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भारत
राजनीति
छत्तीसगढ़: धान के कटोरे में क्यों लुटा हीरों का ख़ज़ाना?
राज्य सरकार ने यहां हीरे की खुदाई कभी की नहीं, लेकिन तस्कर गैर-कानूनी तरीके से सरकारी जमीनों से हीरे चुरा कर मालामाल हो गए। लेकिन यहां के आदिवासी आज भी महुआ बीनकर गुजारा ही करते हैं। 
शिरीष खरे
06 Apr 2021
हीरे के खेत मालिक मजदूर बन पहले से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं, वहीं सरकार को भी एक हीरा हाथ नहीं लगा। फोटो: शिरीष खरे
हीरे के खेत मालिक मजदूर बन पहले से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं, वहीं सरकार को भी एक हीरा हाथ नहीं लगा। फोटो: शिरीष खरे

भारत में धान के कटोरे कहे जाने वाले आदिवासी बहुल राज्य छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में पायलीखंड नाम से एक गांव है। यहां हीरे और बाकी बेशकीमती रत्नों का अथाह भंडार है। पिछले दो दशकों की कहानी बयां करती है कि हीरे के भंडार की भनक जब राज्य सरकार को लगी थी तो उसने यह पूरा इलाका सील करते हुए यहां के खेत मालिकों से जमीनों को खाली करा लिया था और गरीब किसानों को उनके अपने खेतों से उजाड़कर हीरे की खदानों को अपने कब्जे में ले लिय था, लेकिन अफसोस कि वह हीरों की हिफाजत नहीं कर सकी।

गरियाबंद के घने जंगलों से होकर जब आप पायलीखंड गांव तक पहुंचेगे तो यहां की लूट देखकर आप भी हैरान हो जाएंगे कि दूर राज्यों के हीरा तस्कर कैसे यहां के खेतों में बड़े-बड़े गड्ढे करते हुए सालों तक हीरे निकालते रहे और उन्हें गुजरात के सूरत के डायमंड मार्केट में बेचते रहे. इस बीच आदिवासी किसान खेत मजदूर में बदल गए जो आज भी दो जून की रोटी के लिए दिन भर जद्दोजहद कर रहे हैं। जबकि, सरकार की तिजोरी में भी एक हीरा न आ सका। आखिर यह सब कैसे हुआ! जानते हैं:

''यह मेरे बचपन की बात है, मुझे याद है कि दादी ने तब कुछ चमकदार पत्थरों को दिखाते हुए मुझसे कहा था- हमारे खेत के भीतर सोने से भी कीमती रत्न हैं, शायद हीरे! तब मैं इतना छोटा था कि समझा ही नहीं दादी क्या बोल रही हैं! पर, अब समझ आ रहा है कि वे हीरे किस तरह से मेरी जिंदगी को बचपन में ही तबाह कर गए। तब पिता जिंदा थे और हमारी आंखों के सामने ही अफसरों ने बुरी तरह हमारी मूंग की खड़ी फसल बड़ी बेरहमी से चौपट करवा डाली थी।"- यह दर्द है नैनसिंह नेताम का, जो छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल गरियाबंद के घने जंगलों के बीच पायलीखंड गांव के रहवासी हैं और असल में उस खेत के मालिक हैं, जहां 1993 में तत्कालीन मध्य-प्रदेश ने यहां हीरों का भंडार होने की पुष्टि की थी। बता दें कि वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ मध्य-प्रदेश से अलग होकर एक नया राज्य बना था।

पायलीखंड गांव छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 190 किलोमीटर दूर बसा एक आदिवासी बहुल गांव है। हीरा भंडार वाले खेत के मालिक नैनसिंह गौंड जनजाति से संबंध रखते हैं। इस गांव में गौंड और कमार जनजाति के परिवार रहते हैं। कोई आठ-दस साल पहले नैनसिंह नेताम के पिता जयराम नेताम का निधन हो चुका है। अब नैनसिंह अपनी बूढ़ी मां और पत्नी के साथ पायलीखंड गांव में ही एक छोटी-सी झोपड़ी में रहते हैं।

नैनसिंह पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं, ''जब में कोई छह बरस का था, इसलिए बहुत ज्यादा याद भी नहीं आता कि सरकार ने हमारे साथ कैसा सलूक किया था। फिर भी पिता ने जो बताया था, वो बताऊं तो वे बाबू लोग अफसर पिता से बोलते थे कि तुम्हारे खेत में हीरे हैं। इसलिए उन्हें यह जमीन सरकार को देनी पड़ेगी। अच्छा-खासा मुआवजा मिलेगा, इतना सारा पैसा मिलेगा कि दो-तीन पीढ़ियों तक कोई काम करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। फिर भी पिता को संदेह था कि सरकार उनके साथ ठगी कर सकती है। इसलिए उन्होंने सरकार को अपनी जमीन देने से मना कर दिया था। पिता को लग गया था कि खेत हड़पने के लिए वे अफसर झांसा दे रहे हैं। मगर सरकार तो सरकार होती है, बाबू लोगों ने साफ कह दिया था कि हीरे वाली जमीन तो सरकार को देनी ही पड़ेगी। अच्छा होगा पैसा हाथ में रख लो, नहीं तो कुछ हाथ न आएगा। इसलिए उन्होंने हमें खेत से खदेड़ दिया और पैसा-वैसा कुछ नहीं दिया। मेरे पिता पैसे के लिए रायपुर जाकर मारे-मारे फिरते। हमने फिर से खेत में फसल लगाने की कोशिश की, पर बाबू लोग बार-बार आकर देखते और गुस्सा करते।"

नैनसिंह आगे बताते हैं, "पिता ने बार-बार मना किया और खेत में ही दोबारा फसल उगाने की कोशिश की तो उन्होंने पुलिस का डर दिखाया और एक दिन सच में वे पुलिस ले आए। हमसे कहा गया कि अब यदि फिर खेत में नजर आए तो जेल जाओगे। उन्होंने हमारे चार एकड़ के खेत को चारों तरफ लोहे के तारों से बांध दिया। लोहे का ही एक बड़ा गेट भी लगाकर उसमें ताला डाल दिया। तब से मेरे माता-पिता दूसरे के खेतों में मजदूरी करने लगे। मैं बड़ा हुआ तो मुझे भी मजदूरी करनी पड़ी। पहले अपनी मां के साथ मजदूरी करने जाता था, फिर विवाह हुआ और मां के साथ पत्नी भी मजदूरी करने साथ जाने लगी।"

नैनसिंह और उनका परिवार अब बड़े किसानों के यहां मजदूरी करता है। हीरे के भंडार वाले उनके खेत से कोई पांच सौ मीटर दूर हम उनके घर पहुंचे तो देखा कि उनकी छोटी-सी झोपड़ी में रहने वाले इस परिवार के पास अपने मेहमानों को बैठाने के लिए कुर्सी तक नहीं है। पूरा परिवार किसी तरह हर दिन अपना पेट भरने के लिए भर संघर्ष करता है। नैनसिंह कहते हैं, ''सरकार गांव के बाहरी लोगों को क्यों बाल बांका न कर सकी, जिन्होंने ट्रकों से खेतों की मिट्टी उलीची, हमारे हीरे निकाले, उन्हें तराशा, बेचा और अब ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं।"
इस बारे में जब गरियाबंद जिले के एक खनिज अधिकारी से बात की तो उन्होंने बताया कि: आधिकारिक तौर पर राज्य सरकार ने यहां हीरे की खुदाई कभी की नहीं। इसलिए पायलीखंड गांव से राज्य सरकार को एक भी हीरा नहीं मिला।"

वहीं, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के खनिज विभाग के मुताबिक 1993 में भारतीय खान सर्वेक्षण और राज्य शासन ने मिलकर एक सर्वे किया था और इस पूरे क्षेत्र में करीब 3 हजार कैरेट हीरे मिलने की संभावना जताई थी।

दूसरी तरफ, केंद्रीय वन व पर्यावरण के निर्देश पर छत्तीसगढ़ सरकार ने 20 फरवरी, 2009 में उदंती-सीतानदी बाघ अभ्यारण्य घोषित किया था। इस बाघ अभ्यारण्य परियोजना के तहत 851 वर्ग किलोमीटर कोर जोन बनाया गया है। पायलीखंड की हीरा खदान इसी कोर जोन में आती है। लिहाजा, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत बाघों की सुरक्षा को देखते हुए वन व पर्यावरण मंत्रालय से हीरे की खुदाई के लिए कार्य करने की अनुमति मिलनी मुश्किल हो रही है। इसलिए सरकारी स्तर पर हीरा उत्खनन नहीं हो पा रहा है।

पायलीखंड गांव जांगड़ा ग्राम पंचायत के तहत आता है। जांगड़ा पंचायत के पूर्व सरपंच चमार सिंह नेताम का इस बारे में कहना है कि 30-35 साल पहले गांव वाले खेत के चमकीले पत्थर उठाकर मैनपुर के व्यापारियों को 20-25 रु. में बेच देते थे। इस तरह बाहरी लोगों को पता लग गया कि यहां हीरे हैं। वे गैर-कानूनी तरीके से सरकारी जमीनों पर खुदाई करने लगे और हीरों को लूट-लूटकर मालामाल हो गए, लेकिन यहां के गौंड और कमार आदिवासी आज भी महुआ बीनकर गुजारा ही करते हैं।

गांव के सरपंच और अन्य ग्रामीण बातचीत में बताते हैं कि हीरा तस्करों ने गांव के नजदीक जमीनों को खोद-खोद कर गहरी खदानों में बदल दिया। फोटो: त्रिलोचन मानिकपूरी 

यदि सुरक्षा के लिहाज से देखें तो हीरे की मुख्य खदान यानी नैनसिंह की जमीन पर सरकार द्वारा लगाए गए सीमेंट के दो जर्जर खंबे हैं और जंग खाता लोहे का गेट टूट चुका है। जाहिर है कि आज भी यह पूरी खदान हीरा निकलने के लिए तस्करों के सामने खुली है। बरसात में जब इंद्रावती नदी का बहाव तेज होता है तो गांव की सड़क नदी में डूब जाती है और यह क्षेत्र पुलिस प्रशासन की पहुंच से दूर हो जाता है। इसी समय अवैध खनन सबसे ज्यादा होता है। पड़ोसी राज्य ओडिशा और रायपुर के व्यापारी बरसात के दौरान यहीं रहते हैं। स्थानीय मजदूर को यदि हीरा मिला तो वह व्यापारी को दो से तीन सौ रुपए में बेच देता है।"

सरकार द्वारा नैनसिंह के खेत पर लगाए गेट के बचे हुए खंबे। फोटो: शिरीष खरे

दूसरी तरफ, गरियाबंद जिला पुलिस का मानना है कि साल 2015 में 30 नंवबर को ओडिशा के दो तस्करों को 225 नग हीरों के साथ क्राइम ब्रांच ने पकड़ा था, जिनकी कीमत लगभग 25 लाख आंकी गई थी। उसी साल 17 नवंबर को एक युवक से 38 नग हीरे बरामद हुए थे। पुलिस छह साल में तस्करी के 29 प्रकरण बना चुकी है। हालांकि, इस बारे में जब आप जिला पुलिस अधीक्षक स्तर के किसी अधिकारी से औपचारिक बात करेंगे तो उनके पास एक टका-सा जवाब होगा: पायलीखंड गांव के आसपास चौकसी बढ़ाई गई है। इससे अवैध उत्खनन पर लगाम लग गई है।

वहीं, इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य खनिज विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि 1999 में अविभाजित मध्य-प्रदेश सरकार ने सुरक्षाबल के जवानों को भी यहां तैनात किया था। लेकिन, बाद में यहां से सुरक्षा हटा ली गई थी।

हीरे की खदान जहां कभी फसल लहलहाई करती थीं। फोटो:शिरीष खरे 

पायलीखंड में जब हम नैनसिंह के घर में उनकी मां जेमनीबाई से मिलने पहुंचे तो वे उठकर खड़ी हो गईं। बहुत देर तक बातचीत करने के बाद जब लौटते समय हमने उनसे इजाजत मांगी तो उन्होंने एक चुभती हुई बात कही।

जेमनीबाई बोलीं: ''हमें कुछ नहीं मिला, और हमें सरकार से कुछ चाहिए भी नहीं। हमें अब हमारा खेत भी नहीं चाहिए। उसे तो इतने सालों में ही हीरा चोरों ने ऐसा खोद डाला कि वह अब खेती के काम का रहा भी नहीं। फिर भी हमें पैसा नहीं चाहिए साब! सरकार से हमें जमीन का ही कोई टुकड़ा दिलवा दो बस हम मेहनत मजूरी करके अपना पेट पाल लेंगे। हम किसान मजूर आदमी हैं, जमीन मिल गई तो हम अपने यहां ही फसल उगाएंगे, बहू और बेटे को जीने का आसरा मिल जाएगा।"

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