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कोरोना संकट : दो महीने बाद अचानक अभयदान! क्यों? कैसे?
‘घर में ही रहना है’ कहने वाले लोग अचानक ‘कब तक घर में रहेंगे’ और ‘अब तो कोरोना के साथ ही जीना है’ कैसे कहने लगे? और क्या केवल कपड़े के मास्क के भरोसे ही कोरोना को मात दी जा सकती है? अगर हां, तो इस सब बंदी की ज़रूरत ही क्या थी?
मुकुल सरल
21 May 2020
कोरोना संकट
लॉकडाउन-4 के दौरान ढील मिलते ही दिल्ली में पहले की तरह जाम भी लगने लगा है। फोटो (19 मई, 2020) साभार : सोशल मीडिया

22 मार्च को 14 घंटे के ‘जनता कर्फ़्यू’ के जरिये कोरोना की चेन तोड़ने का ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ द्वारा स्थापित ‘वैज्ञानिक’ दावा करने वाले भक्त और गोदी मीडिया दो दिन बाद 24 मार्च को ही मोदी जी की घोषणा अनुसार 21 दिन में कोरोना के ख़ात्में की बात करने लगे। कहने लगे कि तीन दिन ज़्यादा ही हैं क्योंकि महाभारत का युद्ध तो 18 दिन में ही जीत लिया गया था। ख़ैर इस महाभारत के युद्ध के लिए रामायण काल की ‘लक्ष्मण रेखा’ घरों के दरवाज़े पर खींच दी गई और मोदी जी ने कहा कि कोरोना का अर्थ है- ‘कोई रोड पर न निकले’ और इन 21 दिन एक ही काम करना है- घर में रहना है, घर में रहना है, घर में रहना है।

ख़ैर, 21 के फिर 40 दिन (19 दिन का लॉकडाउन-2, 15 अप्रैल से 3 मई) हुए। हां, इससे पहले 5 अप्रैल को घर की बत्ती बुझाकर दीये, मोमबत्ती जलाने और इससे पैदा होने वाली बेतहाशा हीट (गर्मी) से कोरोना की समाप्ति के ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों’ के दूसरे दावे के बाद भी जब ‘गो कोरोना गो’ नहीं हुआ, तब ये दिन बढ़कर 54 हो गए (14 दिन का लॉकडाउन-3, 4 मई से 17 मई), लेकिन हालात संभलने की बजाय और बिगड़े हुए ही दिखे। मगर इसके साथ ही 18 मई से एक ढीले-ढाले लॉकडाउन-4 की शुरुआत हो चुकी है।

यही मेरा सवाल है, यही मेरी चिंता है कि जब पहले लॉकडाउन के समय 500 के करीब कोरोना संक्रमण के केस थे तब बिल्कुल ही घर से नहीं निकलना था। मतलब किसी से हाथ भी छू जाने का मतलब ख़तरा था। भक्त और गोदी मीडिया भी दिन-रात यही सलाह दे रहे थे कि इतना बड़ी वैश्विक बीमारी है और कुछ लोग कुछ दिन घर में नहीं बैठ सकते। बेघर भी उनके दुश्मन हो रहे थे, पलायन करते मज़दूर भी और उनकी मदद करते लोग भी। और बीमार भी। ये सभी उनके लिए दुश्मन, देश के दुश्मन टाइप थे। लेकिन जब केस एक लाख से ऊपर पहुंच गए हैं और मरने वालों की संख्या भी 3 हज़ार से ज़्यादा हो गई है तब अचानक से सबकुछ खोलने की जल्दी दिख रही है।

Corona update india 21 may_0.jpg

अब भक्त और गोदी मीडिया दोनों इसकी वकालत करते हुए हमें समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ‘कब तक सब बंद रहेगा’। ‘अब तो कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी होगी’। अरे भाई, समझने वाले तो पहले लॉकडाउन के समय ही समझ रहे थे कि कोरोना जल्दी नहीं जाने वाला या शायद कभी नहीं जाने वाला। इसी के साथ जीने का अभ्यास करना होगा। लेकिन तब सब कुछ रोक दिया गया। घर बंद, बाज़ार बंद, रेल बंद, देश बंद। बिल्कुल नोटबंदी की तरह देश ठप्प कर दिया गया। जबकि उस समय भी बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और हम जैसे नादान जानकार भी कह रहे थे कि नोटबंदी से कुछ नहीं होगा। न कालाधन मिलेगा, न भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, न नकली नोटों का धंधा रुकेगा। लेकिन उस समय भी भक्त और गोदी मीडिया यही कह रहे थे कि कालाधन और भ्रष्टाचार की एक ही दवा है नोटबंदी। इन लोगों ने तो नोटों में नैनो चिप और जीपीएस सिस्टम भी लगवा दिया था। ख़ैर क्या हुआ सबने देखा और तबसे बर्बाद हुई अर्थव्यवस्था आज तक न संभली।

यही हाल कोरोना में किया जा रहा है। पहले इस कदर बंद किया गया कि कोरोना के अलावा किसी अन्य बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को इलाज तक मयस्सर नहीं हुआ। अस्पतालों की ओपीडी बंद। प्राइवेट डॉक्टरों के क्लीनिक बंद। गर्भवती महिलाओं को भी इधर से उधर दौड़ाया गया। मतलब ऐसा डर कि दूसरे के साये से भी कोरोना का ख़ौफ़। घर में भी दो गज़ की दूरी। लेकिन दो महीने बाद अचानक अभयदान! अचानक ये ज्ञान प्राप्त हो गया कि सिर्फ़ मास्क पहनकर और सोशल (फिज़ीकल) दूरी अपना कर ही कोरोना को मात दी जा सकती है। और अब तो बाज़ार से लेकर फैक्ट्रियों तक में ये सोशल डिस्टेंसिंग भी दिखाई नहीं दे रही है। बस मुंह पर गमछा या रुमाल बांध लो और कोरोना की छुट्टी।

कोई बताएगा कि आज जब कोरोना (कोविड-19) से संक्रमित लोगों की संख्या विश्व में क़रीब 50 लाख और भारत में एक लाख के पार हो चुकी है तो ये ज्ञान कहां से आया कि सबकुछ खोल देना चाहिए। हक़ीक़त तो यही है कि सबकुछ तो पहले भी बंद नहीं करना था। आज जैसे राज्य अपने हिसाब से रेड ज़ोन, येलो ज़ोन, ग्रीन ज़ोन तय कर रहे हैं, यह अधिकार पहले दिन से उनके पास होना चाहिए था और राज्य को ये अपने ज़िला प्रशासन पर छोड़ देना चाहिए था कि वे किस इलाके को पूरी तरह बंद करते हैं और किसे खोलते हैं। ट्रेन भी जिस तरह आज शुरू की जा रही हैं, उन्हें जारी ही रहना था, उन्हें चलाने के जो एहतियात आज बरते जा रहे हैं वे पहले भी बरते जा सकते थे। और जहां तक मरीजों की संख्या दोगुनी होने की दर घटाने और मरीज़ों के बढ़ने के हिसाब से तैयारी की बात थी तो वो तैयारी आज भी नहीं दिखाई दे रही।

न कोई नये अस्पताल बने हैं, न नये वैटिंलेटर आए हैं। सभी स्वास्थ्य और आपदाकर्मियों जिनमें आशा कर्मी और सफाई कर्मी भी शामिल हैं, को भी पीपीई किट और विशेष मास्क मिल गए हों ऐसी भी ख़बरें नहीं हैं। हां, अब पीपीई किट और एन95 मास्क की किल्लत को लेकर पहली की तरह ख़बरें नहीं मिल रही हैं। टेस्ट की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन अभी भी सब्र करने लायक हो ऐसा नहीं है। इसके अलावा अभी भी न बेघरों और प्रवासी मज़दूरों को शहर में ही बेहतर सुविधा और खाना देने की व्यवस्था हो पाई है, न उन्हें उनके गांव-घर पहुंचाया जा सका है। सरकारी क्वारंटीन के हालात हम सबके सामने हैं कि लोग वहां किन स्थितियों में रखे जा रहे हैं। हालात ये हैं कि वहां से लोग कूद-कूदकर भाग रहे हैं। और इस सब आधी-अधूरी तैयारियों के बीच एक खुला-खुला लॉकडाउन-4 शुरू कर दिया गया है जो 31 मई तक जारी रहेगा। इस बीच नियमित रेल, हवाई जहाज़ सबकुछ शुरू कर दिया जा रहा है।

ख़ैर कुछ भी हो हमारे लोगों की खासकर भक्त लोगों का ये कॉन्फिडेंस देखने लायक है जो वो सिर्फ एक सामान्य मास्क के बूते अब कोरोना जीतने निकले हैं। इनसे मिलिए, बात कीजिए तो नहीं लगता कि कोई डरने की बात है। सबकुछ सामान्य सा शो किया जा रहा है। वैसे हक़ीक़त यही है कि इतने दिनों में उच्च और मध्य वर्ग ने खुद को सुरक्षित कर लिया है और आगे के लिए भी दो गज़ की दूरी के साथ सुरक्षित ज़ोन तैयार कर लिया है, लेकिन ग़रीब को ये सब सुविधा नहीं। वो अब बेरोज़गारी में भूख से भी मर रहा है, घर वापसी के दौरान हादसों में भी और अब कोरोना का भी सबसे ज़्यादा आसान शिकार वही होगा। आज ही यूपी, बिहार, झारखंड तमाम जगह से रिपोर्ट है कि अब कोरोना के ज़्यादातर मामले प्रवासी मज़दूरों के बीच से आ रहे हैं।   

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