NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विश्वविद्यालयों में सामाजिक न्याय का खात्मा
इस तरह से विभागवार रोस्टर के कारण विश्वविद्यालयों में सामाजिक न्याय का खात्मा साफ-साफ दिख रहा है। इतनी बड़ी धांधली पर कहीं भी बातचीत नहीं है। यह मीडिया की बहस का हिस्सा नहीं है।
अजय कुमार
10 Jul 2018
university

भारत की ज़मीनी हकीकत से कोसों ऊपर हवा में उड़ने वाले लोग कहते हैं कि आरक्षण खत्म कर देना चाहिए। यह भारतीय समाज का पॉपुलर चलन है। इसका फायदा वह राजनीतिक पार्टियाँ उठाने की कोशिश करती हैं जिनका समाज में सदियों से चली आ रहे अन्यायी ढाँचे के सुधार से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि इसी अन्यायी ढाँचे की बुनियाद पर ये पार्टियाँ अपनी इमारत खड़ी करती हैं। भाजपा की इमारत की ईंट भी समाज के इसी अन्यायी ढाँचे की भट्टी में बनती है। 
 
पिछले महीने यूजीसी के एक सर्कुलर की वजह से विश्वविधालयों में शिक्षकों की नियुक्तियों में मौजूद सामाजिक न्याय की धज्जियाँ उड़ गयीं लेकिन किसी ने उफ़ तक नहीं की। यह विषय उस तरह से चर्चा का विषय नहीं बना, जिस तरह से पिछले एक दो सालों में एंटी नेशनल की फ़र्ज़ी बहस चलाकर विश्वविद्यालयों को चर्चा का विषय बनाया गयाI   
 
5 मार्च 2018 के यूजीसी के सर्कुलर के तहत विश्विद्यालय में  शिक्षकों की नियुक्ति का आधार विश्विद्यालय न होकर विश्विद्यालय का विभाग  तय किया गया।  यानि शिक्षकों की नियुक्ति में सामाजिक न्याय को सुचारु ढंग से लागू करने के लिए  रोस्टर की प्रक्रिया  विश्विद्यालय के विभाग को इकाई मानते हुए  काम करेगी। सरकारी नौकरी में  सामाजिक न्याय को स्थापित करने के लिए रोस्टर का उपयोग किया  जाता है। इसके तहत कुछ पॉइंट निर्धारित किये जाते हैं। इन पॉइंट के तहत पदों का बँटवारा किया जाता है। सामाजिक न्याय लागू होने के बाद से रोस्टर में प्रत्येक 7वाँ पद SC को, 14वाँ पद ST को और हर चौथा पद OBC वर्ग के प्रत्याशी के लिए निर्धारित किया गया है।

 

 

चूँकि ST के लिए 7.5 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान है जिसे सीटों में तब्दील करने की व्यावहारिकता के कारण DoPT ने रोस्टर को 200 प्वाइंट का निर्धारित किया। जिसमें सीटों का निर्धारण उक्त अनुपात में किया जाता रहा हैI लेकिन विभागवार रोस्टर में पदों की संख्या आमतौर पर बहुत कम होने से आरक्षित पदों का नंबर ही नहीं आएगा और अधिकांश पद सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित हो जाते हैं। विश्वविद्यालय को एक इकाई मानकर 200 प्वाइंट रोस्टर बनाने पर लगभग 50 फ़ीसदी आरक्षण मिलता, जबकि विभागवार रोस्टर में यह आरक्षण लगभग 5 फ़ीसदी मात्र रह गया हैI ऐसा इसलिए है क्योंकि विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में विभाग छोटे होते हैं, जिससे पदों की संख्या अमूमन दर्जन से कम ही होती है। ऐसे में सबसे भयावह है कि ST संवर्ग के लिए सभी विज्ञापन में पदों की संख्या ही समाप्त हो गई है। 
 
उच्च शिक्षा में SC-ST के लिए आरक्षण 1997 में और OBC के लिए आरक्षण 2007 में लागू हुआ। उसके बाद से ही स्थाई नियुक्तियाँ कमोबेश बंद रही हैं. अब जैसे ही ये आरक्षण विरोधी रोस्टर आया, सभी जगह नियुक्तियाँ की जा रही हैं।  वे सभी आरक्षित पद, जो एक दशक पहले ही सृजित हुए, वे विभागवार रोस्टर से समाप्त हो गए हैं।  शार्टफ़ॉल और बैकलॉग पदों यानि कि आरक्षित पदों के न भरने  को लेकर कोई नीति नहीं है।  ऐसे में उच्च शिक्षा में वंचित तबके की संवैधानिक हिस्सेदारी (ST- 7.5%, SC- 155, OBC- 27%) कभी पूरी ही नहीं हो सकेगी। साल 2016 -17  के यूजीसी के  वार्षिक रिपोर्ट के तहत देश भर के कॉलेजों और विश्वविधायलयों में सरकारी शिक्षकों की संख्या तकरीबन 14.7 लाख है। इसमें से कॉलेजों में नियुक्त शिक्षकों की संख्या तकरीबन 13.08 लाख (89  फीसदी ) है  और विश्विद्यालयों में नियुक्त शिक्षकों की संख्या तकरीबन 1.62 (9 फीसदी ) लाख है। 30 विश्वविधायलयों  के प्रोफेसर,अस्सिटेंट प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों की कुल संख्या 31146 है । इसमें से SC,ST,OBC की कुल संख्या 9130 है । यह इन वर्गों के लिए आरक्षित कुल  49.5 फीसदी सीटों में  महज 29.03 फीसदी है।
 
5 मार्च के सर्कुलर के विरोध में सरकार का MHRD मंत्रालय ने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में SLP दायर किया है, जिसकी सुनवाई की पहली तिथि आगामी 20 जुलाई है।  एक RTI के जवाब में यूजीसी ने बताया कि रोस्टर का मामला अभी न्यायालय के विचाराधीन है।  न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद देश भर के विश्वविद्यालय लगातार विभागवार रोस्टर लागू करके विज्ञापन जारी करके नियुक्ति करते जा रहे हैं।  न्यायालय में विचाराधीन होने के समय नियुक्ति प्रक्रिया रोकना और यथास्थिति बनाए रखना ही न्यायपालिका व संविधान सम्मत है।  जबकि यहाँ ऐसा नहीं हो रहा है। इस सर्कुलर की वजह से विश्विद्यालय शिक्षक नियुक्ति की विज्ञप्ति के हालत पर पड़ने वाले वाले प्रभाव का जायज़ा आरटीआई फाइल करके ली गयी। आरटीआई के जवाब में  मिली विज्ञप्तियों की स्थिति  विश्वविधायलयों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में सामाजिक  न्याय के खात्में की तरफ  साफ़-साफ़ इशारा करती है। संवैधानिक आरक्षण विरोधी सरकारी सर्कुलर के आने के बाद से विज्ञापनों की तिथिवार सूची इस प्रकार है, जिसमें विभागवार रोस्टर की पहली सूची है. दूसरी सूची 200 प्वाइंट रोस्टर की है, अर्थात यदि कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय एक यूनिट होती, तो ये विज्ञापन दूसरी सूची के अनुसार होता।

rti
 
विभागवार रोस्टर लागू करने के लिए HRD मंत्रालय और यूजीसी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जिस फैसले को आधार बना रहे हैं, वह सलाहकारी है, जबकि पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय आरक्षण के पक्ष में आये हैं, जिनका यहाँ उल्लंघन किया जा रहा है. ऐसे में उच्च शिक्षा के संवैधानिक चरित्र को बचाए रखने के लिए ये ज़रूरी है कि सरकार एक संसदीय अध्यादेश लाकर विभागवार रोस्टर सम्बन्धी फैसले को वापस करे और उच्च शिक्षा तक समाज का वंचित-शोषित तबके के लिए संभावनाएं बचाए रखें। 
 
इस तरह से विभागवार रोस्टर के कारण विश्वविद्यालयों में सामाजिक न्याय का खात्मा साफ-साफ दिख रहा है। इतनी बड़ी धांधली पर कहीं भी बातचीत नहीं है। यह मीडिया की बहस का हिस्सा नहीं है । समाज को भी इससे कुछ लेना देना नहीं क्योंकि यह समाज के पॉपुलर चलन पर धक्का नहीं मारता है। इस दौर के लोकप्रिय संचार माध्यमों ने यह बताया ही नहीं कि सामाजिक न्याय जैसी भी कोइ चीज होती है। काश हमें एंटी नेशनल जैसी बातों की बजाए सामाजिक न्याय जैसी बातें सुननी को मिलती तो वंचित तबके के साथ ऐसी नाइंसाफी करने से पहले एक बार सरकारें जरूर सोचती  ।
 

University
Reservation
BJP
Central Government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • Lakhimpur massacre
    वसीम अकरम त्यागी
    चलने से लेकर कुचलने तक : किस्सा गाड़ी का
    10 Oct 2021
    ये क़िस्सा सिर्फ गाड़ी का नहीं हैं, बल्कि इन्हीं गाड़ियों में ‘चलने’ वाली इस देश की सरकार और न्याय व्यवस्था का भी किस्सा है, ये वही गाड़ियों हैं जो अपने पीछे धूल की जगह सवाल छोड़ गईं हैं।
  • Lakhimpur massacre
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता: लखीमपुर के शहीद किसानों का मर्सिया
    10 Oct 2021
    अदनान कफ़ील दरवेश हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवि हैं। लखीमपुर खीरी के किसान हत्याकांड से विचलित होकर उन्होंने यह कविता लिखी है। कविता व्यंग्यात्मक शैली में कही गई है। वाकई, शायद जब कोई घटना भीतर तक…
  • patient
    शंभूनाथ शुक्ल
    मरीज़ को क्लाइंट समझने की सोच से उबरा जाए!
    10 Oct 2021
    वैद्य अथवा डॉक्टर के लिए दोस्ती का कोई मतलब नहीं उन्हें हर बीमार अपना क्लाइंट नज़र आता है जिससे वे दवा के बदले पैसा उगाह सकते हैं। इसीलिए लोग कहते हैं कि जिस मौसम में बीमारियाँ बढ़ती हैं वही मौसम…
  • World Hunger
    सतीश भारतीय
    कोरोना संकट के बीच भूख से दम तोड़ते लोग
    10 Oct 2021
    ऑक्सफैम द्वारा जारी नई रिपोर्ट द हंगर वायरस मल्टीप्लाई के अनुमान से ज्ञात होता है कि इस वक्त दुनिया भर में करीब 15.5 करोड़ लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 2…
  • US National Security
    एम. के. भद्रकुमार
    बाइडेन-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन संभावित 
    10 Oct 2021
    इस संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन और चीन के पोलित ब्यूरो सदस्य यांग यिएची के बीच स्विटजरलैंड के ज्यूरिख में हुई बैठक महत्त्वपूर्ण है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License