NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
ग्रामीण भारत में करोना-31: ओडिशा के अमपोरा गांव में मनरेगा के तहत कोई काम नहीं
इलाक़े के 5-6 साप्ताहिक बाज़ार जो लॉकडाउन से पहले लगते थे, वे अब बंद हैं। किसानों के पास सिर्फ़ एक विकल्प बचा है कि वे अपनी उपज के दाल सस्ती क़ीमतों पर व्यापारियों के हाथ बेच दें।
सदानन्द साहू
04 May 2020
ग्रामीण भारत
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : एनडीटीवी

यह इस श्रृंखला की 31वीं रिपोर्ट है जो ग्रामीण भारत के जीवन पर कोविड-19 से संबंधित नीतियों से पड़ रहे प्रभावों की तस्वीर पेश करती है। सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा जारी इस श्रृंखला में कई विद्वानों की रिपोर्टों को शामिल किया गया है, जो भारत के विभिन्न गांवों का अध्ययन कर रहे हैं। यह रिपोर्ट उनके अध्ययन में शामिल गांवों में मौजूद लोगों के साथ टेलीफोन पर हुई साक्षात्कार के आधार पर तैयार की गई है। यह रिपोर्ट ओडिशा के जाजपुर ज़िले के अमपोरा गांव पर देशव्यापी लॉकडाउन से पड़ रहे असर की पड़ताल करती है।

सड़क मार्ग से अमपोरा गांव की भुवनेश्वर (राज्य की राजधानी) से दूरी तक़रीबन 120 किमी है और यहां से निकटतम शहर 20 किमी दूर जाजपुर-कोंझर है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए 10 अप्रैल से लेकर 16 अप्रैल के बीच टेलीफोन के जरिए जानकारी एकत्रित की गई थी। इस बातचीत में अमपोरा और इसके पड़ोस में स्थित जलासुअन पटना गांव के 9 लोग शामिल थे।

अमपोरा की आबादी क़रीब 1,000 की होगी, जिसमें सभी जातियों को मिलाकर कुल 200 घर हैं। ब्राह्मणों और क्षत्रियों में से प्रत्येक के 10-10 परिवार हैं जिनके पास अपनी ज़मीन हैं और ये सभी खेतिहर परिवार हैं, जबकि 30 वैश्य परिवारों में मिठाई बनाने और बढ़ई का काम करने वाले लोग शामिल हैं। बाक़ी के बचे 150 परिवार अनुसूचित जाति से हैं, जिनमें मछुआरे, चरवाहे और अन्य शामिल हैं।

इस गांव में लगभग 80% परिवार या तो पट्टे पर खेतीबाड़ी करते हैं या अस्थाई तौर पर खेत में मज़दूरी करते हैं और इनमें से अधिकांश आर्थिक तौर पर ग़रीबी रेखा से नीचे का जीवन बिता रहे हैं। गांव में चार लोग ऐसे भी हैं जिनके पास सरकारी नौकरी है और क़रीब 10 लोग औद्योगिक श्रमिक के तौर पर कार्यरत हैं। इन ग्रामीणों को काम के सिलसिले में गांव से बाहर जाना होता है और आने जाने के लिए ये दुपहिया वाहन का इस्तेमाल करते हैं।

इस गांव को राज्य की राजधानी और अन्य बड़े शहरों से जोड़ने वाला जो रेलवे स्टेशन है वह यहां से लगभग आठ किमी की दूरी पर टोमका में है। जबकि इस गांव को दूसरे राज्यों से जोड़ने वाला दूसरा प्रमुख रेलवे स्टेशन जाजपुर-कोंझर में है। भुवनेश्वर जाने वाली सिर्फ एक बस सेवा इस गांव से होकर गुजरती है, जो कि आजकल बंद कर दी गई है। इसके अलावा यातायात का यहां कोई अन्य साधन उपलब्ध नहीं है और ग्रामीणों को आस-पास के स्थानों पर जाने के लिए काफी हद तक मोटरसाइकिल और साइकिल की सवारी पर निर्भर रहना पड़ता है।

अमपोरा में खेतीबाड़ी की स्थिति

गांव में पानी की व्यवस्था उत्तर और दक्षिण से निकलने वाली दो छोटी जल धाराओं से पूरा हो जाता है। नदी की तरफ जो ज़मीन हैं उनमें सब्जी, मूंगफली और दाल उगाई जाती हैं क्योंकि इसमें गर्मियों के मध्य तक सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध रहता है।

इन ज़मीनों पर खेती का काम मुख्य तौर पर पट्टाधारक किसान करते हैं – और कुल सात या आठ घर ही होंगे जिनके पास नदी के किनारे की ज़मीन हैं। नदी के किनारे की बाक़़ी ज़मीन ज़्यादातर पड़ोस के जलसुंअन- पटना गांव वालों की हैं।

खरीफ के सीजन में ज़्यादातर किसान धान की खेती करते हैं। यदि मानसून अच्छा हुआ तो ही रबी की खेती की जाती है। इस बार मानसून में अच्छी बारिश हुई थी इसलिए रबी के सीजन में इस बार काफी बड़े क्षेत्रफल में दलहनी फसलें (मूंग, अरहर और उड़द) बोई गईं थी। कई परिवार अपने खेतों में सब्ज़ियां भी उगाते हैं और पांच से छह परिवार ऐसे हैं जो नदी किनारे सब्ज़ियों की खेती करते हैं। दलहन की कटाई का काम अप्रैल के दूसरे सप्ताह में शुरू हो चुका था और 25 अप्रैल तक जारी रहेगा।

अमपोरा में कुछ किसानों के पास पशुधन के रूप में गाय और बकरियां हैं। दुग्ध उत्पादन का कारोबार और जानवरों की चराई के लिए बाहर निकलने पर लॉकडाउन के दौरान कुछ ज़्यादा सख़्ती नहीं बरती गई है और यह काम बदस्तूर जारी है।

बाज़ारों तक पहुंच बना पाने की स्थिति

गांव के आस-पास करीब पांच या छह साप्ताहिक बाज़ार लगते हैं। लॉकडाउन की वजह से ये सभी अब बंद पड़े हैं। इसके कारण जो लोग सब्ज़ी की खेती करते हैं उनके पास अपने माल की बिक्री के विकल्प बेहद सीमित रह गए हैं, अब उन्हें बेहद सस्ते दरों पर अपनी उपज को अमपोरा में या पडोसी गांव वालों को बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। जब साप्ताहिक बाज़ार खुले होते थे तो कुछ दलहन की खेती करने वाले किसान अपना उत्पाद यहां लाकर बेचते थे, क्योंकि गांव की तुलना में यहां पर अच्छे दाम मिल जाया करते थे। अब चूंकि लॉकडाउन के कारण यह सब करना संभव नहीं रह गया है, इसलिए अब एकमात्र यही विकल्प बचा है कि पड़ोस के गांव के व्यापारी के हाथों बेहद सस्ते दामों पर अपनी दलहन की उपज बेच दी जाए।

गैर-कृषि रोज़गार तक पहुंच का प्रश्न

इस इलाक़े में फ़ूड प्रोसेसिंग की दो छोटी इकाइयां स्थापित हैं: एक में नमकीन (चटपटा नमकीन) और दूसरी इकाई में चावल से बनने वाले मुरमुरे बनाए जाते हैं। इन इकाइयों को काम जारी रखने की अनुमति प्राप्त है और यहां से जो वाहन, खाद्य सामग्री और किराने की वस्तुएं लेकर आती-जाती हैं, पुलिस की ओर से उनपर कोई रोक-टोक नहीं है।

इन फ़ूड प्रोसेसिंग इकाइयों के उत्पाद अमपोरा के 15 किलोमीटर के दायरे में लगभग 500 किराना दुकानों को बेचीं जाती हैं। लॉकडाउन के दौरान इन दोनों इकाइयों द्वारा निर्मित उत्पादों की मांग में वृद्धि देखने को मिली है, लेकिन इन दोनों ही ईकाइयों को काम करने के लिए मज़दूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर नमकीन फैक्ट्री के मालिक भीबी अपने यहां 14 मज़दूरों को नौकरी पर रखे थे, जिसमें से छह पुरुष थे जो नमकीन बनाने वाले (कारीगर) थे और नौ महिलाएं पैकेजिंग का काम करती थीं। लेकिन लॉकडाउन के बाद से कई मज़दूर इस ईकाई में आ पाने में असमर्थ हैं, जिसके चलते श्रमिकों की संख्या घटकर पांच रह गई है जिसमें दो सदस्य तो कम्पनी मालिक के परिवार से हैं, ताकि कम पड़ रहे मज़दूरों की कमी को पूरा किया जा सके।

मुरमुरा बनाने वाली इकाई में आजकल चार मज़दूर ही कार्यरत हैं, जिनमें से दो तो फैक्ट्री मालिक के परिवार से ही हैं। उधर प्रशासन द्वारा भी लॉकडाउन के दौरान सामाजिक दूरी के नियमों को लागू किये जाने के चलते भी कार्यस्थल पर कम संख्या में लोगों को रखे जाने के नियम का पालन करना पड़ रहा है।

गांव में खेती के आलावा कोई अन्य रोज़गार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। कुछ मज़दूर जो पास के औद्योगिक शहर कलिंग नगर में काम के सिलसिले में चले गए थे, वे भी लॉकडाउन के पहले चरण के दौरान गांव लौट आए थे। गांव में मनरेगा (ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना) से जुड़े कोई काम भी उपलब्ध नहीं है। हाल-फिलहाल सिर्फ कुछ खेतिहर मज़दूर हैं और चरवाहे हैं जो घर से बाहर और खेतों में काम कर रहे हैं।

बैंकों और अन्य आवश्यक वस्तुओं तक पहुंच

गांव में बैंक की शाखा मौजूद नहीं है और निकटतम एटीएम यहां से पांच किमी दूर टोल्कनी और देवगन में है। कई ग्रामीणों के पास बैंक में अपना कोई खाता तक नहीं हैं। जो लोग वृद्धावस्था पेंशन पाने के हक़दार हैं या अन्य लाभ को पाने की पात्रता रखते हैं, उन्हें इन पैसों का भुगतान ग्राम कल्याण अधिकारी (वीडब्ल्यूओ) द्वारा नक़द में कर दिया जाता है।

गांव में सिर्फ किराने की दुकानें खुली हुई हैं और उनसे खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति हो पा रही है। अभी तक अनाज, दालें, आलू, प्याज, दूध और सब्जी जैसे खाने पीने की वस्तुएं उपलब्ध हो जा रही हैं। जो परिवार ग़रीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) वाली श्रेणी में आते हैं उन्हें अग्रिम तौर पर तीन महीने का चावल और अन्य सामग्री एक ही बार में सीधे ग्राम कल्याण अधिकारी (वीडब्ल्यूओ) से मिल चुका है। लेकिन बाक़ी के कुछ ग़रीब परिवारों को, जो बीपीएल श्रेणी में नहीं आते, कोई लाभ नहीं मिला है।

कोरोना वायरस के बारे में जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच

आम तौर पर गांव वाले सामाजिक दूरी बनाए रखने के दिशा-निर्देशों का पालन कर रहे हैं। हालांकि कभी-कभार कुछ लोग ताश या कुछ अन्य खेल के लिए जुट जाते हैं, लेकिन जब उन्हें पुलिस आती दिखती है तो ये सब छुप जाते हैं। जिस दौरान इस रिपोर्ट को लेकर इंटरव्यू लिए जा रहे थे तो उस समय किसी भी एनजीओ या नागरिक समाज संगठन की ओर से इस इलाक़े में जागरूकता फ़ैलाने के लिए सक्रिय रूप से कोई काम देखने को नहीं मिला था।

सबसे नज़दीकी अस्पताल गोबर्धनपुर में है, जो यहां से लगभग पांच किमी की दूरी पर है। इस अस्पताल में एक डॉक्टर, एक कंपाउंडर, चार सहायक कर्मचारी और दो एम्बुलेंस की व्यवस्था है। अभी कुछ दिन पहले तक इस अस्पताल में नियमित तौर पर एक भी डॉक्टर नहीं थे, लेकिन महामारी की आशंका को देखते हुए यहां पर डॉक्टर और एम्बुलेंस की व्यवस्था आनन-फानन में कर दी गई है। सरकार ने लोगों को निर्देश दे रखे हैं कि यदि उन्हें चिकित्सकीय मदद की ज़रूरत पड़ती है तो वे अस्पताल को सूचित करें और फिर यह डॉक्टर की ज़िम्मेदारी होगी कि वे आपके घरों का दौरा करेंगे।

लेखक नई दिल्ली स्थित स्कूल ऑफ इंटर-डिसिप्लिनरी एंड ट्रांस-डिसिप्लिनरी स्टडीज में शोधार्थी हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

COI-19 in Rural India-XXXI: No MGNREGA Work Available Jajpur’s Ampora Village

COVID-19
Rural india
Lockdown
market Access
Rabi harvest
healthcare access
Rural Odisha

Related Stories

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल

कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के बाद भाजपा-आरएसएस क्या सीख ले सकते हैं

यूपी: शाहजहांपुर में प्रदर्शनकारी आशा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा, यूनियन ने दी टीकाकरण अभियान के बहिष्कार की धमकी

दिल्ली: बढ़ती महंगाई के ख़िलाफ़ मज़दूर, महिला, छात्र, नौजवान, शिक्षक, रंगकर्मी एंव प्रोफेशनल ने निकाली साईकिल रैली

पश्चिम बंगाल: ईंट-भट्ठा उद्योग के बंद होने से संकट का सामना कर रहे एक लाख से ज़्यादा श्रमिक


बाकी खबरें

  • indian student in ukraine
    मोहम्मद ताहिर
    यूक्रेन संकट : वतन वापसी की जद्दोजहद करते छात्र की आपबीती
    03 Mar 2022
    “हम 1 मार्च को सुबह 8:00 बजे उजहोड़ सिटी से बॉर्डर के लिए निकले थे। हमें लगभग 17 घंटे बॉर्डर क्रॉस करने में लगे। पैदल भी चलना पड़ा। जब हम मदद के लिए इंडियन एंबेसी में गए तो वहां कोई नहीं था और फोन…
  • MNREGA
    अजय कुमार
    बिहार मनरेगा: 393 करोड़ की वित्तीय अनियमितता, 11 करोड़ 79 लाख की चोरी और वसूली केवल 1593 रुपये
    03 Mar 2022
    बिहार सरकार के सामाजिक अंकेक्षण समिति ने बिहार के तकरीबन 30% ग्राम पंचायतों का अध्ययन कर बताया कि मनरेगा की योजना में 393 करोड रुपए की वित्तीय अनियमितता पाई गई और 11 करोड़ 90 लाख की चोरी हुई जबकि…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 6,561 नए मामले, 142 मरीज़ों की मौत
    03 Mar 2022
    देश में कोरोना से अब तक 5 लाख 14 हज़ार 388 लोगों अपनी जान गँवा चुके है।
  • Civil demonstration in Lucknow
    असद रिज़वी
    लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें
    03 Mar 2022
    युद्ध भले ही हज़ारों मील दूर यूक्रेन-रूस में चल रहा हो लेकिन शांति प्रिय लोग हर जगह इसका विरोध कर रहे हैं। लखनऊ के नागरिकों को भी यूक्रेन में फँसे भारतीय छात्रों के साथ युद्ध में मारे जा रहे लोगों के…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव : पूर्वांचल में 'अपर-कास्ट हिन्दुत्व' की दरार, सिमटी BSP और पिछड़ों की बढ़ी एकता
    03 Mar 2022
    यूपी चुनाव के छठें चरण मे पूर्वांचल की 57 सीटों पर गुरुवार को मतदान होगे. पिछले चुनाव में यहां भाजपा ने प्रचंड बहुमत पाया था. लेकिन इस बार वह ज्यादा आश्वस्त नहीं नज़र आ रही है. भाजपा के साथ कमोबेश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License