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शिक्षा
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आख़िर यूजीसी पर शिक्षा के भगवाकरण का आरोप क्यों लग रहा है?
यूजीसी के नए ड्राफ्ट में हिंदू पौराणिक कथाओं और धार्मिक चीजों पर ज्यादा महत्व दिया गया है जबकि मुस्लिम शासन के महत्वपूर्ण बिंदुओं को गायब कर दिया गया है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
25 Mar 2021
UGC

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी अपने स्नातक (ग्रेजुएशन) के नए इतिहास पाठ्यक्रम के ड्राफ्ट को लेकर इन दिनों सुर्खियों में है। इसके चलते  संस्थान और मोदी सरकार की खूब आलोचना भी हो रही है, उन पर शिक्षा का भगवाकरण करने का आरोप लगाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि आयोग सरकार के इशारे पर इतिहास से छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रहा है, इसे एक खास विचारधारा के अनुरूप बनाने की जुगत में लगा है।

क्या है पूरा मामला?

यूजीसी ने हाल ही में एक ड्राफ्ट तैयार किया है। इसके मुताबिक यह दस्तावेज सिर्फ ‘मार्गदर्शक सिद्धांत’ के रूप में फिलहाल तैयार किया गया है। इसमें कहा गया है कि “भारतीय इतिहास के गौरवशाली अतीत और इसके विशाल परिदृश्य के साथ जब छोटे और बड़े स्तर पर अत्यधिक ध्यान दिया जाएगा।”

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक प्रसिद्ध इतिहासकारों जैसे कि प्राचीन भारत पर आरएस शर्मा और मध्यकालीन भारत पर इरफान हबीब की किताबों को हटा दिया गया है। इनकी जगह पर ‘संघ और सत्ता’ के करीबी लेखकों की किताबों को शामिल करने की बात कही गई है।

आपको बता दें कि ये पहला मौका है जब आयोग ने पूरा पाठ्यक्रम ही तैयार कर दिया है। इससे पहले यूजीसी सिर्फ सामान्य दिशानिर्देश जारी किया करती थी या फिर सुझाव देती थी। खुद आयोग ने ही इससे पूर्व में सुझाया था कि विश्वविद्यालयों को पहले के पाठ्यक्रम में 20-30 फीसदी ही परिवर्तन करने की इजाजत है।

क्या है आइडिया ऑफ भारत?

रिपोर्ट के मुताबिक यूजीसी के नए सिलेबस आउटलाइन में इतिहास (ऑनर्स) के पहले पेपर को ‘आइडिया ऑफ भारत’ नाम दिया गया है, जिसमें ‘भारतवर्ष के विचार’ के साथ-साथ वेद, वेदांग, उपनिषद, महाकाव्य, जैन और बौद्ध साहित्य, स्मृति, पुराण इत्यादि पढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के श्याम लाल कॉलेज में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर जीतेंद्र मीणा ने कहा कि नए पाठ्यक्रम में धार्मिक साहित्य का महिमामंडन किया गया है और प्राचीन धर्मनिरपेक्ष साहित्य जैसे कि कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कालिदास की कविताएं और चरक संहिता के आयुर्वेदिक शोध को हटा दिया गया है।

इसके अलावा तीसरे पेपर में ‘सिंधू-सरस्वती सभ्यता’ के नाम से एक टॉपिक है, जिसमें सिंधू, सरस्वती सभ्यता और वैदिक सभ्यता के संबंधों पर बहस का वर्णन है।

सरस्वती सभ्यता जैसा कोई शब्द ही नहीं है!

द वॉयर की रिपोर्ट के मुताबिक ऋगवेद में सरस्वती नदी का उल्लेख एक शताब्दी से भी अधिक समय से वैज्ञानिक शोध का हिस्सा रहा है। केंद्र ने इस नदी को पुनर्जीवित करने के लिए एक प्रोजेक्ट भी बनाया है। हालांकि इसे लेकर गंभीर संदेह है कि क्या ये वाकई वही सरस्वती नदी है जिसका उल्लेख ऋगवेद में हुआ है।

मीणा कहते हैं, “सरस्वती सभ्यता, जिसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जैसा कोई भी शब्द इससे पहले नहीं था।”

इस ड्राफ्ट में इतिहास के सातवें पेपर में ‘भारत पर बाबर के आक्रमण’ को लेकर एक टॉपिक शामिल किया गया है, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय का मौजूदा सिलेबस इसे आक्रमण नहीं मानता है, बल्कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को आक्रमण माना गया है।

हिंदू-मुसलमान को अलग-थलग दिखाने की कोशिश

इस बार के पेपर में मध्यकालीन दौर में हिंदू और मुस्लिम समाज को लेकर दो अलग-अलग टॉपिक बनाया गया है। हालांकि जानकारों का मानना है कि ऐसा ये दिखाने के लिए किया गया है कि किस तरह उस समय मुसलमान और हिंदू अलग-थलग थे, जबकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, हमेशा से यही पढ़ाया जाता रहा है कि किस तरह मध्यकालीन इतिहास में हिंदू और मुसलमान साथ रह रहे थे।

इसके साथ ही 13वीं से 18वीं शताब्दी के बीच के मुस्लिम इतिहास को भी दरकिनार कर दिया गया है।

इस बारे में डीयू में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाने वाले आरएसएस विचार प्रकाश सिंह ने कहा, ‘पहले मुगल इतिहास ने ही सारी जगह घेर रखी थी। ऐसा नहीं है कि इसे दरकिनार किया जा रहा है, बल्कि इसमें कुछ सुधार किए गए हैं। पहले दक्षिण भारत और अन्य भाग के राजाओं को लेकर कम कंटेंट था। अब इन्हें भी जगह दिया जा रहा है।’

यूजीसी के ड्राफ्ट में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं पर भी कम ध्यान दिया गया है और प्रारंभिक 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में सांप्रदायिकता के विषय को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है। दलित राजनीति भी नए पाठ्यक्रम से गायब है।

क्या विश्वगुरु ऐसे बनेंगे?

गौरतलब है कि कई लोगों का मानना है कि यूजीसी ऐतिहासिक आंकड़ों को प्रस्तुत करने और इतिहास के हिस्से के रूप में काल्पनिक घटनाओं को प्रस्तुत करके इतिहासलेखन के मूल सिद्धांतों से समझौता कर रहा है। इसी समय, यह एक वास्तविक अतीत बनाने के लिए अन्य वास्तविक ऐतिहासिक आंकड़ों और घटनाओं की भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत करना या गलत व्याख्या करना चाहता है जो केवल हिंदुत्व के दिमाग में मौजूद हैं।

वैसे ये विडंबना ही है कि एक ओर सरकार भारत को विश्वगुरु बनाने की बात कर रही है तो वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भटकाव के आरोप भी झेल रही है। ठीक ऐसे ही एक तरफ यूजीसी कॉलेजों की स्वायत्तता के लिए जोर दे रहा है, तो वहीं दूसरी ओर देश भर के शैक्षणिक संस्थानों को एक आकार में फिट करने की कोशिश कर रहा है।

UGC
Hindutva
BJP
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hindu-muslim
Religion Politics
Indian education

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