NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
किसी लापता सैनिक के मानवाधिकारों की हिफ़ाज़त कौन करेगा?
भारतीय राज्य ने अपने लापता सैनिकों की बेसबब गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ गरिमा और सुरक्षा के अधिकार को बहाल करने के लिए पर्याप्त संघर्ष नहीं किया है।
पुष्कर राज
12 Dec 2020
कैप्टन संजीत भट्टाचार्जी
कैप्टन संजीत भट्टाचार्जी,फ़ोटो: सौजन्य: काउंटरकरेंट्स I

यह उस देश में एक अजीब तरह का सवाल लग सकता है,जिसे अपने सैनिकों की क़सम खाना पसंद है। किसी भी राष्ट्र में एक सैनिक की जगह गर्व का होता है और वह समाज का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा होता है। एक सैनिक देश की हिफ़ाज़त करने के दौरान गोलियों का सामना करते हुए भी हर समय “ये दिल मांगे मोर” की जाप ही करता है। गोलीबारी में मारे जाने वाले सैनिक इबादत के क़ाबिल होते है,लेकिन ऐसी मिसालें भी हैं,जहां उन्हें उन बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है,जिन्हें हम ख़ुद तो इस्तेमाल करते हैं,लेकिन जिन्हें हम उनके लिए बहुत अहमियत नहीं देते हैं।

इसलिए,यह बेहद शर्म और गंभीर चिंता का विषय है कि मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 5 और अनुच्छेद 6 के तहत निर्धारित सम्मान और गरिमा के मूल अधिकार पाने में कोई सैनिक नाकाम हो। यूएनडीएचआर के अनुच्छेद 9 (बेसबब गिरफ़्तारी से सुरक्षा) के उल्लंघन के शिकार कैप्टन संजीत भट्टाचार्जी का साथ अपने ही देश ने छोड़ दिया है।

जिस समय यह सब आप पढ़ रहे हैं,उस समय आज भट्टाचार्जी (SS35271W, 7/8 जीआर) ब्रिगेडियर होते,लेकिन वह एक कुख्यात पाकिस्तानी जेल के किसी अंधेरी कोठऱी में दम तोड़ रहे हैं। अपने यूनिट में प्यार से उन्हें "तानाजी" कहा जाता था, लेकिन अब उन्हें "मेंटल" और "सलीम" जैसे नामों से पुकारते हुए अपमानित किया जा रहा है।

भट्टाचार्जी ने 19 और 20 अप्रैल, 1997 की आधी रात को अपनी पलटन के साथ पाकिस्तान से लगी सीमा पर कच्छ के रण पर गश्त लगाते हुए छूट गये थे। अगले दिन,उस गश्ती दल के पंद्रह सदस्य वापस आ गये थे, लेकिन कप्तान और उनके साथी,लांस नायक राम भड़ाना थापा वापस आने वाले लोगों में नहीं थे। इसके बाद वे कभी वापस नहीं लौटे।

28 नवंबर को, 23 साल के अपने सबसे छोटे बच्चे का इंतज़ार करने के बाद कैप्टन भट्टाचार्जी के पिता का भारत में निधन हो गया। 81 साल की उनकी मां को अब भी अपने बेटे के लौटने का इंतज़ार है। लांस नायक थापा के परिवार इस समय कहां हैं,यह किसी को नहीं पता है।

भारतीय सेना का रवैया

सेना के 24 से 28 अप्रैल 1997 के रिकॉर्ड से पता चलता है कि कैप्टन भट्टाचार्जी को पाकिस्तानी मछुआरों ने 1162 और 1165 सीमा चौकियों के बीच काम करने वाले पाकिस्तानी सेना के किसी “मेजर कियानी” को सौंप दिया था। उमरकोट पोस्ट के कैप्टन उमर 28 अप्रैल को उनके साथ हो लिये थे और "भारतीय सेना के इन दो लापता सैनिक अधिकारियों को हैदराबाद (पाकिस्तान) के बाहरी इलाके के पूछताछ केंद्र ले जाया गया था।"

सेना ने भट्टाचार्जी के बीमार पिता को इस बारे में कोई सूचना नहीं दी थी कि वह अपने सबसे प्रतिभाशासी अफ़सरों में से उस अफ़सर का पता लगाने के लिए किस तरह की कोशिश कर रही है, जो कि अब दुश्मन की हिरासत में है। भट्टाचार्जी कराटे में ब्लैक बेल्ट होल्डर और बाधा लीड रनर भी थे। सेना ने इसे "गोपनीय" बताते हुए कप्तान के परिवार के साथ अपनी कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के निष्कर्षों को साझा नहीं किया था।

हालांकि,फ़रवरी 2005 में भट्टाचार्जी के पिता को तत्कालीन रक्षा मंत्री की तरफ़ से एक चिट्ठी मिली थी,जिसमें पहले "लापता" घोषित किये गये उनके बेटे के "असामयिक निधन" के लिए खेद व्यक्त किया गया था। इसके बाद पांच साल और बीत गये,और मई 2010 में राष्ट्रपति सचिवालय ने कैप्टन भट्टाचार्जी की मां,कमला भट्टाचार्जी को सूचित करते हुए एक चिट्ठी लिखी कि उनके बेटे का नाम युद्ध के लापता क़ैदियों (PoW) की मौजूदा सूची में जोड़ दिया गया है। "मिसिंग 54" के तौर पर जाना जाने वाली इस सूची को 1997 के बाद से कई बार उच्चतम स्तर पर पाकिस्तानी अधिकारियों के सामने ले जाया गया था। यह सूची जुलाई 2001 में आयोजित आगरा शिखर सम्मेलन के दौरान भी पेश की गयी थी।

भट्टाचार्जी की मां को वह पत्र तब लिखा गया था,जब सरकार की आधा दर्जन याचिकाओं और रिमाइंडर्स का जवाब सेना के दक्षिणी कमान, रक्षा मंत्रालय और तीन प्रधानमंत्रियों को भेजा गया था। यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना के सर्वोच्च कमांडर की निराशाजनक प्रतिक्रिया थी। इसने परिवार का दिल तोड़कर रख दिया।

युद्धबंदी नहीं

इन दावों के उलट,भट्टाचार्जी युद्ध क़ैदी नहीं हैं,क्योंकि उन्हें इस श्रेणी से बाहर किया जा रहा है।इसकी वजह यह बतायी जा रही है कि उस रात भारत का पाकिस्तान के साथ युद्ध नहीं हुआ था,कैप्टन भट्टाचार्जी(बीमार लांस नायक थापा के साथ) अचानक आयी बाढ़ में फंस गये थे। यह एक अप्रत्याशित संकट था,जिसने कच्छ के रण को अविश्वसनीय बना दिया था, और इसमें अकादमी के सर्वश्रेष्ठ मानचित्र रीडर भी गच्चा खा गया था,जो या तो उस बाढ़ में बह गया था या सीमा के पाकिस्तानी दिशा में जाने के लिए बेबस हो गया था। उन्हें पाकिस्तानी मछुआरों ने बचा लिया था और फिर पाकिस्तान के अधिकारियों के हवाले कर दिया था। यह इलाक़ा लोगों के एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ चले जाने और छूट जाने के लिए कुख्यात है। भारत और पाकिस्तान के मछुआरों के सिलसिले में तो यह एक सामान्य बात है।

भट्टाचार्जी की स्थिति उस मछुआरे से अलग नहीं थी,जो अपने जाल डालने के लिए समुद्र में जाता है,क्योंकि वह उस समय शांति के समय लगने वाली गश्ती पर थे। फ़र्क़ इतना ही है कि किसी मछुआरे के जाल के साथ जाने के उलट, वह उन गोला-बारूदों को ले जा रहे थे,जिसका इस्तेमाल उन्होंने कभी किसी के खिलाफ नहीं किया था।

अप्रैल 1997 से भारत ने पाकिस्तान के साथ सैकड़ों नागरिकों की अदला-बदली की है,क्योंकि दोनों राष्ट्र इस बात पर सहमत हैं कि यह राजनीतिक मुद्दा नहीं,बल्कि मानवीय मुद्दा है। भट्टाचार्जी का बुरी परिस्थितियों में सीमा के ग़लत छोर पर फ़ंसा होना किसी दर्दनाक बदनसीबी के अलावे भला और क्या हो सकता है, लेकिन इससे धीमी मौत हो सकती है। उनकी हालत मशहूर फ़िल्म वीर ज़ारा के नायक के अलग नहीं है, हालांकि उस फ़िल्म के नायक के हालात एक निजी मक़सद से प्रेरित थे,जबकि भट्टाचार्जी की पीड़ा अपने राष्ट्र की ख़ातिर है। भट्टाचार्जी एक वास्तविक हीरो हैं और वह फ़िल्मी पर्दे के हीरो नहीं हैं और इसलिए वह भले ही किसी और क्षेत्र से हों,लेकिन  किसी स्टार के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सम्मान के हक़दार हैं।

इस बार पर ग़ौर किये जाने की ज़रूरत है कि भट्टाचार्जी मरे नहीं हैं। किसी असंवेदनशील नौकरशाह के दस्तख़त वाले कागज के एक टुकड़े पर स्याही से दर्ज होने को छोड़कर इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि उनका निधन हो गया है। वह लापता हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भूलया नहीं गया है, कम से कम वह मां तो अभी भी उन्हें नहीं भूल पायी है, जिसे यह जानने का अधिकार है कि वह कहां हैं और अगर वह ज़िंदा नहीं हैं,तो उनकी क़ब्र कहां है।

सरकारी रुख़ और आगे का रास्ता

इस मामले में अफ़सरों का रवैया, भूमिका और उनका आचरण निराशाजनक रहा है, और यह समझ से परे है। सरकार का कहना है कि पाकिस्तान किसी युद्धबंदी के अस्तित्व से लगातार इनकार करता रहा है। इसलिए,यह जानने के बावजूद कि भट्टाचार्य सहित ये युद्धबंदी पाकिस्तान में हैं,मगर कुछ भी नहीं किया जा सकता है। जिनेवा सम्मेलनों का इस्तेमाल करने और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के पास जाने के गुजरात उच्च न्यायालय के 2011 के निर्देश के बावजूद, ऐसा करने से इनकार करने का कोई कारण नहीं बताया गया है,जबकि भारत जिनेवा सम्मेलन पर दस्तख़त करने वाले देशों में से एक है।

सरकार का आचरण दर्शाता है कि यह हमारे उन बहादुर सैनिकों को किस तरह त्याग देती है, जो मूल रूप से लापता सैनिक हैं और निर्वासन में है,यह एक ऐसा कार्य है,जो यूएनडीएचआर के अनुच्छेद 9 के तहत निषिद्ध है।

हालांकि,भारत सिर्फ़ उन नौकरशाहों और राजनेताओं से बना देश नहीं है,जो सरकार बनाते हैं। कैप्टन भट्टाचार्जी और लांस नायक थापा 11 लाख 20 हज़ार की संख्या वाले उस मज़बूत परिवार के सैनिक हैं, जो अपने किसी भी लापता सदस्य को नहीं भूलेंगे। इतना  तो तय है कि ये 11 लाख 20 हज़ार सैनिक वाला परिवार अपने नौजवानों के बलिदान को ख़ूब अहमियत देते हैं और अपनी मातृभूमि के इन रक्षकों के साथ खड़े हैं और उनके लिए एक ऐसा उचित जगह चाहते हैं,जो निश्चित रूप से दुश्मन मुल्क की जेल तो नहीं ही हो। कोई सिपाही लापता हो सकता है, बंदी हो सकता है, प्रताड़ित हो सकता है, और उचित तरीक़े से ख़्याल नहीं रखे जाने की वजह से किसी आधे कटे हुए मज़बूत पेड़ की तरह तिल-तिल करके मर जाये,लेकिन उसे कभी भुलाया तो नहीं जाना चाहिए।

कम से कम उनका इतना अधिकार तो है ही कि उन्हें भुलाया नहीं जाये।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाते थे और पीपुल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव हैं। इनके विचार निजी हैं।

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

Who Will Defend the Human Rights of a Missing Soldier?

india-pakistan
Missing soldiers
Human Rights

Related Stories

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

मणिपुर चुनाव: भाजपा के धनबल-भ्रष्ट दावों की काट है जनता का घोषणापत्र

मानवाधिकार संगठनों ने कश्मीरी एक्टिविस्ट ख़ुर्रम परवेज़ की तत्काल रिहाई की मांग की

अपने क्षेत्र में असफल हुए हैं दक्षिण एशियाई नेता

वार इन गेम: एक नया खेल

महामारी से कितनी प्रभावित हुई दलित-आदिवासी शिक्षा?

मानवाधिकारों और न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाता उत्तर प्रदेश : मानवाधिकार समूहों की संयुक्त रिपोर्ट

भारत में मरीज़ों के अधिकार: अपने हक़ों के प्रति जागरूक करने वाली ‘मार्गदर्शक’ किताब

कितना याद रखें, कितना मन को मनाएं और कितना भूलें? 


बाकी खबरें

  • भाषा
    श्रीलंका में हिंसा में अब तक आठ लोगों की मौत, महिंदा राजपक्षे की गिरफ़्तारी की मांग तेज़
    10 May 2022
    विपक्ष ने महिंदा राजपक्षे पर शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हमला करने के लिए सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को उकसाने का आरोप लगाया है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिवंगत फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को दूसरी बार मिला ''द पुलित्ज़र प्राइज़''
    10 May 2022
    अपनी बेहतरीन फोटो पत्रकारिता के लिए पहचान रखने वाले दिवंगत पत्रकार दानिश सिद्दीकी और उनके सहयोगियों को ''द पुल्तिज़र प्राइज़'' से सम्मानित किया गया है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर खीरी हत्याकांड: आशीष मिश्रा के साथियों की ज़मानत ख़ारिज, मंत्री टेनी के आचरण पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
    10 May 2022
    केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के आचरण पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि वे इस घटना से पहले भड़काऊ भाषण न देते तो यह घटना नहीं होती और यह जघन्य हत्याकांड टल सकता था।
  • विजय विनीत
    पानी को तरसता बुंदेलखंडः कपसा गांव में प्यास की गवाही दे रहे ढाई हजार चेहरे, सूख रहे इकलौते कुएं से कैसे बुझेगी प्यास?
    10 May 2022
    ग्राउंड रिपोर्टः ''पानी की सही कीमत जानना हो तो हमीरपुर के कपसा गांव के लोगों से कोई भी मिल सकता है। हर सरकार ने यहां पानी की तरह पैसा बहाया, फिर भी लोगों की प्यास नहीं बुझ पाई।''
  • लाल बहादुर सिंह
    साझी विरासत-साझी लड़ाई: 1857 को आज सही सन्दर्भ में याद रखना बेहद ज़रूरी
    10 May 2022
    आज़ादी की यह पहली लड़ाई जिन मूल्यों और आदर्शों की बुनियाद पर लड़ी गयी थी, वे अभूतपूर्व संकट की मौजूदा घड़ी में हमारे लिए प्रकाश-स्तम्भ की तरह हैं। आज जो कारपोरेट-साम्प्रदायिक फासीवादी निज़ाम हमारे देश में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License