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राजनीति
योगी की गाय-नीति : कैसे होगा उत्थान; किसान मजबूर, अफसर परेशान
योगी सरकार के आदेश पर न्यूज़क्लिक ने एक सीनियर आईएस अधिकारी से बातचीत की। अधिकारी इस आदेश को सुनते ही हंसने लगे और कहा, “नेता अपनी नीति में फंस चुके हैं...।
अजय कुमार
05 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: AajTak

सरकार का काम होता है नीतियाँ बनाना। वैसी नीतियाँ बनाना जिनसे सबसे जरूरी परेशानियों का हल हो। इन नीतियों को जनता के बीच लागू करने का काम प्रशासक का होता है। इन दोनों के मिलने से यह उम्मीद जगती है कि सरकार वैसी राजनीति कर रही है जिससे जनता की भलाई हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में बिल्कुल उल्टा हो रहा है। योगी सरकार सत्ता की राजनीति कर रही है और हिंदुत्व का भावुक हित साधते-साधते गाय के नाम पर ऐसा प्रशासनिक ढांचा और माहौल बना दिया है, जिससे पूरा उत्तर प्रदेश परेशान हो चुका है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने आदेश जारी किया था कि गौशाला बनाने के लिए सरकार 0.5 फीसदी सेस चार्ज करेगी। इसके तुरंत बाद यह आदेश जारी किया कि  राज्य के सभी जिलाधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि आवारा पशुओं से किसानों और जनता को परेशानी न हो और 10 जनवरी तक सभी आवारा पशुओं को गौ संरक्षण केंद्र तक पहुंचा दिया जाए। आवारा पशुओं के मालिकों की भी खैर नहीं। कहा गया कि उनका पता लगाकर उनपर भी कार्रवाई की जाए। 

गौ मालिक इसलिए परेशान हैं क्योंकि राज्य की नीति गौ-पालन के खिलाफ जाती है। गौ-रक्षा की नीति भले ही हिंदुत्व की आस्था से जुड़े होने का हल्ला मचाए लेकिन हकीकत यह है कि ये विशुद्ध राजनीति है, जिसका मकसद केवल सत्ता हथियाने के लिए लोगों को भावुकता के आधार पर अपनी तरफ जुटान करते रहना है। गौ-रक्षा की नीति को इसलिए पूरी तरह खराब कहा जाना चाहिए क्योंकि यह कृषि अर्थव्यस्था से पूरी तरह से कटते जा रहे समाज के लिए यह बिलकुल असम्भव है कि वह उत्पादक गायों के साथ अनुत्पादक गायों के लिए चारे की व्यवस्था कर पाए। ऐसे में गायों के मालिक गायों को खुला और छुट्टा छोड़ने पर मजबूर हुए हैं। शहर से लेकर गाँव तक गायों की चहलकदमी मालिकों के इसी मजबूरी का बयान करती है और मजबूर गायों को आवारा पशुओं का नाम दे दिया गया है। यह आवारा गाएं खुद के चारे के लिए फसलों को चर रही हैं। फसलें बर्बाद हो रही हैं। अपनी फसलों को बचाने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहराइच, लखीमपुर खीरी से लेकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में मथुरा, मेरठ, अलीगढ और बागपत और बुंदेलखंड में उरुई, जालौन तक के किसान रात भर जगकर और दिनभर लाठी भांजकर गायों को भगाने में लगे हुए हैं। आलम ये है कि सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए किसानों ने आवारा गायों को सरकारी भवनों जैसे स्कूलों, अस्पतालों और पंचायत भवनों में बंद करना शुरू कर दिया है। किसानों का कहना है कि गायों की वजह से फसलों की तो तो बर्बादी हो ही रही है, साथ में हमारे आपसी झगड़े भी बढ़ते जा रहे हैं। आवारा पशुओं को सरकारी भवनों में बंद करना हमारी मजबूरी हो गयी है ताकि सरकार अपनी नीतिगत गलतियों की तरफ ध्यान दे। ऐसे में आलाकमान से आदेश आता है और पुलिसवाले आकर सरकारी भवनों से गायों को बाहर निकालते हैं। पुलिसवालों से शिकायत करने पर उनका जवाब होता है कि जैसे पहले हो रहा था वैसे ही सब चलता रहे। ऐसे में पुलिसवालों और हमारे बीच भी झड़पें बढ़ी हैं। 

योगी सरकार के आदेश पर न्यूज़क्लिक ने एक सीनियर आईएस अधिकारी से बातचीत की। अधिकारी इस आदेश को सुनते ही हंसने लगे और कहा, “नेता अपनी नीति में फंस चुके हैं। वैधानिक तौर पर इस आदेश में कोई गलती नहीं है। छुट्टा गायें पब्लिक गुड्स हैं और राज्य की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उनका संरक्षण करे। साथ में यह बात भी सही है कि मालिक को ये अधिकार नहीं है कि वह गायों को अनाथ छोड़ दे, उसकी जिम्मेदारी यह बनती है कि वह उसे गौशाला में पहुंचा दे। लेकिन व्यवहारिक रूप से इसे लागू करना बहुत मुश्किल है। हम जानते हैं कि हमारी गौशालाओं की क्षमता इतनी नहीं हैं, जितनी आवारा गायें हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस समय पूरे उत्तर प्रदेश में तकरीबन डेढ़ करोड़ आवारा गायें घूम रही हैं। इस नियम को पालन करने में जितनी सख्ती की जायेगी उतनी ही पुलिस और आम जनता के बीच झड़पें बढेंगी। इसकी असल वजह यह है गौकशी पर प्रतिबन्ध हैं। अगर यह प्रतिबन्ध नहीं हटता है तो यह आवारा गायों की परेशानी विकराल रूप लेने की तरफ बढ़ रही है। अभी तक केवल गौरक्षकों की हिंसा की बात सुनी जा रही थी अब आम जनता के बीच आपसी झगड़ें भी बढ़ाने वाली है। प्रशासन इस मसले पर पहले से ही परेशान था, अब परेशानी और अधिक बढ़ने वाली है। हमारे यहाँ गायों की खरीद बिक्री किसी कागजी कार्रवाई के बाद नहीं होती है कि यह तय किया जा सके कि कौन किस गाय का मालिक है।” 

अब उत्तर प्रदेश में गौशालाओं पर बात करते हैं। उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग के तहत राज्य में तकरीबन 495 रजिस्टर्ड गौशालाएं हैं। हर गौशाला में इनकी क्षमता से ज्यादा गायों की संख्या बढ़ती जा रही है। अलीगढ़ के टप्पल गाँव की गौशाला में इस साल के मार्च महीने में 400 गायें थी। इस समय यह बढ़कर 2000 हो गयीं है। यह स्थिति हर गौशाला की है। हर गौशाला में क्षमता से अधिक गायों को रखा जा रहा है। तमाम गौशालाओं से देखभाल की कमी से गायों के मरने की भी ख़बरें आती रही हैं। मेरठ की गोपाल गौशाला में इस समय तकरीबन 800 गायें हैं, जिनमें से 100 गायों से दूध मिलता है। हर दिन इस गौशाला पर तकरीबन 40 हजार खर्च करना पड़ता है। इस तरह से इस गौशाला में हर साल तकरीबन डेढ़ करोड़ खर्च होता है। लेकिन इस गौशाला से सलाना केवल 1.3 करोड़ की कमाई होती है। इससे भी बदतर हालत टप्पल की गौशाला की है। जहां तकरीबन 2000 गायें रहती हैं, जिनमें से केवल 10 गायों से दूध मिलता है। सलाना तकरीबन डेढ़ करोड़ खर्च करना पड़ता है और कमाई के नाम पर एक रुपया भी नहीं मिलता है। गौशाला से पैदा होने वाले अपशिष्ट पदार्थों जैसे की गौमूत्र और गौ-गोबर आदि के जरिये तकरीबन लाख-दो लाख की कमाई हो जाती है। ऐसी हालत में उत्तर प्रदेश में गौकशी प्रतिबन्ध से ऐसा माहौल बना देना जिसमें गौ मालिक गायों को खुला छोड़ने पर मजबूर हुए हैं, हालत को और अधिक गंभीर करती है. सरकार को अगर यह लगता है कि 0.5 फीसदी सेस लगाने से यह मसला सुलझ जाएगा तो यह सरकार की नादानी है। हो सकता है तात्कालिक तौर पर कुछ राहत मिले लेकिन आगे का क्या? टैक्स से उगाहे गए पैसे का सामान्य सिद्धांत यह होता है कि पैसा उन समस्याओं के हल करने में खर्च किया जाए जो सार्वभौमिक प्रकृति के हो यानी ऐसी जगहों पर खर्च हो जिनका जुड़ाव सबसे हो। जैसे सड़क, बिजली, पानी आदि। लेकिन यहाँ तो सेस लगाया जा रहा है यानी टैक्स के ऊपर टैक्स। वह भी ऐसी समस्या के लिए जो सरकार की गलत नीतियों से जन्मी है। ऐसी जीवनशैली से जन्मी है जिसका जुड़ाव हमारे मौजूदा जीवनशैली से बिल्कुल नहीं है। स्मार्ट सिटिज, औद्योगिकरण, बुलेट ट्रेन, डिजिटल इंडिया का सपना देखने वाला हिंदुस्तान सेस लगाकर गायों को बचा पायेगा, यह नामुमकिन लगता है।

इसे भी पढ़ें : किसानों की सुनों : गाय पालना और संभालना बनता जा रहा है एक समस्या

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