NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा भी बोगस निकला, आप फिर उल्लू बने
इसकी इस वक्त न ज़रूरत है और न ही यह अनिवार्य है। यह राय भारत के क़ानून आयोग कीI
रवीश कुमार
03 Sep 2018
रवीश कुमार

यूनिफॉर्म सिविल कोड की इस वक्त न ज़रूरत है और न ही यह अनिवार्य है। यह राय भारत के क़ानून आयोग की है। पिछले शुक्रवार को कानून आयोग ने परिवार कानून सुधार पर अपनी तरफ़ से एक चर्चा-पत्र जारी किया है। आयोग का पक्ष है कि समुदायों के बीच समानता की जगह समुदायों के भीतर स्त्री और पुरुष के बीच समानता होनी चाहिए। सती प्रथा, देवदासी, तीन तलान और बाल विवाह ये सब सामाजिक बुराइयां हैं और मानव अधिकारों के ख़िलाफ़ हैं। धर्म के लिए अनिवार्य भी नहीं हैं। आयोग ने पर्सनल लॉ और सेकुलर कानून में कई प्रकार के सुधार सुझाए हैं। जैसे भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 की कुछ धाराओं के अनुसार पारसी औरतों को कम अधिकार मिले हैं। आयोग ने सुझाव दिया है कि पारसी औरतें जब समुदाय से बाहर शादी करें तो उन्हें पारसी पहचान रखने का अधिकार मिले और उनके बच्चों को मां के पारसी धर्म चुनने का अधिकार मिले। आयोग ने हिन्दू अविभाजित परिवार कानून को ख़त्म करने का सुझाव दिया है जिसके सहारे टैक्स चोरी का काम होता है।

कुल मिलाकर एक देश एक चुनाव के साथ एक देश एक कानून का यह ड्रामा भी यहां समाप्त होता है। ऐसे काल्पनिक विषयों का एक ही मतलब होता है, मूल समस्या से ध्यान हटाकर किसी ऐसी चीज़ पर ध्यान टिका देना जो सभी समस्याओं की बुनियाद नज़र आने लगे। यूनिफार्म सिविल कोड के नाम पर चैनलों और अखबारों में कितनी बहस चलाई गई और मुसलमानों के प्रति नफ़रत का वट वृक्ष खड़ा किया जाता रहा। इस डिबेट में पहले भी कुछ नहीं था, अब भी कुछ नहीं है,मगर इसके ज़रिए कम पढ़ने वाले और तर्कों तथ्यों को कम समझने वालों के दिमाग़ में यह बात रोप दी गई कि मुसलमानों को विशेष कानून संरक्षण हासिल है। यूनिवर्सिटी से निकल कर कई कई साल तक कुछ नहीं पढ़ने वाले भी यूनिफार्म सिविल कोड के नाम पर ऐसे विद्वान होकर कूद पड़ते हैं जैसे सब जानते हों।

जब यह बहस तीन तलाक के साथ साथ चल रही थी तब फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बार बार कहा था कि यह बेतुका है। इसे एक साथ किया ही नहीं जा सकता है। बारी बारी से सबमें सुधार की ज़रूरत है लेकिन आप देश की विविधता को समाप्त कर सब पर एक समान पर्सनल कानून नहीं थोप सकते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि जिनके पर्सनल लॉ हैं उनके भीतर सुधार किए जाएं। तब फ़ैज़ान मुस्तफ़ा को जाने क्या क्या कहा गया। अब कानून आयोग ने अपना टाइम और जनता का पैसा बर्बाद करने के बाद यही कहा है। इसे आयोग तक पहुंचा कर मान्यता दी गई ताकि प्रेस को मौका मिले बहस का। नतीजा क्या हुआ। इस बहस के बहाने दर्शकों को सांप्रदायिक बनाने की फैक्ट्री खोली गई, चलाई गई। टीवी पर तर्क की ज़रूरत तो होती नहीं है। एंकर को पता होता नहीं है। बस सत्ता के आका का आदेश है तो टुकड़े उठाकर दौड़ जाना है।

पहले चुनाव आयोग ने कहा कि एक देश एक चुनाव नहीं हो सकता है। इस बार तो नहीं हो सकता तो जो पांच साल में नहीं हो सकता उस पर पांच साल बहस क्यों हुई? कानून आयोग ने भी कह दिया कि यूनिफार्म सिविल कोड की न ज़रूरत है न अनिवार्य है। दो मुद्दों का यह हाल हुआ मगर इन्हें ज़िंदा रखने के लिए बयान दिलवा कर, सेमिनार कर वैधता दी गई ताकि लगे कि वाकई कुछ होने वाला है। देश की समस्या का मूल समाप्त होने वाला है।

तो इस तरह भारत के युवाओं आप फिर उल्लू बने। कहां तो आपकी नौकरी पर, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहस होनी चाहिए था मगर एजेंडा था कि आप यह सब छोड़ कर हिन्दू-मुस्लिम करें। अंग्रेज़ी हुकूमत जो डिज़ाइन छोड़ गई थी, उस डिज़ाइन को साकार करने के लिए संस्थाएं लगी हैं। आखिर आप कब तक और कहां तक हिन्दू-मुस्लिम करेंगे। क्या नौकरियों के लिए लाठी खाते हुए भी हिन्दू मुस्लिम करेंगे। इसका क्या करेंगे जो आपको फर्ज़ी बहस में उलझा कर उल्लू बनाया गया? क्या आप अपने उन महीनों को लौटा सकेंगे, भारत को बर्बाद करने के लिए गढ़े गए बहस के मुद्दों पर जो समय ख़र्च हुआ है, क्या उसे लौटा सकेंगे? वो सब छोड़िए, आपके ज़हन में जो ज़हर भरा गया है, उसी से बाहर आने में ज़माना बीत जाएगा। आप सांप्रदायिक बना दिए गए हैं, उसे राष्ट्रवाद का नाम दिया गया है, ताकि आपको लगे कि देश के निर्माण में कोई योगदान और बलिदान दे रहे हैं। याद रखना युवा दोस्तों, बोतल का लेबल बदल देने से ज़हर नहीं बदल जाता है।

आप इस ज़हर के असर में थे, आपको यही अच्छा लगता है, इसके नाम पर न्यूज़ चैनलों को प्रोपेगैंडा का अड्डा बना दिया गया। आप तरसते रहे कि आपकी पीठ पर पड़ी लाठी, कैंसिल हुई परीक्षा की एक झलक कोई दिखा दे, बढ़ी हुई फीस की कोई बात कर दे, ग़ायब होती नौकरी पर चर्चा हो जाए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब इस ज़हर से बाहर आना इतना आसान नहीं है। आप राजनीति का विकल्क क्या ख़ाक ढूंढेंगे, पहले आप अपना विकल्प खोज लें। आप अपने भीतर भरे गए नफ़रत का विकल्प मोहब्बत खोज लें। उतना ही बहुत होगा। नहीं होगा तो एक काम कीजिए। एक टी शर्ट पर पर लिख लीजिए। सपनों से भरी हमारी जवानी की हर शाख पर उसने उल्लू कब बिठा दिया? हमको उल्लू कब बना दिया?

नोट- आई टी सेल के लोग चाहें जितनी गाली दे लें, उन्हें पता है कि बात सही है। दिक्कत उनकी इस बात से है कि ये बात इतनी सही क्यों है। वो अब झूठ से बग़ावत नहीं कर सकते हैं। नोटबंदी में जिस तरह से उल्लू बने हैं उसी शर्म को नहीं मिटा पाएंगे ये आई टी सेल वाले। आपकी गालियां आपको मुबारक।

रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से साभार I

uniform civil code
यूनिफार्म सिविल कोड
आरएसएस
महिला समानता

Related Stories

बिहार: नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने समान नागरिक संहिता का किया विरोध

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता चाहता है, इसका क्या मतलब है?

2024 में बढ़त हासिल करने के लिए अखिलेश यादव को खड़ा करना होगा ओबीसी आंदोलन

गोवा का यूनिफॉर्म सिविल कोड न्याय से उतना ही दूर है जितना न्याय से दूर भाजपा का दौर है!

इस्लाम में लैंगिक समता और समान नागरिक संहिता

जीतने वाले के पास विकल्प होता है, लेकिन हारने वाला होता है मजबूर

लोकतंत्र सोशल मीडिया की कठपुतली बन सकता है

बढ़ते हुए वैश्विक संप्रदायवाद का मुकाबला ज़रुरी

एमरजेंसी काल: लामबंदी की जगह हथियार डाल दिये आरएसएस ने

हामिद अंसारी, जिन्ना की तस्वीर और एएमयू में हंगामा


बाकी खबरें

  • एम. के. भद्रकुमार
    डोनबास में हार के बाद अमेरिकी कहानी ज़िंदा नहीं रहेगी 
    26 Apr 2022
    ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने शुक्रवार को नई दिल्ली में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस को बेहद अहम बताया है।
  • दमयन्ती धर
    गुजरात : विधायक जिग्नेश मेवानी की गिरफ़्तारी का पूरे राज्य में विरोध
    26 Apr 2022
    2016 में ऊना की घटना का विरोध करने के लिए गुजरात के दलित सड़क पर आ गए थे। ऐसा ही कुछ इस बार हो सकता है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पिछले 5 साल में भारत में 2 करोड़ महिलाएं नौकरियों से हुईं अलग- रिपोर्ट
    26 Apr 2022
    क़ानूनी कामकाजी उम्र के 50% से भी अधिक भारतवासी मनमाफिक रोजगार के अभाव के चलते नौकरी नहीं करना चाहते हैं: सीएमआईई 
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य सरकारें अलर्ट 
    26 Apr 2022
    देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,483 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 30 लाख 62 हज़ार 569 हो गयी है।
  • श्रिया सिंह
    कौन हैं गोटाबाया राजपक्षे, जिसने पूरे श्रीलंका को सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया है
    26 Apr 2022
    सैनिक से नेता बने गोटाबाया राजपक्षे की मौजूदा सरकार इसलिए ज़बरदस्त आलोचना की ज़द में है, क्योंकि देश का आर्थिक संकट अब मानवीय संकट का रूप लेने लगा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License