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CAA-NRC : महिलाओं का चौराहे पर बैठना नहीं, आपकी सोच 'लज्जाजनक' है योगी जी!
योगी आदित्यनाथ के महिलाओं के ख़िलाफ़ दिये गए बयान का जवाब देते हुए नागरिकता क़ानून का विरोध कर रही महिलाओं ने कहा है कि योगी की सोच लज्जाजनक है।
सोनिया यादव
23 Jan 2020
CAA

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही महिलाओं के चौराहे पर बैठने को लज्जाजनक बता रहे हों, लेकिन महिलाओंं का घरों से निकल कर विरोध करना उन तमाम बेड़ियों को तोड़ने जैसा है जो पि़तृसत्ता के बंधन में उन्हें बांधती हैं। उस मनुस्मृति को ठेंगा दिखाने जैसा है जो औरतों को महज़ चार दिवारी और मर्दों के संरक्षण में रहने तक सीमित रखता है।

सीएम योगी ने कानपुर की एक रैली में कहा है, "इतना बड़ा अपराध...पुरूष घर में रज़ाई ओढ़कर सो रहा है और महिलाओं को आगे करके चौराहे पर बैठाया जा रहा है। कितना लज्जाजनक है… कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों के लिए। विरोध कर रही महिलाओं को मालूम ही नहीं है कि CAA क्या है? वे लोग धरने पर बैठे हैं। आप जब उनसे पूछेंगे कि आप धरने पर क्यों बैठे हैं तो वो कहेंगे कि घर के मर्द ने कहा है।"

सीएम योगी का ये कथन हक़ीक़त से कोसों दूर नज़र आता है। नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ महिलाओं ने ही देशभर में मोर्चा खोल रखा है। इस विरोध में महिलाओं की भूमिका बताती है कि अब उन्होंने डरना और पीछे रहना बंद कर दिया है। दिल्ली के शाहीन बाग़ से शुरू हुआ महिलाओं का आंदोलन आज देश के हर छोटे-बड़े इलाकों तक पहुंच गया है। कोलकाता के पार्क सर्कस से लेकर उत्तर प्रदेश के घंटाघर तक, बिहार के गया से उत्तराखंड के हल्दवानी तक हर जगह महिलाएं इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं।

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उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। अलीगढ़, इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ समेत कई इलाकों में महिलाएं सीएए और एनआरसी का विरोध कर रही हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ की चेतावनी और 1200 प्रदर्शकारियों पर केस दर्ज होने के बावजूद महिलाएं सड़कों पर उतर रही हैं, आज़ादी के नारे लगा रही हैं और सरकार से सवाल पूछ रही हैं।

मीडिया में आई खबर के मुताबिक योगी आदित्यनाथ सरकार ने अलीगढ़ में 60 महिलाओं, प्रयागराज में 300 महिलाओं, इटावा में 200 महिलाओं और 700 पुरुषों पर केस दर्ज किया है। केस दर्ज होने के बाद भी लखनऊ के घंटाघर से लेकर इलाहाबाद के मंसूर अली पार्क में प्रदर्शन जारी है। रायबरेली के टाउनहॉल में भी महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं। 21 जनवरी को इटावा में हो रहे प्रदर्शन को भले ही पुलिस प्रशासन ने आधी रात को लाठीचार्ज कर जबरन ख़त्म करवा दिया हो लेकिन महिलाओं का संघर्ष अभी भी जारी है।

प्रदर्शनकारी महिलाओं ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, "सीएम भले ही कह रहे हों कि मर्दों ने औरतों को आगे किया है लेकिन वो शायद भूूल रहे हैं कि इस देश में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई फुले जैसी कई महिलाएं थीं जिन्होंने अपने हक के लिए हज़ारों मर्दों का मुकाबला किया। सीएए विभाजनकारी है, संविधान के ख़िलाफ़ है और जो संविधान में आस्था रखता है वो इसका कभी समर्थन नहीं कर सकता। महिलाओं का चौराहे पर बैठना नहीं, आपकी सोच 'लज्जाजनक' है योगी जी।"

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बिहार में भी इस आंदोलन के विरोध में कई जगह महिलाएं धरना दे रही हैं। पहले गया फिर अररिया और अब मुज़फ़्फ़रनगर की औरतों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है। बुधवार 22 जनवरी से हज़ारों महिलाएं 'सत्याग्रह' धरने पर बैठी हैं और कानून वापस न लिए जाने तक प्रदर्शन की बात कर रही हैं। ये आंदोलन माड़ीपुर चौक, शहीद खुदीराम बोस स्मारक और चंदवारा में जारी है।

इस संबंध में प्रदर्शन कर रही महिलाओं का कहना हैं, "हमने अपने आंदोलन की शुरुआत राष्ट्रगान के साथ की है। हमारे पास संविधान की प्रस्तावना है और हम संविधान बचाने के लिए एकजुट होकर लड़ रहे हैं। सरकार धर्म के आधार पर लोगों को बांटना चाहती है और हम बराबरी और धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाना चाहते हैं।"

उधर उत्तराखंड के हल्द्वानी की महिलाओं ने भी सीएए और एनआरसी के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा दिया है। 22 जनवरी बुधवार से यहां सैकड़ों महिलाएं ताज चौराहे पर धरने पर बैठी हैं। हाथों में सीएए और एनआरसी के विरोध की तख्तियां लहरा रहीं हैं, नारे लगा रही हैं। यहां कुछ राजनीतिक दलों से जुड़ी महिलाओं ने भी धरना स्थल पर आकर प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया।

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प्रदर्शन में शामिल उर्मिला नेगी ने न्यूज़क्लिक को बताया, "बनभूलपुरा से हमारा संघर्ष शुरू हुआ था। इसके बाद हम ताज चौराहे पर धरने पर बैठ गए। हमारी मांग है कि सरकार सीएए और एनआरसी को वापस ले। हम इसे काला क़ानून मानते हैं, ये संविधान के ख़िलाफ़ है, देश की धर्मनिरपेक्षता पर हमला है। साथ ही पड़ोसी देशों के साथ नाइंसाफ़ी भी है।"

ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार ने देश भर में जारी तमाम विरोध प्रदर्शनों के बीच भले ही नागरिकता संशोधन कानून 10 जनवरी से लागू कर दिया हो, लेकिन इसे लेकर शुरू हुआ विवाद अभी थमा नहीं है। दिन-प्रतिदिन प्रदर्शनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। छात्रों से लेकर नागरिक समाज के लोग और बुजुर्गों से लेकर छोटे बच्चे तक इस आंदोलन में शिरकत कर रहे हैं तो वहीं इसकी खास बात ये है कि इसका नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं। दिल्ली के शाहीन बाग़ के धरने को हटाने और बचाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अब ये धरना रहे न रहे, इसने अपना काम कर दिया। शाहीन बाग़ की बदौलत देश में कई जगह शाहीन बाग़ जैसे मोर्चे खुल गए हैं।

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