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मज़दूर-किसान
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राजनीति
आख़िर कब तक: बिहारी गेहूं और बिहारी मज़दूर, लेकिन केक खाए पूंजीपति, लाठी खाए मजबूर!
बिहार में उत्पादित कुल गेहूं का 40 फीसदी बाहर के राज्यों में चला जाता है। बाहर के राज्यों में यही बिहारी मज़दूर, बिहार के गेहूं से ही बिस्किट बनाते हैं, केक बनाते हैं, बेकरी आइटम्स बनाते हैं, लेकिन अंत में उनके हिस्से आती है पुलिस की लाठी, सरकारों से मिलने वाली उपेक्षा और एक अनिश्चित भविष्य की सौगात।
शशि शेखर
27 May 2020
Bihari labors
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकों और पर्सेप्शन की राजनीति में फंसे लोगों (खास कर बिहारियों) के लिए इस सत्य को पढ़ना और पचाना शायद मुश्किल हो सकता है। लेकिन, ये सत्य है और सरकारी फाइलों में दर्ज है कि बिहार में उत्पादित कुल गेंहू का 40 फीसदी बाहर के राज्यों में चला जाता है। और इसके बाद क्या होता है? गेंहू के साथ घुन पिसने की तर्ज पर, बिहारी मज़दूर भी बाहर के राज्यों में चला जाता है।

बाहर के राज्यों में यही बिहारी मज़दूर, बिहार के गेहूं से ही बिस्किट बनाते हैं, केक बनाते हैं, बेकरी आइटम्स बनाते हैं, लेकिन अंत में उनके हिस्से आती है पुलिस की लाठी, सरकारों से मिलने वाली उपेक्षा और एक अनिश्चित भविष्य की सौगात। तो सवाल है कि लाखों प्रवासी बिहारी मज़दूरों की “घर वापसी” के बाद, बिहार सरकार के पास, बिहार के विपक्ष के पास इन प्रवासी मज़दूरों के लिए क्या विजन है, क्या रणनीति है, क्या योजना है?

“असफलता का स्मारक” से उम्मीद  

न्यूज़क्लिक के लिए हमने मज़दूरों की वापसी के मुद्दे पर राजद, कांग्रेस, भाकपा और भाकपा (माले) के नेताओं से बातचीत की और ये समझने की कोशिश की कि आखिर उनके पास मज़दूरों की इस समस्या का क्या कोई चिर-स्थायी समाधान है।

लगभग सभी नेताओं की बातचीत से दो तरह के समाधान निकल कर सामने आए। एक शॉर्ट टर्म सॉल्यूशंस और एक लॉंग टर्म सॉल्यूशंस। मनरेगा को जहां तकरीबन सभी नेताओं ने शॉर्ट टर्म सॉल्यूशंस के रूप में देखा, वहीं एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री इनके हिसाब से बिहारी कामगारों के लिए दीर्घकालिक समाधान के रूप में सामने आया।

दिलचस्प बात ये है कि चाहे बिहार की डबल इंजन सरकार हो या केन्द्र की एनडीए सरकार, ये सरकारें भी मानती है कि कांग्रेस की “असफलता का स्मारक” ऊर्फ मनरेगा फिलहाल संकटग्रस्त मज़दूरों को तात्कालिक राहत दे सकता है। नतीजतन, केन्द्र सरकार अपने कथित राहत पैकेज में जहां मनरेगा के हिस्से 40 हजार करोड रुपये आवंटित करती है, वहीं बिहार की नीतीश सरकार ने भी क्वरंटाइन सेंटर से ही मनरेगा जॉब कार्ड बांटने की शुरुआत कर दी है।

अब ये एक अलग बहस है कि मनरेगा के तहत मज़दूरों को कितने दिन का काम दिया जाना चाहिए, क्या अभी मनरेगा मज़दूरी में वृद्धि किए जाने की जरूरत है और ये भी कि मनरेगा के तहत किस तरह के काम किए जाने चाहिए।

मनरेगा और एग्रो इंडस्ट्रीज

इस बीच जहां राहुल गांधी न्याय योजना के तहत सभी गरीबों के खाते में 7500 रुपये कैश ट्रांसफर की बात कर रहे हैं, वहीं बिहार में महागठबन्धन की मुख्य पार्टी राष्ट्रीय जनता दल भी इससे सहमत नज़र आ रही है।

राज्यसभा सांसद और राजद नेता मनोज झा भी न्यूज़क्लिक के लिए इस मुद्दे पर बात करते हुए इसी तरह के सुझाव देते हैं। मनोज झा मानते हैं कि केन्द्र सरकार के राहत पैकेज में अर्जेंसी का अभाव है और इससे मज़दूरों को कोई राहत नहीं मिलने जा रही है।

वे कहते हैं, “तत्काल प्रभाव से मज़दूरों के खाते में तीन महीने के लिए कैश ट्रांसफर किया जाए और मनरेगा के तहत मैन डेज और वेज बढाया जाए।” मनोज झा सुझाव देते हैं कि दीर्घकालिक उपाय के तहत, बिहार सरकार को तत्काल बिहार को जोन में बांट कर एग्रो बेस्ड यानी फूड प्रोसेसिंग यूनिट को बढ़ावा देने का काम करना चाहिए। मखाना, मकई, मछली, लीची जैसे उत्पादों के जरिए रोजगार सृजन की क्षमता बढाई जा सकती है।

न्यूजक्लिक से बातचीत में मनोज झा ये भरोसा दिलाते हुए कहते हैं कि उनकी पार्टी इस बारे में एक विजन डॉक्यूमेंट बना रही है। अब, ये विजन डॉक्यूमेंट नीति आयोग की उन सिफारिशों कितना एडोप्ट करेगी,जिसमें बिहार के कृषि विकास का एक क्लियर रोडमैप दिया गया है, यह देखने वाली बात होगी।
 
मनरेगा मज़दूरों को इस महामारी से बचाने का तात्कालिक जरिया हो सकता है, इस तथ्य पर बिहार की राजनीति से जुड़े तकरीबन सभी दल एकमत नजर आ रहे है। न्यूज़क्लिक के लिए बात करते हुए भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य कहते हैं, “फौरी तौर पर राज्य और केंद्र को मिल कर एक माइग्रेंट वर्कर एक्शन प्लान बनाने की जरूरत है। मज़दूरों को लॉकडाउन पीरियड का वेज और गुजारा भत्ता मिलना चाहिए। महामारी के साथ महामन्दी के इस दौर के बाद, इन मज़दूरों के समायोजन की व्यवस्था हो। जिस काम से वे वापस आ रहे हैं, उसी काम में अगर वे वापस जाना चाहते हैं तो सम्मानपूर्वक उन्हें वहां समायोजित किया जाना चाहिए और अगर वे बिहार में ही रह कर काम करना चाहते हैं तो वहीं इसके इंतजाम किए जाने चाहिए। तत्काल मनरेगा और आगे पूरे बिहार के लिए एग्रो बेस्ड इंडस्ट्रियलाइजेशन प्लान लाना होगा।”

ग्रामीण संपत्ति का सृजन

बहरहाल, मोटे तौर पर एक बात उभर कर सामने आई कि प्रवासी मज़दूरों को तात्कालिक राहत देने की क्षमता मनरेगा में है, उसी मनरेगा में जिसे मौजूदा प्रधानमंत्री यूपीए की असफलता का स्मारक बता चुके हैं। लेकिन, मनरेगा के तहत जिस तरह के काम होते है, क्या वे काम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास के काम आएंगे?

इस बारे में बातचीत करते हुए कांग्रेस असंगठित कामगार प्रकोष्ठ के मध्य भारत के प्रभारी और कांग्रेस नेता डॉक्टर अजय उपाध्याय का मानना है कि बिहार वापस आ रहे सभी मज़दूरों में कौशल है।

वे कहते हैं, “उनके इस कौशल का उपयोग करके बिहार सरकार चाहे तो बिहार की तस्वीर और तकदीर बदल सकती है। निश्चित तौर पर मनरेगा में उनका समायोजन जरूरी है। मनरेगा के माध्यम से बहुत सारे स्थायी ग्रामीण संपत्ति का निर्माण हो। इससे उनकी जीविका भी चलेगी और एक महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर गांव बनाने की संकल्पना भी संभव हो सकेगा।”
             
बिहार सीपीआई राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रविन्द्र नाथ राय बातचीत के दौरान एक अहम बात कहते हैं। उनके मुताबिक, बिहार के अधिकांश लोग फोर्स्ड माइग्रेशन के शिकार है। बिहार के पूर्णिया, मधेपुरा (कोसी) के इलाके से इसी तरह का माइग्रेशन बडे स्तर पर होता है। सोशल अनरेस्ट की वजह से बिहार से माइग्रेशन हुआ, खास कर मध्य बिहार के इलाके से।

अब, जब कोरोना महामारी की वजह से ये मज़दूर बिहार वापस आ रहे है तो इन्हें कैसे सरकार समायोजित करेगी? इस सवाल पर राय कहते हैं कि तत्काल इन मज़दूरों को जिन्दा रहने के लिए नगद दे सकती है। हालांकि, वो ये भी कहते है कि रातोंरात बिहार में बडा इंडस्ट्री लगाना संभव नहीं है। लेकिन, साथ ही वो ये भी कहते हैं कि एग्रो बेस्ड जॉब ही एकमात्र विकल्प है।

वे सुझाव देते हैं, “छोटे-छोटे स्तर पर एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री लगाया जाए तो रोजगार सृजन संभव है। इसके लिए हमारे पास कच्चा माल है, कौशल है और इसके लिए बडी पूंजी की भी जरूरत नहीं होगी।”

मुजफ्फरपुर अपनी लीची के लिए मशहूर है। राष्ट्रीय लीची अनुसन्धान केन्द्र भी मुजफ्फरपुर के मुशहरी प्रखंड में ही है। इस संवाददाता ने लीची अनुसन्धान केन्द्र मुजफ्फरपुर के एक वरिष्ठ अधिकारी से जब बात की तो पता चला कि बामुश्किल अभी 2-4 जिलों में लीची की खेती होती है, जबकि अनुसन्धान केन्द्र का दावा है कि तकरीबन आधे से अधिक बिहार में इसकी खेती हो सकती है और इतना ही नहीं, अनुसंधान केन्द्र ने अपने तौर पर लीची से दर्जनों उत्पाद तैयार किए हैं, जिनकी बाजार कीमत लीची फल की तुलना में कहीं अधिक मिल सकती है।

लेकिन, क्या वजह है कि बिहार के पास इतना शानदार अनुसन्धान केन्द्र है, फिर भी क्यों राज्य सरकार इस दिशा में कोई ठोस और ईमानदार कदम नहीं उठा पाती? और हां, यहां सिर्फ लीची के साथ ही नहीं, केला, आलू, मखाना, सब्जियां और अन्य अनाजों/फलों/सब्जियों के साथ भी यही कहानी है।

अकेला ये तथ्य ये साबित करता है कि आज जिन मज़दूरों की वापसी पर लोग हायतौबा मचा रहे हैं, वही मज़दूर पोस्ट कोरोना बिहार की तस्वीर बदल सकने की क्षमता भी रखते हैं, बशर्ते बिहार सरकार इच्छाशक्ति दिखाए।

लेकिन क्या ये इच्छाशक्ति बिहार की “डबल इंजन” सरकार के पास है? जब केन्द्र ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की तो बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा कि बिहार में 5200 ऐसे प्रतिष्ठान जहां 93,775 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनका मासिक वेतन 15 हजार से कम है, उन्हें इस पैकेज का सर्वाधिक लाभ मिलेगा।

लेकिन, सवाल है कि ये लाभ कब मिलेगा, कैसे मिलेगा? और सवाल तो ये भी है कि नीति आयोग ने बिहार के कृषि विकास के लिए जो रोडमैप तैयार किया था (नीति आयोग टास्क फोर्स ऑन बिहार एग्रीकल्चर), उसको क्रियांवित करने के लिए इस 20 लाख करोड़ में से बिहार को कितना मिलेगा?

नीति आयोग की रिपोर्ट: 2 लाख 83 हजार 106 करोड़ रुपये की ज़रूरत  

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बिहार के संपूर्ण कृषि विकास के लिए 2015 से 2022 के बीच कुल 2 लाख 83 हजार 106 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। अगर बिहार सरकार इतना पैसा निवेश कर सकती है तो नि:सन्देह बिहार अपनी कृषि क्षमता का अधिकतम उपयोग करते हुए सर्वांगीण विकास के रास्ते पर आगे बढ सकता है।

इसमें, फसल उत्पादन, स्टोरेज, सिंचाई, फूड प्रोसेसिंग, लैंड रिसोर्स मैनेजमेंट, पशुपालन, मार्केटिंग जैसे तमाम पहलुओं के विकास की बात शामिल है। मसलन, नीति आयोग का ये मानना है कि बिहार में किसी भी उपज का सही तरीके से मैनेजमेंट किया जाए तो इससे बडे अवसर पर रोजगार सृजन हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, 2020 के अंत तक बिहार रिकॉर्ड 90 लाख मिट्रिक टन मक्का का उत्पादन करेगा, लेकिन दुख की बात ये है कि बिहार अभी भी पॉल्ट्री और मछली के लिए जरूरी फीड का 80 फीसदी दूसरे राज्यों से मंगाता है।

गौरतलब है कि मुर्गा या मछली पालने के लिए उन्हें जो फीड दिया जाता है, वो मक्के से ही तैयार होता है। अकेले खगडिया जैसे जिले में इतना क्षमता है कि वो अपने मक्का उत्पादन के जरिए हजारों लोगों के लिए रोजगार सृजन कर सकता है। और यह स्थिति सिर्फ मक्के की नहीं है। चावल, गेहूं, सब्जियां, आम, लीची जैसी सभी फसलों के साथ ऐसा ही है। तो क्या वाकई 15 साल पुरानी डबल इंजन वाली बिहार सरकार नीति आयोग की सिफारिशों पर ईमानदारी से काम कर पाई? अब तक तो ऐसा नहीं दिख रहा है। लेकिन, आगे इन सिफारिशों के अनुरूप काम करना ही होगा। अन्यथा, इसके नतीजे कोरोना महामारी से भी अधिक घातक साबित होंगे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।) 

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