NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
किधर है अमेरिका में लोकतंत्र? 
बिना कोई शक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका बुनियादी रूप से कमजोर हो गया है। 
एम. के. भद्रकुमार
11 Jan 2021
अमेरिका में लोकतंत्र? 
जनवरी 2021को अमेरिका के कैपिटल हिल, वाशिंगटन  में  धावा बोलते ट्रंप समर्थक

जर्मन विदेश मंत्री हीको मास ने अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में बुधवार को हुई बेहद नाटकीय़ घटनाओं-कैपिटल बिल्डिंग में उपद्रव करने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से तख्तापलट का प्रयास-पर एक मर्मस्पर्शी टिप्पणी की है। उन्होंने इस कांड की तुलना हिटलर के संपूर्ण सत्ता पर कब्जा के मकसद से 1933 में शुरू किये अभियान से की है, जिसके तहत जर्मन की संसद (रैहस्टाग) की इमारत में आग लगा दी गई थी। कैपिटल कांड के बाद, विदेशों में अमेरिका के सर्वनाशक की छवि बताती है कि दुनिया उसको किस नजरिये से देख रही है। 

बुधवार को हुए भयानक कांड को याद किये बिना अमेरिकी अधिकारियों को  अपने विदेशी समकक्षों से लोकतंत्र में चुनावों की महत्ता समझाने और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के बारे में बातचीत करने में दशकों लगेंगे। यह कांड उनके चेहरे पर एक तमाचे की तरह है। बिना किसी शक-शुबह के, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका बुनियादी रूप से कमजोर हो गया है। 

अमेरिका के लिए अपनी प्रतिष्ठा और दूसरों में डर पैदा करने की क्षमता को फिर से बहाल करने की कोशिश अब एक न उम्मीदी का सबक हो गया है। शत्रु ताकतें संयुक्त राज्य अमेरिका में एक नई अरक्षितता देखेंगे। यहां तक कि  यूरोप में अमेरिका के मजबूत सहयोगी  भी इस बात पर ताज्जुब कर रहे हैं कि क्यों उन्हें नाटो के साथ उत्तर अटलांटिक  गठबंधन के केंद्र के प्रति अपना विश्वास रखना चाहिए, जबकि अमेरिका की राजनीति ज्वरग्रस्त हो गई है

एक आम अवधारणा है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित जो बाइडेन की टिप्पणियों का बहाना बनाते हुए अपने समर्थकों को इस “विद्रोह” के लिए उकसाया था।  जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल  और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री  बोरिस जॉनसन  ने भी इस कांड के लिए बृहस्पतिवार को  सीधे-सीधे ट्रंप पर तोहमत लगाये।  इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से अचानक गुस्से और निराशा में आए, डेमोक्रेट्स, ट्रंप को राष्ट्रपति पद से “बर्खास्त करने” की मांग कर रहे हैं। इस बीच, जिस चीज ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा, वह है, कैपिटल  हिल की बिल्डिंग में अराजकता रोकने में सुरक्षा एजेंसियों की सीधी-सीधी अयोग्यता। यह वास्तविकता है कि सुरक्षा बल लोकतंत्र के गढ़ अमेरिका में ऐसी घटना को होते नहीं रोक सके, यह व्यवस्था के एकदम निष्क्रिय हो जाने का उदाहरण है। 

इसी तरह,कानून लागू करने वाली एजेंसियों की कलंककारी विफलता भी  गहरी चिंता का कारण है।  अमेरिका में 9/11  की घटना के बाद आने वाली सरकारों ने अपने देश की सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए करोड़ों डॉलर की धनराशि खर्च की है। लेकिन कैपिटल हिल में तैनात सुरक्षाबलों की तरफ से दिखाई गई निष्कियता का सबसे हैरतकारी पक्ष, उसके उस व्यापक प्रतिरोध प्रदर्शनों से एकदम विपरीत है, जो वह नस्लीय अन्याय,  युद्ध  और अमेरिका में दमन के खिलाफ सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध अपने बल प्रयोग के जरिये दिखाती रही है।

अमेरिका में श्वेत वर्चस्ववादी अर्धसैनिक समूहों के साथ पुलिस की समानुभूति का अपना एक इतिहास रहा है। बुधवार को कैपिटल हिल कांड की तस्वीरें दिखाती हैं कि वहां तैनात लगभग 2000 सुरक्षाकर्मियों की दिलचस्पी अराजक भीड़ को इमारत में घुसने से रोकने में नहीं थी। सोशल मीडिया पर कम से कम एक ऐसी विवादास्पद तस्वीर वायरल हुई है, जिसमें एक पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों के साथ  “सेल्फी” लेता दिख रहा है। अन्य तस्वीरों में सुरक्षा अधिकारियों को, इमारत में ट्रंप-समर्थक प्रदर्शनकारियों के प्रवेश के लिए दरवाजे खोलते दिखाया गया है।

निश्चित रूप से,  डेनमार्क राज्य में कुछ सड़ गया है। वास्तव में, यह कलंकित करने वाला कांड अमेरिकी राजनीतिक प्रणाली में गड़बड़ी की तरफ उंगली उठाता है, जिसमें 6 सालों बाद अमेरिकी सीनेट में डेमोक्रेट्स के नियंत्रण होने के जोर-शोर से किए जा रहे प्रचार को नहीं छिपाया जा सकता है।  गड़बड़ी इससे भी कहीं गहरे स्तर पर है और इन सबका अमेरिका की पुरातन चुनाव प्रणाली और न केवल उसके समाज में व्यापक विभाजन में है, बल्कि दो मुख्यधारा की पार्टियों के ध्रुवीकरण में भी है। निकट भविष्य में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स पार्टियां बिखर सकती हैं,  जिससे  अमेरिका में द्वि-दलीय प्रणाली का स्वयं ही  अंत हो सकता है। 

अमेरिका खतरनाक रूप से विभाजित एक गणराज्य बन गया है, जिसके बारे में जॉर्ज वॉशिंगटन और उसके उत्तराधिकारी जॉन एडम्स ने चेतावनी दी थी।

 जॉर्ज वाशिंगटन ने अपने विदाई समारोह में चेताया था कि “अति-पक्षपात”- “एक धड़े के दूसरे धड़े के ऊपर प्रतिशोध की तीखी भावना के साथ प्रभुत्व का विकल्प”- कुछ बिंदुओं पर “भयंकर निरंकुशता” में बदल रही है। एड्म की चेतावनी थी कि “ (अमेरिकी) गणतंत्र का दो महान पार्टियों के बीच विभाजन...एक भयानक राजनीतिक बुराई होने वाली है।”

इसका विरोधाभास यह है कि अगर अमेरिका में द्वि दलीय व्यवस्था  आज तक कामयाब रही है तो इस वजह से कि इसके पहले वे दोनों दल एक दूसरे से इतने दूर नहीं थे।  वास्तव में, वे बहुत थोड़े के लिए एक साथ होते थे और अधिकांश में, वे राज्य तथा स्थानीय पार्टियों के एक बड़े खेमे वाले ढीले-ढाले गठबंधन के रूप में काम करते थे। दरअसल, यह चतुष्पदी-पार्टी प्रणाली है, जिसमें उदारवादी डेमोक्रेटस और अनुदारवादी रिपब्लकिन के साथ उदारवादी रिपब्लिकन और अनुदारवादी डेमोक्रेट्स सह-वासी हैं। 

हालांकि, हाल के दशकों में राजनीति ने मौलिक रूप से एक अलग दिशा पकड़ ली है, जैसा कि ‘ब्रेकिंग द टू पार्टी डूम लूप :  द केस फॉर  मल्टी पार्टी डेमोक्रेसी इन अमेरिका’ के लेखक ली ड्रूटमैन ने हाल में ही लिखा था कि, अब वह “सरकारी व्यय पर एक समझौता-परस्त तकरार से राष्ट्रीय संस्कृति और पहचान पर एक शून्य तात्पर्य वाले नैतिक संघर्ष में बदल गया है।” 

ड्रूटमैन के शब्दों में, “संघर्ष जैसे ही तेज हुआ, पार्टियों ने उन सरोकारों को बदल लिया जिनके लिए वे मुस्तैद होती थीं।  उदारवादी रिपब्लिकन और उदारवादी डेमोक्रेट लुप्त हो गए।  चतुष्दलीय प्रणाली महज दो दलों में विघटित हो गई।”  

“विविधता और  सर्वदेशीय मूल्यों वाली डेमोक्रेट्स पार्टी का शहरों में तो दखल बना रहा लेकिन वह  नगर के बाहर के क्षेत्रों से गायब हो गई।  और  परंपरागत मूल्यों,  श्वेत, तथा ईसाई पहचान वाली रिपब्लिकन पार्टी नगरों से तो भाग खड़ी हुई परंतु इसके बाहर के क्षेत्रों में वह खूब फली-फूली। पक्षपाती सामाजिक गुब्बारा फूलने लगा और कांग्रेस संबंधित  जिलों पर विशेष रूप से एक पार्टी या दूसरी पार्टी का कब्जा होता गया।  इसका परिणाम यह हुआ कि प्राइमरी, आम चुनावों में तो नहीं, कई सारे जिलों में प्रत्याशियों की जीत को निश्चित करती है।” 

इन सबका अपरिहार्य परिणाम यह हुआ है कि दलीय हितों के पार जाकर समझौता करना दुर्लभ हो गया है, दोनों दलों के बीच कोई मेल-मिलाप नहीं है और शक्ति के बंटवारे की और नियंत्रण तथा संतुलन की प्रणाली को तज दिया गया है।  इन समस्याओं का एकमात्र  समाधान बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली में है। लेकिन  संविधान के चुनाव उपबंधों के साथ एक दुष्टतापूर्ण चक्र है, जो प्रत्येक राज्य को अपने तरीके से नियम-कायदा तय करने की छूट देता है, एक ऐसी शक्ति जिसका अमेरिकी कांग्रेस ने देश में दो दलीय प्रणाली को बनाए रखने में उपयोग किया है और जो सुनिश्चित करती है कि चुनाव व्यापक रूप से अप्रतिस्पर्धात्मक बना रहे। 

बिना राजनीतिक पार्टियों के आधुनिक व्यापक लोकतंत्र कैसे हो सकता है? दुनिया के अधिकांश उन्नत लोकतंत्र बहुदलीय लोकतंत्र का समर्थन करते हुए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की तरफ कदम बढ़ाए हैं,  जबकि अमेरिकी चुनाव प्रणाली और वोटिंग के तौर-तरीके 19वीं शताब्दी में ब्रिटेन से आयात किए गए थे और बिना किसी विचार-विमर्श किये ही स्वीकार कर लिए गये थे, जो समय के साथ बदलाव न करने से जड़वत बने हुए हैं। 

बहुदलीय लोकतंत्र  सर्वथा त्रुटिरहित नहीं है, लेकिन यह विविधता, मेलजोल और समझौतों का समर्थन करने के लिहाज से कहीं बेहतर या श्रेष्ठ है जो अमेरिका जैसे बहुलतावादी समाज में स्व-शासन के लिहाज से आवश्यक है। कैपिटल हिल में दिखा भारी असंतोष और कुंठा ने खतरे की घंटी बजा दी है कि दोहरी दलीय प्रणाली का “अति-पक्षपात” (जिसके बारे में वाशिंगटन और ऐडम्स ने चेताया है), अमेरिकी लोकतंत्र के भविष्य के विनाश का संकेत करती है। 

यदि भविष्य में तूफानों को फिर से इकट्ठा होने से रोकना है, उनके प्रति समय से पहले कोई कार्रवाई करनी है तो अमेरिका को एक बहुदलीय लोकतंत्र में रूपांतरित करने के लक्ष्य से प्रेरित होकर सुधार के कदम उठाना बहुत आवश्यक है। जैसी दशा है,  अति पक्षपात ने अमेरिकी विधायिका में गतिरोध को तेज कर दिया है, उसे गंभीर कर दिया है और यह शीर्ष नेतृत्व से नीचे की तरफ बढ़ रहा है। कांग्रेसी संबंधी सह-पक्षपातता के पास राष्ट्रपति को नियंत्रित करने के लिए कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि उनकी चुनावी जीत उनकी सफलता और लोकप्रियता से जुड़ी है।

वहीं दूसरी ओर, कांग्रेसी संबंधी विरोधी हिमायतियों को राष्ट्रपति के साथ काम करने की कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि चुनावी सफलता उनकी विफलता और अलोकप्रियता से जुड़ी हुई है।  नतीजतन,  हथियार डालना है या पत्थरबाजी  करनी है,  यह  इस पर निर्भर करता है कि ध्रुवीकरण में कौन कहां खड़ा है। 

इन सबके परिणामस्वरूप,  विधायिका के स्तर पर अवरोध का मतलब है मसलों के हल के लिए न्यायपालिका पर अत्यधिक निर्भर रहना,  जो निश्चित रूप से सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों (खास कर, जीवनपर्यंत अवधि तक की जाने वाली नियुक्तियों) के मुद्दे को ऊंचे-दांव और स्वामित्व का मुद्दा बनाती है और इसने इस पर सहमति बनाने के लिए की जाने वाले संघर्षों को तेज किया है और इसी तरह, चुनावों को भी। यह तब, अपने अधो बिंदु पर पहुंच गया था, जब ट्रंप ने पिछले मंगलवार को 2020 के चुनाव परिणाम को बदल देने के लिए जॉर्जिया के राज्य सचिव पर दबाव डाला था।

बाइडेन, जो सर्वोत्कृष्ट रूप से सर्वसहमति बनाने वाले नेता हैं, जिन्होंने स्वयं को  “संक्रमणकालीन राष्ट्रपति” (ट्रांजिशनल प्रेसिडेंट) कहा है, वह अमेरिकी राजनीति में ध्रुवीकरण की मूल समस्या को उसके नुकसान की अंतिम सीमा तक पहुंचने के पहले समाधान करने के लिहाज से काफी योग्य हैँ। 

यूरोपियन अपने इतिहास को समझते हैं कि अमेरिकी लोकतंत्र का गहरा-दोषपूर्ण संस्करण लंबे समय तक अपने नागरिकों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और बिखरे नागरिकों को संलग्न नहीं कर सकता, उन्हें एक साझे मकसद के लिए एकजुट नहीं कर सकता, और कि यहां राजनीति तेजी से अराजकतावादी एवं स्वेच्छाचारी होती जा रही है और अमेरिका में नागरिक एवं राजनीतिक, दोनों ही अपनी कार्यपालिका के हद पार जाने से खतरा महसूस करते हैं। 

जर्मन के विदेश मंत्री मास की टिप्पणी ने एक दुखती रग को छू लिया है, लेकिन अमेरिकी लोकतंत्र का भविष्य जर्मन के दुखांत इतिहास पर ध्यान देने पर काफी निर्भर हो सकता है। कैपिटल दंगा राजनीतिक खदान में कैनरी बन सकता है-एक सचेत करने वाली कहानी। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Whither American Democracy?

Donald Trump
US Electoral System
Joe Biden
NATO
US Democracy

Related Stories

बाइडेन ने यूक्रेन पर अपने नैरेटिव में किया बदलाव

90 दिनों के युद्ध के बाद का क्या हैं यूक्रेन के हालात

यूक्रेन युद्ध से पैदा हुई खाद्य असुरक्षा से बढ़ रही वार्ता की ज़रूरत

खाड़ी में पुरानी रणनीतियों की ओर लौट रहा बाइडन प्रशासन

फ़िनलैंड-स्वीडन का नेटो भर्ती का सपना हुआ फेल, फ़िलिस्तीनी पत्रकार शीरीन की शहादत के मायने

यूक्रेन में संघर्ष के चलते यूरोप में राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 

सऊदी अरब के साथ अमेरिका की ज़ोर-ज़बरदस्ती की कूटनीति

गर्भपात प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट के लीक हुए ड्राफ़्ट से अमेरिका में आया भूचाल

अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात

नाटो देशों ने यूक्रेन को और हथियारों की आपूर्ति के लिए कसी कमर


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    चिंता: कोरोना ने फिर रफ़्तार पकड़ी, देश में 24 घंटों में 2 लाख के क़रीब नए मामले
    12 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,94,443 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 60 लाख 70 हज़ार 233 हो गयी है।
  • Maurya
    मुकुल सरल
    स्वामी प्रसाद मौर्य का जाना: ...फ़र्क़ साफ़ है
    12 Jan 2022
    यह केवल दल-बदल या अवसरवाद का मामला नहीं है, यह एक मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया है, वो भी श्रम मंत्री ने। यह योगी सरकार की विफलता ही दिखाता है। इसका जवाब योगी जी से लिया ही जाना चाहिए।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    तीसरी लहर को रोकने की कैसी तैयारी? डॉक्टर, आइसोलेशन और ऑक्सीजन बेड तो कम हुए हैं : माकपा
    12 Jan 2022
    मध्यप्रदेश में माकपा नेता के अनुसार दूसरी लहर की तुलना में डॉक्टरों की संख्या 1132 से घट कर 705 हो गई है। इसी तरह आइसोलेशन बेड की संख्या 29247 से घटकर 16527 रह गई है। इसी प्रकार ऑक्सीजन बैड भी 28,152…
  • Protest in Afghanistan
    पीपल्स डिस्पैच
    अफ़ग़ानिस्तान में सिविल सोसाइटी और अधिकार समूहों ने प्रोफ़ेसर फ़ैज़ुल्ला जलाल की रिहाई की मांग की
    12 Jan 2022
    काबुल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान और क़ानून पढ़ाने वाले डॉ. जलाल तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के पिछले प्रशासन के आलोचक रहे हैं। उन्होंने महज़ सुरक्षा पर ध्यान दिये जाने की तालिबान सरकार की चिंता की…
  • bjp-rss
    कांचा इलैया शेफर्ड
    उत्तर प्रदेश चुनाव : हौसला बढ़ाते नए संकेत!
    12 Jan 2022
    ज़्यादातर शूद्र, ओबीसी, दलित और आदिवासी जनता ने आरएसएस-भाजपा के हिंदुओं को एकजुट करने के झूठे दावों को संदिग्ध नज़र से देखा है। सपा के अखिलेश यादव जैसे नेताओं को इस असहमति को वोट में बदलने की ज़रूरत है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License