NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विवाह बचाने से बड़ा है व्यक्ति का मूल अधिकार
महिलाओं के संवैधानिक अधिकार के निर्धारण में उन सामाजिक मूल्यों और कानूनी मान्यताओं को बाहर निकालना जरूरी है जो अभी तक महिलाओं के अस्तित्व की आजादी में बंधन की तरह काम करते आ रहे हैं।
अजय कुमार
29 Sep 2018
सांकेतिक तस्वीर

भारतीय  संविधान की खूबसूरती यह है कि यह मैं, आप  और हम जैसी संभावनाओं को शामिल करता है और समय और समाज  की परिपक्वता के हिसाब से न्यायलय को न्यायिक संवेदनशीलता के तहत  व्याख्या करने की सहूलियत देता है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। यह धारा व्यभिचार को अपराध करार देती है यानी कि विवाहित औरत द्वारा अपने पति के अलावा  किसी और मर्द के साथ यौन सम्बन्ध बनाना गैरकानूनी है। लेकिन इसके लिए सजा की भुक्तभोगी विवाहित औरत न होकर वह मर्द होगा जिसके साथ औरत ने व्याभिचार का संबंध स्थापित किया है। यह धारा विवाह के उस सदियों पुराने सिद्धांत पर आधारित है जिसके तहत विवाह के सम्बन्ध में मर्द औरत की मर्जी का मालिक हो जाता है और केवल मर्द को मिलने वाली सजा   इस सामाजिक  मान्यता पर आधारित है, जिसके तहत मर्द को औरतों के इर्द गिर्द घूमते रहने  वाला समझा जाता है। पीठ ने कहा कि यह महिला को गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करती है जिसके परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने ये फैसला सुनाया।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने जस्टिस एएम खानविलकर के साथ मुख्य फैसला सुनाते हुए कहा कि ''एक सभ्य समज के लिए व्यक्ति की गरिमा एक पवित्र सीमा का निर्धारण करती है। एक सभ्यता उस समय सम्मान हासिल करती है जब वह महिलाओं के व्यक्तिगत दायरों का सम्मान करने लगती है। इसका मतलब यह हुआ कि जब महिलाओं को समाज में बराबरी के भावना के साथ देखना शुरू कर दिया जाता है। एक औरत से यह नहीं कहा जा सकता है कि वह वैसे ही अपने लिए सोचे जिस तरह से समाज या मर्द उसके लिए सोचता है। इस तरह की सोच से एक औरत की मूल पहचान की हत्या होती है। इसलिए अब यह समय आ गया है कि कहा जाए कि विवाह सम्बन्ध में मर्द, औरत का मास्टर यानी मालिक नहीं होता है। विवाह संबंधों में भी बराबरी की भावना ही संबंधों पर हुकूमत करेगी। अब विवाह संबधों से जुड़ी सारी पुरानी मान्यताओं और अवधारणाओं की तिलांजलि दे देनी चाहिए। एक वक़्त में जो कानून और नियम जरूरी  हो सकते हैं वही नियम और कानून वक्त के दूसरे दौर में गैरजरूरी भी हो सकते हैं। एक लिंग की किसी दूसरे लिंग पर संप्रभुता गलत है। धारा 497 साफ तौर पर मनमानी है। 

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि व्यभिचार के इस कानून की वजह से त्रिपक्षीय भुलभुलैया बनती थी। जिसमें संविधान की भावना के अनुसार नहीं बल्कि चली आ रही मान्यताओं के अनुसार किसी को दोषी और पीड़ित की श्रेणी में रखा जाता था। लिंग के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव संविधान के अनुच्छेद  14 का उल्लंघन था। अब एक ऐसी स्थिति की कल्पना की जा सकती है जिसके मूल में बराबरी की भावना काम करती हो।"

इस कानून की वजह से निजता पर हमला होता था। और किसी की  निजता को उजागर कर इसे  अपराध की अवधारणा में शामिल करना कहीं से भी उचित नहीं है। इसलिए इस कानून के पीछे अपराध की अवधारणा नहीं बल्कि सामाजिक नैतिक दबाव की भूमिका होती थी। जब  विवाह के पक्षकार  विवाह से जुड़ी अपनी नैतिक प्रतिबद्धता खो देते हैं तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि वह कानून के नजर में अपराधी हैं। यह उनकी व्यक्तिगत नैतिकता से जुड़ा मसला है यानी कि  यह पक्षकारों पर निर्भर करता है कि वह ऐसी स्थिति से कैसे निपटें। वह चाहें तो साथ-साथ रह सकते हैं और चाहें तो तलाक लेकर अलग हो सकते हैं। यह पूरी तरह से किसी की निजता से जुड़ा मसला है। जिसे सामाजिक नैतिक संदर्भों की वजह से आज तक अपराध माना जा रहा था।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर व्यभिचार के तहत किसी को अपराधी बनाया जा रहा है तो इसका यह मतलब है कि उसे सजा दी जा रही है जो विवाह के भीतर नाखुश है।  इसलिए धारा 497 असंवैधानिक है और इसे व्यभिचार भी नहीं मानना चाहिए।

न्यायाधीश नरीमन ने कहा व्यभिचार कानून के तहत किसी को सजा अभी तक इसलिए दी जाती थी क्योंकि वह किसी मर्द की संपति यानी कि औरत के साथ छेड़छाड़ करता था। तकरीबन हर तरह के पुरातन समाजों में इसके लिए सजा दी जाती थी। अब वह पुरातन समय पूरी तरह से बीत चुका है। अब उस समय के तर्क लागू नहीं हो सकते हैं। अब धारा 497 की संविधान के जरिए दी गए संवैधानिक गारंटी में हस्तक्षेप करता है। इसलिए इस कानून को खारिज किया जाता है। हो सकता है कि बहुमत इस कानून को खारिज करने के खिलाफ राय रखता हो लेकिन तीन तलाक के मसले पर भी ऐसा ही हुआ था, जो सही था उसके तहत फैसला लिया गया था और इसके पक्षधर अल्पमत में थे। यह भी कहना गलत है कि व्यभिचार कानून का उद्देश्य विवाह के स्थायित्व को बचाना था क्योंकि अगर विवाह में दरार आ गई है और दो लोग पूरी तरह से सामाजिक नैतिक दबाव में एक दूसरे के साथ रह रहें हैं तो यह उनके निजता के अधिकार प्रताड़ित करना कहा जाएगा।

न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि हमारा संविधान अधिकारों की जमापूंजी और बहुत सारी आज़ादी या स्वतंत्रताओं का उत्सव है। औरतों के अस्तित्व पर अब तक सामाजिक मूल्यों और सामाजिक संस्थानों का कब्जा रहा है।  इसलिए महिलाओं के संवैधानिक अधिकार के निर्धारण में उन सामाजिक मूल्यों और कानूनी मान्यताओं को बाहर निकालना जरूरी है जो अभी तक महिलाओं के अस्तित्व की आजादी में बंधन की तरह काम करते आ रहे हैं। इस तरह से धारा 497 किसी औरत के सम्मान के खिलाफ है। आज़ादी  मानव अस्तित्व का हिस्सा है। धारा 497 ने औरत के चुनने के अधिकार को समाप्त करने का काम किया है। औरत को इस कानून में संपत्ति की तरह माना गया है।

न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा का फैसला है कि ऐतिहासिक मान्यताओं के तहत विवाह जैसी संस्थाओं में व्यभिचार जैसे शब्दों की उपज होती है। यह शब्द एक तरह के भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है जिसकी उपज इस मान्यता से होती है कि औरत के ऊपर मर्द का राज होता है और विवाह के बाद एक औरत मर्द के खिलाफ जाकर व्यवहार नहीं कर सकती है। इसलिए धारा 497 किसी व्यक्ति के मिले मौलिक  अधिकार का उल्लंघन करती है और यह असंवैधानिक है ।

इस तरह से इस पूरे फैसले को एक वाक्य में समझना हो तो यह कहा जा सकता है कि हम सभ्यता के ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां विवाह बचाने से ज्यादा जरूरी है कि व्यक्ति के मूलाधिकारों को बचाया जाए ।

Adultery Law Scrapped
Supreme Court

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जेएनयू में फिर हिंसा: एबीवीपी पर नॉनवेज के नाम पर छात्रों और मेस कर्मचारियों पर हमले का आरोप
    11 Apr 2022
    जेएनयू छात्र संघ ने एक बयान में कहा, “घृणा और विभाजनकारी एजेंडे की अपनी राजनीति का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए एबीवीपी के गुंडों ने कावेरी छात्रावास में हिंसक माहौल बनाया है। वे मेस कमेटी को रात के खाने…
  • लाल बहादुर सिंह
    JNU में खाने की नहीं सांस्कृतिक विविधता बचाने और जीने की आज़ादी की लड़ाई
    11 Apr 2022
    जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र खाने के लिए नहीं, सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप नागरिकों की जीने की आज़ादी और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं।
  • अभिवाद
    सीताराम येचुरी फिर से चुने गए माकपा के महासचिव
    11 Apr 2022
    23वीं पार्टी कांग्रेस ने केरल से केंद्रीय समिति सदस्य एम सी जोसेफिन की मृत्यु पर भी गहरा शोक व्यक्त किया है, जिनकी कांग्रेस में भाग लेने के दौरान हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई।
  • एम. के. भद्रकुमार
    यमन में ईरान समर्थित हूती विजेता
    11 Apr 2022
    माना जाता है कि हूती आज से सात साल पहले के मुक़ाबले तेहरान के कहीं ज़्यादा क़रीब है। ऐसे में इस बात की ज़रूरत है कि अमेरिका ईरान से बातचीत करे।
  • भाषा
    हिंदुत्व एजेंडे से उत्पन्न चुनौती का मुकाबला करने को तैयार है वाम: येचुरी
    11 Apr 2022
    सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए येचुरी ने सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने और माकपा की ताकत में उल्लेखनीय वृद्धि करने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने केंद्र में भाजपा व उसकी सरकार…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License