपये की बढ़ोतरी नहीं की है। मिड  डे मिल कर्मचारी समाज के सबसे निचले तबके के हैं। इनकी हालत इतनी बुरी है कि स्कूल के शिक्षक इनसे बच्चों का खाना बनाने और खिलाने के अलावा स्कूल में साफ-सफाई भी कराते हैं। इतना ही नहीं कई कर्मचार्यो का तो कहना ही उनसे कई स्कूल प्रिंसिपल घर का भी काम कराते हैं। जो इन कर्मचारियों को मिलता है उसे वेतन या मानदेय भी कहना इन कर्मचारियों का अपमान होगा। 

सिंधु ने कहा कि सिर्फ यह हाल स्कीम वर्कर का ही नहीं बल्कि पैरा टीचर का भी यही हाल है, मोदी सरकार को मज़दूर और कर्मचारी विरोधी रवैया  उन्हें इस चुनाव में उलटा पड़ेगा। 

 

 

mid day meal workers
workers protest
Anganwadi Workers
scheme workers
ICDS
AIFAWH
Delhi
BJP
Narendra modi
modi sarkar
BJP Govt
Central Government
2019 आम चुनाव
General elections2019
working class

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: पंजाब पुलिस का दिल्ली में इस्तेमाल करते केजरीवाल

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!


बाकी खबरें

  • make in india
    बी. सिवरामन
    मोदी का मेक-इन-इंडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा श्रमिकों के शोषण का दूसरा नाम
    07 Jan 2022
    बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गिग कार्यकर्ता नई पीढ़ी के श्रमिक कहे जा सकते  हैं, लेकिन वे सीधे संघर्ष में उतरने के मामले में ऑटो व अन्य उच्च तकनीक वाले एमएनसी श्रमिकों से अब टक्कर लेने लगे हैं। 
  • municipal elections
    फर्राह साकिब
    बिहारः नगर निकाय चुनावों में अब राजनीतिक पार्टियां भी होंगी शामिल!
    07 Jan 2022
    ये नई व्यवस्था प्रक्रिया के लगभग अंतिम चरण में है। बिहार सरकार इस प्रस्ताव को विधि विभाग से मंज़ूरी मिलने के पश्चात राज्य मंत्रिपरिषद में लाने की तैयारी में है। सरकार की कैबिनेट की स्वीकृति के बाद इस…
  • Tigray
    एम. के. भद्रकुमार
    नवउपनिवेशवाद को हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका की याद सता रही है 
    07 Jan 2022
    हिंद महासागर को स्वेज नहर से जोड़ने वाले रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण लाल सागर पर अपने नियंत्रण को स्थापित करने की अमेरिकी रणनीति की पृष्ठभूमि में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की अफ्रीकी यात्रा काफी…
  • Supreme Court
    अजय कुमार
    EWS कोटे की ₹8 लाख की सीमा पर सुप्रीम कोर्ट को किस तरह के तर्कों का सामना करना पड़ा?
    07 Jan 2022
    आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को आरक्षण देने के लिए ₹8 लाख की सीमा केवल इस साल की परीक्षा के लिए लागू होगी। मार्च 2022 के तीसरे हफ्ते में आर्थिक तौर पर कमजोर सीमा के लिए निर्धारित क्राइटेरिया की वैधता पर…
  • bulli bai aap
    सना सुल्तान
    विचार: शाहीन बाग़ से डरकर रचा गया सुल्लीडील... बुल्लीडील
    07 Jan 2022
    "इन साज़िशों से मुस्लिम औरतें ख़ासतौर से हम जैसी नौजवान लड़कियां ख़ौफ़ज़दा नहीं हुईं हैं, बल्कि हमारी आवाज़ और बुलंद हुई है।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License