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विवेकानंद की सहिष्णुता के शिकागो में "अकेले शेर और जंगली कुत्तों की" भागवत कथा
इस "विश्व हिन्दू सम्मेलन में दिए गए संघप्रमुख के संबोधन को विवेकानंद के भाषण की सवा सौ वीं वर्षगांठ के अवसर पर दिया गया बताया है। यह बात अलग है कि इसमें विवेकानंद के उस संबोधन की सारवस्तु का लेशमात्र तक नहीं है।
बादल सरोज
11 Sep 2018
World Hindu Congress

वैसे तो 7 सितम्बर 2018 को शिकागो में शुरू हुई विश्व हिन्दू कांग्रेस के मंच से दिये  आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के भाषण की तुलना स्वामी विवेकानंद के 11 सितम्बर 1893 को शिकागो में ही हुई विश्व धर्म संसद में दिए गए प्रख्यात संबोधन से करना विडंबना की अति है। मगर यह साम्य खुद आयोजको ने थोपा है, इसलिए कोई विकल्प नहीं बचता। इस "विश्व हिन्दू सम्मेलन में दिए गए संघप्रमुख के संबोधन को विवेकानंद के भाषण की सवा सौ वीं वर्षगांठ के अवसर पर दिया गया बताया है।  यह बात अलग है कि इसमें विवेकानंद के उस संबोधन की सारवस्तु का लेशमात्र तक नहीं है।  बल्कि अपने सार और रुप दोनों में यह उस संदेश और उसकी भावना का विलोम और नकार है। 

125 वर्ष पहले मात्र 5 मिनट के 462 शब्दों ( यह हिंदी पाठ की शब्द संख्या है, विवेकानंद अंग्रेजी में बोले थे) में विवेकानंद ने भारत की विचार परम्परा की जो प्रस्तुति की थी, अपने 40-45 मिनट के संबोधन में मोहन भागवत नेे उसे इंचभर आगे बढ़ाना तो दूर सदियों पीछे ले जाने का ही काम किया है। 

संघ प्रमुख ‘‘हिन्दूओ को हजारो साल से त्रस्त और पीडि़त, उत्पीडि़त समुदाय और ‘कभी एक साथ न चलने वाली कौम’ निरुपित करते हुए जिस हीनता-सिंड्रोम को बयान कर रहे थे, वह आरएसएस की शाखाओ में दिए जाने वाले ‘बौद्धिक’ का स्थायी भाव है। विश्व का कोई भी समुदाय स्वयं को इतनी नकारात्मकता के साथ और इस तरह से व्याख्यायित-परिभाषित नहीं करता।  इसकी तुलना में याद आता है विवेकानंद का शिकागो भाषण जिसमें इससे ठीक उलट वे कहते है कि ‘‘मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहनशीलता, सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रुप में स्वीकार करते है।’’

विवेकानंद लज्जा और कातर भाव के साथ अपनी हीनग्रंथि का वैश्विक प्रदर्शन करने की बजाय अपने अति संक्षिप्त भाषण में भीदुनिया के तमाम धर्मों द्वारा भारत को चुने जाने और भारत द्वारा उन्हें स्वीकार किए जाने की विरल विशिष्टता को गिना जाते है। वे मनुष्यता के समग्र के अंश के रुप में खुद को गौरवान्वित पाते है तो भागवत  ‘‘हमारे मूल्य दुनियां भर के मूल्य है, हमारे पास सब था, हम सब जानते थे, कहते कहते, हिन्दू ही सर्वश्रेष्ठ है और 20 वर्ष में दुनियां उसकी होगी  तक का संकेत दे जाते है।’’ सो भी उन विवेकानंद के नाम पर जिन्होंने 125 वर्ष पहले इसी शिकागो में कहा था कि  ‘‘जिस तरह अलग अलग स्त्रोतों से निकली नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिलती है,उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरुप अलग अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़ेे-मेढ़े लगें, पर सभी एक भगवान तक ही जाते है।’’ (उनका श्लोक था ; “रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव”।।)

विवेकानंद जहां ‘‘सभी जाति सम्प्रदाय के लाखों करोड़ों हिन्दुओ की तरफ से विश्व धर्म संसद का आभार’’ व्यक्त करते है वही भागवत हिंदू धर्म के अनेक योग्य (मेरिटोरियस) लोगों की मेरिट का बखान करते हुए दिखते है।  मौजूदा विमर्श में ‘मेरिट’ शब्द का चयन अनायास नहीं है।

125 साल पहले शिकागो में विवकांनद की समझ और प्रस्तुति जहां समावेशी (इन्क्लूसिव) है, वही उसी शिकागो में आरएसएस प्रमुख अलगाव (एक्सक्लूजनरी) के आक्रमण और आत्म निष्कासित नैरेटिव के साथ नजर आना चाहते है। अकेले शेर और जंगली कुत्तों का उनका रुपक अंतर्राष्ट्रीय मंचों की गरिमा के प्रतिकूल भर नहीं है बल्कि उस हत-आहत ग्रंथि (हर्ट सिंड्रोम) की ही रिसन है जो अब बकौल मोहन भागवत खुद को हमलावर के रुप में संगठित करने की ओर सुमंत्रिते - सुविक्रांते की धजा में उन्मुख होनी चाहिए। उन्हें याद दिलाया जाना उपयोगी होगा कि शिकागो की धर्म-संसद के समापन सत्र में बोलते हुए विवेकानंद ने कहा था कि ""अजीब मुश्किल है, मैं हिन्दू हूँ और अपने बनाये कुंए में बैठा मान रहा हूँ कि पूरी दुनिया इस कुंए जितनी छोटी सी है।  ईसाई अपने कुंए में बैठे उसे पूरी दुनिया माने बैठे हैं।  मुसलमान अपने कुंए में बैठे उसे पूरी दुनिया माने बैठे हैं। " इसे आगे बढ़ाते हुए वे बोले थे कि  "यहाँ यदि किसी को यह आशा है  कि यह एकता किसी के लिये या किसी एक धर्म के लिये सफलता बनकर आयेगी  और दूसरे के लिए विनाश बनकर आयेगी , तो मै उन्हेंसे कहना चाहता हूँ कि , “भाइयो, आपकी आशा बिल्कुल असंभव है.”

11 सितम्बर 1893 में इसी शिकागो में विवेकानंद ने कहा था कि;
"साम्प्रदायिकताए, कट्टरताएं और इसकी भयानक वंशज हठधर्मिता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए है। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सम्यताओं का विनाश हुआ है न जाने कितने देश नष्ट हुए है। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हो या कलम से सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा। " 

इन उदगारों से ठीक  उल्टी गुलान्ट मारकर ‘‘दुनिया को हमारी समझ और बुद्धिमत्ता की सख्त जरुरत है’’ से होते हुए मोहन भागवत सौ फीसद आज्ञाकारिता और, भक्तिभाव की शर्त भी दोहरा देते है।  जब वे कहते है कि ‘‘कृष्ण ने कभी युधिष्ठिर की बात नहीं काटी थी।" संघ के स्वयं सेवक प्रधानमंत्री इसे हनुमान के रुपक में पहले ही कह चुके है कि ‘‘हनुमान से सीखने की जरुरत है, उन्होंने कभी कोई प्रश्न नहीं किया, कभी शिकायत नहीं की, जो कहा गया उसे ही लागू किया।’’

निस्संदेह आरएसएस प्रमुख इस गुणवाले जिस भारत का बखान कर रहे थे वैसा वे कल का भारत बनाना जरूर चाहते है, किंतु गुजरे कल और आज का भारत ऐसा नहीं है। वह प्रश्नाकुलता को प्रोत्साहित करने वाला है, चुप्प रहने वाला नहीं, वादे वादे जायते तत्वबोध; वाला भारत है। सत्य के लिए ईश्वर तक से न डरने की बात कहने वाला भारत है। जो भारत सदियों से ऐसा है उसे ऐसा-वैसा बनाने की कल्पना सहज साकार होने वाली नहीं है। 

खुद को समाजवादी कहने वाले, रूढि़वाद के विरुद्ध साहसी सुधारक विवेकानंद की 125वीं वर्षगांठ मनाने के लिए आरएसएस के नाम पर  कथित विश्व हिन्दू सम्मेलन का ही आयोजन ही एक विलोम था-रही सही कसर संघ प्रमुख ने भाषण में पूरी कर दी।
भारतीय समाज और विचार परंपरा में जो भी सकारात्मक और प्रकाशमान है उस सबको धूमिल और विलुप्त कर देने की आरएसएस की मुहिम अब विवेकानंद तक पहुंच गई है। 7 सितम्बर 2018 को आरएसएस प्रमुख इसी मुहिम को आगे बढ़ा रहे थे।

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