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कृषि क़ानून और खाद्य सुरक्षा 
एमएसपी, सरकारी खरीद तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अब तक चली आई व्यवस्था, निहितार्थ: पर्याप्त घरेलू खाद्यान्न उत्पादन सुनिश्चित करती आई है। लेकिन मोदी सरकार ठीक इसी व्यवस्था को ध्वस्त करने में लगी हुई है। इसे हर हाल में रोकना ही होगा।
प्रभात पटनायक
23 Mar 2021
कृषि क़ानून और खाद्य सुरक्षा 

मोदी सरकार ने जो तीन कृषि कानून हड़बड़ी में संसद से पारित करवाए हैं, वे किसान उत्पादकों को सीधे कॉर्पोरेट खरीदारों का सामना करने के लिए छोड़ देते हैं, और तो और उनके बीच राज्य का कोई हस्तक्षेप ही नहीं रहेगा।

सरकार का दावा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था के रूप में उसका हस्तक्षेप तो फिर भी बना रहेगा। लेकिन, यह मानने वाली बात नहीं है। अगर एमएसपी की व्यवस्था वाकई बनी रहने जा रही है, तो इसका कानून में ही प्रावधान करने में क्या दिक्कत है? इसके अलावा, एमएसपी की व्यवस्था के लिए, सरकारी एजेंटों की निगरानी की जरूरत होती है, जैसे मंडियों में तैनात सरकारी एजेंट। अगर मंडियों की ही प्रमुखता खत्म हो जाएगी, जिसकी कि कल्पना ये कानून करते हैं, तब तो एमएसपी की व्यवस्था ही बेमानी हो जाएगी।

इस परिवर्तन का एक नतीजा तो वही होगा, जिस पर काफी चर्चा भी हुई है, कि इसके चलते किसानों को बहुत ताकतवर, निजी एकाधिकारी खरीदारों के रहमो-करम पर छोड़ दिया जाएगा और वह भी ऐसे मालों के मामले में, जिनकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आते हैं। इसका नतीजा यह होगा कि ज्यादा मांग के सालों में कीमतें बढऩे का लाभ तो उत्पादकों को नहीं मिल रहा होगा लेकिन, कम मांग के सालों में जब आपूर्ति फालतू होगी, दाम में गिरावट का बोझ उत्पादकों के सिर पर डाल दिया जाएगा और यह किसानों को कर्ज तथा बदहाली की खाई में धकेल देगा। याद रहे कि एसएसपी की व्यवस्था दाम में ऐसी गिरावट से ही किसानों को सुरक्षा मुहैया कराती है और अब  इसी सुरक्षा को हटाया जा रहा है।

बहरहाल, इन बदलावों का एक और भी नतीजा होने जा रहा है, जिस पर उतनी चर्चा नहीं हुई है। इसका एक और नतीजा होगा— देश की खाद्य सुरक्षा का खात्मा। भूमि एक सीमित संसाधन है और इस सीमा  के बावजूद, ‘भूमि विवद्र्घनकारी’ कदम, जैसे कि सिंचाई का विस्तार (जिससे उतनी ही जमीन पर कई-कई फसलें ली जा सकती हैं और खेती के तरीकों में ऐसे सुधार जिनसे प्रति-एकड़ पैदावार बढ़ाई जा सकती है, उनकी गुंजाइश भी हमारी मौजूदा कृषि व्यवस्था के दायरे में थोड़ी ही है। ऐसे हालात में इस दुर्लभ संसाधन के उपयोग के दरवाजे, विकसित दुनिया के उपभोक्ताओं की तगड़ी क्रय शक्ति के लालचों के लिए खोलने का अनिवार्य रूप से अर्थ यही होगा कि  इस खेती की जमीन का बढ़ता हिस्सा खाद्यान्नों के उत्पादन के लिए उपयोग से हटाकर, ऐसी पैदावारों की ओर मोड़ा जा रहा होगा, जो विकसित दुनिया की जलवायु में पैदा नहीं हो सकती हैं।

बेशक, जब तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली कायम रहती है, सरकार को उसकी जरूरतों के लिए पर्याप्त मात्र में खाद्यान्न की खरीद तो करनी ही पड़ेगी। लेकिन, वर्तमान स्थिति से भिन्न जहां किसान जितना भी खाद्यान्न लाता है, उसे खरीदना होता है, बदले हुए हालात में उसकी इस बात की कोई मजबूरी नहीं होगी कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरत से फालतू जरा सा भी अनाज खरीदे। यह खेती के रकबे को बढ़ते पैमाने पर खाद्य फसलों से अन्य फसलों की ओर मुडऩे के लिए ही प्रोत्साहित करेगा। विकसित दुनिया के बाजारों की मांग पूरी करने से जुड़े बड़े फार्म खासतौर पर इस तरह के बदलाव को बढ़ावा दे रहे होंगे।

वास्तव में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की वार्ताओं के दोहा चक्र में भारत पर इसके लिए बहुत भारी दबाव डाला भी गया था कि खाद्यान्न की सरकारी खरीदी की अपनी गतिविधियों को घटा दे। लेकिन, किसान उत्पादकों और शहरी उपभोक्ताओं, दोनों के लिए ही ऐसा करने के जो बहुत भारी दुष्परिणाम होते उन्हें ध्यान में रखते हुए, एक के बाद एक सभी भारतीय सरकारें अब तक इस दबाव के आगे झुकने से इंकार करती आयी हैं और इसलिए, दोहाचक्र में गतिरोध बना ही हुआ है।

विकसित देश लंबे अरसे से भारत पर इसके लिए दबाव डालते आए हैं कि उनसे खाद्यान्न का आयात करे, जिसकी उनके यहां फालतू पैदावार होती है और उनके लिए दूसरी पैदावारों का निर्यात करे, जिनकी उनके यहां कमी है। पचास के दशक के उत्तराद्र्घ और साठ के दशक के पूर्वार्द्ध में भारत खाद्यान्न का आयात करता भी रहा था और पब्लिक लॉ-480 के अंतर्गत, अमरीका से गेहूं का आयात करता रहा था। बहरहाल, साठ के दशक के मध्य में लगातार दो साल फसल के लिहाज से खराब रहने से बिहार में अकाल के हालात पैदा हो गए। देश की आयात निर्भरता इतनी ज्यादा थी कि शब्दश: समुद्री जहाजों से लोगों के मुंह में निवाले देने की नौबत थी। और आमरीका द्वारा इस स्थिति का फायदा उठाकर भारत का हाथ मरोडऩे की कोशिश की जा रही थी, जिसे ‘खाद्य साम्राज्यवाद’ का नंगा उदाहरण ही कहा जाएगा। यह सब इस कदर असह्य हो गया था कि इंदिरा गांधी ने तत्कालीन कृषि व खाद्य मंत्री, जगजीवन राम से ‘कृषि क्रांति’ की रफ्तार तेज करने के लिए कहा था।

एमएसपी, सरकारी खरीद, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था और सरकारी खरीद के दाम तथा वितरण के दाम के बीच के अंतर की भरपाई करने के लिए खाद्य सब्सीडियां; यह पूरी की पूरी व्यवस्था उसी समय स्थापित की गयी थी। हालांकि, नवउदारवादी निजाम में इस समूची व्यवस्था को कमजोर किया जाता आ रहा था, फिर भी काफी हद तक अब भी यह व्यवस्था बनी हुई है क्योंकि अब तक कोई सरकार इतनी विचारहीन नहीं बन पायी थी कि इस व्यवस्था को ही त्याग दे। और हरित क्रांति के बारे में हमारे विचार चाहे जो भी हों, क्योंकि इसके जलवायुगत दुष्प्रभावों की अक्सर आलोचना होती रही है, इसने भारत को इसका मौका जरूर दिया कि ‘खाद्य साम्राज्यवाद’ की परछाईं से बाहर आ सके और खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर’ बन सके। यह दूसरी बात है कि यह आत्मनिर्भरता, जनता के बहुमत के लिए, आय तथा आहार के दयनीय स्तरों के बने रहने पर ही टिकी हुई है।

बेशक, कुछ लोग कहेंगे कि वे सब तो अतीत की बातें  हैं। हमें ‘खाद्य साम्राज्यवाद’ को ही पकडक़र नहीं बैठे रहना चाहिए। जब भारत विश्व बाजार से इतनी सारी अन्य वस्तुओं का आयात करता है, तो उसके विश्व बाजार से खाद्यान्न का आयात करने में ही क्या बुराई है? इस सवाल के कई जवाब हैं। पहला तो यही कि चूंकि पीछे बताए गए बदलाव के बाद, खाद्य फसलों की जगह पर, विकसित दुनिया की मांग के हिसाब से जो फसलें पैदा की जा रही होंगी, उनके दाम में उतार-चढ़ाव बहुत ज्यादा होते हैं, इस बदलाव से होने वाली निर्यात आय में भी इसी तरह के भारी उतार-चढ़ाव हो रहे होंगे। इसलिए, यह भी पूरी तरह से संभव है कि कुछ ही वर्षों में हमारे देश के पास, विश्व बाजार से खाद्यान्न खरीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा ही नहीं हो।

दूसरे, अगर किसी कारण से अचानक देश से वित्तीय पूंजी का पलायन शुरू हो जाता है, तब भी ठीक वैसी ही स्थिति होगी। बेशक, फिलहाल हमारे देश के पास काफी विदेशी मुद्रा संचित कोष मौजूद है। लेकिन, इस कोष के हमेशा जमा रहने की तो कोई गारंटी नहीं है। इसलिए, देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न की उपलब्धता को इस पर निर्भर हो जाने देना कि हमारी अर्थव्यवस्था से वित्त का पलायन नहीं हो रहा हो, करोड़ों लोगों की जिंदगियां मुट्ठीभर सटोरियों के रहमो-करम पर निर्भर बना देना ही होगा।

तीसरे, जब भारत जैसा कोई विशाल देश विश्व बाजार से अपनी खरीदी में अचानक बढ़ोतरी करेगा, विश्व बाजार में खाद्यान्नों के दाम तेजी से उछल जाएंगे। ऐेसे वर्षों में जब घरेलू खाद्यान्न उत्पाद घटेगा, जैसा कि समय-समय पर होता रहता है, भारत को अपनी जरूरत के खाद्यान्न का आयात करने के लिए कहीं ऊंची कीमत देनी पड़ रही होगी।

चौथे, मान लीजिए कि देश के पास इतनी विदेशी मुद्रा हो कि वह अपनी निर्यात फसल के दाम बैठने के वर्ष में भी विश्व बाजार से जरूरत का खाद्यान्न खरीदने की स्थिति में हो तब भी, निर्यात उपज के दाम घटने से, उसकी पैदावार करने वालों की आय में तो भारी गिरावट होगी ही होगी और उनके पास इस आयातित खाद्यान्न को खरीदने का भी सामर्थ्य नहीं होगी। उस सूरत में देश में आयातित खाद्यान्न के पर्याप्त भंडार होने के बावजूद, लोग भूखे सोने पर मजबूर होंगे।

पांचवीं बात यह है कि आपात स्थितियों में खाद्यान्न की उपलब्धता के मुद्दे को अगर हम भूल भी जाएं तब भी, विकसित दुनिया की जरूरतों के हिसाब से कृषि उत्पादन पर निर्भरता की एक और भी समस्या है। खाद्यान्नों की जगह पर हमारे जैसे देशों में विकसित दुनिया के बाजारों के लिए जो खेती की पैदावारें करायी जाती हैं, उनमें से अनेक में प्रति एकड़ रोजगार, खाद्यान्न की पैदावार के मुकाबले काम होता है। इसलिए खेती के रकबे के खाद्य फसलों से गैर-खाद्य फसलों की ओर खिसकने से सीधे-सीधे खेती में मिलने वाले रोजगार में कमी हो जाएगी। और प्रति एकड़, अपेक्षाकृत कम मजदूरी व्यय के साथ निर्यात फसलों को पैदा करने से जो अतिरिक्त लाभ पैदा हो रहा होगा उससे भी अर्थव्यवस्था में अन्य क्षेत्रों में कोई खास रोजगार पैदा नहीं हो रहा होगा क्योंकि ये अतिरिक्त मुनाफे जो एग्रीबिजनेस द्वारा ही बटोरे जा रहे होंगे, देश के बाहर ही खर्च किए जा रहे होंगे और उनसे दूसरे ही देशों में रोजगार पैदा हो रहा होगा। इसलिए, फलों या फूलों जैसी निर्यात फसलें उगाने के लिए, खाद्यान्न उत्पादन से हाथ खींचा जाना, देश में रोजगार में अच्छी खासी कमी पैदा करेगा और यह जनता को न सिर्फ पहले से ज्यादा गरीब बना देगा बल्कि उसके हाथों में अपनी जरूरत के खाद्यान्न खरीदने के लिए पर्याप्त क्रय शक्ति भी नहीं होगी और वे पहले से ज्यादा भूखे रहने के लिए भी मजबूर हो जाएंगे।

सारे मामले का निचोड़ यह कि भारत जैसे किसी देश के लिए खाद्य सुरक्षा का मतलब ही ह  अपनी जरूरत का ज्यादा से ज्यादा खाद्यान्न खुद ही पैदा करना। इस मामले में भूमि-उपयोग का फैसला बाजार पर हर्गिज नहीं छोड़ा जा सकता है। चूंकि भूमि एक सीमित संसाधन है और घरेलू खाद्यान्न उत्पादन अत्यावश्यक है इसलिए भूमि उपयोग पर सामाजिक नियंत्रण होना जरूरी है।

समूची तीसरी दुनिया में केरल ऐसा अकेला क्षेत्र है जहां एक कानून है जो 2008 में बनाया गया था और जो धान की पैदावार की जमीन का किसी दूसरी पैदावार के लिए उपयोग किए जाने पर रोक लगाता है। बेशक, केरल में खेती की जमीन इतनी ज्यादा कम है कि वह खाद्यान्न की पैदावार के मामले में आत्मनिर्भर हो ही नहीं सकता है फिर भी यह कानून धान के खेतों के किसी विस्तृत पैमाने पर निर्माण आदि के लिए खपाए जाने पर तो रोक लगाता ही है। देश के अन्य क्षेत्र तथा तीसरी दुनिया के देश अगर केरल के इस उदाहरण का अनुसरण करते हैं तो इसमें उनका ही फायदा है।

खाद्यान्नों की पैदावार के रकबे को निर्यात फसलों की पैदावार की ओर मोड़े जाने से होने वाली भारी तबाही का बेहतरीन उदाहरण सब-सहारावी अफ्रीका है, जिसे खाद्यान्न के आयात पर निर्भर होने के बाद से, एक के बाद एक, कई अकालों का सामना करना पड़ा है। भारत में पैदावार के लिए भूमि के उपयोग में बदलाव पर तो कोई नियंत्रण नहीं है। फिर भी एमएसपी, सरकारी खरीद तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अब तक चली आई व्यवस्था, निहितार्थ: पर्याप्त घरेलू खाद्यान्न उत्पादन सुनिश्चित करती आई है। खेद का विषय है कि मोदी सरकार ठीक इसी व्यवस्था को ध्वस्त करने में लगी हुई है। इसे हर हाल में रोकना ही होगा।      

(लेखक  प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। )

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