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भारत
राजनीति
नागरिकता की जांच : अधिकारों से वंचित करने के मनमाने तरीक़े
कोई जन्म तारीख़ और जन्म स्थल कैसे साबित करेगा? इसका एकमात्र पुख़्ता सबूत जन्म प्रमाणपत्र है। सन् 2000 में भारत में जन्म पंजीकरण की दर केवल 56.2 फ़ीसदी थी, उसके पहले तो यह और भी कम रही होगी।
आईसीएफ़
20 Feb 2020
CAA

नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया अप्रैल, 2020 में शुरू हो जाएगी। मतलब अब सिर्फ दो महीने ही बचे हैं। हम जानते हैं कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ इंडियन सिटीजन (NRIC) बनाने की दिशा में NPR पहला क़दम है। इस बीच NPR और NRC के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन जारी हैं। कई राज्य सरकारों ने इस प्रक्रिया का विरोध किया है।

केंद्र सरकार की इस पूरे विरोध पर क्या प्रतिक्रिया है? केंद्र सरकार कहती है कि NRC अभी तो शुरू भी नहीं हुई और NRIC के लिए नियम बनाने अभी बाक़ी हैं। लेकिन सरकार NPR और NRIC के बीच संबंध को नकार नहीं पाई। सरकार इस तथ्य से भी इनकार नहीं कर पाई कि स्थानीय प्रशासन को दस्तावेज़ उपलब्ध न करवा पाने से NRIC से बड़ी संख्या में 'भारतीय नागरिक' संदेहास्पद घोषित हो जाएंगे।

जांच का पैमाना क्या होगा?

असम NRC के ज़रिये हमें देश में होने वाली NRC के नियमों का कुछ अंदाज़ा लग सकता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि असम में NRC थोड़ी अलग प्रक्रिया थी, क्योंकि उसका क्रियान्वयन सुप्रीम कोर्ट ने करवाया था।

असम की NRC में नागरिकता साबित करने के लिए जन्म, संपत्ति, स्थायी निवासी और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों जैसे दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ी थी। यह दस्तावेज़ कट ऑफ डेट (असम में 21 मार्च, 1971) से पहले के होने जरूरी थे। एक व्यक्ति, जिसके पास 1971 के पहले के किसी दस्तावेज़ में अपना नाम नहीं है,उसे दो तरह के दस्तावेज़ दिखाने थे।

पहले दस्तावेज़ से यह साबित करना था कि उसके पुरखों का नाम 1971 की तारीख के पहले के दस्तावेजों में शामिल है। दूसरा, ऐसा दस्तावेज़ बताना था, जो संबंधित पुरखे से उसका रिश्ता प्रमाणित करता हो। अगर हम सामान्य तरीके से देखें तो समझ आता है किNRC में एक कट-ऑफ डेट होगी। जिसके तहत किसी व्यक्ति को यह दस्तावेज़ प्रस्तुत करने होंगे। 

A)  ऐसे दस्तावेज़ पेश करने होंगे, जो कटऑफ डेट से पहले की जन्म तारीख और जन्मस्थल प्रमाणित कर दें।

B) अपने पुरखों से संबंधों को प्रमाणित करने वाले दस्तावेज़ और ''दी गई सूची के वह दस्तावेज़, जो उसकी खुद की पहचान साबित करते हों।"

जैसा असम की NRC से साफ है, आधार कार्ड, वोटर आईडी या पासपोर्ट जैसे दस्तावेज़ जिन्हें हम पहचान पत्र मानते रहे हैं, उन्हें नागरिकता साबित करने का आधार नहीं माना गया था।

हमने नागरिकता संशोधन अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों से एक इंफोग्राफ बनाया है, ताकि यह जटिल प्रक्रिया समझ में आ सके और यह भी समझा जा सके कि एक भारतीय को NRC के तहत नागरिकता साबित करने में कौन सी बाधाएं आएंगी। दुर्भाग्य से सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता साबित करने का भार राज्य के बजाए हम नागरिकों पर ही डाल दिया है।

इसी के चलते नागरिकता साबित करने की पूरी प्रक्रिया एक बहुत बड़ी बाधा बन गई है, जिसे हमें पार करना है। इसे पार करने की सफलता स्थानीय नौकरशाह की मनमानी मंशा पर भी निर्भर करेगी।

इस प्रक्रिया के ज़रिए स्थानीय पॉपुलेशन में पंजीकृत किसी स्थानीय निवासी को दो तरह से बांटा जाएगा। पहले वो लोग होंगे, जो भारतीय बनने के सभी तरह के पैमानों पर खरे उतरेंगे,दूसरे लोग संदेहास्पद होंगे। यह संदेहास्पद लोग बिना राज्य के रहवासी रह जाएंगे।

भारत में नागरिकता के आधार क्या हैं?

भारत में कोई नागरिकता कैसे साबित करता है? भारत में नागरिकता के नियम संविधान और नागरिकता कानून के प्रावधानों से चलते हैं। नागरिकता के पैमाने सभी उम्र के लोगों के लिए एक जैसे नहीं हैं।

1955 में लागू किया गया नागरिकता कानून,जन्म के आधार पर नागरिकता देता है। लेकिन इसके प्रावधानों को 1986 और 2003 में संशोधित किया गया। नीचे दिए ग्राफिक्स में जन्म वर्ष के आधार पर नागरिकता के पैमानों को समझ सकते हैं। आप यह भी देख सकते हैं कि नागरिकता साबित करने के लिए किन दस्तावेज़ों की जरूरत पड़ती है।

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एक जुलाई, 1987 से पहले पैदा हुए लोग

जो लोग एक जुलाई 1987 के पहले पैदा हुए हैं, उनके लिए नागरिकता का आधार जन्म है। इस वर्ग में न आने वाले लोगों के लिए अपने जन्म की तारीख और जन्मस्थल का प्रमाण देकर नागरिकता साबित करनी होगी।

1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच पैदा हुए लोग

कोई व्यक्ति जो 1 जुलाई 1987 के बाद और 3 दिसंबर 2004 से पहले पैदा हुआ है, वह भारत का नागरिक होगा

- अगर वो भारत में पैदा हुआ और

- उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक है।

इस वर्ग में शामिल लोगों को खुद के और अपने माता-पिता में से किसी एक की जन्म तारीख और जगह की जानकारी से संबंधित प्रमाणपत्र देने होंगे।

3 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोग

कोई व्यक्ति जो तीन दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुआ है, उसे भारत का नागरिक बनने के लिए तीन शर्तों को पूरा करना होगा।

- भारत में जन्म

- माता-पिता मे से कोई एक भारतीय होना जरूरी है और

- दूसरा अभिभावक (पेरेंट) कोई अवैध प्रवासी न हो

इस वर्ग में शामिल लोगों को अपने साथ-साथ, अपने माता और पिता, दोनों के नागरिकता संबंधी सबूत ज़मा करने होंगे। इन सबूतों में यह चीजें शामिल होनी चाहिए:

- जन्म तारीख और जन्म स्थल की जानकारी और

- जो अभिभावक भारत का नागरिक है,उसकी जन्म तारीख और जन्म स्थल की जानकारी

- दस्तावेज़ जो साबित करते हों कि दूसरा अभिभावक भारत का नागरिक है या''अवैध प्रवासी नहीं है''

2003 में संशोधित किए गए नागरिकता कानून के मुताबिक अवैध प्रवासी वह विदेशी व्यक्ति है, जिसने बिना वैध दस्तावेज़ के साथ भारत में प्रवेश किया है या दस्तावेज़ों की अंतिम तारीख निकलने के बाद भी भारत में रह रहा है।

दूसरा अभिभावक अवैध प्रवासी नहीं है, इसे साबित करने के लिए :

- विदेशी नागरिक होने की स्थिति में संबंधित देश की नागरिकता के वैध दस्तावेज़ और उसके भारत में आने और यहां ठहरने के दस्तावेज़

- अगर कोई अभिभावक भारतीय भी नहीं है, न ही वे विदेशी नागरिक हैं, तब उन्हें नए नागरिकता संशोधन कानून के तहत अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा,अगर वे निम्न चीजें साबित कर दें-

1.उनका धर्म- हिंदू, सिख, पारसी, जैन,बौद्ध या क्रिश्चियन है।

2.उनके उद्भव का देश अफगानिस्तान,बांग्लादेश या पाकिस्तान है।

3.अगर उन्होंने 31 दिसंबर 2014 के पहले भारत में प्रवास किया है।

नीचे दिए ग्राफिक में नागरिकता संशोधन अधिनियम में नागरिकता साबित करने की शर्तों और इसके लिए जरूरी दस्तावेजों के बारे में बताया गया है।

CAAHindi 03.._1.jpg

अगर संबंधित लोग, स्थानीय प्रशासन के सामने यह सबूत देने में कामयाब रहे, तो उन्हें लोकल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स में जोड़ दिया जाएगा,जो NRIC की सबसे छोटी यूनिट है। जो लोग यह करने में नाकामयाब रहेंगे, उन्हें''संदेहास्पद'' के तौर पर दर्ज किया जाएगा।

नागरिकता साबित करने में सबसे ज्यादा दिक्कत युवा लोगों को होगी। उन्हें न केवल खुद की नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ पेश करने होंगे, बल्कि अपने माता-पिता और दादा-दादी/नाना-नानी की नागरिकता भी साबित करनी होगी। जैसे- अगर कोई बच्ची 2014 में पैदा हुई, उसकी मां 1992 में और पिता 1989 में पैदा हुए, तो अब इस 6 साल की बच्ची को यह साबित करना होगा:

- अपनी जन्म तारीख और जन्म स्थल

- उसकी मां का जन्म स्थल और जन्म तारीख। साथ में उसकी नानी या नाना में से किसी एक का जन्म स्थल और जन्म तारीख

- उसके पिता का जन्म स्थल और जन्म तारीख। साथ में उसके दादा या दादी में से किसी एक का जन्म स्थल और जन्म तारीख

दस्तावेज़

कोई जन्म तारीख और जन्म स्थल कैसे साबित करेगा? इसका एकमात्र पुख़्ता सबूत जन्म प्रमाणपत्र है। सन् 2000 में भार में जन्म पंजीकरण की दर केवल 56.2 फ़ीसदी थी,उसके पहले तो यह और भी कम होगी। 2016 के आखिर में भी उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जन्म पंजीकरण 60.7 फ़ीसदी ही था।

किसी को यह समझने के लिए बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है कि दस्तावेज़ दिखाने और अपने पुरखों की नागरिकता साबित करना किसी के लिए कितनी टेढ़ा काम साबित हो सकता है। असम की NRC से पता चलता है कि कुछ समुदाय और समूह ऐसी प्रक्रिया में घाटे में रहते हैं। असम NRC में जिन 19 लोगों को बाहर किया गया है, उनमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि महिलाएं अपने पितृ पक्ष के पुरखों की नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज़ नहीं खोज पाईं। NRC में कई बच्चों को भी शामिल नहीं किया गया।

अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोग अशिक्षित होते हैं, उनके पास संपत्ति नहीं होती। यहां तक कि उनका स्थायी निवास भी नहीं होता, क्योंकि वे काम की तलाश में एक से दूसरी जगह प्रवास करते रहते हैं। वो कैसे दस्तावेज़ पेश करेंगे? कल्पना कीजिए कि वो अपना काम छोड़कर दस्तावेज़ इकट्ठे करने में लग जाएंगे या स्थानीय अधिकारियों के सामने पेशी के लिए मजूबर होंगे। दैनिक मजदूरी करने वाली मजदूर ऐसे में कैसे अपनी और अपने परिवार की देखभाल करेगी, अगर वो सरकारी ऑफिसों में दस्तावेज़ लेने के लिए काम छोड़कर चक्कर लगाती रहेगी?

इसलिए NRC की यह प्रक्रिया वित्तीय और सामाजिक तौर पर वंचित समुदायों के लिए प्रताड़ना साबित होगी।

अधिकारों से मनमाने तरीके से वंचित करना

जांच की यह प्रक्रिया स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की जाएगी। यह भी डर की एक वजह है, क्योंकि स्थानीय अधिकारियों के पास जरूरी वैधानिक और न्यायिक समझ नहीं होती। नागरिकता साबित करने का प्रश्न वैधानिक प्रवृत्ति का है। इसलिए इस जैसे अहम मसले को नौकरशाहों के सुपुर्द नहीं सौपना चाहिए, जिन्हें कानून की कोई समझ नहीं होती।

अभी तक सरकार की तरफ से कोई शर्तें तय नहीं की गई हैं, लेकिन यह डर है कि जो भी शर्तें होंगी, NRC-NRIC में प्रशासन इनका गलत इस्तेमाल कर सकता है। हाल में एक केस में स्थानीय अधिकारियों ने हरियाणा की रहने वाली दो बहनों को पासपोर्ट देने से इंकार कर दिया था। अधिकारी ने लड़कियों को देखते हुए कह दिया था कि वे नेपाल की रहने वाली हैं।

एक दूसरे मामले में, बेंगलुरू में अधिकारियों ने महज़ एक अफवाह के आधार पर 100 घरों को गिरा दिया था। अधिकारियों ने अफवाह सुनी थी कि इन घरों में अवैध बांग्लादेशी रहते हैं। यह कार्रवाई महज़ एक स्थानीय बीजेपी विधायक द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो को आधार बनाकर, बिना किसी तय प्रक्रिया के की गई थी। इन दोनों मामलों में सरकारी अधिकारियों ने पूर्वाग्रह और गलत जानकारी के साथ काम किया और मनमाने तरीके से लोगों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। यह तस्वीरें बताती हैं कि NPR और NRIC से क्या उथल-पुथल मचेगी।

साभार : आईसीएफ़ 

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