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हरियाणा में आशा कार्यकर्ताओं ने निगरानी रखे जाने के डर से सरकार के ट्रैकिंग ऐप को नकारा
हाल के दिनों में आशा कार्यकर्ताओं को अपने दैनिक लक्ष्यों को अपडेट करने के लिए एमडीएम 360 शील्ड नामक एप्लीकेशन को डाउनलोड करने के लिए कहा गया था। यह एप्लीकेशन संबंधित अधिकारियों को कार्यकर्ताओं की लोकेशन को भी ट्रैक करने की अनुमति देता है।
सागरिका किस्सू
17 Jun 2021
हरियाणा में आशा कार्यकर्ताओं ने निगरानी रखे जाने के डर से सरकार के ट्रैकिंग ऐप को नकारा
प्रतीकात्मक तस्वीर। चित्र साभार: टाइम्स ऑफ़ इंडिया

हरियाणा में करीब 22,000 आशा कर्मियों ने गोपनीयता भंग होने की चिंताओं को देखते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के द्वारा पेश किये गए एप्लीकेशन को संचालित करने से इंकार कर दिया है। आशा कर्मियों को हाल ही में अपने दैनिक लक्ष्यों को अपडेट करने के लिए एमडीएम 360 शील्ड नामक एप्लीकेशन को डाउनलोड करने के लिए कहा गया था। यह एप्लीकेशन संबंधित अधिकारियों को आशा कर्मियों की लोकेशन को भी ट्रैक करने की अनुमति देता है।

लगातार विरोध के बाद, आशा कर्मियों को जिनसे ऑनलाइन काम करने के लिए कहा गया था, को अधिक कुशलतापूर्वक कार्य करने में मदद करने के लिए स्मार्टफोन दिए गए थे। इन कार्यकर्ताओं द्वारा स्मार्टफोन का इस्तेमाल गाँव में कोविड-19 से संक्रमित लोगों के आंकड़ों को अपडेट करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिससे प्रशासन को रोगियों पर नजर बनाये रखने में मदद मिलती है।

आशा कर्मियों ने एप्लीकेशन के “अनिवार्य” डाउनलोड किये जाने को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। आशा कर्मियों के मुताबिक, जिला और प्रखंड स्तर के आशा समन्वयकर्ताओं ने उनके फोन में एक एप्लीकेशन डाउनलोड किया था। उनका कहना था कि समन्यवयकों ने उनके साथ इसका पासकोड तक साझा नहीं किया था। इसके साथ ही उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है कि यह एप्लीकेशन उन लोगों को पहले से कहीं अधिक “जांच और उत्पीड़न” के लिए उजागर करता है।

आशा वर्कर्स यूनियन की महासचिव और सीटू हरियाणा की प्रदेश अध्यक्ष सुरेखा के अनुसार, इस एप्लीकेशन का उद्देश्य “निगरानी” बनाये रखने के लिए है।

उनका कहना था “यह एप्लीकेशन जाँच और शोषण का मार्ग प्रशस्त करता है। हमारे समन्यवक, जो ज्यादातर पुरुष हैं, हमारी लोकेशन को ट्रैक कर सकते हैं और वस्तुतः हमारे फोन की जानकारी को भी हासिल कर सकते हैं। उनके पास हमारे डेटा, तस्वीरों और अन्य जानकारियों तक पहुँच बना पाना पूरी तरह से संभव है। क्या यह भयावह नहीं है?”

कार्यकर्ताओं का कहना था कि हाल के दिनों में उत्पीड़न की कई घटनाएं प्रकाश में आई हैं और एप्लीकेशन से उनकी चिंता और बढ़ सकती हैं। सुरेखा के अनुसार “आशा कर्मियों को तब भी धमकाया और परेशान किया जाता था जब वे बगैर फोन के काम किया करती थीं। अब जबकि समन्वयक सीधे तौर पर हमारे फोन को संभाल रहे हैं, तो ऐसे इस बात की संभावना है कि कुछ विवादास्पद चीजें हमारे फोन में डाली जा सकती हैं, और हमें ब्लैकमेल किया जा सकता है।”

हरियाणा में सभी 22 जिलों की आशा कार्यकर्ताओं ने सर्वसम्मति से विरोध के प्रतीक के तौर पर अपने-अपने फोन विभाग को सुपुर्द करने का फैसला किया है। एक आशा कर्मी का कहना था “निजता का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है और हम किसी को भी इसका हनन नहीं करने दे सकते। यदि इस एप्लीकेशन को नहीं हटाया जाता है, तो हम सभी अपने स्मार्टफोन को वापस सौंपने के लिए तैयार हैं।” 

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की आपूर्ति के मामले में आशा कार्यकर्त्ता रीढ़ की हड्डी के समान हैं। कोविड-19 के दौरान आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर सर्वेक्षण करने का काम किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद उनकी मांगों को अनसुना किया जा रहा है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें नियमित रूप से मास्क और सेनेटाईज़र उपलब्ध नहीं कराये जा रहे हैं, जो कि उनके द्वारा किये जा रहे काम के अनिवार्य हिस्से के तौर पर हैं।

एक ऐसे समय में जब लोगों को कोरोनावायरस से बचने के लिए डबल-मास्क लगाने के लिए कहा जा रहा है, संक्रमित रोगियों के सीधे संपर्क में आने वाली आशा कर्मियों को नियमित रूप से सिंगल मास्क तक भी नियमित तौर पर उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। 

सुरेखा ने कहा “सिर्फ दो से चार सर्जिकल मास्क के साथ पूरे महीने भर काम करना असंभव है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसी) में सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। हमें सर्जिकल मास्क के साथ कम से कम दोबारा इस्तेमाल किये जा सकने वाले मास्क को उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

फ्रंटलाइन पर रहकर काम करने के बावजूद आशा कर्मियों को स्वास्थ्य कर्मियों के तौर पर मान्यता नहीं दी जा रही है। आशा कार्यकर्ताओं को ग्रामीण टीकाकरण केन्द्रों पर भी तैनात किया गया है, ताकि प्रकिया को सुचारू रूप से संचालित करने को सुनिश्चित किया जा सके। इसके अतिरिक्त, कार्यकर्ताओं द्वारा टीकाकरण की महत्ता के बारे में जागरूकता पैदा की जा रही है। 

एक अन्य कार्यकर्त्ता ने बताया कि “कई आशा कार्यकर्ताओं के पास पहचान पत्र तक नहीं हैं और इसके चलते उन्हें सर्वेक्षण कार्य में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हम कार्यकर्ताओं को आईडी कार्ड मुहैय्या कराये जाने पर जोर दे रहे हैं, ताकि वे अपने काम को ज्यादा बेहतर ढंग से संपन्न कर सकें।”

हाल ही में, न्यूज़क्लिक ने उन दस आशा कार्यकर्ताओं के परिवारों के बारे में रिपोर्ट की थी जिनकी हरियाणा में कोरोनावायरस की चपेट में आने से मौत हो गई थी, और उन्हें केंद्र सरकार की बीमा योजना से कोई पैसा नहीं मिला था। मौतों की संख्या इस बीच बढ़ी है, इसके बावजूद परिवारों को सरकार की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिला है।

आशा वर्कर्स यूनियन, हरियाणा ने कहा है “हम मांग करते हैं कि जिन आशा कर्मियों की मौत कोविड-19 के कारण हुई है, उनके परिवारों को केंद्र सरकार की ओर से 50 लाख और हरियाणा सरकार से 10 लाख रूपये का बीमा दिया जाये।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

ASHA Workers in Haryana Reject Govt. Tracking App over Surveillance Fears

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