NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्या यूक्रेन युद्ध को लेकर ग़रीब देशों पर दबाव बनाने के लिए स्वास्थ्य का इस्तेमाल किया जायेगा?
लिथुआनिया सरकार ने यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के दौरान बांग्लादेश को तक़रीबन आधा मिलियन कोविड-19 वैक्सीन खुराक को दान करने के अपने फ़ैसले को पलट दिया है। इससे एक ख़तरनाक़ मिसाल क़ायम होती है
एना व्राचर
04 Apr 2022
ukraine
मार्च में हुई संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक।

यूक्रेन में रूसी संघ के सैन्य हस्तक्षेप की निंदा करने वाले एक प्रस्ताव पर हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा के मतदान के तुरंत बाद लिथुआनिया की सरकार ने 3 मार्च को बांग्लादेश को कोविड-19 टीकों की 444,600 खुराक दान करने के अपने फ़ैसले को रद्द करने का निर्णय लिया था। जैसा कि लिथुआनिया की सरकार ने खुले तौर पर कहा था कि बांग्लादेश को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता वाले बाक़ी 35 देशों के साथ इस प्रस्ताव पर मतदान से परहेज करने को लेकर दंडित किये जाने के लिहाज़ से यह फ़ैसला लिया गया था।

बांग्लादेश के ख़िलाफ़ की गयी यह कार्रवाई युद्ध की शुरुआत के बाद से रूस के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा सख़्त उपायों,यानी लगाये गये प्रतिबंधों का हिस्सा नहीं थी। लेकिन, यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि अमीर देश किस तरह ग़रीब देशों पर अपनी कार्रवाई का समर्थन करने के लिहाज़ से दबाव बनाने के लिए स्वास्थ्य का इस्तेमाल करने से भी नहीं परहेज़ करते।

कोविड-19 से जुड़े चिकित्सा उत्पाद स्वास्थ्य संसाधनों के लिए ज़रूरी उन चीज़ों में नवीनतम चीज़ हैं, जिनका इस्तेमाल अमीर देश दशकों से दुनिया के बाक़ी देशों को ब्लैकमेल करने के लिए करते रहे हैं, और वे इस लिहाज़ से बहुत असरदार साबित हो सकते हैं। वैश्विक स्तर पर वैक्सीन, रोगों की पहचान से जुड़े तकनीक और चिकित्सा प्रक्रिया की बराबरी के साथ सुलभता को निर्धारित करने की क्रियाशील व्यवस्था का अभाव है,ऐसे में पश्चिमी देशों की दवा कंपनियां और सरकारें ही यह तय करती हैं कि किसे क्या मिले।

अगर दूसरी सरकारें भी लिथुआनिया की राह पर चलने का फ़ैसला कर लेती हैं और उन देशों को आपूर्ति करना बंद कर देती हैं, जो पश्चिम की ओर से प्रस्तावित उपायों का विरोध करते हैं या समर्थ करने से परहेज करते हैं, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के तक़रीबन आधे  अफ़्रीकी सदस्य देशों ने मतदान के दौरान किया था,तो महामारी से निपटने की कोशिशें और धीमी पड़ सकती हैं । यह इसलिए ख़ासकर चिंताजनक है, क्योंकि ऐसे नये-नये वेरिएंट अब भी खोजे जा रहे हैं, जो ख़ासकर उन लोगों के लिए जोखिम पैदा करने वाले है,जिनकी पहुंच दवाओं और टीकों तक नहीं है।

प्रतिबंधों के तहत रद्द किया गया स्वास्थ्य का अधिकार

अमीर देशों ने ऐसे प्रतिबंधों को पेश करके ग़रीब देशों के लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को खतरे में डालने से कभी संकोच नहीं किया है, बल्कि इस तरह के प्रतिबंधों को हस्तक्षेप करने और इन देशों की अंतरूनी नीतियों को बदलने की कोशिश का एक वैध तरीक़ा ही माना है। प्रतिबंध लगाने वालों का दावा है कि इसका मक़सद उन देशों के शासक वर्गों को दंडित करना है,जो इन प्रतिबंधों के निशाने पर होते हैं और इस तरह, संभावित रूप से शासन परिवर्तन को प्रेरित करना है। हालांकि,इसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा आम लोगों को ही भुगतना होता है।

2017 और 2018 के बीच वेनेज़ुएला पर एकतरफ़ा लादे गये अमेरिकी सख़्त प्रतिबंधों के असर यह हुआ था कि वहां 40,000 लोग मारे गये थे। इसके अलावा, वेनेज़ुएला को पीले बुखार और पोलियो के टीके सहित बाक़ी टीकों की ख़रीद और आयात में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इसका नतीजा यह हुआ था कि वेनेज़ुएला में पोलियो का आख़िरी मामला दर्ज होने के लगभग 30 साल बाद,यानी 2018 में इस रोग की वापसी की आशंका पैदा हो गयी थी। हालांकि,स्वास्थ्य अधिकारियों ने बाद में इस बात की पुष्टि कर दी कि इसकी संभावना अब नहीं है। लेकिन, यह एक बड़ी चिंता का विषय इसलिए बना रहा है, क्योंकि लाखों बच्चों का टीकाकरण नहीं हो पा रहा है।

ईरान के ख़िलाफ़ लगाये गये प्रतिबंधों के बाद देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली ज़रूरी दवाओं और दूसरे उत्पादों के आयात सहित बुनियादी सेवा को सुनिश्चित कर पाने को लेकर संघर्ष कर रही थी। इन प्रतिबंधों के चलते कैंसर और मधुमेह से पीड़ित रोगियों के उपचार में भी समस्यायें पेश आयी हैं, जिसके कारण कई लोग इसकी काला बाज़ारी से हो रही आपूर्ति पर निर्भर हैं। इससे परिवारों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ा है और रोज़ी-रोटी तक पर ख़तरे मंडराने लगे हैं।

इस तरह के एकतरफ़ा और ज़ोर-ज़बरदस्ती वाले उपायों के पड़ने वाले नकारात्मक असर पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत अलीना डोहान की रिपोर्ट बताती है कि ईरान को इन प्रतिबंधों के सिलसिले में अमीर देशों की कंपनियों की ओर से अख़्तियार किये जाने वाले अति-उत्साह का भी ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है। हाल ही का एक उदाहरण स्वीडिश कंपनी मोल्नलीके हेल्थ केयर से जुड़ा हुआ है।इस कंपनी ने ईरान को एपिडर्मोलिसिस बुलोसा के रोगियों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली पट्टियों की आपूर्ति बंद कर दी थी। एपिडर्मोलिसिस बुलोसा दरअस्ल बीमारियों का एक समूह है, जिससे चमड़ी में दर्दनाक फफोले हो जाते हैं और चमड़ी नाजुक हो जाती है। ईरानी सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल क्रिमिनल लॉ के मुताबिक़, मोल्नीके की इस कार्रवाई से कम से कम 30 बच्चों की मौत हो गयी थी, साथ ही इस पट्टी के अभाव का सामना कर रहे रोगियों के दर्द में 70% का इज़ाफ़ा हो गया था।

महामारी से पैदा हुईं नयी जटिलतायें

कोविड-19 इन प्रतिबंधों को झेल रहे लोगों के लिए कई नयी जटिलतायें लेकर आया, क्योंकि ये ग़रीब देश न तो टीके और न ही उनका रख-रखाव करने के लिए ज़रूरी उपकरण ख़रीद पाने में सक्षम थे। ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर डिफ़ेंडिंग विक्टिम्स ऑफ़ वायलेंस के साथ एक साक्षात्कार में डौहान ने इस बात की चेतावनी दी है कि जिन देशों ने एकतरफ़ा और ज़ोर-ज़बरदस्ती से लादे गये प्रतिबंधों का सामना किया है,उनके बारे में ख़बर है कि उन्हें कोवैक्स कार्यक्रम में भागीदारी में पेश आने वाली समस्याओं का भी सामना करना पड़ा है। कोवैक्स कार्यक्रम ख़ासकर ग़रीब देशों के सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद लोगों तक टीकों की पहुंच को सुनिश्चित करने वाला कार्यक्रम था। ये मसले उन्हें  भुगतान किये जाने को लेकर उन बैंकों की अनिच्छा के नतीजे थे, जिन्हें उन देशों के बदला लेने का डर था, जिन्होंने इन प्रतिबंधों को लगाया था। यहां तक कि जिस क्यूबा ने अपने ख़ुद के टीके बनाये थे  और उन टीकों को उसने प्रतिबंधों का सामना कर रहे दूसरे देशों के साथ साझा किया था, उसे भी इन टीकों के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले ज़रूरी सीरिंज की कमी का सामना इसलिए करना पड़ा, क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी ने सीरिंज के आयात को बाधित कर दिया था।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में रूस के आकार और उसकी भूमिका के साथ-साथ उस पर लगाये गये प्रतिबंधों का समर्थन करने को लेकर पश्चिम के बाहर के कई देशों की अनिच्छा को देखते हुए रूस ख़ुद इस तरह से तुरंत प्रभावित तो नहीं हो सकता,लेकिन व्यापार पर केंद्रित इन ऐतिहासिक प्रतिबंधों का स्वास्थ्य सेवा और पोषण पर तो असर पड़ा ही है। इस बीच, अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूस को लेकर अख़्तियार किये गये अपने रुख़ पर चलाने को लेकर दुनिया भर के देशों को धमका रहे हैं। अगर पश्चिमी ताक़तें सभी संधियों को ख़त्म करने और दूसरे देशों से इसी तरह की मांग करने की राह पर चलती रहीं, तो इसके नतीजे दुनिया भर को अपनी चपेट में ले सकते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान और सहयोग जोखिम वाले पहलुओं में से कुछ ऐसे पहलू हैं,जिसका असर वैश्विक स्तर पर इस नयी स्वास्थ्य आपात स्थितियों के मामले में नुक़सानदेह होना तय है। लेकिन, जैसा कि महामारी के दौरान क्यूबा और वियतनाम ने सहयोग की मिसाल क़ायम की है, विपन्न देशों के बीच उस तरह का सहयोग इस बात की उम्मीद जगाती है कि ऐसी समस्याओं को कमतर किया जा सकता है। लेकिन, जब तक इस तरह के विकल्प नहीं बन जाते, पश्चिम देशों की ओर से की जा रही इस तरह की दंडात्मक कार्रवाई का असर पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकता है।

पीपुल्स हेल्थ डिस्पैच के नवीनतम संस्करण से और भी ज़्यादा लेख पढ़ें और यहां न्यूजलेटर को सब्सक्राइब करें।

साभार:पीपल्स डिस्पैच

#EndSanctionsSaveLives
Alena Douhan
COVID-19 Vaccines
epidermolysis bullosa
Iranian Center for International Criminal Law
Mölnlycke
Organization for Defending Victims of Violence
Right to Health
Russia-Ukraine war

Related Stories

बिहार : प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में फ़ीस कम करने और राइट टू हेल्थ की मांग होने लगी तेज़

ओमिक्रॉन से नहीं, पूंजी के लालच से है दुनिया को ख़तरा

स्वास्थ्य का अधिकार: केरल और तमिलनाडु ने पेश की मिसाल 

कोविड-19 में पेटेंट और मरीज़ के अधिकार: क्या किसी अधिकार विशेष के बजाय यह पूरी मानवता का सवाल नहीं है ?


बाकी खबरें

  • UP Pamphlet
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनावः कानपुर में बांटे जा रहे पर्चे में लव जिहाद, धर्मांतरण और पलायन जैसे विवादित मुद्दे
    04 Feb 2022
    इस तरह के पर्चे लोगों के घर अखबार और अन्य माध्यम से पहुंच रहे हैं। ऐसे पर्चे सार्वजनिक होने के बाद सभी दल एक दूसरे पर सवाल उठा रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि ऐसे भड़काऊ पर्चे बांटकर…
  • SC
    अजय कुमार
    प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिशा निर्देश दिए?
    04 Feb 2022
    प्रमोशन में आरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। साथ में मामला बदलने पर बदलने वाली परिस्थितियों और तथ्य के आधार पर कुछ जरूरी पैमाने तय करने की जिम्मेदारी सरकार को सौंप…
  • UP
    सोनिया यादव
    यूपी: बुलंदशहर मामले में फिर पुलिस पर उठे सवाल, मामला दबाने का लगा आरोप!
    04 Feb 2022
    धराऊ में बीते महीने पिछड़े समुदाय की एक 16 वर्षीय लड़की की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने जबरन डरा-धमकाकर शव का रातों-रात अंतिम संस्कार करवाया दिया। साथ ही…
  • Yogi
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः योगी आदित्यनाथ ने जर्जर स्कूल की तस्वीर ग़लत दावे के साथ साझा की
    04 Feb 2022
    सवाल उठता है कि क्या जिस जर्जर स्कूल की तस्वीर को साझा किया गया है, वो सचमुच वर्ष 2017 से पहले की यानी सपा शासनकाल की है? आइये! पड़ताल करते हैं-
  • Goa
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोवा चुनावः क्या है मछली बेचने वालों के मुद्दे और भाजपा का रिपोर्ट कार्ड?
    04 Feb 2022
    गोवा एक तटीय प्रदेश है। बड़ी आबादी मछली कारोबार से जुड़ी हैं। लेकिन बावजूद इसके इनके मुद्दे पूरी चुनाव चर्चा से गायब हैं। हमने मापसा की मछली मार्केट में कुछ मछली बेचने वालों के साथ बात की है कि उनके…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License