NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
शुभम शर्मा
28 Feb 2022
karnataka
कर्नाटक के कुछ कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध के खिलाफ प्रदर्शन करतीं महिलाएं। 

मई 2014 के बाद से मुसलमान हिंदुत्व के मुख्य निशाने पर रहे हैं। सोची-समझी लिंचिंग से लेकर नागरिकता के दावों को दूर करने वाले कानूनों तक, भारतीय मुसलमानों को आजादी के बाद से ही देश में एक दुःस्वप्न का सामना करना पड़ा है। उनकी हालिया परेशानी हिजाब या हेडस्कार्फ़ का मुखालफत किए जाने के लेकर है, जिन्हें कई मुस्लिम महिलाएं पहनती हैं। विडम्बना है कि यह विरोध उन हिंदुत्ववादी ताकतों से होता है, जो खुद सामाजिक रूढ़िवाद और हर रंग की संकीर्णता पर टिकी रहती हैं। 

हिजाब निस्संदेह महिलाओं पर पितृसत्तात्मक रस्मो-रिवाज को थोपना है। लेकिन यहां यह मुद्दा नहीं है-यहां बहस कक्षाओं के अंदर मुस्लिम महिलाओं के हिजाब पहनने की मांग के साथ शुरू हुई है। कहा जाता है कि हिंदुत्व से प्रेरित-संचालित इस्लामोफोबिया, जो मुख्य रूप से साम्राज्यवादी अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी देशों द्वारा बनाया गया है, उसमें हिजाब और बुर्का को केवल मुसलमान तक ही सीमित कर दिया गया है। सच्चाई तो यह है कि पर्दा या पर्दा-प्रथा, इस्लाम के जन्म से काफी पहले से चलन में थी। ऐसा इसलिए कि पितृसत्ता इस्लाम के बहुत पहले से थी। इस्लाम से पहले, पश्चिम एशिया की सासानियन महिलाएं पर्दा या घूंघट करती थीं जैसा कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बीजान्टिन काल के दौरान ईसाई समुदायों की महिलाएं करती थीं। असीरियन कानून ने महिलाओं के पर्दा या घूंघट करने के नियम भी बनाए थे कि किस महिला को घूंघट करना चाहिए और किसको नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, रईसों की पत्नियों को पर्दा या घूंघट करना पड़ता था, जैसा कि रखैल और पूर्व 'पवित्र वेश्याओं' करती थीं, जो अब विवाहिता हो गई थीं। अलबत्ता, गुलाम औऱतों को पर्दा या घूंघट करने की जरूरत नहीं थी। 

इसी तरह, उत्तर-पश्चिमी भारत में, महिलाओं में घूंघट निकालने की एक सामान्य प्रथा है, जो अपने से बड़ी महिलाओं एवं बड़े-बुजुर्गों से सामना होने पर उनके सहनशील एवं आदरयुक्त-विनम्र व्यवहार के रूप में प्रकट होती है। 1970 के दशक में यह अनुमान लगाया गया था कि हरियाणा में लगभग 72.61 फीसदी महिलाएं रोजमर्रे के अपने व्यवहार में घूंघट काढ़ती थीं। अभी हाल ही में 2017 में हरियाणा सरकार की पत्रिका कृषि संवाद के विज्ञापन में घूंघट काढ़े एक महिला की प्रकाशित तस्वीर से जाहिर होता है कि चीजें नहीं बदली हैं। इस महिला के फोटो कैप्शन में लिखा गया है “घूंघट की आन-बान, म्हारा हरियाणा की पहचान”।

अपनी पुस्तक वीमेन एंड जेंडर इन इस्लाम में, लैला अहमद लिखती हैं कि पैगंबर मोहम्मद के जीवनकाल के दौरान, केवल मुस्लिम पत्नियों को ही घूंघट करने की आवश्यकता होती थी। कहा जाता है कि पैगम्बर मोहम्मद के इंतकाल के बाद और आसपास के क्षेत्रों में इस्लामिक परचम लहराए जाने के बाद से उच्च वर्ग की औरतें पर्दानशीं होने लगीं थीं। इनकी देखा-देखी घूंघट या हिजाब मुस्लिम उच्च वर्ग की औरतों के बीच एक सामान्य रिवाज बन गया। आसान लहजे में कहें तो मोहम्मद की बीवियों का यह पर्दा, घूंघट या हिजाब एक आदर्श रिवाज बन गया, जिसको कि बाद में आम महिलाओं ने भी अपनाया। 

कुरान से हिजाब की मंजूरी मिलने या न मिलने के बारे में बहस गूढ़ है और इस मसले को इसके मानने वालों की आस्था पर छोड़ देना ही बेहतर है। हालांकि कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह तय करना कि कुरान हिजाब को मंजूरी देता है या नहीं, यह एक विभाजनकारी अभ्यास होगा। सवाल है कि क्या होगा अगर अदालत पवित्र पुस्तक की अनेक व्याख्याओं को नजरअंदाज कर देती है और इस्लाम के लिए आवश्यक हिजाब को अयोग्य करार देती है, जैसा कि उसने बाबरी मस्जिद वाले मामले में किया था? और क्या होगा अगर अदालत यह तय करती है कि हिजाब या पर्दा या घूंघट इस्लाम में एक जरूरी दस्तूर है? क्या इसका मतलब यह होगा कि मुस्लिम धर्म के प्रति आस्था रखने वाली सभी महिलाओं को हिजाब पहनना होगा? 

बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने हिंदुत्व के निकम्मे अनुयायियों-समर्थकों के लिए मुस्लिम पिछड़ेपन की बहस को फिर से मेज पर ले आने में बाजी मार ली है, जैसा कि उसने तीन तलाक बिल के साथ किया था। पर इसके दोगुने खतरे हैं: पहला, इससे बहुसंख्यक समुदाय की रूढ़िवादिता और सामाजिक पिछड़ेपन का मसला अछूता छूट जाता है। यहां हम जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध उक्ति को देखें जिसमें कहा गया है कि, यदि बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता अल्पसंख्यक की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक है, तो बहुसंख्यकों का रूढ़िवाद अल्पसंख्यक की तुलना में कहीं अधिक एक गंभीर सामाजिक बाधा है। हिंदू महिलाओं में पितृसत्तात्मकता को थोपने के प्रतीकों को बरकरार रखकर हिंदुत्व ने एक खतरनाक शोरबा बनाया है। 

दूसरे, इसने मुसलमानों के भीतर रूढ़िवादी ताकतों को मजबूत किया है, जिनकी पकड़ को अभी भी उसके भीतर से एक विकट चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। महिलाओं को हिजाब पहनने पर जोर देने वाले उनके पहले के पितृसत्तात्मक प्रत्युत्तर ने अब एक प्रतिरोधी चरित्र धारण कर लिया है। दूसरे शब्दों में, हिजाब स्त्री-शालीनता के थोपे गए प्रतीक से अलग हिंदुत्व के खिलाफ प्रतिरोध का एक प्रतीक बन गया है। 

इस अपमानजनक मुकाबले में जाहिर तौर विजेता हिंदुत्व और इस्लामवादियों की ताकतें ही हैं। फिर भी इसका मिजाज न जीती जाने वाले जंग की है, क्योंकि हिंदुत्व को जो भी लाभ होगा, वह अंततः एक समुदाय के रूप में मुसलमानों के खिलाफ काम करेगा। दूसरे शब्दों में, चूंकि हिंदुत्व शाहरुख खान और पहलू खान के बीच अंतर नहीं करता है, एक समुदाय के रूप में मुसलमान एक और अग्निपरीक्षा के खिलाफ हैं। 

धर्मनिरपेक्षतावादियों और प्रगतिवादियों को बहुत सावधानी से चलना चाहिए। तीन दशक से भी पहले, जब राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने शाह बानो के फैसले को पलटने के लिए कानून में संशोधन किया था, तब इसका फायदा हिंदुत्ववादी ताकतों ने ही उठाया था। वे एक 'पीड़ित' हिंदू की तुलना में मुस्लिम 'तुष्टीकरण' का बाइनरी बनाने में सफल रहे थे और एक स्थानिक और निराधार धारणा पर एक पूरा का पूरा आंदोलन खड़ा कर दिया कि भगवान राम का जन्म ठीक उसी स्थान पर हुआ था, जहां बाबरी मस्जिद थी। आज हिंदुत्व राम मंदिर बनाने में सफल हो गया है और फिर भी मुसलमानों के खून का प्यासा बना हुआ है। ऐसे मंजर में, हिजाब के लिए किसी भी समर्थन को मुस्लिम तुष्टीकरण की दिशा में एक प्रयास के रूप में माना जाना तय है। 

ऐसे में प्रगतिशीलों के सामने दोहरी चुनौती है। सबसे पहले, मुस्लिम पहचान की रक्षा हिजाब के समर्थन से पहले होनी चाहिए। संदेश को इस तरह से कोडित करने की आवश्यकता है, कि वह उन लोगों का समर्थन नहीं करता है, जो हिजाब को मुस्लिम महिलाओं के लिए आवश्यक मानते हैं। दूसरे, महिलाओं की मुक्ति का एजेंडा तय करने लिए सभी वर्गों के नारीवादियों के नेतृत्व में पितृसत्ता के खिलाफ एक साझा सार्वजनिक अभियान शुरू करना चाहिए। तभी हिंदू और मुस्लिम महिलाओं के बीच धर्म के पार एकता स्थापित की जा सकती है, जो गढ़ी गई सांप्रदायिक कटुता से ग्रस्त-त्रस्त नहीं होगी, जिसको हिंदुत्व लगातार बढ़ावा देने की फिराक में रहता है। 

(लेखक एक स्वतंत्र रिसर्च स्कॉलर हैं। आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं) 

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Why Hindutva and Patriarchy Get Hijab Wrong

Muslim women
Hijab
karnataka hijab controversy
Shah Bano
appeasement
feminism
Hindu-Muslim Unity
Lynching
Muslim Identity
Hindutva
Communalism
babri masjid

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

ओटीटी से जगी थी आशा, लेकिन यह छोटे फिल्मकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा: गिरीश कसारावल्ली

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

ज्ञानवापी कांड एडीएम जबलपुर की याद क्यों दिलाता है

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

मनोज मुंतशिर ने फिर उगला मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर, ट्विटर पर पोस्ट किया 'भाषण'

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव 2022 : बदहाल अस्पताल, इलाज के लिए भटकते मरीज़!
    08 Feb 2022
    भारतीय रिजर्व बैंक की स्टेट फाइनेंस एंड स्टडी ऑफ़ बजट 2020-21 रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड सरकार के द्वारा जन स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च किया गया है।
  • uttarakhand
    न्यूज़क्लिक टीम
    चमोली जिले का थराली विधानसभा: आखिर क्या चाहती है जनता?
    07 Feb 2022
    उत्तराखंड चुनाव से पहले न्यूज़क्लिक की टीम ने चमोली जिले के थराली विधानसभा का दौरा किया और लोगों से बातचीत करके समझने का प्रयास किया की क्या है उनके मुद्दे ? देखिए हमारी ग्राउंड रिपोर्ट
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    धर्म का कार्ड नाजी दौर में ढकेलेगा देश को, बस आंदोलन देते हैं राहत : इरफ़ान हबीब
    07 Feb 2022
    Exclusive इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने देश के Living Legend, विश्व विख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब से उनके घर अलीगढ़ में बातचीत की और जानना चाहा कि चुनावी समर में वह कैसे देख रहे हैं…
  • Punjab
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाबः बदहाल विश्वविद्यालयों पर क्यों नहीं बात करती राजनैतिक पार्टियाँ !
    07 Feb 2022
    पंजाब में सभी राजनैतिक पार्टियाँ राज्य पर 3 लाख करोड़ के कर्ज़े की दुहाई दे रही है. इस वित्तीय संकट का एक असर इसके विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा है. अच्छे रीसर्च के बावजूद विश्वविद्यालय पैसे की भारी…
  • COVID, MSMEs and Union Budget 2022-23
    आत्मन शाह
    कोविड, एमएसएमई क्षेत्र और केंद्रीय बजट 2022-23
    07 Feb 2022
    बजट में एमएसएमई क्षेत्र के लिए घोषित अधिकांश योजनायें आपूर्ति पक्ष को ध्यान में रखते हुए की गई हैं। हालाँकि, इसके बजाय हमें मौजूदा संकट से निपटने के लिए मांग-पक्ष वाली नीतिगत कर्रवाइयों की कहीं अधिक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License