NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
मज़दूरों, किसानों, खेत मज़दूरों ने ऐतिहासिक अभियान का किया आगाज़ 
जनता के प्रमुख मुद्दों पर सरकार के लचर रवैये के ख़िलाफ़ मेहनतकश लोगों ने 'भारत बचाओ' आंदोलन की शुरूआत कर दी है। 
सुबोध वर्मा
26 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
मज़दूरों, किसानों, खेत मज़दूरों ने ऐतिहासिक अभियान का किया आगाज़ 
Image Courtesy: iStock

भारत एक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है - और यह सिर्फ वही नहीं है जिसे आप दैनिक समाचार पत्रों या समाचार चैनलों के मध्यम से ग्रहण करते है। सबसे बड़ी बात यह है कि संसद सत्र चल रहा है लेकिन सत्र पूरी तरह से पेगासस नामक कोहरे में घिर हुआ है। इस कोहरे को सरकार ने पैदा किया है क्योंकि वह इस बात को कतई नहीं बताना चाहती है कि आखिर स्पाइवेयर के इस्तेमाल को किसने अधिकृत किया और इसका इस्तेमाल कर कौन रहा है। नतीजतन, संसद में गतिरोध जारी है और अन्य सभी महत्वपूर्ण मुद्दे ठंडे बस्ते में चले गए हैं। इस बीच, संसद के बाहर, किसान एक मिनी "संसद" चला रहे है, जो आठ महीने से अधिक समय से तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। जबकि देश के कई हिस्सों में लोग अभी कोरोना वायरस की दूसरी क्रूर लहर से उबर रहे हैं और सोच रहे हैं कि सरकारें कब ठीक से काम करेंगी।

लेकिन देश के कल-कारखानों और दफ्तरों, खेत-खलिहानों और खानों, समुद्र और पहाड़ों, विश्वविद्यालयों और अस्पतालों में क्रोध और असंतोष की भावना बढ़ रही है। इसके मुख्य रूप से दो कारण है: एक तो जिस लड़खड़ाहट के साथ नरेंद्र मोदी सरकार और कई राज्य सरकारों ने घातक महामारी को संभाला, और दूसरा, जिस तरह से उनके अयोग्य काम के तरीक से जनता की आजीविका तबाही हुई। जबकि महामारी के कारण हुए विनाश से सिर्फ चार लाख से अधिक मौतों और 3 करोड़ से अधिक संक्रमणों का अंदाज़ा लगाया जा रहा है, लेकिन कई विशेषज्ञों और अधिकांश लोग इस बात से आश्वस्त हैं कि यह आंकड़ा चौंका देने वाला हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक इन मौतों की संख्या 30 से 50 लाख तक हो सकती है। इस त्रासदी को आम लोगों ने मृत्यु और बीमारी के रूप में तो झेला लेकिन साथ ही इसका खर्च भी वहन किया, जबकि उनके परिवार के बजट ने इसकी अनुमति नहीं देते थे या देते हैं। 
 
बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, जो पिछले साल रिकॉर्ड 24 प्रतिशत तक पहुंच गई थी और उसके बाद वह 7-9 प्रतिशत की गंभीर स्थिति में बनी हुई है। इस साल मौजूदा नौकरियों का नुकसान लगभग 2.5 करोड़ तक पहुंच गया है, जिससे आय में गिरावट आई है और एक अध्ययन के अनुसार कम से कम 80 प्रतिशत लोगों के प्रभावित होने का अनुमान है, जिनकी  मजदूरी में कटौती या वेतन फ्रीज, काम के बोझ में वृद्धि के चलते परिवारों को अपना पेट भरने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है - ज़मीन से जुड़ी आज की मनहूस तस्वीर यही है। आर्थिक पिरामिड के ऊपर नज़र डालें तो इस दौरान बड़ी कंपनियों ने पिछले एक साल में रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है और भारतीय अरबपतियों ने कथित तौर पर अपनी संपत्ति में काफी इजाफा किया है। इस दुखद समय में अमीर और गरीब के बीच का अंतर लगातार बढ़ता गया है - जो बताता है कि मोदी सरकार लोगों की मदद के लिए क्या कुछ कर रही है।

इन विकट हालात में लोगों के पास लड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। यह अस्तित्व की लड़ाई है, जो भारत को बचाने की भी लड़ाई है।

'भारत बचाओ' अभियान 

हाल ही में, देश के तीन प्रमुख संगठन - श्रमिकों, किसानों और कृषि श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करते हुए - इस लड़ाई को संगठित करने और नेतृत्व करने के लिए एक साथ आगे आए हैं। ये इस प्रकार हैं:

ये संगठन, सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू), अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) और अखिल भारतीय खेत-मज़दूर यूनियन (एआईएडब्ल्यूयू) हैं। इन संगठनों ने देश के कामकाजी लोगों के विशाल बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हुए, देश के कोने-कोने में कुछ बुनियादी मुद्दों के इर्द-गिर्द आम लोगों को जुटाने के लिए दो सप्ताह का व्यापक अभियान शुरू करने का फैसला किया है, जो मुद्दे आम लोगों को परेशान कर रहे हैं। अभियान इस संदेश को फैलाने के लिए है कि लोगों को तबाही से बचाना और उन्हें इस संकट की घड़ी में राहत देना सरकार का काम है। अभियान का समापन 9 अगस्त 2021 को होगा जिसे 'भारत बचाओ दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। अभियान के अंतिम दिन, जिस दिन 1942 में ब्रिटिश खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया गया था, सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनें और किसान संगठन का महामोर्चा संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने भी इसमें शामिल होने का फैसला किया है। यह कामकाजी लोगों का सबसे बड़ा विरोध होगा, जिसमें व्यावहारिक रूप से लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए काम करने वाले सभी संगठन शामिल होंगे।

मेहनतकश लोगों की यह अभूतपूर्व एकता पिछले कुछ वर्षों में उभर कर सामने आई है, जो मोदी सरकार की खुलेआम शत्रुतापूर्ण नीतियों से पैदा हुई है, जिसने 2 करोड़ नौकरियां देने के तमाम बड़े दावों और सभी को 'अच्छे दिन' का मायावी स्वप्न दिखाने के बावजूद अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है और लाखों मेहनतकश लोगों को बर्बाद कर दिया है। 

जो महत्वपूर्ण मुद्दे इस अभियान और 'भारत बचाओ दिवस' के मूल में हैं उन्हें नीचे दिए जा रहा है।

मुद्दे क्या हैं?

तत्काल राहत: कुछ मांगें ऐसी भी उठाई जा रही हैं कि उन लोगों को तत्काल राहत दी जाए, जो महामारी के कारण अत्यधिक पीड़ित हैं खासकर गलत तरीके से लागू किए गए लॉकडाउन और प्रतिबंधों के कारण ऐसा हुआ है। वे मुद्दे इस प्रकार हैं:

• सभी आयकर भुगतान न करने वाले परिवारों को प्रति माह 7500 रुपये का नकद हस्तांतरण किया जाए।       

• महामारी की पूरी अवधि तक प्रति व्यक्ति/प्रति माह 10 किलो मुफ्त खाद्यान्न दिया जाए।

• एक निश्चित समय सीमा के भीतर सभी का नि:शुल्क टीकाकरण किया जाए। और सभी कोविड मौतों के लिए मुआवजा दिया जाए।

नकद हस्तांतरण बेहद जरूरी है क्योंकि लोगों की या तो कमाई खत्म हो गई है या आय में भारी कटौती हुई है। पिछले एक साल से बचत भी खत्म हो गई और आय बुरी तरह से रुक गई है। इसके अलावा, लाखों लोगों को कोविड के इलाज पर भारी खर्च करना पड़ा है। इस तरह के हस्तांतरण से न केवल तत्काल राहत मिलेगी, बल्कि मांग में गिरावट के कारण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। इससे अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी। इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह कॉरपोरेट वर्गों को रियायतें और कर्ज देने के बजाय अपना खजाना खोले और आम लोगों पर पैसा खर्च करना शुरू करे।

टीकाकरण इस तत्काल राहत का एक बड़ा हिस्सा है क्योंकि भारत को "दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान" घोषित किए हुए सात महीने बीत चुके हैं, फिर भी केवल 7 प्रतिशत लोगों को ही दूसरी खुराक मिली है। जब तक लोगों को कोरोनावायरस से कुछ सुरक्षा नहीं मिलती है, तब तक सामान्य आर्थिक गतिविधि असंभव है। सरकार ने वैक्सीन उत्पादन और उसके वितरण में पूरी तरह से गड़बड़ी की है। सरकार ने करीब दो महीने तक टिकाकरण के काम को निजी खिलाड़ियों को सौंप दिया था, जिसने टीकाकरण की गति में अवरोध पैदा कर दिया था। सरकार ने काबिल सार्वजनिक क्षेत्र का इस्तेमाल करने के बजाय वैक्सीन उत्पादन को निजी क्षेत्र तक ही सीमित रखा हुआ है।

नौकरियां और आय: लोगों की आय को बढ़ावा देने, उनके लिए रोजगार सुनिश्चित करने और बढ़ती कीमतों से पहले से मिल रही कम आय को नुकसान हो रहा है इसलिए कीमतों को कम करने के लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक है। इसके लिए सरकार को जो प्रमुख कदम उठाने की जरूरत है, वे इस प्रकार हैं:

• गारंटीशुदा खरीद के साथ सभी फसलों के लिए उत्पादन की कुल लागत (सी2)+50 प्रतिशत पर न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाए। 

• आवश्यक वस्तुओं के साथ पेट्रोल, डीजल, गैस, खाना पकाने के तेल आदि की कीमतों में भारी वृद्धि को रोकने के लिए सख्त और तत्काल कदम उठाए जाए।

• अधिक रोजगार पैदा किए जाए। सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की सभी रिक्तियों को तुरंत भरें। छंटनी और वेतन कटौती बंद की जाए। 

• आकस्मिक, संविदा, स्कीम मज़दूरों और असंगठित मज़दूरों सहित सभी को न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और पेंशन सुनिश्चित की जाए। 

• मनरेगा का बजट बढ़ाया जाए। शहरी रोजगार गारंटी योजना लागू की जाए। 

फिर से, इन मांगों का स्पष्ट मतलब यही है कि मोदी सरकार को किसानों और श्रमिकों (औद्योगिक और कृषि) के प्रति अपने शत्रुतापूर्ण रवैये को छोड़ देना चाहिए। 2004 में स्वामीनाथन आयोग द्वारा सिफारिश किए जाने के बाद से किसान सी2 + 50 प्रतिशत को लागू करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। मोदी सरकार ने अपने वादे को पूरा करने के बजाय, वास्तव में खरीद और एमएसपी की पूरी प्रणाली को खत्म करना शुरू कर दिया है। इसी तरह, इसने नियोक्ताओं को श्रम कानूनों का उल्लंघन करने और न्यूनतम मजदूरी को कम करने के लिए भी स्वतंत्र लगाम दे दी है। महामारी के दौरान, लाखों श्रमिकों को बिना मुआवजे या अर्जित मजदूरी न देकर नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके ऊपर, सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में भी भारी वृद्धि की है, जिससे लोगों पर एक अप्रत्यक्ष कर लगा दिया गया है। दालों, मांस और अंडे, और खाना पकाने के तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के कारण ये ऊंची कीमतें परिवारों पर दोहरी मार कर रहे हैं - पहले से ही कम हुई आय मुद्रास्फीति से और भी कम हो गई है। 

नीतिगत निर्णय: इन तात्कालिक उपायों के अलावा, मोदी सरकार को लोगों के कल्याण पर सीमित खर्च की हठधर्मिता को छोड़ने की मांग करते हुए और अर्थव्यवस्था के लगातार बढ़ते क्षेत्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने के खिलाफ़ भी मांग की जा रही है, चाहे वह घरेलू हो या विदेशी। इस संदर्भ में निम्न मांगें हैं:

• मजदूर विरोधी श्रम संहिता, जनविरोधी कृषि कानून और बिजली संशोधन विधेयक को रद्द किया जाए। 

• स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत आवंटित किया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत किया जाए। 

• सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सरकारी विभागों के निजीकरण और विनिवेश को रोकें। कठोर ईडीएसओ को वापस लें।

मज़दूर और किसान इन प्रतिगामी कानूनों के खिलाफ काफी समय से संघर्ष कर रहे हैं लेकिन मोदी सरकार इन कानूनों को लाकर निजी कॉरपोरेट क्षेत्र को अपना भौंडा समर्थन जारी रखे हुए है। सरकार द्वारा पारित श्रम-संहिताएं नियोक्ताओं/मालिकों को अपनी मर्जी से काम पर रखने और काम से निकालने, कम समय के लिए ठेके पर काम देने को संस्थागत बनाने, वेतन निर्धारण तंत्र को कमजोर करने, श्रम कानून के तंत्र को नष्ट करने और श्रमिकों को किसी भी अन्याय के खिलाफ विरोध करने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। पारित कृषि कानून बुवाई से लेकर बिक्री तक पूरे कृषि उत्पादन और व्यापार श्रृंखला का निगमीकरण करने में मदद करेंगे। बिजली अधिनियम संशोधन बिजली वितरण का निजीकरण करेगा और किसानों की सब्सिडी समाप्त करेगा।

यह भी मांग की जा रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र की अमूल्य औद्योगिक इकाइयों को निजी संस्थाओं को बेचने के अभियान को तत्काल रोका जाए। यह न केवल भारत की आत्मनिर्भरता और आर्थिक संप्रभुता को कमजोर करेगा बल्कि इससे नौकरियों का भारी नुकसान भी होगा।

जैसे-जैसे भारतीय अगले साल ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आजादी की 75वीं वर्षगांठ को मनाने की तैयारी कर रहे हैं, विडंबना इस बात की है - और जो वास्तव में चिंताजनक भी है - कि भारत का नेतृत्व एक ऐसी सरकार कर रही है जो उस स्वतंत्रता की जड़ों को काट रही है जिसके लिए हजारों लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी की थी। ऐसा नहीं है कि उन स्वतंत्रता सेनानियों के सपने पूरे हो गए हैं, लेकिन वर्तमान सरकार जो कर रही है, वह उन काले दिनों की याद दिलाती है, जब भारत बेहद गरीब लोगों का देश कहलाता था, जहां एक अत्यंत अमीर अभिजात वर्ग का शासन था। 'भारत बचाओ' अभियान इसके खिलाफ आम लोगों का एतिहासिक कदम है।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीच दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Workers, Farmers, Farm Labourers Launch Historic Campaign

Workers
farmers
Farm Labourers
unemployment
Modi government
BJP
Save India Campaign
CITU
AIKS
Save India Day

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?


बाकी खबरें

  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में न Modi magic न Yogi magic
    06 Mar 2022
    Point of View के इस एपिसोड में पत्रकार Neelu Vyas ने experts से यूपी में छठे चरण के मतदान के बाद की चुनावी स्थिति का जायज़ा लिया। जनता किसके साथ है? प्रदेश में जनता ने किन मुद्दों को ध्यान में रखते…
  • poetry
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'टीवी में भी हम जीते हैं, दुश्मन हारा...'
    06 Mar 2022
    पाकिस्तान के पेशावर में मस्जिद पर हमला, यूक्रेन में भारतीय छात्र की मौत को ध्यान में रखते हुए पढ़िये अजमल सिद्दीक़ी की यह नज़्म...
  • yogi-akhilesh
    प्रेम कुमार
    कम मतदान बीजेपी को नुक़सान : छत्तीसगढ़, झारखण्ड या राजस्थान- कैसे होंगे यूपी के नतीजे?
    06 Mar 2022
    बीते कई चुनावों में बीजेपी को इस प्रवृत्ति का सामना करना पड़ा है कि मतदान प्रतिशत घटते ही वह सत्ता से बाहर हो जाती है या फिर उसके लिए सत्ता से बाहर होने का खतरा पैदा हो जाता है।
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: धन भाग हमारे जो हमें ऐसे सरकार-जी मिले
    06 Mar 2022
    हालांकि सरकार-जी का देश को मिलना देश का सौभाग्य है पर सरकार-जी का दुर्भाग्य है कि उन्हें यह कैसा देश मिला है। देश है कि सरकार-जी के सामने मुसीबत पर मुसीबत पैदा करता रहता है।
  • 7th phase
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव आख़िरी चरण : ग़ायब हुईं सड़क, बिजली-पानी की बातें, अब डमरू बजाकर मांगे जा रहे वोट
    06 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में अब सिर्फ़ आख़िरी दौर के चुनाव होने हैं, जिसमें 9 ज़िलों की 54 सीटों पर मतदान होगा। इसमें नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी समेत अखिलेश का गढ़ आज़मगढ़ भी शामिल है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License