NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लेखक को क्या करना चाहिए
कोशिश यह है कि कुछ सवालों को सामने रखा जाये। हमें गहन तरीक़े से अपनी ख़ुद की जांच-पड़ताल करना चाहिए और सख़्ती से आत्म-आलोचना करनी चाहिए।
अजय सिंह
14 Jun 2021
लेखक को क्या करना चाहिए
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार

इस लेख के शीर्षक के जवाब में यही कहा जा सकता है: ज़ाहिर है, उसे लिखना चाहिए ! लेकिन सवाल है : वह क्या लिखे, कैसे लिखे, क्यों लिखे, और किसके लिए लिखे।

क्या उसके लिखत-पढ़त का कोई असर या गूंज-अनुगूंज है? अगर लोगों तक लिखा हुआ न पहुंचे, देर-सबेर ही सही, तो क्या फिर लिखे हुए की उपयोगिता रह जाती है? सवाल पेचीदा हैं। जवाब आसान नहीं।

यहां यह बता देना ज़रूरी है कि इस लेख का मक़सद प्रवचन या उपदेश देना नहीं है। यह आत्म-निरीक्षण व आत्म-आलोचना की दिशा में मामूली कोशिश है। कोशिश यह है कि कुछ सवालों को सामने रखा जाये। हमें गहन तरीक़े से अपनी ख़ुद की जांच-पड़ताल करना चाहिए और सख़्ती से आत्म-आलोचना करनी चाहिए। हमें आत्म-आलोचना करनी है, आत्म-भर्त्सना नहीं। दोनों में फर्क है।

जब ‘लेखक’ शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो इसमें स्त्री लेखक व पुरुष लेखक दोनों शामिल हैं। भाषा को जेंडर-फ़्रेंडली (जेंडर-अनुकूल) और जेंडर-न्यूट्रल (जेंडर-तटस्थ) कैसे बनाया जाये, यह बड़ी लेकिन जेनुइन समस्या है, जिससे दुनिया भर की भाषाएं जूझ रही हैं, एक लेखक के लिए यह चुनौती है।

हमारी अपनी हिंदी आम तौर पर पुरुष वर्चस्ववादी भाषा है, जिसकी जड़ें ब्राह्मणी सामंती पितृसत्तात्मक सामाजिक बनावट, संस्कार व सोच-विचार में गहराई से घुसी हुई हैं। बोले जानेवाले और लिखे जानेवाले इसके सारे क्रिया पद, संज्ञाएं, सर्वनाम व विशेषण पुरुषवाचक हैं। स्त्री यहां है, लेकिन वस्तु (ऑब्जेक्ट) के रूप में-पुरुष की अधीनता में—है। वह मुख्य कर्ता-धर्ता या पालनहार के रूप में नहीं है। मुख्य कर्ता-धर्ता या भरण-पोषण करनेवाला (भतार या भरतार) पुरुष ही है।

अब यह चीज़ हिंदी को स्त्री-द्वेषी (misogynist) भाषा बनने की तरफ़ ठेल देती है, जहां स्त्री अपमान, तिरस्कार, मज़ाक, गाली-गलौज व यौन हिंसा का निशाना बनती है, उसे यौन वस्तु बना दिया जाता है। या फिर, उसे दोयम दर्जा देते हुए उसे पुरुष ‘ कृपा’ व ‘ उदारता’ की आकांक्षी—सही शब्द है भिखारी—बना दिया जाता है। स्त्री बौद्धिक रूप से हीन या कमतर है, यह धारणा आम तौर पर लोगों के जहन में बैठी हुई है।

अगर आलोचनात्मक नज़रिए से देखा जाये, तो, कुछ अपवादों को छोड़कर, कई हिंदी लेखकों—जैसे : महेंद्र भल्ला, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, पकंज बिष्ट, मोहन राकेश, रवींद्र कालिया, आदि—की रचनाओं में स्त्री-द्वेषी नज़रिया मिलेगा। नीलेश रघुवंशी और कृष्णा सोबती भी स्त्री-द्वेषी दृष्टिकोण से मुक्त नहीं हैं। आलोचक रामचंद्र शुक्ल की आलोचना की बुनियाद ही स्त्री-विरोध, मुस्लिम-विरोध, दलित-विरोध और उर्दू-विरोध पर टिकी है—मीरा, कबीर और रैदास पर उनकी हिकारत से भरी टिप्पणियों पर ग़ौर फरमाइये। यहां तक कि मध्यकालीन कवि कबीर भी, जिन्हें विद्रोही माना जाता है, स्त्री के प्रति अत्यंत अपमानजनक व अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक लेखक को इस पर विचार करना होगा कि ऐसा क्यों है।

यह स्त्री-द्वेषी दृष्टिकोण, जो लंबे समय से सांस्कृतिक-वैचारिक तौर पर जड़ जमाये है, आगे चलकर ‘ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ यानी हिंदू राष्ट्रवाद और वैचारिक /राजनीतिक फ़ासीवाद के लिए ज़मीन तैयार करता है, जिससे इन दिनों हमारा देश गुज़र रहा है। 2014 से, जब से केंद्र में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, यह वैचारिक फ़ासीवाद संस्थाबद्ध रूप लेता हुआ ज़्यादा-से-ज़्यादा आक्रामक होता चला गया है। अब खुलकर इसके निशाने पर स्त्री, मुसलमान, ईसाई, दलित, आदिवासी, एलजीबीटीक्यू (LGBTQ), ग़रीब-वंचित-घुमंतू समुदाय हैं। साथ ही, उदार-सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवी समुदाय और नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) पर भी उसने बर्बर तरीक़े से हमला बोला।

इस दौरान हिंदी सबसे ज़्यादा हिंसा और नफ़रत फैलानेवाली भाषा बनती चली गयी। हालत यहां तक आ पहुंची कि इस नफ़रती और हिंसक हिंदी से क्षुब्ध होकर एक हिंदी कवि (मंगलेश डबराल) को कहना पड़ा कि मुझे शर्म है कि मैं हिंदी में लिखता हूं। जिस तरह से गंगा नदी ‘ शव-वाहिनी गंगा’ बन गयी है, उसी तरह से हिंदी भी हिंदू राष्ट्रवाद वाहिनी और वैचारिक फ़ासीवादी-वाहिनी भाषा बन गयी है।

एक लेखक को इस पर सोचना है। उसे सोचना है कि वह ऐसी हिंदी का क्या करे। उसे सोचना है कि हिंदी को कैसे इस दमघोटू गिरफ़्तारी से बाहर निकाले और उसे मानवीय व प्रेमिल-सजल बनाये।

नये भारत की खोज का सपना लिये कुछ लड़ाइयां चल रही हैं। कश्मीर, भीमा कोरेगांव व शाहीनबाग़ इस लड़ाई का हिस्सा हैं। दिल्ली हिंसा (2020) और उसके बाद बड़े पैमाने पर निर्दोष नौजवान स्त्री-पुरुषों की गिरफ़्तारी, और दिल्ली की सीमाओं पर छह महीने से ज़्यादा समय से चल रहा किसान आंदोलन इस लड़ाई के अगले पड़ाव है। अब लक्षद्वीप को बचाने का अभियान भी इस लड़ाई का हिस्सा बन गया है।

एक लेखक को सोचना है कि वह कैसे इस बड़ी लड़ाई से अपनी भाषा व लेखन को जोड़े। उसे हिंदी को ‘शव-वाहिनी’ होने से बचाना है उसे प्रेम व जीवन का गीत गाना है। बिना थके।

(लेखक वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

writer
LGBTQ
Kashmir
Bhima Koregaon
Press freedom

Related Stories

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

इतवार की कविता: भीमा कोरेगाँव

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

दिल्ली : फ़िलिस्तीनी पत्रकार शिरीन की हत्या के ख़िलाफ़ ऑल इंडिया पीस एंड सॉलिडेरिटी ऑर्गेनाइज़ेशन का प्रदर्शन

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती


बाकी खबरें

  • Mothers and Fathers March
    पीपल्स डिस्पैच
    तख़्तापलट का विरोध करने वाले सूडानी युवाओं के साथ मज़बूती से खड़ा है "मदर्स एंड फ़ादर्स मार्च"
    28 Feb 2022
    पूरे सूडान से बुज़ुर्ग लोगों ने सैन्य शासन का विरोध करने वाले युवाओं के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाले। इस बीच प्रतिरोधक समितियां जल्द ही देश में एक संयुक्त राजनीतिक दृष्टिकोण का ऐलान करने वाली हैं।
  • गौरव गुलमोहर
    यूपी चुनाव: क्या भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं सिटिंग विधायक?
    28 Feb 2022
    'यदि भाजपा यूपी में कम अंतर से चुनाव हारती है तो उसमें एक प्रमुख कारण काम न करने वाले सिटिंग विधायकों का टिकट न काटना होगा।'
  • manipur
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मणिपुर में पहले चरण का चुनाव, 5 ज़िलों की 38 सीटों के लिए 67 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदान
    28 Feb 2022
    मणिपुर विधानसभा के लिए आज पहले चरण का मतदान संपन्न हो गया। मतदान का समय केवल शाम 4 बजे तक ही था। अपराह्न तीन बजे तक औसतन 67.53 फ़ीसदी मतदान हुआ। अंतिम आंकड़ों का इंतज़ार है।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : फिर ज़ोर पकड़ने लगी है ‘स्थानीयता नीति’ बनाने की मांग : भाजपा ने किया विरोध
    28 Feb 2022
    हेमंत सोरेन सरकार को राज्य में होने वाली सरकारी नियुक्तियों के लिए घोषित विसंगतिपूर्ण नियोजन नीति को छात्रों-युवाओं के विरोध के बाद वापस लेना पड़ा है। लेकिन मामला यहीं थम नहीं रहा है।
  • Sergey Lavrov
    भाषा
    यूक्रेन की सेना के हथियार डालने के बाद रूस ‘किसी भी क्षण’ बातचीत के लिए तैयार: लावरोव
    28 Feb 2022
    लावरोव ने यह भी कहा कि रूस के सैन्य अभियान का उद्देश्य यूक्रेन का ‘‘विसैन्यीकरण और नाजी विचारधारा से’’ मुक्त कराना है और कोई भी उस पर कब्जा नहीं करने वाला है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License