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भारत
राजनीति
स्वतंत्रता की अवधारणा को क्रांतिकारी मानना होगा
संविधान दिवस पर विशेष: आज जब सामाजिक क्रांति की बजाय सामाजिक प्रतिक्रांति का उद्देश्य हावी हो गया है और देश की एकता अखंडता की संकीर्ण अवधारणा ने नागरिक अधिकारों को मनमाने तरीके से छीनने की तैयारी कर ली है तब लगता है कि स्वतंत्रता की अवधारणा एक क्रांतिकारी अवधारणा बन चुकी है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
26 Nov 2020
संविधान दिवस
Image courtesy: The Economic Times

भारतीय संविधान दिवस पर कृषि कानूनों का विरोध करने के लिए दिल्ली आ रहे किसानों को हर कीमत पर रोकने की कोशिशें फिर यह साबित करती हैं कि भारत में सामाजिक न्याय के लिए स्वतंत्रता की अवधारणा कितनी महत्वपूर्ण है और उनमें टकराव नहीं है। जाड़े में किसानों पर लाठीचार्ज और पानी की बौछारों को इसी कीमत पर गलत ठहराया जा सकता है कि यह संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। यह संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणा पत्र का उल्लघन है। वरना राज्य की सुरक्षा के नाम पर निवारक नजरबंदी कानूनों से लेकर धारा 144 के तहत किसी की कभी भी की जाने वाली गिरफ्तारी को सही ठहराया जा सकता है।

जो लोग मानते हैं कि निजी स्वतंत्रता की अवधारणा सिर्फ अर्णब गोस्वामी या उनके जैसे उन्माद फैलाने वाले पत्रकारों और राजनेताओं की आजादी तक सीमित है उनकी बात तो जाने दीजिए लेकिन जो मानते हैं कि स्वतंत्रता देश के उन सभी नागरिकों को मिली हुई है जो शांतिपूर्ण तरीके से अपने नागरिक अधिकारों का प्रयोग करना चाहते हैं उनसे तो संवाद करना ही होगा। यह संवाद उनसे भी करना होगा जो लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे हैं और उसे संचालित कर रहे हैं और तमाम दबावों के बावजूद कभी कभी खुले में सांस लेने की इच्छा जाहिर करते हैं।

दरअसल संविधान के जो दो बड़े उद्देश्य थे उनमें से पहला उद्देश्य था देश की एकता और अखंडता को कायम करना और दूसरा उद्देश्य था सामाजिक क्रांति। सामाजिक क्रांति के भीतर मौलिक अधिकार समाहित थे। लेकिन उनके भीतर सामुदायिक उद्देश्यों पर जब भी ज्यादा जोर दिया जाता था तो वे स्वतंत्रता को छांटने का काम करते थे।

एक तरह से एकता और अखंडता और सामाजिक क्रांति दोनों उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के औचित्य को अपने अपने ढंग से सिद्ध करते थे। इनमें कही संपत्ति जब्त करने तो कहीं राजनीतिक आजादी छीनने का राज्य का अधिकार प्रभावी होता था। लेकिन फिर भी फिर भी भारत जैसे गंभीर सामाजिक और आर्थिक विषमता पर आधारित समाज में जब भी सामाजिक क्रांति की बात होती थी तो उससे लगता था कि आम आदमी का कहीं न कहीं सबलीकरण होगा और उससे मौलिक अधिकारों का दायरा बढ़ेगा और समाज का लोकतांत्रीकरण होगा।

लेकिन आज जब सामाजिक क्रांति की बजाय सामाजिक प्रतिक्रांति का उद्देश्य हावी हो गया है और देश की एकता अखंडता की संकीर्ण अवधारणा ने नागरिक अधिकारों को मनमाने तरीके से छीनने की तैयारी कर ली है तब लगता है कि स्वतंत्रता की अवधारणा एक क्रांतिकारी अवधारणा बन चुकी है। देश की एकता और अखंडता और सामाजिक क्रांति की गंगा जमुनी अवधारणा के बीच अब स्वंतत्रता की विलुप्त सरस्वती की तलाश की जानी चाहिए और उसे किसी भी प्रकार से जीवित किया जाना जरूरी है।

विडंबना देखिए कि आपातकाल के दमन से टकराने का दम भरने वाली और लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल करने का श्रेय लेने वाली जनसंघ पार्टी का रूपांतरित रूप भारतीय जनता पार्टी आज लगभग वही कर रही है जो आपातकाल के दौरान कांग्रेस पार्टी ने किया था। हालांकि वह अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और तीन तलाक को अवैध घोषित करने से लेकर श्रम सुधार और नए कृषि कानून सभी को आजादी और मुक्ति ही साबित करती है। वह लव जेहाद के प्रस्तावित कानूनों को भी स्त्रियों की मुक्ति की अवधारणा से जोड़ती है। लेकिन हकीकत में इनके परिणामस्वरूप देश की एकता और अखंडता और पूंजीवादी क्रांति के लिए प्रतिक्रांति की ऐसी लहर चल पड़ी है कि इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता खो गई है।

अगर गौर किया जाए तो संविधान के 44 वें संशोधन, पंचायती राज कानून, 18 वर्ष के युवाओं को मताधिकार और बाद में वामपंथी प्रभाव में यूपीए सरकार की ओर से पास किए गए शिक्षा और भोजन के अधिकार के साथ मनरेगा जैसी योजनाओं को छोड़ दिया जाए तो हमारी विधायिका निरंतर नागरिकों की स्वतंत्रता, गरिमा और सम्मान को प्रतिबंधित करने वाले कानून पास करने की चैंपियन बनती जा रही है।
 
निवारक नजरबंदी कानूनों की जो परंपरा अंग्रेजों ने 1818 में बंगाल जेल नियमन नियमावली के माध्यम से शुरू की थी उसे आजाद भारत में उन नेताओं ने नए रूप मे अपनाया जो उनका दमन झेलकर और उन्हें खत्म करने की कसम खाकर सत्ता मे आए थे। 1950 में जब संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकार चार्टर जारी किया तभी भारत सरकार ने निवारक नजरबंदी कानून पारित किया।

तब तर्क दिया जाता था कि देश में वामपंथी अराजक शक्तियां हैं और विघटनकारी व सांप्रदायिक लोग हैं, इन्हें इन कानूनों के बिना नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इस कानून की अवधि 1969 तक बार बार बढ़ाई गई। 1971 में मीसा कानून आया, तो 1974 में काफीपोसा, 1980 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए बना। इसी के साथ यह भी याद दिलाना जरूरी है कि अंग्रेज सरकार ने 1915 में जो डीआईआर कानून बनाया था उसे 1962 में फिर से सक्रिय किया गया और उसका बहुत सारे विपक्षी राजनेताओं पर उपयोग किया गया। यह सिलसिला 1985 के टाडा, 2002 के पोटा और 1967 के यूएपीए कानून को 2008 में फिर से झाड़ पोंछकर करके जारी किया गया।

आज संविधान की उद्देशिका में दिए गए `हम भारत के लोग’ और व्यक्ति की गरिमा के पदों के साथ जब इन कानूनों को रखकर देखा जाता है तो लगता है कि या तो संविधान का दावा गलत है या फिर इन कानूनों का होना गलत है। दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं। यानी मुट्ठी भी तनी रहे और कांख भी ढकी रहे यह कैसे हो सकता है। हम भारत के लोगों की श्रेष्ठता को भारत सरकार ने हथिया लिया है और व्यक्ति की गरिमा को पार्टियों के `गिरोह’ ने। आज अपने विरोधियों को गिरोह कहने का चलन बहुत बढ़ गया है लेकिन वास्तव में गिरोह तो उन्हीं का होता है जिन्होंने सत्ता पर कब्जा कर लिया है या कब्जा करने की तैयारी में हैं। इनके बीच नागरिक या हम भारत के लोग लाचारी का अनुभव करते हैं।

आज की स्थितियां देखकर लगता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का जो दावा 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की पीठ के फैसले के बाद किया जाता है वह फिर एके गोपालन बनाम मद्रास राज्य की 1971 की स्थिति पर लौट गया है। कहा जाता है कि सात साल बाद आए इस फैसले से हमारी न्यायपालिका ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक की यात्रा कर ली। इस फैसले पर इतनी खुशी जताई गई कि जैसे संविधान सभा ने `उचित प्रक्रिया’ की जो अवधारणा संविधान निर्माण के दौरान छोड़ दी थी उसे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में शामिल कर दिया। जिस न्यायपालिका ने कम्युनिस्ट नेता एके गोपालन की गिरफ्तारी को अवैध बताने से इनकार कर दिया था उसने उचित कारण बताए बिना इंदिरा गांधी की बहू मेनका गांधी का पासपोर्ट जब्त करने को अवैध बताया।

`उचित प्रक्रिया’(Due Process) अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का ऐसा कवच है जो हमें अपने संविधान निर्माण के दौरान मिलते मिलते रह गया। चूंकि हम अंग्रेजों के उपनिवेश से आजाद हो रहे थे इसलिए अमेरिकी विधिशास्त्र की इस अवधारणा का महत्व नहीं समझ सके और तमाम जद्दोजहद के बावजूद उसे अपना नहीं सके। हालांकि डा भीमराव आंबेडकर पर अंग्रेजों का प्रभाव कम नहीं था लेकिन वे अमेरिकी संविधान में पांचवें और 14 वें संशोधन के माध्यम से डाले गए `उचित प्रक्रिया’ के सिद्धांत को अपने संविधान में भी जगह दिए जाने के पक्ष में थे। लेकिन विडंबना देखिए कि संविधान का आरंभिक मसविदा तैयार करने वाले बी.एन. राव ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की सलाह पर उसे हटवा दिया।

फेलिक्स फ्रैंकफर्टर ने कहा कि यह एक अलोकतांत्रिक सिद्धांत है जो चुने हुए प्रतिनिधियों के कानूनों पर वीटो लगाने का अधिकार परोक्ष रूप से नियुक्त की गई न्यायपालिका को देता है। यानी न्यायिक समीक्षा का यह विशिष्ट अधिकार लोकतंत्र को एक कुलीनतंत्र में बदल देता है। इसलिए हमारी संविधान सभा `उचित प्रक्रिया’ पर लंबे समय तक झूलने के बाद आखिर में उसे हटाने के लिए तैयार हो गई। इसके हट जाने से तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने बड़ी राहत की सांस ली।

यह तो कहिए कि डा भीमराव आंबेडकर ने किसी तरह से संविधान सभा में मसविदे के अनुच्छेद 15 और 15 ए(संविधान के अनुच्छेद 21 और 22) में यह बात जुड़वा दी कि किसी को भी कारण बताए बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा और निवारक नजरबंदी कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को तीन माह से ज्यादा नहीं हिरासत में नहीं रखा जा सकता। उसके बाद रखने के लिए सलाहकार परिषद की राय लेनी होगी। आंबेडकर ने साफ शब्दों में कहा कि अनुच्छेद 21 जिस तरह से पारित किया गया है उससे भारत की जनता बहुत नाराज है। उसकी भरपाई के लिए अनुच्छेद 22 में व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले कारण जानने, वकील की सलाह पाने और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार देकर किया जा रहा है।

कल्पना कीजिए आज अगर अनुच्छेद 21 में सचमुच `उचित प्रक्रिया’ का पद शामिल होता तो हमारी न्यायपालिकाएं नागरिक अधिकारों की रक्षा में कितनी सक्षम होतीं। आज भले हमारे संविधान में 101 संशोधन हो चुके हैं लेकिन निकट भविष्य में ऐसी पार्टी के सत्ता में आने की कल्पना नहीं की जा सकती जो अमेरिका के पांचवें और 14 वें संविधान संशोधन की तरह `उचित प्रक्रिया’ का पद अनुच्छेद 21 में जोड़ सके। उचित प्रक्रिया का अर्थ उस कानून से है जो युक्तिसंगत हो और जिसमें मनमानी कार्रवाई की गुंजाइश न हो।

अगर कानून वैसा नहीं है तो अदालत उसे रद्द कर सकती है। निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की नई व्याख्याओं के माध्यम से निजता के अधिकार को भी मौलिक अधिकार और समय समय पर अनुच्छेद 21 में दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार माना है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने 27 किस्म के अधिकार बताए हैं जिसमें भोजन, पानी, स्वास्थ्य, पर्यावरण, रोजगार, प्राकृतिक न्याय का अधिकार, सम्मान का अधिकार जैसे जीवन के जरूरी अधिकार शामिल हैं।

लेकिन जब न्यायिक उपचार देने वाले जीवन रक्षक औषधि के रूप में उपलब्ध अनुच्छेद 32 का दायरा संकुचित किए जाने की बात चल रही हो और जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार संबंधी तमाम याचिकाओं को अदालतें लंबे समय तक टालती जा रही हों, तब स्वतंत्रता का अधिकार सचमुच क्रांतिकारी अधिकार बन जाता है। यह सब एक खास आर्थिक वर्ग और उसके समर्थक राजनीतिक वर्ग के इशारे पर ही हो रहा है। इसलिए इन्हें पाने की कोशिश आम जनता के हक से जुड़ जाता है। दरअसल छह तरह की स्वतंत्रताएं देने वाला अनुच्छेद 19 भी अनुच्छेद 21 यानी जीवन और निजी स्वंतंत्रता के अधिकार का ही विस्तार है।

वही `उचित प्रक्रिया’ का सिद्धांत वहां `उक्तिसंगत निर्बंध’ के रूप में मौजूद है। जिस सिद्धांत का ही हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल के मामले में आईटी कानून की धारा 66 ए को रद्द कर दिया था। लेकिन अदालतें नागरिक अधिकारों की रक्षक उस समय नहीं बनतीं जब विधायिका और कार्यपालिका उन पर अंकुश लगाने को तैयार बैठी हों।

हालांकि उचित समय यही है। अदालतें भी जनमत का इंतजार करती हैं और देखती हैं कि क्या जनता अपने अधिकार चाहती है या नहीं। अगर जनता स्वयं ही उन्हें लव जेहाद के कानून के नाम पर या डिजिटल मीडिया पर अंकुश के नाम पर समर्पित करने को तैयार है तो अदालतें कार्यपालिका और विधायिका से टकराव क्यों लेंगी। इसलिए पिछली सदी की सामाजिक क्रांति आज स्वतंत्रता के अधिकार को क्रांतिकारी मानकर ही हो सकती है उसका दमन करके नहीं।

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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