NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
वजीफे के बहाने अल्पसंख्यक दर्जे पर राजनीति
सांप्रदायिकता का ज़हर किस तरह बोया जा रहा है उसकी बानगी देखनी हो तो टीवी डिबेट के सवालों पर गौर कीजिए। कुल मिलाकर अब अल्पसंख्यक और इस दर्जे की जरूरत पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं।
प्रेम कुमार
14 Jun 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: awsar.prabhatkhabar.com

नरेंद्र मोदी सरकार ने अगले पांच साल में देश के 5 करोड़ अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति की योजना का एलान किया है। मगर, इसके साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है। विरोध करने वाले वही लोग हैं जो बीजेपी की कट्टरवादी धार्मिक नीतियों के समर्थक रहे हैं। आश्चर्य इस बात का है कि ऐसे विरोधियों के प्रति बीजेपी की सहानुभूति भी खुलकर दिख रही है। अब अल्पसंख्यक और इस दर्जे की जरूरत पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। सवाल ये भी उठाए जा रहे हैं कि जिन राज्यों में हिन्दू अल्पमत में हैं उन्हें भी अल्पसंख्यक का दर्जा क्यों नहीं दिया जाए।

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर अल्पसंख्यक को परिभाषित करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को दे रखा है। इसके लिए तय समय-सीमा भी बीत चुकी है। अश्विनी उपाध्याय अल्पसंख्यक को परिभाषित करने की जरूरत के साथ कई सवाल उठाते रहे हैं-

  • जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में जहां बहुमत में मुसलमान हैं, वे अल्पसंख्यक कैसे हो सकते हैं?
  • जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में जहां हिन्दू अल्पमत में हैं वे अल्पसंख्यक क्यों नहीं माने जाने चाहिए?
  • आबादी कितनी प्रतिशत हो कि अल्पसंख्यक का दर्जा बरकरार रहे?
  • अगर डेमोग्रेफी में बदलाव आता है तो क्यों नहीं अल्पसंख्यक के दर्जे में भी बदलाव आए?

अश्विनी उपाध्याय की याचिका या फिर उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश और उसके अनुरूप राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का जो भी फैसला होगा, वह वास्तव में सुधारात्मक उपाय या विचार हैं जो एक सभ्य समाज में चलते रहने चाहिए। तार्किक तौर पर कहीं से भी अश्वनी उपाध्याय की याचिका में कोई विसंगति नहीं लगती। मगर, इस बहाने जो बहस छेड़ी जा रही है, जो वातावरण बनाया जा रहा है वह जहरीला है और यही चिन्ता का विषय है।

खुलेआम कहा जा रहा है कि मुसलमानों से अल्पसंख्यक का दर्जा ‘छीन’ लेना चाहिए। सवाल ये है कि छीनने वाली शक्ति कौन है या हो सकती है? कौन किससे छीन लेने का अधिकार रखता है? अगर एक मानक तय कर दिया जाए तो स्वत: उसी आधार पर अल्पसंख्यक चिह्नित कर लिए जाएंगे और इस दर्जे से जुड़ने या हटने की प्रक्रिया चल पड़ेगी। इसमें ‘छीन लेने’ जैसे भाव के लिए कोई जगह नहीं होती।

सांप्रदायिकता का ज़हर किस तरह बोया जा रहा है उसकी बानगी देखनी हो तो टीवी डिबेट में उन सवालों पर गौर कीजिए, जो कुछ इस तरह से उठाए जा रहे हैं

  • मुस्लिम छात्रों के लिए वजीफे का बोझ हिन्दू क्यों सहन करे?
  • वे बच्चे पैदा करें और हम उनका बोझ उठाएं, ऐसा क्यों होगा?
  • अल्पसंख्यक के नाम पर कब तक मुसलमानों को मलाई खिलाई जाती रहेगी?
  • अगर अल्पसंख्यक होने का कोई फायदा नहीं है तो क्यों न इस दर्जे को हटा दिया जाए?

ये सवाल खास किस्म के कट्टरपंथी लोग ही उठा रहे होते तो बात अलग थी, अब तो खुद मीडिया का एक धडा भी इन सवालों के साथ खड़ा दिख रहा है। इसलिए विषय गम्भीर हो जाता है। प्रकारांतर से यही कहने की कोशिश दिखती है कि मुसलमानों को अल्पसंख्यक होने की वजह से जो सुविधाएं मिल रही हैं, उसका खात्मा होना चाहिए। या तो वे इसके लिए खुद राजी हो जाएं और नहीं तो जबरन उनसे ऐसी सुविधाएं वापस ले ली जाएं। इसी अर्थ में ‘छीन लेने’ जैसे भाव पैदा हो रहे हैं।

मुसलमान जब अपने पिछड़े होने की दुहाई देते हैं, तर्क देते हैं कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़िए कि किस तरह देश के मुसलमानों की हालत दलितों से भी गयी गुजरी हो चुकी है, तो समाज का यही वाचाल तबका खुद मुसलमानो को ही इसका जिम्मेदार ठहराने से पीछे नहीं हटता। वोट बैंक की राजनीति, धर्मनिरपेक्षता और कांग्रेस को मुसलमानों की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार ठहराने का भी चलन चल पड़ा है।

सच्चाई ये है कि वोट बैंक की राजनीति आज अधिक हो रही है। ‘सबका साथ सबका विकास’ के दावे के साथ धर्मनिरपेक्षता की बातें आज अधिक की जा रही हैं। इन सबके बीच मोदी राज में अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती की घटनाएं बढ़ रही हैं, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अब मुसलमान अतीत में अपने साथ दुर्दशा की बात पर हामी भरें या वर्तमान में अपने साथ हो रहे व्यवहार पर नज़र रखें, उन्हें समझ में नहीं आ रहा। बीता हुआ कल उनके लिए ख़तरनाक था या आने वाला कल ख़तरनाक होने वाला है यह बात उन्हें समझ में नहीं आ रही है।

मुसलमानों को अधिक जनसंख्या के लिए जिम्मेदार तो ठहराया जाता है लेकिन वास्तव में अगर 2011 की जनगणना पर नज़र डालें तो मुसलमानों की आबादी में अगर 3.42 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है तो हिन्दुओं की आबादी में 13.88 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गयी है। इसका मतलब ये है कि हिन्दुओं की आबादी वास्तव में मुसलमानों के मुकाबले 4 गुना अधिक बढ़ी है।

मुसलमानों से 4 गुना ज्यादा बढ़ी है हिन्दुओं की आबादी

आबादी (करोड़ में)   2011         2001         वृद्धि

भारत                      121           102            19

हिन्दू                        96.63        82.75        13.88   

मुसलमान                 17.22        13.8           3.42

अगर प्रतिशत रूप में आंकड़ों पर गौर करें तो हिन्दुओँ की आबादी 0.65 फीसदी घटी है और मुसलमानों की आबादी में 0.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हिन्दुओं के लिए यह कहीं से भी चिन्ताजनक नहीं है। मुसलमानों की आबादी की रफ्तार तुलनात्मक रूप में अधिक जरूर है लेकिन पहले से कम हुई है। यह तथ्य बताता है कि जनसंख्या नियंत्रण को लेकर समूचा देश गम्भीर हुआ है। सिख, बौद्ध, जैन बाकी आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार में भी कमी देखी गयी है।

धार्मिक आबादी प्रतिशत में

आबादी (प्रतिशत में)   2011         2001         वृद्धि

हिन्दू                         79.8        80.45        -0.65

मुसलमान                  14.2         13.4          0.80

ईसाई                        2.3      लगभग वही      0.00

सिख                         1.7           1.5            -0.2

बौद्ध                          0.7           0.6            -0.1

जैन                            0.45      लगभग वही    0.00

निश्चित रूप से देश के लिए सोचने वाला वर्ग सीमित वर्ग नहीं है। देश का हर तबका चाहे वह राजनीतिक हो, धार्मिक अथवा सामाजिक या फिर कुछ और, देश हित की चिन्ता कर रहा है। मगर, समाज में नफ़रत का बीज बो रहे लोग ऐसा आभास करा रहे हैं मानो देशहित उनके अलावा कोई सोच ही नहीं सकता। समाज में बोए जा रहे इस ज़हर को रोकने की पहल करने की जिम्मेदारी शासक वर्ग को आगे बढ़कर लेनी चाहिए। अगर वो ऐसा नहीं करता है तो विपक्ष की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

(लेखक लंबे समय तक प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं और अब एक पत्रकारिता संस्थान में पढ़ा रहे हैं।)

minority
minority scholarship
minority attacks
Minority status
Indian media
BJP-RSS
right wing politics

Related Stories

लखनऊ विश्वविद्यालय: दलित प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ मुक़दमा, हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं!

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

भारत में सामाजिक सुधार और महिलाओं का बौद्धिक विद्रोह

2023 विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तेज़ हुए सांप्रदायिक हमले, लाउडस्पीकर विवाद पर दिल्ली सरकार ने किए हाथ खड़े

कोलकाता : वामपंथी दलों ने जहांगीरपुरी में बुलडोज़र चलने और बढ़ती सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ निकाला मार्च

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

सुप्रीम कोर्ट ने जहांगीरपुरी में अतिक्रमण रोधी अभियान पर रोक लगाई, कोर्ट के आदेश के साथ बृंदा करात ने बुल्डोज़र रोके

डराये-धमकाये जा रहे मीडिया संगठन, लेकिन पलटकर लड़ने की ज़रूरत

अब राज ठाकरे के जरिये ‘लाउडस्पीकर’ की राजनीति

जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान


बाकी खबरें

  • corona
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,778 नए मामले, 62 मरीज़ों की मौत
    23 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.05 फ़ीसदी यानी 23 हज़ार 87 हो गयी है।
  • moon
    संदीपन तालुकदार
    चीनी मिशन में इकट्ठा किये गये चंद्रमा के चट्टानों से शोध और नये निष्कर्षों को मिल रही रफ़्तार
    23 Mar 2022
    इस परिष्कृत चीनी चंद्र मिशन ने चीन और उसके बाहर दोनों ही जगहों पर पृथ्वी या उसके वायुमंडल से बाहर के चट्टानों पर शोध किया है। जानकार उम्मीद जता रहे हैं कि इससे हमें सौर मंडल के बारे में नयी-नयी…
  • bhagat singh
    हर्षवर्धन
    जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार
    23 Mar 2022
    भगत सिंह के जाति व्यवस्था के आलोचना के केंद्र में पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत है। उनके अनुसार इन दोनों सिद्धांतों का काम जाति व्यवस्था से हो रहे भीषण अत्याचार के कारण उत्पन्न होने वाले आक्रोश और…
  • bhagat singh
    लाल बहादुर सिंह
    भगत सिंह की फ़ोटो नहीं, उनके विचार और जीवन-मूल्यों पर ज़ोर देना ज़रूरी
    23 Mar 2022
    शहादत दिवस पर विशेष: भगत सिंह चाहते थे कि आज़ाद भारत में सत्ता किसानों-मजदूरों के हाथ में हो, पर आज देश को कम्पनियां चला रही हैं, यह बात समाज में सबसे पिछड़े माने जाने वाले किसान भी अपने आन्दोलन के…
  • भाषा
    साल 2021 में दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी थी : रिपोर्ट
    22 Mar 2022
    साल 2021 में वैश्विक स्तर पर वायु गुणवत्ता की स्थिति बयां करने वाली यह रिपोर्ट 117 देशों के 6,475 शहरों की आबोहवा में पीएम-2.5 सूक्ष्म कणों की मौजूदगी से जुड़े डेटा पर आधारित है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License