NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
भारत
राजनीति
असम के टापू वाले गांवों में स्कूल छोड़ने की दर इतनी अधिक क्यों है?
सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इस क्षेत्र की 19.31 प्रतिशत की साक्षरता दर राज्य की 63 प्रतिशत की दर से बहुत कम है, और क्षेत्र में केवल 1,872 स्कूल का होना प्रति व्यक्ति 0.07 स्कूल हिस्से में आते हैं।
वर्षा तोरगाल्कर
24 Mar 2021
Translated by महेश कुमार
असम

ढुबरी: असम के ढुबरी जिले के बिलासीपारा ब्लॉक का गाँव बाघमरी जोकि चार गाँव या टापुवाला गाँव कहलाता है, की रहने वाली एक बच्चे की माँ 19 वर्षीय मोरजिमा अली (बदला हुआ नाम) ने 14 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था। उनके आस-पास में कोई स्कूल नहीं था और स्कूल जाने के लिए उन्हे 2-3 किमी पैदल चलना पड़ता था और फिर नाव से 20 मिनट की सवारी करनी होती थी। 

दूरी के मद्देनजर आसपास के इलाके से कोई भी लड़की मोरजिमा के साथ स्कूल जाने को तैयार नहीं होती थी। जैसे ही मोरजिमा का मासिक धर्म शुरू हुआ उसके माता-पिता ने उसे स्कूल छोड़ने के लिए कहा। नतीजतन 16 साल की उम्र में उसका निकाह कर दिया गया था। वे ऐसी अकेली महिला नहीं है। बाघमरी में दस में से नौ लड़कियां 10 वीं की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं। 

चार इलाक़ा है क्या?

ब्रह्मपुत्र या उसकी सहायक नदियों से पैदा हुई गाद या रेत के टीले के जमाव से बने सैंडबार्स या टापुओं से बने गांवों को चार या चपोरी गाँव कहते हैं। ये गाद या रेत नदी की ऊपरी धारा के  बहाव से इकट्ठा होती हैं। राज्य में ब्रह्मपुत्र नदी के रास्ते में 14 जिलों के 2,251 चार गाँव पड़ते हैं, जिनकी अनुमानित जनसंख्या 24,90,097 है, जो 2003-04 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार अब तक का उपलब्ध सबसे नवीनतम डेटा है। असम के 340 प्रति वर्ग किलोमीटर के मुकाबले चार गांवों की जनसंख्या का घनत्व 690 प्रति वर्ग किमी है जोकि अपने आप में बहुत अधिक है।

यहाँ प्रति व्यक्ति खेती के लायक भूमि सिर्फ 0.24 एकड़ है और साक्षरता दर 19.31 प्रतिशत है जोकि राज्य की 63 प्रतिशत की दर से काफी कम है। गरीबी रेखा से नीचे की आबादी कुल प्रतिशत 67 है। इस इलाके में केवल 1,872 स्कूल हैं और सर्वेक्षण के मुताबिक प्रति व्यक्ति 0.07 स्कूल पड़ते हैं। यहाँ अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी का बड़ा हिस्सा निवास करता है।

27 साल का असलम शेख, जो गुवाहाटी में भवन निर्माण का मजदूर है, वर्तमान में चल रही कोरोना महामारी के कारण अपने पैतृक गाँव मायारचर में रहता है। नदी के किनारे अपने पड़ोसी के खेत में खड़े होकर, असलम ने न्यूज़क्लिक को बताया कि “मेरे माता-पिता भूमिहीन थे और मजदूरी करते थे। मेरे तीन भाई और तीन बहनें हैं। मेरे माता-पिता ने मुझे 12-13 साल की उम्र में एक चाय की दुकान पर मजदूरी करने भेज दिया था। मैं तभी से काम कर रहा हूं। ऐसा कोई तरीका नहीं था जिसके जरिए वे मुझे स्कूल भेज सकते थे। मेरे किसी भी भाई ने 6ठी या 7वीं कक्षा से आगे की पढ़ाई नहीं की है।”

मायारचर के बच्चों को माध्यमिक शिक्षा हासिल करने के लिए स्कूल जाने के लिए (यानि 8 वीं से 10 वीं कक्षा की शिक्षा हासिल करने के लिए) लगभग 4 किमी की दूरी तय कर गुटिपारा जाना पड़ता है।

स्कूल की पढ़ाई छोड़ने के कारण 

चार गाँव कहो या टापू वाले गांव में आमतौर पर केवल प्राथमिक स्कूल होते हैं जहां बच्चे चौथी या सातवीं कक्षा तक पढ़ सकते हैं। चार गांवों के लिए केवल एक माध्यमिक विद्यालय होता है। जहां पक्की सड़कों के अभाव के कारण, बच्चों को कच्ची सड़कों के जरिए लंबी दूरी तय की यात्रा करनी पड़ती है जो साल के लंबे समय तक गाद और रेत से भरी होती हैं। कभी-कभी बच्चों को अपने जीवन को खतरे में डालकर या 15-20 मिनट की नाव की यात्रा और फिर उबड़-खाबड़ बांस के पुल को पार करना पड़ता है। उन्हें नाव की यात्रा के लिए 5-10 रुपये देने पड़ते हैं। 

बच्चों को स्कूल जाने के लिए इस तरह के बांस के पुल को पार करना पड़ता है

सीमांत या कम आय वाले माता-पिता प्रत्येक बच्चे पर प्रति दिन 10 रुपये खर्च नहीं कर सकते हैं। नतीजतन, बच्चे अक्सर प्राथमिक शिक्षा लेने के बाद स्कूल छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें रोजाना स्कूल जाने के लिए विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

"क्या कोई इस बात की कल्पना कर सकता है कि माता-पिता लड़कियों को पढ़ाई करने की अनुमति क्यों नहीं देते हैं। इसलिए कि स्कूल से लौटते वक़्त अक्सर देर हो सकती है। माता-पिता सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं। इसके अलावा, यहां के स्कूलों में शायद ही कोई महिला शिक्षक होती है। उनके सामने एकमात्र विकल्प सिर्फ लड़कियों की शादी करना होता है।

उन्होंने बताया कि, "चार गांवों की नब्बे फीसदी महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र पहले ही हो जाती है और बाकी कि 20 साल की उम्र से पहले हो जाती है। अगर माताएं अनपढ़ हैं या  शिक्षित हैं, तो वे अपने बच्चों को कैसे पढ़ा सकती हैं? यह सिलसिला जारी है।”

21 साल का ज़कारिया शेख, जो गुटीपारा में स्नातकों की शिक्षा हासिल करने वालों में से एक है, तुलनात्मक रूप से बेहतर परिवार से संबंधित है और उनके पास एक साइकिल भी है। उन्होंने बताया कि साइकिल से उनका कॉलेज तक पहुंचना बहुत कठिन मसला है। “गुटीपारा गाँव में 10 वीं कक्षा तक का स्कूल है और इसलिए मैं वहाँ पढ़ सका था। लेकिन मुझे अपने कॉलेज पहुँचने के लिए महामाया तक रोजाना 5-6 किमी साइकिल चलानी पड़ती थी। मुझे अक्सर 1-2 कक्षाएं छोड़नी पड़ती थीं। मैं बारिश में भीग जाता, और मानसून के दौरान नाव से महामाया जाते समय मेरी नोटबुक भीग जाती थी। बाढ़ के मौसम के दौरान मैं कॉलेज नहीं जा सकता था।"

मानसून के दौरान उन्हे नाव से स्कूल जाना पड़ता है

“जो लोग जमीन के मालिक हैं वे खेती करते हैं और जो भूमिहीन वे मजदूरी करते हैं। वे खुद के खाने के लिए तो खेती करते हैं, लेकिन अक्सर उन्हे अपनी उपज के वाजिब दाम नहीं मिलते  हैं। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे लोग अपनी आय बढ़ा सकें। चूंकि लोग बहुत गरीब हैं, इसलिए उनके पास अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं है। हालांकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा मुफ्त है, लेकिन फिर भी उन्हें किताबों, यूनिफॉर्म आदि की खरीद के लिए पैसे  की जरूरत होती है। इसलिए स्कूल भेजने के बजाय, वे बच्चों को बड़े शहरों में मज़दूरी करने के लिए भेजना पसंद करते हैं, ”अब्दुल मन्नान, जोकि एक सामाजिक कार्यकर्ता, जो ज़ुएजी फ़ाउंडेशन चलाते है, जो क्षेत्र में काम करने वाले बहुत कम गैर सरकारी संगठनों में से एक है। 

बड़ी संख्या बच्चे मदरसे या जिन्हे मुस्लिम धार्मिक संस्थानों कहते में जाते हैं, जो इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। कई संस्थान तो लड़कों के लिए आवासीय स्कूल के रूप में उपलब्ध हैं। मदरसा शिक्षकों में से एक अबू हनीफा ने बताया कि, “माता-पिता अपने बच्चों को मदरसे में इसलिए भेजते हैं क्योंकि उन्हें नियमित स्कूलों में बच्चों को शिक्षित करना बहुत मुश्किल और ख़र्चीला है। हालाँकि, इस तरह की धार्मिक शिक्षा से शायद ही उन्हे कोई रोजगार मिलता है। वे नतीजतन किसान या मजदूर ही बनते हैं।”

इस दौरान,  असम सरकार द्वारा सभी मदरसों को आम/सामान्य स्कूलों में बदलने के फैसले ने अब क्षेत्र के इन स्कूलों की निरंतरता पर भी सवालिया निशान लगा दिया है।

विभिन्न सरकारें चार गांवों का विकास करने में भयंकर रूप से असफ़ल रही हैं 

गुवाहाटी के सामाजिक कार्यकर्ता डॉ॰ बीभब तालुकदार ने गरीब इलाकों में अशिक्षा और गरीबी के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया हैं। उन्होंने कहा कि, “कागज पर चार गाँव के इलाके में  बेहतर शिक्षा सहित कई योजनाएं शामिल हैं। लेकिन उन्हें शायद ही लागू किया जाता है। यह सरकार की सबसे बड़ी विफलता है।”

इस बीच, चार गांवों के निवासी प्रत्येक गांव में और आसपास के इलाकों में माध्यमिक स्कूल की मांग कर रहे हैं ताकि उनके बच्चे शिक्षा हासिल कर सकें।

असम के माध्यमिक शिक्षा विभाग और चार इलाके के विकास के लिए बने निदेशालय को भेजी ई-मेल का जवाब नहीं मिला है जिसमें स्कूलों की कम संख्या होने, स्कूल छोड़ने और निरक्षरता की ऊंची दर पर सवाल उठाया गया है। किसी भी विभाग ने फोन का भी कोई जवाब नहीं दिया है। 

(इस लेख की लेखिका एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और उनके द्वारा व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)

Char Villages
Assam Government
Himanta Biswa Sarma
Access to education
Right to education
Primary Schools
BJP Government in Assam
Secondary Education Department Assam
Directorate of Char Areas Development Authority

Related Stories


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 26,727 नए मामले, 277 मरीज़ों की मौत
    01 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.82 फ़ीसदी यानी 2 लाख 75 हज़ार 224 हो गयी है।
  • Kejriwal
    अजय कुमार
    अरविंद केजरीवाल देशभक्ति का नया पाठ्यक्रम लेकर क्यों आ रहे हैं?
    01 Oct 2021
    देशभक्ति के लिए नया पाठ्यक्रम बनाने की ज़रूरत नहीं बल्कि केजरीवाल जैसे नेताओं को नागरिक शास्त्र पढ़कर एक सजग नागरिक के तौर पर आलोचनात्मक चिंतन करते हुए ज़िंदगी जीने की ज़रूरत है।
  • afghanistan
    एम. के. भद्रकुमार
    अफ़ग़ानिस्तान पर क्या है अमेरिका-ब्रिटेन की मंशा?
    01 Oct 2021
    एक तरफ़ अमेरिका और ब्रिटेन और दूसरी तरफ़ रूस और चीन के बीच कुल मिलाकर माहौल बहुत ख़राब है। पाकिस्तान इससे अनजान नहीं हो सकता है।
  • covid
    सौरभ शर्मा
    उत्तर प्रदेश : बिजनौर के निज़ामतपुरा गांव में कोविड-19 ने जीवन को पीछे ढकेला
    01 Oct 2021
    निज़ामतपुरा में आर्थिक तौर पर कमज़ोर परिवार बेहद गंभीर स्तर की ग़रीबी का सामना कर रहे हैं। इस साल कोरोना की दूसरी लहर के दौरान स्वास्थ्य आपात ज़रूरतों और बुनियादी खपत की पूर्ति को लिए गए क़र्ज़ को चुकाने…
  • DA
    रौनक छाबड़ा
    अधिकारियों ने किया महंगाई भत्ते को अनफ्रीज़ करने की घोषणा के विरोध का ऐलान
    01 Oct 2021
    पिछले साल महंगाई भत्ते को फ़्रीज़ करने का विरोध करने के बाद, कर्मचारियों का मानना है कि यह उन पर एक और हमला है क्योंकि मज़दूरों और अधिकारियों को महंगाई भत्ता अलग-अलग प्रतिशत पर मिलेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License