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भारत
राजनीति
क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?
2019 के बाद से जो प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं, उनसे ना तो कश्मीरियों को फ़ायदा हो रहा है ना ही पंडित समुदाय को, इससे सिर्फ़ बीजेपी को लाभ मिल रहा है। बल्कि अब तो पंडित समुदाय भी बेहद कठोर ढंग से दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को चुनौती दे रहा है।
अशोक कुमार पाण्डेय
23 May 2022
kashmir
कश्मीरी राहुल भट की हत्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हुए

हाल में सरकारी कर्मचारी और बडगाम के रहने वाले राहुल भट की मौत ने कश्मीर घाटी में एक बार फिर हलचल पैदा कर दी है। उनके समुदाय के कुछ दूसरे लोगों की भी हाल के वक़्त में हत्या कर दी गई थी। लेकिन राहुल भट की हत्या की बेहद अहम है, जिसे उसकी पृष्ठभूमि में समझना जरूरी है। भट उन कश्मीरी ब्राह्मणों में से थे, जो हाल में प्रधानमंत्री के विशेष पैकेज में किए गए नौकरियों के वायदे के बाद लौटे थे, इस योजना की शुरुआत मनमोहन सिंह ने की थी। 

प्रधानमंत्री का यह विशेष पैकेज वापस घाटी लौटने वाले कश्मीरी ब्राह्मणों को सरकारी नौकरियों और ट्रांजिट कैंप में सुरक्षित रहवास की सुविधा उपलब्ध करवाता है। ट्रांजिट कैंप, दीवारों से बंद एक रहवासी अपार्टमेंट होते हैं, जो आसपास के इलाके से पूरी तरह कटे हुए होते है, राहुल जिस कैंप में रहते हैं, वह श्रीनगर से बहुत दूर नहीं था। अब तक इसके रहवासी शांति के साथ रहते आ रहे थे। लेकिन उनकी घाटी में वापसी बहुत स्थायी समझ नहीं आ रही थी, क्योंकि उनमें से बहुत सारों ने अब भी जम्मू में स्थानी निवास बनाकर रखे थे। इन रहवासियों का स्थानीय लोगों के साथ संपर्क बहुत सीमित है, यह लोग सप्ताह के दिनों में काम करना पसंद करते हैं और सप्ताहांत में जम्मू लौट जाते हैं।  

कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाए, तो यह कश्मीरी पंडित आमतौर पर सुरक्षित रहे हैं। बल्कि घाटी में पंचायत प्रधानों, सदस्यों और दूसरे चुने हुए प्रतिनिधियों की हत्या होती रही है, लेकिन इन सभी की वजह लड़ाकों के संविधानिक प्रक्रिया के विरोधी होने को बताया जाता रहा है, बता दें बहुसंख्यक आबादी से आने वाले प्रतिनिधियों की भी बड़ी संख्या में हत्या होती रही है। इन सवालों का यहां उठाया जाना जरूरी है, क्योंकि यह सारे घटनाक्रम ख़तरनाक इशारे कर रहे हैं।

प्रशासन को नहीं है कोई समझ: कश्मीर की नई वास्तविकता

रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दुलत 90 के दशक में कश्मीर में थे। वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कश्मीर टीम के अहम सदस्यों में से एक थे। उनकी किताब "कश्मीर: द वाजपेयी ईयर्स" 90 के दशक की शुरुआत की घटनाओं और कश्मीर मुद्दे पर सत्ता की सार्वजनिक और पर्दे के पीछे की बातचीत का प्रत्यक्ष ब्योरा पेश करती है। 19 मई को वरिष्ठ पत्रकार करण थापर के साथ एक इंटरव्यू में, जो द वायर में प्रकाशित हुआ है, दुलत ने कहा कि घाटी में बढ़ते हमलों के पीछे श्रीनगर का स्वतंत्र "आंतकी सेल" जिम्मेदार है। प्रशासन को पता ही नहीं है कि इस सेल के सदस्य कौन हैं और वे कहां रहते हैं। वे कहते हैं कि इन्हें पाकिस्तान से जोड़ा जाता है और 2019 में देखे गए किसी भी हमले की तुलना में इनका काम ज़्यादा 'पेशेवर' है। 

90 के दशक से पाकिस्तान कश्मीर में उग्रवाद को समर्थन देता आया है, इसके लिए पाकिस्तान ने लड़ाकों को हथियार, वित्त और प्रशिक्षण संबंधी मदद उपलब्ध कराई है। एक नासमझ प्रशासन कश्मीर के लिए नया नहीं है; आतंकवाद की शुरुआत में नब्बे के दशक में भी प्रशासन को कुछ नहीं मालूम था। लेकिन 2019 के बाद से घाटी की स्थिति का परीक्षण करने के बाद ज़्यादा चीजों को ध्यान में रखना होगा। हमें दुलत के दूसरे दावे को भी समझना होगा कि "2019 के बाद से कश्मीर सबसे ख़तरनाक आतंकवाद का सामना कर रहा है।" इसके समर्थन में वे कहते हैं कि "उग्रपंथी समूहों से ताल्लुक रखने वाले ज़मीनी कार्यकर्ताओं" और इनके साथ "सहानुभूति रखने वालों" की संख्या बढ़ रही है।

अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संविधान के अनुच्छेद 370 को हटा दिया था और बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियों का आदेश दिया था। इन गिरफ्तारियों में सिर्फ़ वे लोग शामिल नहीं थे, जिन्हें उग्रपंथियों से सहानुभूति रखने वाला समझा जाता था, बल्कि इसमें कश्मीर का पूरा सियासी नेतृत्व तक शामिल था। इसमें फारुख अब्दुल्ला, ऊमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और सैफुद्दीन सोज शामिल थे, जो हमेशा संविधानवादी और भारतीय झंडे के वफ़ादार रहे हैं। इन लोगों ने चुनाव लड़े और जीते हैं। भले ही भारत के अर्ध-समर्थक और उग्रपंथी इन पर भारत की कठपुतली होने का आरोप लगाते हैं, लेकिन इसके बावजूद इनकी घाटी में बड़ी लोकप्रियता रही है। पिछले साल हुए बीडीसी चुनावों में इनकी सफलता से भी इनकी लोकप्रियता पचा चलती है। 5 अगस्त 2019 के बाद इनकी लंबी हिरासत और उसके बाद सत्ताधारी पक्ष के वरिष्ठ सदस्यों और उनकी ट्रॉल आर्मी द्वारा उनको निशाना बनाए जाने के चलते इनका घाटी में कद कम हो गया है, इसलिए वहां संवैधानिक राजनीति के लिए समर्थन और स्थान कम हुआ है।  

इसके साथ-साथ पूरे देश में जारी सांप्रदायिक माहौल, लिंचिंग और मुख्यधारा की मीडिया द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ़ लांछन लगाने की मुहिम ने इस माहौल को और भी बदतर बना दिया है। दुलत कहते हैं कि इसने एक ऐसी स्थिति का निर्माण किया है, जहां जमात जैसा संगठन "पुलिस समेत प्रशासन के भीतर तक फैल गया है"

इस तरह अनुच्छेद 370 को हटाते वक़्त बीजेपी द्वारा किए गए शांति और विकास के तमाम वादे खारिज हो चुके हैं। जबकि बाकी के भारत में उन्माद फैलाने की उनकी कोशिशों को बहुत सफलता मिली है। लेकिन इस सफलता ने घाटी में एक विरोधाभासी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है और यही आज की हिंसक अराजकता के लिए जिम्मेदार है। 

कश्मीर फ़ाइल्स की दरारें और परिसीमन की राजनीति

कश्मीर फाइल्स ऐसी पहली फिल्म है जिसका ना केवल दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों, बल्कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने तक इसका प्रचार किया। घाटी से कश्मीरी हिंदुओं के पलायन की पृष्ठभूमि में बनी यह फिल्म उस दौर के 'अनकहे सच' को कहने का दावा करती है। निर्देशक का ऐलानिया एजेंडा विशेष तौर पर कश्मीर मुस्लिमों और आमतौर पर मुस्लिमों को खलनायक बनाने का था। बल्कि विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ने सिनेमा हॉल को जंग के मैदान में बदल दिया। स्क्रीनिंग के दौरान भड़काऊ नारेबाजी कई हफ़्तों तक सोशल मीडिया पर छाई रही। 

जाने-माने संगठन- कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिक्कू, जो घाटी में कश्मीरी पंडितों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्होंने बाद में हुई घटनाओं के लिए इस फिल्म को जिम्मेदार बताया है। (जम्मू-कश्मीर के पुर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ऐसे ही विचार प्रदर्शित किए थे।) संक्षिप्त में कहें, तो हिंदुत्ववादी विचारधारा के उस एजेंडे में सही बैठती है, जो भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य को बाकी के हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करती है।

इसकी सफलता पर चलते हुए हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथियों की योजना घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की है। हम ऐसी ही चीज पाकिस्तान के उत्तरी इलाके (गिल्गित और बाल्टिस्तान) में देख सकते हैं, जिसे पंजाबी सुन्नी बहुल इलाका बना दिया गया है। जबकि वहां पारंपरिक तौर पर रहते आए शिया समुदाय को अल्पसंख्यक बना दिया गया है। कश्मीर में 50 हजार मंदिरों को बनाने की घोषणाओं के साथ अहम सरकारी पदों पर गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति करने जैसी चीजें हो रही हैं। जैसा दुलत ने कहा, "प्रवासी पंडित नौकरियां पा रहे हैं, खासकर ऐसे विभागों में जनसांख्यिकी बदलावों के लिए अहम हैं। 

कश्मीरी पंडितों के दुखों को दूर करने की आड़ में विभाजनकारी परियोजना को लागू करने की कोशिशें भी हुई हैं। जैसे- घाटी में उनकी संपत्ति से जुड़ी दिक्कतों के समाधान के लिए बनाया गया पोर्टल। इस पोर्टल के जरिए प्रवासी की संपत्ति के सर्वे या मापन से जुड़ी शिकाय दर्ज कराने की अनिवार्यता खत्म हो गई है। इससे कश्मीरियों के दिमाग में और भी ज़्यादा संशय पैदा हुआ है और भारत विरोधी तत्वों को युवाओं को हिंसा की ओर प्रेरित करने में आसानी होने लगी है। 

परिसीमन ने भी घाटी में तनाव को और बढ़ा दिया है व इन चिंताओं को पुष्ट किया है कि केंद्र सरकार चाहती है कि विधानसभा में जम्मू, कश्मीर के ऊपर प्रभुत्व रखे। पूर्व राज्य में हमेशा प्रमुख मुस्लिम रहा है और उसकी राजनीति भी घाटी केंद्रित थी। सिर्फ गुलाम नबी आजाद को छोड़कर सारे मुख्यमंत्री घाटी से थे। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि लद्दाख, जम्मू और कश्मीर घाटी के तीनों इलाकों में घाटी में सबसे ज़्यादा आबादी थी। लेकिन आरएसएस और बीजेपी के पास जम्मू क्षेत्र में आधार वर्ग है, जम्मू का भौगोलिक इलाका सबसे बड़ा है। इसके चलते मुस्लिम तुष्टिकरण और घाटी के अधिक प्रतिनिधित्व के काल्पनिक आरोप लंबे वक़्त से आरएसएस-बीजेपी द्वारा लगाए जाते रहे हैं। 

अब नए परिसीमन प्रस्ताव ने घाटी की ज़्यादा आबादी और नज़रंदाज किया और जम्मू क्षेत्र की विधानसभा सीटों में इजाफा कर दिया, जो इसके भौगोलिक विस्तार पर आधारित है। यह भारत में सभी जगह जारी पारंपरिक प्रक्रिया से अलग है। उदाहरण के लिए भौगोलिक तौर पर उत्तर प्रदेश से ज़्यादा बड़े मध्य प्रदेश में विधानसभा की कम सीटे हैं। क्योंकि उत्तर प्रदेश में आबादी ज्यादा है।

घाटी में जनता की नाराजगी, आतंकी गतिविधियों में हालिया इजाफा और पंडितों की हत्याएं एक डरावनी तस्वीर पेश कर रही हैं। लेकिन स्थानीय और केंद्र सरकार, जो अपने चुनावी बहुमत और राष्ट्र निर्माण की सांप्रदायिक समझ पर आधारित छवि निर्माण के चलते अति आत्म-विश्वास में है, वह लगातार इस चीज को नज़रंदाज कर रही है। 

प्यादे हुए विद्रोही

पंडितों पर हमले से हमेशा बीजेपी का समर्थन बढ़ता रहा है। पंडितों की हत्याएँ मुख्यधारा की मीडिया की बहस में भी जगह बनाती हैं। ऐसी हर घटना के बाद सोशल मीडिया पर हलचल तेज हो जाती है। हर बार ज़्यादा तेज आवाज के साथ पाकिस्तान और मुस्लिमों पर आरोप लगाए जाते हैं और इस उन्मादी भाषणबाजी को तेज करने के लिए अभियान चलाए जाते हैं। 

 बीजेपी ने भट की हत्या के बाद पुराने ढर्रे पर लाभ लेने की कोशिश की और पाकिस्तान के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित किए। लेकिन घाटी या उसके बाहर, कश्मीरी पंडितों से बीजेपी को कोई समर्थन हासिल नहीं हुआ। इसके बजाए केंद्र शासित प्रशासन के खिलाफ़ प्रदर्शन करते हुए कश्मीरी पंडितों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईँ। एक वीडियो में मारे गए कश्मीरी पंडित की पत्नी जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट-जनरल मनोज सिन्हा और केंद्रीय गृहमंत्री पर जवाबदेही के आरोप लगाती है। तो अब इन प्रदर्शनों में एक नई चीज स्थानीय मुस्लिमों का समर्थन देखने को मिल रहा है। अब यह प्रदर्शनकारी राहुल भट के साथ-साथ मारे गए एसपीओ, एक मुस्लिम कश्मीरी रियाज भट के लिए भी न्याय की मांग करते हैं। घाटी में यह अनोखे घटनाक्रम हैं और यह दक्षिणपंथियों के सांप्रदायिक एजेंडे के लिए बड़ी चुनौती है। पहले दिन यह प्रदर्शन इतना तेज था कि प्रशासन ने अपने सबसे पसंदीदा तरीके अपनाने को मजबूर होना पड़ा- प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठी चार्ज किया गया और आखिरकार पंडितों को उनके कैंपों में बंद कर दिया गया। घाटी में तैनात 350 कश्मीरी पंडितों ने प्रतिरोध के तौर पर इस्तीफा दे दिया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें वहां सुरक्षित महसूस नहीं होता। पंडित इस बात से भी हैरान थे कि लेफ्टिनेंट गवर्नर, भट की हत्या के बाद ट्रांजिट कैंप में उनसे मिलने नहीं आए।  

सरकार को प्रशासन के खिलाफ़ कश्मीर पंडितों के प्रदर्शन का अनुमान नहीं था। मीडिया ने इसकी रिपोर्टिंग नहीं की। जैसा पिछले साल भी किया गया था जब कश्मीरी पंडित लंबी भूख हड़ताल पर बैठे थे। ऑनलाइन ट्रोल्स ने राहुल भट की सोशल मीडिया प्रोफाइल को खंगाल लिया, लेकिन उन्हें तब निराश होना पड़ा, जब उन्होंने पाया कि राहुल भट ने रोहिंग्या लोगों की हत्या के खिलाफ़ विरोध जताया था। एक गैर-सांप्रदायिक कश्मीरी पंडित, दक्षिणपंथियों के लिए सबसे बुरा सपना है और इन लोगों ने राहुल भट की मौत का मजाक बनाना शुरू कर दिया। लेकिन इससे भी उनके पक्ष में माहौल नहीं बना और आखिरकार उन्होंने इसे नज़रंदाज कर दिया। 

लेकिन कश्मीरी पंडितों का प्रदर्शन अब भी जारी है। केपीएसएस इसमें नेतृत्व कर रहा है और संजय टिक्कू ने अनुच्छेद 370 को हटाए जाने और द कश्मीर फाइल्स के सांप्रदायिक एजेंडे की निंदा की थी। उन्होंने फिल्म और उसके बाद शुरू हुए नफरत के खेल को घाटी में माहौल खराब करने के लिए जिम्मेदार बताया था। उन्होंने घाटी के बहुसंख्यकों से उनका समर्थन करने की अपील की थी। उन्होंने डर जताया कि इन घटनाक्रमों से कश्मीरी पंडितों के वापस घाटी में रहने की संभावनाएं खत्म हो जाएंगी। इतना ही नहीं, बल्कि इनसे अब भी घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों को विस्थापन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

आगे क्या हो सकता है?

एक विख्यात कश्मीरी पंडित ने कहा है कि सांप्रदायिक राजनीति और भारत के दूसरे हिस्सों में मुस्लिमों के खिलाफ़ हिंसा, घाटी में भी उन्हीं हालातों को दोहराएगी। सोशल मीडिया और सेटेलाइट टीवी चैनलों ने घाटी को पूरे देश और दुनिया से जोड़ दिया है, इसलिए हर घटना मोबाइल तक पहुंचती है और एक प्रतिक्रिया हासिल करती है। जिस तरीके से सांप्रदायिक राजनीति के लिए कश्मीर का उपयोग किया जा रहा है, उसका स्पष्ट नकारात्मक प्रभाव घाटी पर नज़र आ रहा है। दक्षिणपंथियों के प्रोपेगेंडा के लिए अक्सर पंडितों का उपयोग प्यादों के तौर पर किया जाता रहा है। उनके पलायन के दर्द का, उनके दिमाग और उनकी खुद की छवि पर गहरा असर पड़ा है, जिसमें मुस्लिम स्वाभाविक खलनायक नज़र आते हैं। दोनों समुदायों के बीच वक़्त के साथ फासला और बढ़ता ही गया है।

बीजेपी के लिए यह सारी चीजें लाभकारी साबित हुई हैं। बीजेपी तुरंत किसी भी घटना के लिए कश्मीर के मुख्यमंत्रियों को जिम्मेदार बता देती थी। पूर्व राज्य में राजनीतिक स्थान के लिए उनके लालच ने पूरी स्थिति को ही सिर के बल खड़ा कर दिया। अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया और राज्य को महज़ केंद्र शासित प्रदेश बनाकर छोड़ दिया गया। आज बीजेपी के पास जम्मू और कश्मीर, कुछ राज्यों व केंद्र में संपूर्ण शक्ति है। इसलिए जम्मू और कश्मीर के निवासियों के पास उनके साथ हुई ज़्यादतियों की शिकायत के लिए खुद बीजेपी द्वारा चलाए जाने वाले तंत्र के अलावा कोई नहीं है। लेकिन अब शुरुआत में फैलाया गया राजनीतिक उन्माद तेजी से कम हो रहा है। पंडितों से घाटी में वापसी और सुरक्षा समेत तमाम बड़े-बड़े वायदे किए गए थे, जबकि इसके लिए ना तो पर्याप्त पैसा रखा गया और ना ही कोई अच्छी योजना बनाई गई। इससे वे पंडित नाराज हो गए, जो अब भी घाटी से जुड़े हुए हैं। हाल में पनून कश्मीर के नेता का एक वीडियो आया था, जिसमें वे गृहमंत्री और सरकार की निंदा कर रहे थे, यह वीडियो बहुत वायरल हुआ था। पनून कश्मीर उन प्रवासी पंडितों का संगठन है, जिन्होंने हमेशा बीजेपी का समर्थन किया है। हाल में हुई भट की हत्या के बाद कई कश्मीरी पंडितों ने सरकार की निंदा की है और द कश्मीर फाइल्स के निर्देशक पर सवाल उठाए हैं।

याद रखिए कि प्रधानमंत्री पैकेज के तहत जो पंडित वापस आए हैं, वे कश्मीर में थोड़ा वक़्त बिता चुके हैं। वे स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के साथ संपर्क में हैं और उन्हें ज़मीनी हालातों का खुद अनुभव हो रहा है। वे आराम से प्रशासन द्वारा कही गई आधिकारिक बात को नहीं मानेंगे- मौजूदा विरोध प्रदर्शन भी यही साबित करते हैं।

कश्मीरी समाज की जटिलता और सह-अस्तित्व के इसके लंबे इतिहास से बेखबर मौजूदा सत्ता वास्तविकता को मानने और अपने तरीके बदलने के लिए तैयार नहीं है। आरएसएस के शाखा तंत्र और 'बौद्धिक' सत्र में हुए उनके प्रशिक्षण ने जटिल सामाजिक ढांचे में लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व की उनकी समझ को अपाहिज कर दिया है। पूंजीवादी वर्ग को उनका बेशर्त समर्थन अतीत के आर्थिक-सामाजिक हासिल को बर्बाद कर रहा है। रुपये अपने निचले स्तर पर है, ज्ञानवापी औऱ मथुरा मस्जिद पर युद्धोन्माद छाया हुआ है, दोनों का मीडिया प्रबंधन के जरिए इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन यह दिखावटी और शोरगुल भरी नौटंकी ज़्यादा दिन नहीं चलने वाली है और इससे गिरती अर्थव्यवस्था नहीं सभल जाएगी। हमारे लिए चेतावनी साफ़ है: कश्मीर पर इस "रणनीति" के विनाशकारी परिणाम, क्षेत्र को एक बार फिर खून से सने हिंसक हालातों में फंसा सकते हैं। 

अशोक कुमार पांडे कई किताबों के लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

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