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यूपी बजट विश्लेषण : जनता से जुड़ी योजनाओं के खर्च में कटौती, सरकार चलाने के लिए ज़्यादा आवंटन
उत्तर प्रदेश में जहां और ज्यादा खर्चा बढ़ाये जाने की जरूरत है वही सरकार खर्चा कम करके बचत पर जोर दे रही है। और इस बचत का अधिकांश भाग सामाजिक क्षेत्रों और योजनाओं के खर्चे में कटौती करके हासिल किया जा रहा है, जिससे सीधे तौर पर जनता प्रभावित हो रही है।
पीयूष शर्मा
11 Feb 2019
up budget

उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा की योगी के नेतृत्व वाली सरकार आई है तब से 87577 करोड़ रुपये के राजस्व बचत की है लेकिन इसपर कोई खुश होने की ज़रूरत नहीं है, इसका असल मतलब है कि जनता से कर व स्रोतों से ज्यादा पैसा लिया गया परन्तु उसको जनता के लिए खर्च नहीं किया गया। उत्तर प्रदेश में जहां और ज्यादा खर्चा बढ़ाये जाने की जरूरत है वही सरकार खर्चा कम करके बचत पर जोर दे रही है। और इस बचत का अधिकांश भाग सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के खर्चे में कटौती करके हासिल किया जा रहा है, जिससे सीधे तौर पर जनता प्रभावित हो रही है।

इस वर्ष का वार्षिक वित्तीय विवरण बताता है कि उत्तर प्रदेश 2006-07 से लगातार राजस्व बचत में है यानी 2006-07 से आज तक प्रदेश सरकार ने 1 लाख 87 हजार से अधिक के खर्चो में कटौती की है जिसका साफ़ परिणाम हमारे सामने दिखाई देता है, लगभग सभी विभागों में पद रिक्त हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य और दूसरी बुनयादी सेवाएँ खस्ताहाल में हैं।

up budget1.jpg

स्रोत: बजट दस्तावेज, बजट विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार

इस वर्ष 2019-20 के बजट में योगी सरकार का अनुमान है कि 2022-23 तक 3 वर्षों में करीब 1 लाख 60 हजार करोड़ रुपये की बचत करेगी अगर दूसरे शब्दों में कहें तो प्रदेश में सरकार 1 लाख 60 हजार करोड़ के खर्चों में कटौती करेगी। अभी तक सबसे ज्यादा राजस्व बचत यानी खर्चों में कटौती योगी नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा की गयी है।

सामाजिक व आर्थिक सेवाओं से योगी सरकार ने मुहँ मोड़ा

राज्य अपना खर्चा तीन महत्वपूर्ण केटेगरी; सामान्य, सामाजिक व आर्थिक सेवाएँ में करते हैं। सामान्य सेवाओं में प्रशासन को चलाने का खर्चा शामिल होता है, व सामाजिक सेवाओं में सामाजिक विकास पर होने वाला खर्चा शामिल होता जिसमें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जाता है ताकि जनता प्रदेश की अर्थव्यवस्था के विकास में अपना सहयोग दे सके। इसके साथ आर्थिक सेवाओं में जनता के लिए आय बढ़ाने वाली आर्थिक गतिविधियों के प्रोत्साहन व बढ़ावा देने के लिए खर्च किया जाता है। इस प्रकार सामाजिक व आर्थिक सेवाओं पर वर्ष दर वर्ष खर्चा बढ़ाए जाने की जरूरत है परन्तु उतर प्रदेश सरकार इसके उलट सामाजिक व आर्थिक सेवाओं पर खर्चा कम रही हैं।

up budget2.jpg स्रोत : वार्षिक वित्तीय विवरण 2019-20, बजट विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार

योगी सरकार  के गठन से पहले वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रदेश में सामाजिक व आर्थिक सेवाओं पर सेवाओं क्रमश: 34.8 व 27.1 प्रतिशत कुल बजट के सापेक्ष खर्च हो रहा था जो वित्त वर्ष 2019-20 के बजट में घटकर 31.5 व 25.2 प्रतिशत हो गया है। लेकिन सरकार को चलाने के लिए प्रशासन आदि परखर्च 2016-17 से 28.7 प्रतिशत से बढ़ाते हुए 2019-20 के बजट अनुमान में 32.3 फ़ीसदी कर दिया है। सरकार का यह रवैया विकास विरोधी है क्योंकिसामाजिक व आर्थिक सेवाओं पर खर्च में कटौती होने से प्रदेश में मानव संसाधन का विकास नहीं हो पायेगा और भविष्य में प्रदेश की आय भी घटेगी और इतना ही नहीं आर्थिक सेवाओं में कटौती होने से प्रदेश में वस्तु व सेवाओं की पूर्ति में कमी आएगी जिसके कारण वस्तु व सेवाओं के दाम बढ़ेंगे और जिसका सीधा प्रभाव जनता पर पड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि योगी सरकार प्रशासन चलाने के नाम पर खर्च कम करे और सामाजिक व आर्थिक सेवाओं पर आवंटन बढ़ाए।  

जनसरोकार से जुड़े सेक्टर/क्षेत्रों पर बजट में कटौती

2019-20 के बजट का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सरकार ने जनसरोकारों से जुड़े क्षेत्रों में भारी कटौती लगातार जारी है, सरकार हमारे सामने केवल संख्यात्मक वृद्धि पेश करती है तथा यह वृद्धि विभाग व क्षेत्र विशेष की वर्तमान जरूरतों एवं स्थिति को ध्यान में रख कर नहीं की गई है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) व कुल बजटीय आवंटन के सापेक्ष विभाग वार खर्च का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि बुनियादी जरूरतों के प्रति सरकार की प्राथमिकता क्या है। सरकार राजस्व बचत के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से जनता से जुड़े क्षेत्रों के खर्चों में कटौती कर रही है।

अधिकांश क्षेत्रों के बजट आवंटन में कटौती की गयी है या पहले जितना खर्च किया जा रहा है। राज्य में 2018-19 के बजट में शिक्षा पर कुल बजट का 14.7 फ़ीसदी खर्च का अनुमान था जो इस वर्ष के बजट में घटकर 14.3 फ़ीसदी हो गया है। इसके साथ ही शिक्षा 2018-19 के बजट अनुमान में किये गये वादे के विपरीत इसी 2018-19 के पुनरीक्षित अनुमान के आंकड़े बताते हैं कि प्राथमिक शिक्षा पर 537 करोड़ व माध्यमिक शिक्षा पर 94 करोड़ कम खर्च कर रही है और उच्च शिक्षा पर 951 करोड़ ज्यादा खर्च कर रही है, पर वहीं इस 2019-20 के बजट में 2018-19 के पुनरीक्षित अनुमान के मुकाबले 862 करोड़ रूपये की कटौती की है। शिक्षा में प्रदेश पहले से ही पिछड़ा हुआ है, बड़े स्तर पर पद रिक्त पड़े हुए है, कालेजों और विश्वविद्यालयों के पास लैब, पुस्तकालयों और दूसरे संसाधनों की कमी है। ‘असर’ की रिपोर्ट बताती है कि कक्षा आठ के करीब आधे बच्चे आसान सा गणित का सवाल नहीं कर सकते हैं। ऐसे में अगर सरकार बजट बढ़ाने की बजाय कम करेगी तो यह जनता के साथ बहुत बड़ा छलावा है।

इस साल के बजट में चिकित्सा के लिए मामूली बढ़ोतरी हुई है परन्तु पिछले साल 2018-19 के बजट आवंटन और पुनरीक्षित अनुमान का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि योगी सरकार ने अपने वादे के विपरीत 913 करोड़ रुपये की कटौती की है और इसमें सबसे ज्यादा एलोपथी में 364 करोड़ व परिवार कल्याण में 406 करोड़ रुपयों से अधिक की कटौती की है। जहाँ प्रदेश में सरकारी अस्पताल एवं चिकित्सा सुविधाएँ बदहाल स्थिति में हैं ऐसे में कम बजट या कटौती कैसे समस्या का समाधान कर पाएंगे इस अर्थशास्त्र को तो योगी जी ही समझा सकते हैं।

यही स्थिति दूसरे क्षेत्रों के बजट में भी है जिसका विवरण हम सारणी में देख सकते हैं।

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स्रोत : बजट 2019-20, बजट विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार

प्रदेश के ग्रामीण विकास में सरकार का नकारत्मक रवैया

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास के प्रति सरकारों का रवैया नकारात्मक ही रहा है जिसके परिणाम स्वरूप प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जरूरी घटक जिसमें किसान, पशुधन व कुटीर उद्योग आदि खस्ताहाल है।

2019-20 के बजट के आंकड़े बताते हैं कि हथकरघा उद्योग जो कि कृषि क्षेत्र के बाद सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराने वाला प्रदूषण रहित विकेंद्रीकृत कुटीर उद्योग है, यह उद्योग अपनी परंपरागत कलात्मकता एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। परन्तु हथकरघा क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता में नहीं है, एक तो पहले से ही बजट काफी कम था वहीं इस साल बजट आवंटन 249 करोड़ रुपये कर दिया है जो कि 2017-18 के वास्तविक खर्चों में 358 करोड़ रुपये था।

इसी प्रकार कृषि क्षेत्र जो प्रदेश के ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है उसमे भी इस साल के बजट में भारी कटौती की गयी हैं, पिछले साल के पुनरीक्षित अनुमान से 2226 करोड़ रुपये की कटौती की गयी है। 2017-18 में सरकार ने माना था की किसान बड़े आर्थिक बोझ में है जिसके लिए प्रदेश सरकार ऋणमाफ़ी योजना लेकर आई थी जिसके कारण 2017-18 में सरकार ने 24275 करोड़ रुपये खर्च किये थे, परन्तु इस साल के बजट में सरकार ने 2017-18 के बजट का आधे से भी कम खर्च का अनुमान दिया है जबकि किसान अभी भी आर्थिक बोझ में है ऋणमाफ़ी भी बहुत कारगर साबित नहीं हुई है और पूरा कृषि क्षेत्र बड़े स्तर पर संसाधनों के आभाव में है। यह जरूरी है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सरकार कृषि एवं उससे जुड़े क्षेत्रों के लिए बजट बढ़ाएं|

उत्तर प्रदेश, देश में पशुधन के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्य रहा है। केंद्र व राज्य में भाजपा की सरकार आने से पशुधन व गोवंश की समस्याओं के कारण ग्रामीण व्यवस्था पूरी तरह लड़खड़ा गयी है। इस बात को सरकार भी कहीं न कहीं मान रही है जिसके फलस्वरूप 2019-20 के बजट में छुट्टा गोवंश व गौशाला के लिए करीब 600 करोड़ रुपयों क प्रावधान किया है परन्तु यह राशि नाकाफी है। हाल ही में न्यूज़क्लिक के द्वारा किये गये अध्ययन में सामने आया है कि प्रदेश में करीब 43 लाख अनुपयोगी गोवंश है जो किसानों व आम जनता के लिए सरदर्द बने हुए है तथा इनके लिए 19 हजार करोड़ रुपयों से अधिक खर्च करने की जरूरत है। इसलिए यह कहना कोई गलत नहीं होगा कि भाजपा द्वारा केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए गाय का सहारा लिया और अब उसको ऐसे ही बेसहारा छोड़ा हुआ है। अगर यही हालात रहे थे जल्दी ही प्रदेश में छुट्टा गोवंश एक विकराल समस्या का रूप ले लेंगे।

प्रदेश की भाजपा सरकार ने आर्थिक दृष्टिकोण से राज्य के लिए उदासीन रवैया अपनाया हुआ है। सरकार का सारा ध्यान घाटे में कमी के लक्ष्यों को पूरा करने में है जिसके लिए वह आय न बढ़ाकर लगातार खर्चों में कटौती करके पूरा कर रही है। राज्य सरकार को ध्यान रखना चाहिए की प्रदेश का लाभ सीधा जनता से जुड़ा है। यह जरूरी है कि प्रदेश का मानव संसाधन बेहतरी की तरफ बढ़े चाहे। सरकार यह भूल रही है कि प्रदेश सरकार कोई दुकान या कंपनीनहीं है कि जिसको लाभ के लिए चलाया जाए।

 

 

 

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