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मौसम परिवर्तन पर अमीर देशों के रूझान से हजारों लोग पीड़ित बनने को मजबूर
मौसम परिवर्तन पर कोई भी पश्चिमी समझौता पर्याप्त नहीं होगा, अगर उसमें यूएन क्लाइमेट फंड के लिए पैसे न हों और समझौते में बिना फायदा लिए तकनीक हस्तांतरण की बात शामिल न हो।
विजय प्रसाद
05 Dec 2019
COP 25

स्पैन के मैड्रिड में दो दिसंबर से यूएन 'क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस' शुरू हो चुकी है। इसे 'COP 25' के नाम से जाना जाता है। दुनियाभर के प्रतिनिधि यहां हमारे ग्रह की सबसे गंभीर समस्या पर चर्चा के लिए जुटे हैं। केवल नव-फासिस्ट दक्षिणपंथी जैसी ख़तरनाक सियासी ताकतें ही 'क्लाइमेट चेंट या मौसम परिवर्तन' की असलियत से मुंह मोड़ सकती हैं। कॉर्बन आधारित ईंधन से दूसरे ईंधनों की तरफ बदलाव न होने की वजह देशों का अड़ियल रवैया नहीं है। इसके लिए तीन कारण हैं;

दक्षिणपंथियों ने मौसम परिवर्तन को नकारा

ईंधन उद्योग से जुड़े कई हिस्सों के कॉर्बन आधारित ईंधन से हित जुड़े हुए हैं; पश्चिमी देश यह मानने से इंकार कर रहे हैं कि यह समस्या उनकी पैदाइश है और उन्हें अपने संसाधनों का इस्तेमाल कर दूसरे देशों को कॉर्बन आधारित ईंधन से दूसरे ईंधन की ओर मुड़ने में मदद करनी चाहिए। ध्यान रहे इन देशों का धन पश्चिमी देशों ने हड़पा है। दक्षिणपंथी और 'मौसम उद्योग से जुड़े लोगों' के हितों जैसी पहली दो बाधाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। मौसम उद्योग के पैसे (जैसे कोच बंधु) से उनको मदद पहुंचाई जाती है, जो सच्चाई पर शक पैदा कर मौसम परिवर्तन की समस्या से इंकार कर रहे है।

तीसरी रूकावट बेहद गंभीर है। इसके चलते यूएन की कोशिशें सफल नहीं हो पाईं। 1992 में हुए 'पृथ्वी सम्मेलन (अर्थ समिट)' में दुनियाभर के देशों ने 'यूएन फ्रेमवर्क कंवेशन ऑन क्लाइमेट चेंज' पर सहमति जताई थी। दो साल बाद यह महासभा से पारित हो गया। इसके तहत इस बात पर सहमति बनी थी कि उपनिवेशवाद को मौसम संकट से अलग नहीं किया जा सकता।

संबंधित पक्षों ने लिखा, ''मौसम परिवर्तन की वैश्विक प्रकृति, एक जरूरी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के लिए, दुनियाभर के देशों के अधिकतम सहयोग, जो उनकी अलग-अलग क्षमताओं, जिम्मेदारियों और समााजिक-आर्थिक स्थितियों के हिसाब से हो सकती है, उस साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारी की मांग करती है।''

साझा और विभेदित ज़िम्मेदारियां

यहां जिस मुख्य हिस्से पर ध्यान देने की जरूरत है, वो है 'साझा लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियां'। इसका मतलब है कि मौसम परिवर्तन ऐसी समस्या है, जो सभी देशों को प्रभावित करती है। इसकी मार से कोई देश बच नहीं सकता। बहुत सारे ऐसे देश हैं जो सदियों के उपनिवेशवाद और कॉर्बन ईंधन से फायदा उठाते रहे हैं, ऐसे में कम नुकसान पहुंचाने वाले ईंधन सिस्टम को बनाने में उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ जाती हैं।

इसमें बहुत कम वाद-विवाद है कि कुछ देश, खासकर पश्चिमी देशों को उपनिवेशवाद और कॉर्बन ईंधन से बेइंतहां फायदा हुआ है। 'कॉर्बन डाइऑक्साइड इंफॉर्मेशन एनालिसिस सेंटर' के 'ग्लोबल कॉर्बन प्रोजेक्ट' के मुताबिक़, सन् 1750 से अमेरिका दुनियाभर में सबसे बड़ा कॉर्बन उत्सर्जक रहा है। मुख्य कॉर्बन उत्सर्जक मूलत: साम्राज्यवादी ताकतें रही हैं, जिनमें यूरोपीय देश और अमेरिका प्रमुख हैं। 18 वीं सदी से ही न केवल इन देशों ने ज़्यादातर कॉर्बन का उत्सर्जन किया है, बल्कि इनका अपने कोटे से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन जारी है।

कार्बन प्रायोजित पूंजीवाद औऱ उपनिवेशों से चुराई हुई दौलत से यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देश अपने लोगों का भला करने में कामयाब रहे। आज भी एक औसत यूरोपीय नागरिक और औसत भारतीय नागरिक के जीवन जीने के स्तर में वही फर्क है, जो एक सदी पहले हुआ करता था। चीन, भारत और दूसरे विकासशील देशों की कॉर्बन खासकर कोयले पर निर्भरता बहुत ज़्यादा है। लेकिन इसके बावजूद भी चीन और भारत का प्रति व्यक्ति कॉर्बन उत्सर्जन अमेरिका से ज़्यादा नहीं है। अमेरिका का कॉर्बन उत्सर्जन चीन के प्रतिव्यक्ति कॉर्बन उत्सर्जन से दोगुना है।

ग्रीन क्लाइमेट फंड

फ्रेमवर्क में उपनिवेशवाद और 'औद्योगिक पूंजीवाद की वैश्विक भिन्नता' के कॉर्बन बजट पर पड़ने वाले प्रभाव को पहचाना गया। इसलिए रियो में 'ग्रीन क्लाइमेट फंड' की स्थापना पर सहमति बनी। पश्चिमी देशों से इसमें बड़ा योगदान करने के लिए कहा गया। इस पैसे का इस्तेमाल विकासशील देशों में कॉर्बन आधारित सामाजिक विकास से आगे जाने के लिए किया जाएगा।

आशा थी कि 2020 तक इस फंड में 100 बिलियन डॉलर इकट्ठे हो जाएंगे। अमेरिका ने तीन बिलियन डॉलर देने का वादा किया था, लेकिन सिर्फ एक बिलियन का ही योगदान दिया। डोनल़्ड ट्रंप ने फंड में अब अमेरिकी योगदान को भी रोक दिया है। जबकि इसके उलट बार्नी सैंडर्स ने कहा था कि वे फंड में 200 बिलियन का योगदान करेंगे। वहीं ब्रिटेन के जर्मी कॉर्बिन ने वायदा किया है कि वे वर्ल्ड बैंक के क्लाइमेट इंवेस्टमेंट फंड पर ब्रिटेन के प्रभाव का इस्तेमाल 'क्लाइमेट जस्टिस' दिलाने में करेंगे। रूस और ऑस्ट्रेलिया ने भी इस फंड में पैसा देना बंद कर दिया है। इस फंड को आगे बढ़ाने की भी कोई भूख दिखाई नहीं देती। संभावना कम ही है कि COP25 में इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाएगा।

100 बिलियन डॉलर का आंकड़ा बेहद पारंपरिक है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी अपनी वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक में बताती है कि असली आंकड़ा ट्रिलियन में है। किसी भी पश्चिमी देश ने इस स्तर पर फंड के विस्तार पर कोई बात नहीं की है।

कोयले पर हमला

चीन, भारत और दूसरे देशों को निशाना बनाना आसान है। नवंबर की शुरूआत में यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने बैंकाक में UN-ASEAN मीटिंग के बाद प्रेस को संबोधित किया। इसमें उन्होंने न तो ग्रीन क्लाइमेट फंड और न ही विभेदित जि़म्मेदारियों की बात की। उन्होंने तीन प्रस्ताव दिए, इनमें से किसी का भी मूल विभेदित जिम्मेदारियों के सिद्धांत से कोई लेना देना नहीं है।

1.कॉर्बन उत्सर्जन पर कर लगाया जाना चाहिए।

2.जीवाश्म ईंधन पर खर्च होने वाले खरबों डॉलर की सब्सिडी बंद की जानी चाहिए।

3.2020 तक कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के निर्माण को रोकना होगा।

इनमें से किसी भी प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं जताई गई। बल्कि अंत:सरकारी पैनलों से आ रही रिपोर्टों में समस्या की जिस गंभीरता को बताया गया है, उनको देखते हुए कदम उठाए जाने जरूरी हैं।

लेकिन यह कार्रवाई किस तरह की होगी? यह तीनों प्रस्ताव उन देशों को सीधे नुकसान पहुंचाएंगे जो अभी भी अपने लोगों को बिजली पहुंचाने में नाकामयाब रहे हैं या वो देश जो यूएन के सतत विकास लक्ष्यों से दूर हैं। दक्षिणपूर्व एशिया, जहां गुतेरेस यह बातें बोल रहे थे, वहां भी 2030 तक ही पूरी तरह बिजली की पहुंच हो पाएगी।

विकसित औद्योगिक देश, जैसे ब्रिटेन और जर्मनी ने कहा है कि वे 2040 तक ही कोयले से पूरी तरह निज़ात पाने में सक्षम हो पाएंगे। यह वह देश हैं जिन्होंने 'पॉवरिंग पास्ट कोल एलायंस' बनाय़ा है। इसको 'ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फायनेंस' से मदद प्राप्त है, जो नए समझौतों से फायदा उठाने को उत्सुक कैपिटल फंड में से एक है। वहां वेंचर कैपिटलिस्ट के लिए पैसे बनाने की जगह है; वे ग्रीन क्लाइमेट फंड के लिए जरूरी अरबों डॉलर का योगदान नहीं करेंगे। ग्रीन ट्रांजेक्शन के नाम पर जो पैसा ये बचाएंगे, उसका बहुत थोड़ा सा हिस्सा ही इन्हें कॉर्बन रहित भविष्य के लिए देना होगा।

एक भद्दा विकल्प

इस बीच विकासशील देशों के सामने सबसे सस्ते ईंधन कॉर्बन को भूल जाने का विकल्प है। अगर ऐसा होता है तो उन्हें अपने लोगों के सामाजिक विकास को भी छोड़ना होगा या फिर यह देश कॉर्बन का इस्तेमाल कर अपने ग्रह को नुकसान पहुंचाएंगे। अगर विकसित देश ग्रीन क्लाइमेट फंड में पैसे नहीं देते और बिना लेन-देन के पवन-सौर तकनीकें देने से इंकार करते हैं, तो विकासशील देशों के पास केवल यही विकल्प हैं। पश्चिमी देशों की तरफ से दिया गया कोई भी विकल्प कारगर नहीं होगा, अगर उसमें ग्रीन क्लाइमेट फंड औऱ बिना फायदे लिए तकनीक हस्तांतरण मौजूद नहीं होंगे।

विजय प्रसाद इतिहासकार, संपादक और पत्रकार हैं। वह इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट Globetrotter में राइटिंग फैलो और चीफ करस्पोंडेंट हैं। विजय लेफ्टवर्ड बुक्स के मुख्य संपादक भी हैं और Tricontinental: Institute for Social Research के निदेशक हैं।

सोर्स: इंडिपेडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट

य़ह आर्टिकल Globetrotter ने पब्लिश किया है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Wealthy Countries’ Approach to Climate Change Condemns Hundreds of Millions of People to Suffer

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