NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट: लॉकडाउन से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में कोई ख़ास मदद नहीं मिली
इस रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में 2019 के अप्रैल माह की तुलना में 17% की कमी देखने को मिली थी। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया काम पर वापस लौटने लगी, उत्सर्जन में भी बढ़ोत्तरी दर्ज होने लगी और जून में यह पिछले साल की तुलना में 5% बढ़ चुकी थी।
संदीपन तालुकदार
12 Sep 2020
लॉकडाउन से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में कोई ख़ास मदद नहीं मिली
फोटो साभार: पिकिस्ट

कोरोनावायरस महामारी के कारण दुनिया भर में लॉकडाउन लगाने और अर्थव्यवस्थाओं के धीमे पड़ते जाने से परोक्ष तौर पर कार्बन उत्सर्जन में कमी के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी सकरात्मक बदलाव की अपेक्षा की जा रही थी। लेकिन शायद चीजें उतनी सपाट नहीं होती हैं, जैसा कि कुछ आशावादियों ने इस सम्बंध में उम्मीद पाल रखी थी। संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम रिपोर्ट में जिसे यूनाइटेड इन साइंस रिपोर्ट नाम दिया गया है, ने इस बात का खुलासा किया है कि विश्व स्तर पर कोविड-19 के कारण जलवायु परिवर्तन में शायद ही कोई फर्क पड़ा हो।

यह बात सही है कि लॉकडाउन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भारी कमी देखने को मिली थी। लेकिन इसकी वजह से वायुमंडल में गैसों के संकेन्द्रण में हो रही निरंतर वृद्धि नहीं रुक पाई थी। अध्ययन में पाया गया है कि 2016-2020 की अवधि के सबसे ज्यादा गर्म पांच सालों के तौर पर बने रहने की संभावना है। बदले में जलवायु परिवर्तन के अपरिवर्तनीय प्रभाव लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं।

यूनाइटेड इन साइंस रिपोर्ट ने अपने भीतर अनेकों अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विशेषज्ञों को शामिल कर रखा है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) तक शामिल हैं। रिपोर्ट में पाया गया है कि लॉकडाउन के कारण अप्रैल के महीने में 2019 की तुलना में ग्रीनहाउस गैसों के दैनिक उत्सर्जन के स्तर में 17% तक की कमी आ चुकी थी। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया काम पर वापस लौटने लगी, जून तक उत्सर्जन में एक बार फिर से बढ़ोत्तरी होती चली गई और पिछले वर्ष की तुलना में यह 5% बढ़ा हुआ था।

इस अध्ययन में दुनिया भर के कुछ महत्वपूर्ण निगरानी स्टेशनों के पर्यवेक्षणों को शामिल किया गया है। हवाई स्थित मौना लोआ वेधशाला में जब हवा के नमूनों में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा आँकी गई तो जुलाई 2019 के 411 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) की तुलना में इस साल जुलाई में यह 414 पीपीएम पाई गई। इसी तरह तस्मानिया स्थित केप ग्रिम मॉनिटरिंग स्टेशन पर इस साल जुलाई में सघनता 407 से बढ़कर 410 पीपीएम तक हो चुकी थी।

हालांकि गर्म गैसों के संकेन्द्रण की पूर्ण वैश्विक तस्वीर इस वर्ष के उत्तरार्ध से पहले मिल पाने की संभावना नहीं है। लेकिन इसके बावजूद फिलहाल जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह किस दिशा में बढ़ रहा है। निश्चित तौर पर यह दिशा उर्ध्वगामी है, और वातावरण में गर्म गैसों के संकेद्रण में वृद्धि अवश्यंभावी है।

डब्ल्यूएमओ के महासचिव प्रो. पेट्टेरी तालस ने इस मुद्दे की गंभीरता पर अपनी टिप्पणी में कहा था “ग्रीनहाउस गैस के संकेन्द्रण के कारण - जोकि पिछले तीस लाख वर्षों के दौरान पहले से ही अपने उच्चतम स्तर पर है, और इसमें बढ़ोत्तरी लगातार जारी है। इसी दौरान साइबेरिया के बड़े भूभाग में 2020 की पहली छमाही के दौरान लंबे समय तक जबर्दस्त गर्म हवाओं के थपेड़े देखने को मिले हैं, जिसके बिना किसी मानवजनित जलवायु परिवर्तन के घटित होने की संभावना न के बराबर है। और अब यह सूचना मिल रही है कि 2016-2020 के ये पाँच वर्ष अब तक के रिकॉर्ड में सबसे गर्म पाए गए हैं। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि 2020 में जहाँ हमारे जीवन के कई पहलू बुरी तरह से बाधित हुए, लेकिन जलवायु परिवर्तन का दौर अबाध गति से आगे बढ़ रहा है।”

इस अध्ययन ने उत्सर्जन में कटौती करने के लिए वाकई में क्या किये जाने की आवश्यकता है, और इसे कम करने के लिए असल में क्या प्रयास किये जा रहे हैं के बीच में बढती दूरी पर महत्वपूर्ण चिंता जाहिर की है। यदि हम पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो ग्रीनहाउस गैस के उत्पादन में तुरंत कटौती किये जाने की तत्काल जरूरत है, ताकि पूर्व-औद्योगिक अवधि के बाद से अब तक की तापमान वृद्धि को अधिकतम 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोका जा सके।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के जल स्तर में पहले से ही अविश्वसनीय गति से बढ़ने की पृवत्ति बनी हुई है। 2016 और 2020 के दौरान यह वृद्धि दर प्रति वर्ष के हिसाब से 4.8 मिमी पाई गई है, जबकि 2011-2015 की अवधि में इसकी दर 4.1 मिमी थी। आर्कटिक बर्फ के स्तर में भी गिरावट अब खतरनाक बिंदु पर पहुंच चुकी है, जिसमें हर दस वर्षों में 13% की गिरावट आ रही है।

जबकि उत्सर्जन पर निगरानी रखने से इस बात का पता चल जाता है कि हकीकत में सतह पर क्या चल रहा है, और उसके बारे में कुछ किया जा सकता है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि गर्म गैसों का संकेन्द्रण असल में वातावरण में होता है। इनमे से कुछ गैसें, जैसे कि कार्बन डाइऑक्साइड सैकड़ों वर्षों तक वातावरण में बनी रह सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम रिपोर्ट स्पष्ट तौर पर गर्म गैसों के खतरनाक स्तर पर संकेन्द्रण के बढ़ते जाने की ओर इंगित करती है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

COVID-19 Lockdown Didn’t Help Much in Reducing Carbon Emission: UN Report

United in Science Report
World Meteorological Organisation
COVID19 Lockdowns and Climate Change
Lockdown Impact on Carbon Emission
COVID 19 Lockdown
climate change
PARIS AGREEMENT
global warming

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

विश्व जल दिवस : ग्राउंड वाटर की अनदेखी करती दुनिया और भारत

धरती का बढ़ता ताप और धनी देशों का पाखंड

1400 वैज्ञानिकों की चेतावनी : जलवायु परिवर्तन पर क़दम नहीं उठाए तो मानवता झेलेगी 'अनकही पीड़ा'

कोविड-19 : मप्र में 94% आईसीयू और 87% ऑक्सीजन बेड भरे, अस्पतालों के गेट पर दम तोड़ रहे मरीज़

विकसित देशों के रास्ते पर चलना भारत के लिए बुद्धिमानी भरा नहीं है : प्रो. विक्रम सोनी

लॉकडाउन से कामगारों के भविष्य तबाह, ज़िंदा रहने के लिए ख़र्च कर रहे हैं अपनी जमापूंजी 

उपभोग की आदतों में बदलाव से हो सकती है भू-मंडल और जीव-मंडल की रक्षा!

ग्रामीण भारत में कोरोनावायरस-39: लॉकडाउन से बिहार के बैरिया गांव के लोगों की आय और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हुई

लॉकडाउन में मोदी सरकार द्वारा हड़बड़ाहट में उठाए गए क़दम


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License