NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
विज्ञान
अंतरराष्ट्रीय
विश्व शांति दिवस : जलवायु परिवर्तन को लेकर कितने जागरूक हैं हम!
इस साल विश्व शांति दिवस की थीम "Climate Action for Peace" है। इस थीम के जरिए दुनिया भर के लोगों को ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि शांति बनाए रखने के लिए जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करना सबसे जरूरी है। जलवायु में हो रहा परिवर्तन विश्व की शांति और सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है।
सोनिया यादव
21 Sep 2019
world peace day
Image courtesy: NDTV

हर साल 21 सितंबर को विश्व शांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1981 में विश्व शांति दिवस की घोषणा इस का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों और नागरिकों के बीच शांति व्यवस्था कायम करना और अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों और झगड़ों पर विराम लगाना है। शांति का संदेश दुनिया भर में पहुंचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कला, साहित्य, सिनेमा, संगीत और खेल जगत की विश्वविख्यात हस्तियों को शांतिदूत भी नियुक्त किया हुआ है। इस साल विश्व शांति दिवस की थीम "Climate Action for Peace" है। इस थीम के जरिए दुनिया भर के लोगों को ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि शांति बनाए रखने के लिए जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करना सबसे जरूरी है। जलवायु में हो रहा परिवर्तन विश्व की शांति और सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है।

आज के दौर में जलवायु परिवर्तन एक ऐसी विश्वव्यापी चुनौती है, जिससे हर किसी को कई स्तरों पर लड़ना होगा। 23 सितंबर को न्यूयॉर्क में होने वाले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की बैठक से पहले दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए कदम उठाने का आह्वान करते हुए कई जगह प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं।

सबसे पहले आसान भाषा में अगर जलवायु परिवर्तन को समझे तो औद्योगिक क्रांति के बाद धरती का तापमान साल दर साल बढ़ रहा है। इसके दुष्परिणाम ये है कि तापमान में बढ़ोतरी होती जा रही है। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और प्रवृत्ति बढ़ चुकी है। जिसका मुख्य कारण ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन है।

20 सितंबर, शुक्रवार को प्रदर्शनकारियों ने वैश्विक जलवायु हड़ताल का आयोजन 110 कस्बों और शहरों में किया। इस दौरान सरकार और कारोबारियों से कहा गया कि वे 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को घटाकर शून्य करने के लक्ष्य को पूरा करने का वादा करें। आने वाले दिनों में ऐसी ही रैलियों का आयोजन दुनिया भर में करने की योजना है।

शुक्रवार को ही नई दिल्ली में भी दर्जनों छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और एक रैली के दौरान आवास तथा शहरी मामलों के मंत्रालय के बाहर नारे लगाए- “जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई हो” और “हम साफ हवा में सांस लेना चाहते हैं।”

स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा शहर में स्थित संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज या अंतरशासकीय जलवायु परिवर्तन परिषद यानी ‘आइपीसीसी’ के मुख्यालय ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसके अनुसार पृथ्वी पर तापमान, उसके पूरे इतिहास की तुलना में, इस समय सबसे अधिक तेज़ गति से बढ़ रहा है। 1950 वाले दशक के बाद से भूमि और महासागरों के ऊपर का तापमान, हर दशक में, औसतन 0.2 डिग्री सेल्सियस की गति से बढ़ता गया है। कम से कम पिछले 30 लाख वर्षों में पृथ्वी की ऊपरी सतह का तापमान इस गति से कभी नहीं बढ़ा।

आइपीसीसी’ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री पर अब भी रोका जा सकता है। लेकिन, इसके लिए खेती-किसानी के तौर-तरीकों और खान-पान की आदतों में परिवर्तन के साथ-साथ तेज़ी से और बड़े पैमाने पर वृक्ष एवं वनरोपण अभियान चलाने होंगे। पेड़-पौधे ही हवा से कार्बन-डाईऑक्साइड सोख कर उसे अपने भीतर बांधते हैं। हवा में कार्बन-डाईऑक्साइड जितनी घटेगी, भूतल पर का तापमान बढ़ने की गति में उतनी ही कमी आयेगी।

जुलाई 2019 में विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ ने स्विट्ज़रलैंड के शोध का एक अध्ययन प्रकाशित किया। अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि वृक्ष और वनरोपण अभियानों द्वारा जलवायु परिवर्तन की जितने कारगार तरीके से रोकथाम की जा सकती है, उतनी और किसी तरीके से नहीं हो सकती। अकेले इसी तरीके से मानवजनित दो-तिहाई कार्बन-डाईऑक्साइड को हवा से ख़ीच कर पेड़ों के रूप में बांधा जा सकता है।

सेंटर फॉर साइंस एंड इनवॉरोमेंट में कार्यरत राकेश ने न्यूज़क्लिक को बताया, 'तापमान यदि ऐसे ही बढ़ता रहा, तो सूखा, बाढ़, भीषण गर्मी, सर्दी, लू और तूफ़ान जैसी मौसमी अति की घटनाएं बढ़ेंगी और पैदावार में कमी आएगी। इसलिए खाद्यपदार्थों के उत्पादन और खाने-पीने के सारे तौर-तरीकों को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है।

डेवलेपमेंट ऑलटरनेटीव्स के सदस्य सौरभ सिंह का कहना है कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर समस्या है, इसे फिलहाल गंभीरता से लोगों द्वारा नहीं लिया जा रहा है, लेकिन हमारी छोटी-बड़ी सभी आदतों का इस पर बहुत असर पड़ता है।

उन्होंने कहा, 'औसत भूतलीय तापमान अभी ही 1.53 डिग्री और सागरतलीय तापमान 0.9 डिग्री बढ़ चुका है। हमें वनों और दलदलों की भी रक्षा करनी होगी, क्योंकि वे कार्बन-डाईऑक्साइड को बांधते हैं।'

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 अभी तक के मौजूद रिकॉर्ड में चौथा सबसे गर्म साल रहा है। आने वाले सालों में तापमान में और बढ़ोतरी होगी और यह स्थिति पृथ्वी के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकती है। स्थिति चिंताजनक अवश्य है, लेकिन विकल्पहीन नहीं। संयुक्त प्रयास से अभी भी इस स्थिति में सुधार किया जा सकता है।

world peace Day
climate change
GLOBAL CLIMATE ACTION
Climate Action
Protest for the climate
global warming

Related Stories

अंकुश के बावजूद ओजोन-नष्ट करने वाले हाइड्रो क्लोरोफ्लोरोकार्बन की वायुमंडल में वृद्धि

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 

जलवायु शमन : रिसर्च ने बताया कि वृक्षारोपण मोनोकल्चर प्लांटेशन की तुलना में ज़्यादा फ़ायदेमंद

अगले पांच वर्षों में पिघल सकती हैं अंटार्कटिक बर्फ की चट्टानें, समुद्री जल स्तर को गंभीर ख़तरा

धरती का बढ़ता ताप और धनी देशों का पाखंड

क्या इंसानों को सूर्य से आने वाले प्रकाश की मात्रा में बदलाव करना चाहिए?

अमीरों द्वारा किए जा रहे कार्बन उत्सर्जन से ख़तरे में "1.5 डिग्री सेल्सियस" का लक्ष्य

जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट : अमीर देशों ने नहीं की ग़रीब देशों की मदद, विस्थापन रोकने पर किये करोड़ों ख़र्च

आईईए रिपोर्ट की चेतावनी, जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए स्वच्छ ऊर्जा निवेश करने में दुनिया बहुत पीछे

जलवायु परिवर्तन से 1 दशक से कम समय में नष्ट हो गए दुनिया के 14% कोरल रीफ़ : अध्ययन


बाकी खबरें

  • HATHRAS
    सरोजिनी बिष्ट
    हाथरस कांड का एक साल: बेटी की अस्थियां लिए अब भी न्याय के इंतज़ार में है दलित परिवार
    28 Sep 2021
    मुख्यमंत्री योगी ने पीड़िता के परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया था, इसी के साथ कनिष्ठ सहायक पद पर परिवार के एक सदस्य को नौकरी और हाथरस शहर में ही एक घर के आवंटन की घोषणा भी की गई।…
  • Akhlaq
    मुकुल सरल
    दादरी लिंचिंग के 6 बरस: तुम भी कभी मिले हो? मिलना कभी ज़रूर/ कैसे है जुड़ता-टूटता अख़लाक़ का बेटा
    28 Sep 2021
    उत्तर प्रदेश में दादरी के बिसाहड़ा गांव के अख़लाक़ हत्याकांड को आज पूरे 6 बरस हो गए हैं। 28 सितंबर, 2015 को गोमांस की अफ़वाह फैलाकर जुटाई गई एक उग्र भीड़ ने उन्हें घर में घुसकर पीट-पीटकर मार डाला था…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 6 महीने बाद कोरोना से रोज़ाना हो रही मौत का आंकड़ा 200 से नीचे आया
    28 Sep 2021
    देश में 24 घंटो में कोरोना के 18,795 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 36 लाख 97 हज़ार 581 हो गयी है।
  • US
    शिव इंदर सिंह
    अमेरिका में मोदी का क्यों हुआ विरोध?
    28 Sep 2021
    अमेरिका व अन्य देशों में किसान आंदोलन के हक में तथा मोदी सरकार की नीतियों को लेकर पहले भी प्रदर्शन होते रहे हैं। इसी कारण से भारतीय मूल के कई अमेरिकी नेताओं ने भी समय-समय पर मोदी सरकार के कामों और…
  • Photo Essay: Kashmir’s Walnut Industry is on the Decline
    कामरान यूसुफ़
    फ़ोटो आलेख: ढलान की ओर कश्मीर का अखरोट उद्योग
    28 Sep 2021
    कश्मीर में अखरोट उगाने की प्रक्रिया में मशीनीकरण की कमी है, इससे पैदावार कम होता है और फ़सल की गुणवत्ता भी ख़राब हुई है, लिहाज़ा कश्मीर के अखरोट उत्पादकों को इस समय निर्यात में गिरावट का सामना करना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License