NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
विश्व बैंक की झूठी प्रशंसा से मोदी खुश क्यों?
विश्व बैंक का एक ऐसा अध्ययन जो ढलती अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोज़गारी को नज़रंदाज़ करता है और 'आर्थिक सुधार' की प्रशंसा करता है.
सुबोध वर्मा
03 Nov 2017
Translated by महेश कुमार
वर्ल्ड बैंक की झूठी तारीफ

विश्व बैंक और भारत की मोदी सरकार के बीच लगता है कुछ खासी नजदीकियां बढ़ रही हैं . विश्व बैंक द्वारा जारी कई रपटों में मोदी सरकार के “सुधारों” की तारीफ़ की गयी है. हाल ही की रपट में “व्यापर करने” के बारे में इस बात के लिए काफी तारीफ की गयी हैं कि मोदी सरकार ने भारत में व्यापार करना आसान कर दिया है. यह रपट, जोकि पिछले 19 वर्ष से जारी की जाती है, में कहा गया है कि मोदी का भारत 190 देशों में 130 के अपने स्थान से ऊपर उठ कर 100वें स्थान पर आ गया है. मोदी ने अपनी हुई इस तारीफ़ को तुरंत ही ट्वीट कर दिया.

रपट कहती है कि व्यापार शुरू करने के लिए भारतीय बाज़ार व्यापार और मुनाफा अर्जित करने  के अनुकूल है. रपट के मुताबिक़ व्यापार करने के लिए यहाँ कम विनियमन या कम कानूनी झंझट, कम नौकरशाही, और कम समय में भारी मुनाफा अर्जित करने का मौका है और इसी वजह से उंचा रैंक मिला है. यह व्यवसाय का एक ठेठ अंतरराष्ट्रीय वित्त दृष्टिकोण है जो 'व्यापर करने के लिए आसानी' को नियमों को हटाने और निरीक्षण से निजात को बढ़ावा देता है. आश्चर्य की बात नहीं, कि रपट उन दिवालिया कानूनों में सुधार के लिए भी भारत को उच्च अंक देती है, जो कानून व्यवसायों को बंद करने के लिए रास्ता बनाते हैं और बैंक ऋण या कामगारों की बकाया राशि को निगल जाने को बढ़ावा देते हैं.

‘व्यापार करने’ की तरजीह को रिपोर्ट के लेखकों ने जिस तरह इस्तेमाल किया है, उसका मतलब स्पष्ट है कि व्यापार करने के लिए विभिन्न वैधानिक अनुमति लेना आसान है और वास्तव में काफी हद तक व्यापार करना भी. इसका जायजा लेने के लिए जिन बातों को शामिल किया गया है उनमें आसानी से ऑनलाइन पी.ए.एन. और टी.ए.एन. नंबर लेना, नए निर्माण परमिट, कर्जे का मिलना, कर अदा करना, ठेके को लागू करना, और दिवाला, आदि को आसानी से तय करना शामिल है. श्रम कानूनों पर भी सूचना एकत्र की गई थी लेकिन इसे अंतिम समय में हटा दिया गया.

हालांकि रिपोर्ट का टाइटल "व्यवसाय करना है: तथा रोज़गार पैदा करने के लिए सुधार करना है” लेकिन विश्लेषणकर्ताओं ने नौकरियों के मुद्दे को बड़ी चालाकी से हटा दिया. यह तो इस बात में ही निहित है कि अगर व्यापार तेज़ी से शुरू होता है तो रोज़गार के अवसर भी पैदा होंगे. लेकिन पिछले करी-करीब डेढ़ दशक में भारत के तजुर्बे इसके उलट रहे है जिसमें 2001 से 2011 के बीच रोज़गार में मात्र 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो 2012 और 2015 के बीच गिर कर केवल 1 प्रतिशत रह गयी. इस समयांतराल में 37 ‘सुधारों’ की पहल की गयी, पहले यु.पी.ए. सरकार और बाद में मोदी सरकार द्वारा, और इसके आधार पर व्यापार अपने उफान पर होना चाहिए था और अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत के हिसाब से हर वर्ष बढनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसका मतलब साफ़ है कि विश्व बैंक जैसे सुधारों और रोज़गार में कोई सम्बन्ध नहीं है.

रिपोर्ट बड़ी ही आसानी से इस बात की उपेक्षा करती है कि एसएमई और सेवा क्षेत्र सहित उद्योगों में ऋण प्रवाह में बढ़ोतरी काफी कम रही है, जिसके परिणामस्वरुप निर्माण कार्य में कमी आई है और निर्यात में लगातार गिरावट हुई है. इन सभी बिन्दुओं पर रपट भारत को उच्च अंक देती है.

बड़े स्तर पर ऑनलाइन पर जो  भी डाटा उपलब्ध है उसकी गहरी जांच से पता चलता है कि रपट में भारत के खंड में विश्व बैंक के शौधकर्ताओं ने दो शहरों, मुंबई और दिल्ली के 516 योगदानकर्ताओं के विचार लिए हैं. ये योगदानकर्ता कोई और नहीं बल्कि सरकार के लग्गे-भग्गे  नगरपालिका अधिकारी, व्यवसायी, चार्टर्ड एकाउंटेंट, अधिवक्ता, कस्टम एजेंट, आदि अधिकारी हैं जिनमें कई तो एक ही फर्म के लिए काम करते हैं।

दुसरे शब्दों में कहें तो रपट मात्र दो शहरों तक ही सिमित है और उनमें भी केवल 516 व्यक्तियों के विचारों तक. बेशक, इन लोगों को इतनी जानकारी तो है कि क्या चल रहा है लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उन्हें सब कुछ की जानकारी है? और क्या वे सब कुछ कहने के इच्छुक हैं? उदहारण के लिए, क्या यह कहेंगे कि नई दिल्ली नगर-निगम क्षेत्र में निर्माण कार्य के लिए अनुमति लेना एक कठिन काम है?

कर अदा करने के अलावा इस रिपोर्ट में केवल जून 2017 तक की सूचना शामिल है, जिसके लिए डेटा केवल दिसंबर 2016 तक का है. इस उपाय से भारत को अपनी रैंकिंग और प्रदर्शन में नाटकीय ढंग से सुधार करने का मौका मिला. लेकिन नोटबंदी और इस साल विशेषकर जी.एस.टी. के लागू करने से, लगता है यह रैंकिंग भी खटाई में पड़ गयी है. तरो-ताज़ा आंकड़े ब्यान करते हैं कि जी.एस.टी. के लिए जिन लोगो ने रजिस्टर किया है उनमें से केवल 55 प्रतिशत ही ही जी.एस.टी. भर पाए हैं, इसका एक सीधा कारण तो मंदी है और दूसरा कुछ हद भुगतान की बोझिल प्रक्रिया भी.

यह इस विचार से ही निहित कि “भारत में व्यापार करना आसान है” और जिसका प्रचार विश्व बैंक और मोदी कर रहे हैं वह बहुत ही कमजोर फिसलन भरे धरातल पर आधारित है, चूँकि इस सम्बन्ध में पैमाने और स्तर की जानकारी पाने की गुंजाइश कम है, झुकाव महानगरों और सेवा क्षेत्र व्यापारों की तरफ ज्यादा है. यह कहना गलत न होगा कि भारत में काम करने वाले लगभग 4.5 करोड़ (45 मिलियन) गैर-कृषि उद्यमों (6 वीं आर्थिक जनगणना, 2016) के प्रति जो एक विशाल संख्या है, उनके प्रति लापरवाही बरती गयी है और उनकी परेशानियों और तकलीफों को पूरी तरह छोड़ दिया गया है.

यही कारण है जिसकी वजह से लगता है कि मोदी और विश्व बैंक के बीच यह एक रोमांस का सीजन है, जहाँ नकली तारीफ़ करना सही माना जा रहा है.

 

 

 

वर्ल्ड बैंक
मोदी सरकार
भारतीय अर्थव्यवस्था

Related Stories

किसान आंदोलन के नौ महीने: भाजपा के दुष्प्रचार पर भारी पड़े नौजवान लड़के-लड़कियां

भारतीय अर्थव्यवस्था : एक अच्छी ख़बर खोज पाना मुश्किल

सत्ता का मन्त्र: बाँटो और नफ़रत फैलाओ!

जी.डी.पी. बढ़ोतरी दर: एक काँटों का ताज

5 सितम्बर मज़दूर-किसान रैली: सबको काम दो!

रोज़गार में तेज़ गिरावट जारी है

लातेहार लिंचिंगः राजनीतिक संबंध, पुलिसिया लापरवाही और तथ्य छिपाने की एक दुखद दास्तां

माब लिंचिंगः पूरे समाज को अमानवीय और बर्बर बनाती है

भारतीय अर्थव्यवस्था की बर्बादी की कहानी

अविश्वास प्रस्ताव: दो बड़े सवालों पर फँसी सरकार!


बाकी खबरें

  • एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    मुकुंद झा
    एसकेएम की केंद्र को चेतावनी : 31 जनवरी तक वादें पूरे नहीं हुए तो 1 फरवरी से ‘मिशन उत्तर प्रदेश’
    16 Jan 2022
    संयुक्त किसान मोर्चा के फ़ैसले- 31 जनवरी को देशभर में किसान मनाएंगे "विश्वासघात दिवस"। लखीमपुर खीरी मामले में लगाया जाएगा पक्का मोर्चा। मज़दूर आंदोलन के साथ एकजुटता। 23-24 फरवरी की हड़ताल का समर्थन।
  • cm yogi dalit
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव और दलित: फिर पकाई और खाई जाने लगी सियासी खिचड़ी
    16 Jan 2022
    चुनाव आते ही दलित समुदाय राजनीतिक दलों के लिए अहम हो जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उनके साथ बैठकर खाना खाने की राजनीति भी शुरू हो गई है। अब देखना होगा कि दलित वोटर अपनी पसंद किसे बनाते हैं…
  • modi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे : झुकती है सरकार, बस चुनाव आना चाहिए
    16 Jan 2022
    बीते एक-दो सप्ताह में हो सकता है आपसे कुछ ज़रूरी ख़बरें छूट गई हों जो आपको जाननी चाहिए और सिर्फ़ ख़बरें ही नहीं उनका आगा-पीछा भी मतलब ख़बर के भीतर की असल ख़बर। वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन आपको वही बता  …
  • Tribute to Kamal Khan
    असद रिज़वी
    कमाल ख़ान : हमीं सो गए दास्तां कहते कहते
    16 Jan 2022
    पत्रकार कमाल ख़ान का जाना पत्रकारिता के लिए एक बड़ा नुक़सान है। हालांकि वे जाते जाते भी अपनी आंखें दान कर गए हैं, ताकि कोई और उनकी तरह इस दुनिया को देख सके, समझ सके और हो सके तो सलीके से समझा सके।…
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    योगी गोरखपुर में, आजाद-अखिलेश अलगाव और चन्नी-सिद्धू का दुराव
    15 Jan 2022
    मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के अयोध्या से विधानसभा चुनाव लडने की बात पार्टी में पक्की हो गयी थी. लेकिन अब वह गोरखपुर से चुनाव लडेंगे. पार्टी ने राय पलट क्यों दी? दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की पार्टी अब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License