NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
यमुना की सफ़ाई में 'आधिकारिक उदासीनता' बड़ी चुनौती, हटाया जाय मिलेनियम बस डिपो
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा गठित एक समिति ने कहा कि यमुना की सफ़ाई की निगरानी में सबसे बड़ी चुनौती “आधिकारिक उदासीनता” है क्योंकि वैधानिक प्रावधानों और काफी उपदेशों के बावजूद जल प्रदूषण प्राथमिकता नहीं है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
06 Jul 2020
यमुना की सफ़ाई
image courtesy : New Indian Express

दिल्ली: यमुना की सफाई की निगरानी करने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की तरफ से नियुक्त समिति ने दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) से अनुशंसा की कि मिलेनियम बस डिपो को यमुना किनारे से स्थानांतरित किया जाए। समिति ने यह भी कहा कि पर्यावरण के लिहाज से यह असुरक्षित है।

यमुना निगरानी समिति में एनजीटी के सेवानिवृत्त विशेषज्ञ सदस्य बी एस सजवान और दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा शामिल हैं। समिति ने एनजीटी को बताया कि डीटीसी बिना आवश्यक अनुमति हासिल किए इसका संचालन कर रहा है और अपशिष्ट जल को नदी में छोड़ रहा है। समिति ने कहा कि 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के समय डीटीसी को बस डिपो बनाने के लिए अस्थायी जगह दी गई थी ताकि वह लो फ्लोर बसों का संचालन और उनकी देखभाल कर सके। समिति ने कहा कि डिपो में कई बसों की सफाई की जाती है और अपशिष्ट जल को नदी किनारे खुले में बहाया जाता है।

दो सदस्यीय समिति ने कहा कि जांच में डीटीसी के एक प्रतिनिधि ने बताया कि डिपो में निगम बसों की मरम्मत और देखभाल का काम भी करता है। इसने कहा कि डीटीसी बिना सहमति के इसका संचालन कर रहा है। एनजीटी को सौंपी गई रिपोर्ट में समिति ने कहा, ‘दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने यह भी कहा है कि इस्तेमाल किए गए इंजन ऑयल और अन्य ऑयल, ग्रीज जैसे खतरनाक पदार्थ यहां से निकलते हैं और इसे किसी के संज्ञान में नहीं लाया गया है और ऐसा पिछले नौ वर्षों से चल रहा है।’

अधिकरण ने इससे पहले एक पर्यावरण कार्यकर्ता को निर्देश दिया था कि मिलेनियम बस डिपो को स्थानांतरित करने की अपनी याचिका लेकर वह समिति से संपर्क करे। कार्यकर्ता ने यमुना के किनारे डिपो होने पर आपत्ति जताई थी। हरित पैनल ने यमुना नदी की सफाई की रोजाना आधार पर निगरानी के लिए एक समिति बनाई थी। यह मामला पिछले वर्ष अप्रैल में उच्चतम न्यायालय ने इस आधार पर हरित पैनल के पास भेज दिया था कि एक ही मुद्दे पर ‘समानांतर कार्यवाही’ नहीं चल सकती है।

सबसे बड़ी चुनौती आधिकारिक उदासीनता

समिति ने कहा कि यमुना की सफाई की निगरानी में सबसे बड़ी चुनौती “आधिकारिक उदासीनता” है क्योंकि वैधानिक प्रावधानों और काफी उपदेशों के बावजूद जल प्रदूषण प्राथमिकता नहीं है। एनजीटी के विशेषज्ञ सदस्य बी एस साजवान और दिल्ली की पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा की दो सदस्यीय यमुना निगरानी समिति ने एनजीटी को सौंपी अपनी अंतिम रिपोर्ट में बीते 23 महीनों के दौरान अपने इस अनुभव के बारे में जिक्र किया।

समिति ने कहा, “आधिकारिक उदासीनता पर काबू पाना सबसे बड़ी चुनौती है। यह एनजीटी के निर्देशों को पूरा करने या यमुना निगरानी समिति के प्रयासों को विफल करने के लिये किसी अवज्ञा या अनिच्छा की वजह से नहीं बल्कि इसलिये है क्योंकि जल प्रदूषण तमाम वैधानिक प्रावधानों और उपदेशों के बावजूद प्राथमिकता नहीं है।”

समिति ने कहा, “दूसरी बात यह कि रखरखाव के काम को राजनीतिक स्तर पर नई आधारभूत परियोजनाओं या योजनाओं के मुकाबले कम महत्व दिया जाता है। यह अधिकारियों और अभियंताओं के दिमाग में बैठ गया है कि जिस मानक पर उनके प्रदर्शन को आंका जाएगा वह मुख्य रूप से अधिकारी की नई परियोजनाओं को मंजूरी दिलाने, उसके लिये कोष हासिल करने और समय पर सामान व सेवाएं हासिल करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करता है।”

यमुना निगरानी समिति ने अधिकरण को बताया कि नागरिकों को प्रभावित करने वाले जीवन की गुणवत्ता संबंधी मुद्दे अक्सर पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और दैनिक रखरखाव के मामलों को निपटाने के लिये कनिष्ठ लोगों पर छोड़ दिया जाता है। समिति ने कहा कि स्वच्छ यमुना के लिये ज्यादा बड़े स्तर पर जनता की भागीदारी जरूरी है और इसे हासिल करने के लिये नागरिकों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

कहा गया, “नदी को साफ करने को सरकार के चुनावी वादों की सूची में इस साल शामिल किया गया था और समिति को बताया गया था कि राजनीतिक स्तर पर भी इस पर ध्यान दिया जाना शुरू हो चुका है। लेकिन मौजूदा स्वास्थ्य संकट की वजह से यह एक बार फिर पीछे छूट गया है।”

954 एकड़ ज़मीन पर अब भी खेती

समिति ने बताया है कि इस नदी के बाढ़ की आशंका वाले मैदान के साथ लगती 954 एकड़ जमीन पर अब भी खेती हो रही है और उसने उसे उसके कब्जेदारों से मुक्त कराने की मांग की है।

यमुना निगरानी समिति (वाईएमसी) ने अधिकरण को बताया कि अतिक्रमण करने वाले लोगों की अवैध खेती को हटाने का अभियान चलाया गया था और सात जनवरी तक 352.36 हेक्टेयर जमीन खाली करायी गयी थी।

समिति ने कहा, ‘954 एकड़ जमीन अतिक्रमण और खेती के अधीन है। वाईएमसी इस पर अनथक काम कर रही है लेकिन 20 महीने में खाली कराने की योजना नहीं दी गयी है।’ समिति ने कहा कि एनजीटी यह निर्देश देने पर विचार कर सकता है कि कब्जे में ली गयी जमीन और जहां अदालत का स्थगन नहीं है, वहां से जमीन खाली करने की योजना तैयार की जाए।

एनजीटी का रुख़ सख़्त

गौरतलब है कि यमुना की सफाई के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सख्त रुख अख्तियार किया है। इससे पहले पिछली साल अगस्त महीने में एनजीटी ने साफ कहा था कि यमुना साफ करने के लिए एक निश्चित समयसीमा तय करें। बार-बार समयसीमा टालते हुए आदेश का पालन नहीं किया गया है। 30 साल बाद भी यमुना में प्रदू्षण है।  

एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अगुवाई वाली पीठ ने साफ किया था कि यह समयावधि आखिरी होगी। एनजीटी ने सख्त लहजे में कहा कि अधिकरण नई समयसीमा तय करेगा। इसका उल्लंघन करने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। पर्यावरण और जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यमुना का साफ होना बेहद जरूरी है। एनजीटी ने सभी प्राधिकरणों को उसके आदेशों के संबंध में उठाए गए कदमों की जानकारी देने को कहा था।

आपको बता दें कि इससे पहले 2018 में सरकार ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि यमुना नदी की सफाई एवं संरक्षण पर पिछले 25 वर्षों के दौरान 1514 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं।

लोकसभा में पीके कुनहालिकुट्टी के प्रश्न के लिखित उत्तर में जल संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा था कि 'यमुना कार्य योजना’ (वाईएपी) के तहत वर्ष 1993 से चरणबद्ध ढंग से हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश राज्यों को वित्तीय सहायता देकर गंगा की सहायक नदी यमुना में बढ़ते प्रदूषण के स्तर को रोकने के लिए राज्य के प्रयासों को सहायता दी जा रही है। मंत्री ने कहा कि वाईएपी के चरण-1 एवं चरण-2 के तहत कुल 1514.70 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। हालांकि इसके बावजूद भी यमुना नदी का प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ) 

yamuna
yamuna crisis
Cleaning Yamuna
national green tribunal
NGT
DTC

Related Stories

गैर-स्टार्टर स्मार्ट सिटी में शहरों में शिमला कोई अपवाद नहीं है

सुंदरबन में अवैध रिसॉर्ट के मालिक की पहचान नहीं कर पा रही ममता सरकार

DTC ठेका कर्मचारियों ने अभियान चलाकर केजरीवाल सरकार को दी चेतावनी, 'शवयात्रा' भी निकाली

उत्तराखंड: लंबित यमुना बांध परियोजना पर स्थानीय आंदोलन और आपदाओं ने कड़ी चोट की

दूध गंगा के बचाव में आगे आया एनजीटी

अनियंत्रित ‘विकास’ से कराहते हिमालयी क्षेत्र, सात बिजली परियोजनों को मंज़ूरी! 

बाघजान: तेल के कुंए में आग के साल भर बाद भी मुआवज़ा न मिलने से तनाव गहराया 

तेलंगाना की पहली सुपर थर्मल पावर परियोजना को हरी झंडी देने में अहम मुद्दों की अनदेखी?

उत्तर प्रदेश में यमुना नदी में बहती मिली लाशें, कोरोना से मौत की आशंका, लोग करने लगे जल प्रवाह!

कैसे एक रेत खनन ठेकेदार ने हरियाणा-उत्तरप्रदेश बॉर्डर पर यमुना के बहाव को मोड़ा


बाकी खबरें

  • न्यूजक्लिक रिपोर्ट
    संतूर के शहंशाह पंडित शिवकुमार शर्मा का मुंबई में निधन
    10 May 2022
    पंडित शिवकुमार शर्मा 13 वर्ष की उम्र में ही संतूर बजाना शुरू कर दिया था। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम बंबई में 1955 में किया था। शिवकुमार शर्मा की माता जी श्रीमती उमा दत्त शर्मा स्वयं एक शास्त्रीय…
  • न्यूजक्लिक रिपोर्ट
    ग़ाज़ीपुर के ज़हूराबाद में सुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर पर हमला!, शोक संतप्त परिवार से गए थे मिलने
    10 May 2022
    ओमप्रकाश राजभर ने तत्काल एडीजी लॉ एंड ऑर्डर के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम, गाजीपुर के एसपी, एसओ को इस घटना की जानकारी दी है। हमले संबंध में उन्होंने एक वीडियो भी जारी किया। उन्होंने कहा है कि भाजपा के…
  • कामरान यूसुफ़, सुहैल भट्ट
    जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती
    10 May 2022
    आम आदमी पार्टी ने भगवा पार्टी के निराश समर्थकों तक अपनी पहुँच बनाने के लिए जम्मू में भाजपा की शासन संबंधी विफलताओं का इस्तेमाल किया है।
  • संदीप चक्रवर्ती
    मछली पालन करने वालों के सामने पश्चिम बंगाल में आजीविका छिनने का डर - AIFFWF
    10 May 2022
    AIFFWF ने अपनी संगठनात्मक रिपोर्ट में छोटे स्तर पर मछली आखेटन करने वाले 2250 परिवारों के 10,187 एकड़ की झील से विस्थापित होने की घटना का जिक्र भी किया है।
  • राज कुमार
    जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप
    10 May 2022
    सम्मेलन में वक्ताओं ने उन तबकों की आज़ादी का दावा रखा जिन्हें इंसान तक नहीं माना जाता और जिन्हें बिल्कुल अनदेखा करके आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। उन तबकों की स्थिति सामने रखी जिन तक आज़ादी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License