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वन अधिकार अधिनियम बनाम भारतीय वन अधिनियम : संरक्षण या संरक्षणवाद
एफआरए-विरोधी प्रचार इस तथ्य में निहित है कि इतिहास में पहली बार नौकरशाही और भ्रष्ट वन अधिकारियों से वास्तविक स्वामित्व ले लिया गया है जो खनन माफियाओं और कॉर्पोरेशन के इशारे पर काम करते थे।
विकास भदौरिया
24 Jun 2019
Vikas
प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो साभार: Scroll.in

संरक्षण तथा संरक्षणवाद राजनीतिक परिदृश्य के दो विपरीत ध्येय से जुड़ी अवधारणाएं हैं। संरक्षण को निष्पक्षता तथा स्थिरता के सिद्धांतों में समावेशी और स्थापित होना चाहिए। फिर भी हम रूढ़िवादी संरक्षणवादियों का वैश्विक तौर पर उत्थान देख रहे हैं। वाइल्ड लाइफ फर्स्ट, टाइगर रिसर्च एंड कनजर्वेशन ट्रस्ट (टीआरएसीटी) और नेचर कनजर्वेशन सोसायटी (एनसीएस) जैसे संगठनों ने वर्ष 2008 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) को चुनौती दी थी। ये चुनौती इसके लागू होने के तुरंत बाद दी गई और इसे कुलीन संरक्षणवादी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। ऐसे संगठन बड़े कॉर्पोरेशनों के साथ शामिल हैं जो बड़ी मात्रा में फंडिंग करते हैं और अक्सर निर्दोष आदिवासियों और वनवासियों को उनकी ही भूमि से बेदखली के लिए प्रेरित करते हैं। इन प्रतिस्पर्धी संरक्षणवादी विचारधाराओं में अक्सर ऐसे विधान होते हैं जो विरोधाभासी होते हैं।

शेड्यूल ट्राइब एंड अदर ट्रेडिशनल फॉरेस्ट ड्वेलर (रिकॉग्निशन ऑफ फॉरेस्ट राइट्स) एक्ट 2006, और भारतीय वन अधिनियम 1927, दो विरोधाभासी संरक्षण विचारधाराओं के परिणाम हैं। भारतीय वन अधिनियम (इंडियन फॉरेस्ट एक्ट) एक औपनिवेशिक कानून है जो वन को एक व्यापार योग्य वस्तु के रूप में देखता है और वन-उत्पाद के परिवहन पर अधिकतम नियंत्रण कायम करने और लकड़ी तथा अन्य वनोत्पाद पर शुल्क एकत्र करने के अधिकार का इस्तेमाल करता है। यह राज्य सरकारों को लाखों आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की अवहेलना करते हुए अपनी आवश्यकता के अनुसार वन भूमि को अन्य उपयोगों में बदलने की अनुमति देता है। जबकि एफआरए का उद्देश्य वनों पर निर्भर समुदायों के अधिकारों को मान्यता देकर और उन्हें सामुदायिक वन संसाधन के सच्चे संरक्षणवादी और प्रबंधक के रूप में मानते हुए संरक्षण की एक समावेशी प्रणाली विकसित करना है। इन दो क़ानूनों के तहत विनियामक निकायों में हितों का टकराव है जिसके कारण लाखों आदिवासियों और वनवासियों पर मुकदमा चल रहा है।

एफआरए बनाम आइएफए

वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) और भारतीय वन अधिनियम (आईएफए) वन संरक्षण की दो समानांतर प्रणाली प्रदान करता है। एफआरए को कमजोर करने के प्रयासों के बावजूद ये कानून वन संसाधनों के प्रबंधन को सफलतापूर्वक लोकतांत्रिक बनाने में कामयाब रहा है। त्रि-स्तरीय अपीलीय प्रणाली में यह ग्राम सभा को व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर), सामुदायिक अधिकार (सीआर) और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआर) के मालिकाना हक के दावों पर फैसला सुनाने के लिए एक अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में कार्य करने की अनुमति देता है।

एफआरए न केवल व्यक्तियों के मालिकाना हक को पाने की बात करता है बल्कि इसका उद्देश्य उनके पारंपरिक ग्राम क्षेत्रों के भीतर या बाहर एक बड़े परिदृश्य पर उनके सामूहिक स्वामित्व को मान्यता देकर उनकी परंपरा और संस्कृति की रक्षा करना है। ऐसे समय में जब आदिवासी और वनवासी वन अधिकारियों की दया पर रह रहे हैं और सदियों से अपने घरों और आजीविका को खोने के खतरे के बीच जी रहे हैं तो ऐसे में ये अधिनियम ग्राम सभाओं को कई वैधानिक शक्तियां देकर सशक्त बनाता है। इनकी लिखित सहमति के बिना इस वन भूमि को अन्य उपयोगों के लिए बदला नहीं जा सकता है। भारत में 200 मिलियन अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पारंपरिक वन निवासी (ओटीएफडी) के साथ दस साल के वन अधिकार कानून के साथ वर्ष 2016 की वादा तथा प्रदर्शन रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया में आदिवासियों और वनवासियों का सबसे बड़ा समुदाय है और फिर भी इसे एफआरए जैसे कानून के लिए लंबे समय से 2006 तक इंतजार करना पड़ा। लेकिन लागू होने के समय से लेकर अबतक का सफर एफआरए के लिए सुगम नहीं रहा है।

अंग्रेजों ने आदिवासियों को उनकी भूमि और आजीविका से वंचित कर दिया और स्वतंत्रता के बाद से भूमि तथा वन संसाधनों पर उनके अधिकारों की निरंतर मान्यता न मिलने के चलते इन वनों को संरक्षण की घोषणा करते हुए आईएफए के तहत विवेकहीन अधिसूचनाओं के माध्यम से उन्हें वन विभाग द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया।आदिवासियों, नागरिक समाज और वाम दलों द्वारा बड़े पैमाने पर संघर्ष और विरोध के बाद ये अधिनियम तैयार हो सका। अन्य प्रमुख वाम दलों के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई (एम)] एफआरए की प्रमुख प्रस्तावक थी। एफआरए को यूपीए-वन के दौरान लागू किया गया था। इसके लिए वाम दलों ने संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह कड़ी लडाई लड़ी। वन्यजीव एनजीओ का मुखौटा धारण किए आदिवासी विरोधी समूह द्वारा इस अधिनियम को कमजोर करने के प्रयास किया गया जिसके विरोध में सीपीआई एम ने वाकआउट किया।

एफआरए-विरोधी अभियान की तीव्रता को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इतिहास में पहली बार नौकरशाही तथा भ्रष्ट वन अधिकारियों से वास्तविक स्वामित्व छीन लिया गया है जो खनन माफियाओं और कॉर्पोरेशन के इशारे पर काम करते हैं। एफआरए सुपरसेडिंग एक्ट है जिसका अर्थ है कि कानून इसके लिए प्रतिकारक है जो इसे नियंत्रित नहीं कर सकता है। इस प्रकार एफआरए लागू करने का क्रांतिकारी निहितार्थ यह है कि, आइएफए ने राज्य और वन विभाग को जो अधिकार दिए हैं और वे क्या तय कर सकते हैं उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उनके अधिकार और आवश्यकताएं अब इस समुदाय की सहमति पर निर्भर हैं।

संरक्षण शब्द कहे जाने से बहुत पहले ये आदिवासी स्वदेशी तकनीकों और जटिल वन प्रणाली के अपने विशाल ज्ञान का इस्तेमाल करके अपने वनों और इसके संसाधनों का प्रबंधन और संरक्षण करते रहे हैं। उनकी भूमि पर अतिक्रमण कर के उनकी भूमि को विभिन्न विकास और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जबरन कब्जा कर लिया गया है। एफआरए की वैधता को चुनौती देने वाले वन्यजीव संरक्षणवादियों द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को उन आदिवासियों और वनवासियों को बेदखल करने का निर्देश दिया है जो अवैध रूप से वन भूमि पर कब्जा किए हुए हैं। कई राज्यों द्वारा नोडल एजेंसी को सौंपी गई स्टेटस रिपोर्ट का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने के बाद जनजातीय कार्यमंत्रालय (एमओटीए) ने कहा कि मालिकाना हक के दावों के लिए बड़ी संख्या में अपीलें अभी भी लंबित हैं, जबकि वन प्राधिकरण की तसल्ली के लिए पहचान के सबूत की कमी की तरह कई असली दावों को मनमाने और दोषपूर्ण आधारों पर खारिज कर दिया गया है। एफआरए सामान्य कारणों से दावेदारों की पहचान या अधिकारों को साबित करने का अनावश्यक बोझ नहीं डालता है कि यदि दावेदार वास्तव में आदिवासी या वनवासी हैं तो उनके पास अपने अधिकार के दावे को साबित करने के लिए अपेक्षित दस्तावेज नहीं हो सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं ने अन्य बातों के साथ याचिका में विनती की है कि यदि एफआरए के तहत अधिकारों का दावा सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित करने योग्य नहीं पाया जाता है तब अधिकारियों द्वारा दावेदार को बेदखल करना आवश्यक है। विशेषज्ञों के विचार इसके विपरीत हैं। लैंड कनफ्लिक्ट वाच से जुड़े एक रिसर्च स्कॉलर अदिति पाटिल ने कहा, “बेदखली के फैसले पर पहुंचने से पहले लागू किए गए पूरे कार्य को फिर से जांचना चाहिए। गलतियों की जांच और सुधार किया जाना चाहिए। इन्हीं याचिकाकर्ताओं ने एफआरए की वैधता को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। यह उनके इरादे को लेकर कई संदेह पैदा करता है।”

पाटिल ने कहा, पिछले 15 वर्षों में गैर-वन उद्देश्यों के लिए 9000 वर्ग किलोमीटर से अधिक वनों का सफाया कर दिया गया और वनों की स्थिति (2018) पर विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, वन एवं पर्यावरण की रिपोर्ट पर संसदीय स्थायी समिति के अनुसार 24,000 वर्ग मीटर का क्षेत्र वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए दे दिया गया है। लेकिन कई ऐसे धूर्त संगठनों की सुनियोजित चुप्पी उनके इरादों को उजागर करती है। उनके लिए आदिवासियों को व्यावसायिक अधिकार देना भारत में वनों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है क्योंकि इससे वनों का विखंडन होता है जो जैव विविधता और संरक्षण प्रक्रिया के लिए एक गंभीर ख़तरा है। एफआरए उन लोगों को भूमि पर अधिकार देता है जो वे पीढ़ियों से रह रहे हैं। उन्होंने कहा, 'यह कुछ भी नया नहीं है कि भूमि एक परिवार को दी गई है, इसलिए वनों के विखंडन का सवाल ही नहीं उठता जैसा कि याचिकाकर्ता द्वारा कथित तौर पर कहा गया। हमें इन संगठनों/याचिकाकर्ताओं से सवाल करना चाहिए कि वे अपने संरक्षण सिद्धांतों को कैसे सही ठहराते हैं। विखंडन तथा अकेले खड़े होने वाले तरीके से संरक्षण नहीं हो सकता है।”

वन अधिकारों से ऊपर कॉर्पोरेट?

मोदी सरकार कॉर्पोरेशन के पक्ष में बेदखली को आसान बनाने के प्रयास में ड्राफ्ट नेशनल पॉलिसी, 2018 लायी और पहले से ही वन-विरोधी तथा जनजातीय-विरोधी भारतीय वन अधिनियम, 1980 में सख्त संशोधन किया। अगर ये मसौदा संशोधन लागू हो जाते हैं तो वे अतिआवश्यक एफआरए के प्रावधानों को अप्रभावी बनाएंगे और वन विभाग को मनमाने और अप्रतिबंधित अधिकार देकर वनों के विशाल संरक्षण का दायरा बढ़ाएंगे। पहले वारंट के बिना तलाशी, गिरफ्तारी और जांच करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत शक्तियां होने के अलावा अब वन विभाग के पास अतिक्रमण करने वाले के खिलाफ बंदूक का इस्तेमाल करने की विवेकाधीन शक्तियां भी होंगी। सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम (एएफएसपीए) के तहत दी गई प्रतिरक्षा में वृद्धि के साथ राज्य सरकार की मंजूरी के बिना अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाना लगभग असंभव होगा।

ये मसौदा संशोधन आगे आरोपियों को लेकर बेगुनाही साबित करने का बोझ डालने का प्रस्ताव करता है। इस प्रस्तावित संशोधन को भारतीय साक्ष्य अधिनियम (एस.101) के सामान्य नियम से एक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है जो यह प्रदान करता है कि मामले को साबित करने का बोझ अभियुक्त पर कभी नहीं जा सकता। इसके अलावा वन प्राधिकरण के पास अपने अपराध सिद्ध होने से पहले ही संपत्ति को जब्त करने और बेचने की शक्ति होगी जिसके परिणामस्वरूप आदिवासियों और वनवासियों का उत्पीड़न हो सकता है और भ्रष्टाचार बढ़ सकता है। इसी तरह मसौदा संशोधन कुछ अपराधों के लिए सामूहिक सजा देने का प्रयास करता है- सामूहिक प्रबंधन से सामूहिक पीड़ा तक का भाव।इसके अलावा वन उपज पर शुल्क लगाने और इसके परिवहन के प्रावधानों को भी मसौदा में प्रदान किया गया है जो एफआरए के प्रावधानों को विफल करता है कि माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (एमएफपी) पर कर नहीं लगाया जा सकता है। इन प्रस्तावित मसौदा संशोधनों में से कई अगर लागू किए जाते हैं तो एफआरए को बिना दांत वाला बाघ बना दिया जाएगा।

प्रस्तावित संशोधन द्वारा पूर्वाभासी क्षति के बावजूद एक अन्य अवैज्ञानिक और विनाशकारी मसौदा राष्ट्रीय वन नीति (एनएफपी) तैयार की गई। इस एनएफपी ने कॉरपोरेट मालिकों के हित के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल की आवश्यकता पर अधिक महत्व दिया है। ये पीपीपी मॉडल वनोत्पादन को तय करके संपूर्ण संरक्षण कार्य के व्यवसायीकरण करने का काम करेगा।

सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च देहरादून से जुड़े एक शोधकर्ता मान्या सिंह ने कहा, “वनों को विकसित होने में वर्षों लगते हैं और तब जाकर कार्बन-सीक्वेस्ट्रेशन क्षमता प्राप्त होती है। पौधे को पूरी तरह से विकसित होने में वर्षों समय लगेगा जो पक्षियों और छोटे स्तनधारियों को आश्रय दे सकते हैं। वन की अल्प वृद्धि तथा वृद्धि को वृक्षारोपण से प्रेरित नहीं किया जा सकता है। निजी बागान वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को दोहरा नहीं सकता है। दूसरी ओर पीढ़ियों से पवित्र सरोवरों जैसे पारंपरिक संरक्षण प्रथाओं को स्थानीय लोगों द्वारा संरक्षित किया गया है। नतीजतन पारिस्थितिकी तंत्र की जैव विविधता में कोई बदलाव नहीं होता है जब इसकी प्राकृतिक अवस्था में संरक्षण होता है। मानवजनित परिवर्तन प्राकृतिक संतुलन को बाधित करते हैं और वृक्षारोपण इस संतुलन को प्राप्त करने में विफल रहे हैं। वन नीति का केंद्र बिंदु उन छोटे प्राकृतिक वनों के संरक्षण पर होना चाहिए जिनके साथ हम बचे हैं।”

रूढ़िवादी संरक्षणवादी वाक्यांश एक आम व्युत्पत्ति-विषयक उद्भव होने के बावजूद एक विरोधाभासी की तरह लगता है। इस वर्ग को यह महसूस करना चाहिए कि औपनिवेशिक मानसिकता का संरक्षण करके और उनके कॉर्पोरेट फंड देने वालों के हित के संरक्षण से उन्हें संरक्षणवादी नहीं बनाया जा सकता है, वास्तव में उनके संरक्षण का रुप वह हासिल करता है जो वे हासिल करना चाहते हैं। पर्यावरणीय परिणामों की परवाह किए बिना अप्रतिबंधित आर्थिक विकास के पूंजीवादी विचार के लिए उनका बिना शर्त समर्थन, व्यक्तिगत विकल्पों और कार्रवाई को अनुशासित करने का प्रयास करते हुए उनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है।

राजनीतिक क्षेत्र के विपरीत वैचारिक टकराव और शोध समुदाय सामंती गुटों में विभाजित होकर संरक्षण प्रयासों को अधिक नुकसान पहुंचाएंगे और भारत की घटती जैव विविधता के महत्वपूर्ण आकलन को कमजोर करेंगे। यदि कोई वास्तव में संरक्षण के लिए ईमानदार है तो हमें बिना शर्त आदिवासियों और वनवासियों के समर्थन में आना चाहिए और ड्राफ्ट नेशनल पॉलिसी तथा भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन का विरोध करना चाहिए। ये दोनों मिलकर अतिक्रमणकारियों को वनों के भीतर लाने का काम करेंगे और वनवासियों को अतिक्रमणकारी बताएंगे।

(लेखक स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के दिल्ली स्टेट कमेटी के अध्यक्ष हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

इसे भी पढ़ें : भारतीय वन अधिनियम-2019 नाइंसाफ़ी का नया दस्तावेज़!

 

Indian forest act-2019
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