NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोरोना:  मनुष्य से अधिक मनुष्यता पर है संकट
लोग फिजिकल डिस्टेन्स बनाने में ज़रूर लापरवाह लग रहे हैं लेकिन सामाजिक दूरी बढ़ाने में उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
डॉ. राजू पाण्डेय
15 Apr 2020
covid

कोविड-19 से बचने की युक्तियों और हमारे सामाजिक ढांचे की कुरीतियों की पारस्परिक संगति दुःखद भी है और चौंकाने वाली भी। पता नहीं यह सोशल डिस्टेन्सिंग और हैंड हाइजिन जैसी युक्तियों का सहज गुण धर्म था या हमारे अंदर उबाल मारते अतीत प्रेम (जो मनुवादी व्यवस्था को न्यायोचित और विज्ञान सम्मत ठहराने के बहाने तलाशता ही रहता है) का असर कि कोरोना और सामाजिक अलगाव की जुगलबंदी देखते ही बनती है। लोग फिजिकल डिस्टेन्स बनाने में जरूर लापरवाह लग रहे हैं लेकिन सामाजिक दूरी बढ़ाने में उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। एक ओर स्वयं को सभ्य और सुशिक्षित मानने वाला उच्च वर्ग और इस उच्च वर्ग को अपना आदर्श मानने वाला मध्यम वर्ग है जो बोरियत के बावजूद घर पर बने रहने और अपनी पसंदीदा डिशेस के बिना रह लेने को राष्ट्र के लिए की गई एक बड़ी कुर्बानी के रूप में पेश कर रहा है।

दूसरी ओर वे लोग हैं जो इस प्रभु वर्ग की दृष्टि में अशिक्षित हैं, असभ्य हैं, अस्वच्छ हैं, अनुत्तरदायी हैं और अपनी लापरवाही के कारण देश को खतरे में डाल रहे हैं। इनके बारे में यह कहा जा रहा है कि ये सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के कारण मुफ्तखोर बन गए हैं और अपने मनमौजी स्वभाव  तथा नासमझी  के कारण लॉक डाउन के अनुशासन का पालन करने में असमर्थ हैं। जहाँ देवतुल्य सेलिब्रिटी देश के प्रति करुणा करके खुद घर का काम करने जैसे महान त्याग कर रहे हैं वहीं इन मजदूरों से जरा सी भूख तक बर्दाश्त नहीं हो रही है!

संभवतः ई कॉमर्स और ऑन लाइन फ़ूड सप्लाई का आदी बन चुका, कैशलेस अर्थव्यवस्था की वकालत करने वाला युवा वर्ग यह भूल चुका है कि उसकी थाली तक पहुंचने वाली हर चीज के पीछे इन्हीं गंदे और बदबूदार कहलाने वाले किसान-मजदूरों की मेहनत छिपी हुई है। कोरोना ने इस युवा वर्ग के श्रम के तिरस्कार की प्रवृत्ति को तात्कालिक समर्थन दिया है। यदि कोरोना से बचने के लिए हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें ह्यूमन इंटरफेज न्यूनतम हो- जब मनुष्य ही संक्रमण का कारण माना जाएगा तो फिर हमें खुद को टेक्नोलॉजी और रोबोट्स के हवाले करना ही होगा।

कोरोना ने अस्पृश्यता की अवधारणा को घातक रूप से विज्ञान सम्मत आधार प्रदान किया है। यह अस्पृश्यता  जाति भेद, रंग भेद और नस्ली नफ़रत से भी भयानक है क्योंकि इसका विस्तार मानव के स्पर्श, गंध और हर उस प्रक्रिया तक है जो सामीप्य और निकटता की आश्वासनकारी ऊष्मा के द्वारा  मनुष्य को राहत प्रदान करती है।

कोरोना ने मनुष्य और मनुष्य के बीच संदेह की दीवार खड़ी की है। किस मित्र, किस परिजन, किस रक्त संबंधी के रूप में कोरोना का आक्रमण होगा यह भय पहले से ही कमजोर पड़ चुकी पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था पर निर्णायक आघात करता लगता है। नगरीय समाज को तो फिर भी न्यूक्लियस फैमिली का अनुभव है किंतु ग्रामीण समाजों में जहां संयुक्त परिवार अभी भी जीवित है कोरोना के द्वारा थोपे गए इस सन्देहजनित एकांत को स्वीकृति मिलना कठिन होगा।

कोरोना की यह प्रकृति संदेह और घृणा के नैरेटिव को फैलाने के लिए एक हथियार के रूप में बड़ी आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है और किसी जाति, नस्ल या धार्मिक समुदाय को इस बीमारी के प्रसार के लिए उत्तरदायी ठहराकर बड़ी आसानी से उसे हिंसा का शिकार बनाया जा सकता है।

ग्लोबलाइजेशन ने कोरोना को पैनडेमिक बनाने में अहम योगदान दिया है। लेकिन जब इसके इलाज और नियंत्रण का प्रश्न उठा रहा है तो हम देशों के बीच उसी संदेह और अविश्वास को पनपता देख रहे हैं जिसे व्यक्तिगत स्तर पर इस पैनडेमिक ने फैलाया है। चीन, जहां से यह रोग उत्पन्न हुआ अभी भी इसके विषय में वैसी ही गोपनीयता बरत रहा है जैसी वह अपने अन्य आंतरिक मामलों के संबंध में बरतता रहा है किंतु जब यह वायरस पूरे विश्व के लिए एक खतरा बन गया है तब चीन से कहीं अधिक पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। चीन इसके लिए तैयार नहीं दिखता।

एक ऐसा नैरेटिव भी बनाया जा रहा है कि इस वायरस का प्रसार चीन और उसके व्यापारिक प्रतिद्वंद्वियों की प्रतिस्पर्धा का परिणाम है- एक ऐसी प्रतिस्पर्धा जिसमें विजय प्राप्त करने के लिए बिज़नेस एथिक्स को त्यागकर बायोलॉजिकल वारफेयर का सहारा किसी एक पक्ष द्वारा लिया गया। अमेरिका और चीन के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। अमेरिका और चीन में कौन सचमुच  विक्टिम है और कौन विक्टिम कार्ड खेल रहा है अथवा कोविड-19 का प्रसार एक स्वाभाविक घटनाक्रम है जिसका परिणाम विश्व को भुगतना पड़ेगा – यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर शायद कभी न मिल पाए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अमेरिका द्वारा डब्लूएचओ पर लगाए गए आरोपों का सच सामने आने में तो समय लगेगा लेकिन इतना तो तय है कि डब्लूएचओ से कोविड-19 की भयानकता के आकलन में कहीं न कहीं चूक हुई है। वह स्वयं इस रोग के विषय में अनिश्चय का शिकार रहा और उसकी इस दुविधा ने निर्बाध अंतरराष्ट्रीय आवागमन को बढ़ावा दिया जिसके कारण चीन के वुहान शहर में फैला यह रोग एक पैनडेमिक का रूप ले सका।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर प्रश्न चिह्न लगना कोई नई बात नहीं है। इन पर विकसित और ताकतवर देशों की सरकारों तथा बड़े व्यापारिक घरानों के लिए कार्य करने के आरोप भी लगते रहे हैं। किन्तु यह संभवतः पहली बार है कि अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्क ने अपने हितों की अनदेखी का आरोप विश्व स्वास्थ्य संगठन पर लगाया है।

ग्लोबलाइजेशन, भले व्यापारिक प्रयोजनवश ही, अंतरराष्ट्रीय नागरिक होने का बोध  उत्पन्न करता  है। वैश्विक स्तर पर भाषा, संस्कृति और लोक व्यवहार के परस्पर फ्यूज़न द्वारा एक उदार चेतना के निर्माण में  उसकी भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। ज्ञान विज्ञान के आदान प्रदान को -व्यावसायिक स्वार्थवश ही सही- वैश्वीकरण ने बढ़ावा दिया है। किंतु इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर ग्लोबलाइजेशन के सकारात्मक पक्षों का लाभ कोविड-19 के साथ लड़ाई में अब तक मिलता नहीं दिख रहा है। जहां भारत ने जरूरतमंद देशों को हाइड्रोक्सी क्लोरोक्विन के निर्यात का फैसला लिया है वहीं जर्मनी ने स्पेन, इटली और फ्रांस के मरीजों को अपने यहां लाकर उनका इलाज किया है। ऐसी पहल और भी देशों से अपेक्षित है।

कोविड-19 ने लोगों को संकीर्ण राष्ट्रवाद की ओर धकेला है। विदेशों में रहने वाले प्रवासी श्रमिक,कर्मचारी, व्यवसायी, उद्यमी और छात्र सभी इस संकट की घड़ी में अपने देश वापस लौटना चाहते हैं। उनमें उत्पन्न यह असुरक्षा बोध जितना मातृ भूमि के प्रति सहज लगाव का परिणाम  है उससे कहीं अधिक यह उस सत्य की स्वीकृति का नतीजा है कि हर देश अपने मूल निवासियों की प्राण रक्षा को सर्वोच्च वरीयता देता है और आप्रवासी हमेशा उसकी दूसरी प्राथमिकता होते हैं।

जब जब राष्ट्रों के अस्तित्व पर संकट आता है तब तब वह प्रसिद्ध उक्ति चरितार्थ होती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति विचारधारा एवं उदार मानव मूल्यों से नहीं अपितु संकीर्ण स्वार्थों और राष्ट्र हित से संचालित होती है। 

कोरोना की चिकित्सा दो कारणों से कठिन बन गई है। चिकित्सा विज्ञान के पास इस वायरस की संरचना और  क्रिया विधि के संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। एलोपैथी जिन डबल ब्लाइंड प्लेसिबो कंट्रोल्ड स्टडीज के आधार पर अपनी दवाओं के सुरक्षित होने का दावा करती है उनके लिए समय इस वायरस की आक्रामकता ने नहीं दिया है। रोगियों पर ही विभिन्न औषधियों के प्रयोग किए जा रहे हैं और कोई आश्चर्य नहीं है कि इन औषधियों के कुप्रभावों से रोगियों को गंभीर एवं प्राणघातक क्षति पहुंचती होगी।

यही स्थिति कोरोना के लिए वैक्सीन विकसित करने को लेकर है, पशुओं से प्रारंभ कर धीरे धीरे मनुष्य पर प्रयोग करने की प्रक्रिया अपनाने के लिए आवश्यक समय वैज्ञानिकों को मिल नहीं पा रहा है और कोरोना से ठीक हुए मनुष्यों के प्लाज्मा से वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इन सारे वैक्सीन विषयक प्रयोगों में सैंपल साइज भी अपर्याप्त ही है।

दूसरी कठिनाई इस रोग की संक्रामकता के कारण है। रोगी को अपने परिजनों की मौजूदगी में जो मानसिक संबल मिलता था वह उपलब्ध नहीं है। अपने परिजनों से लगभग अंतिम विदा लेकर अनिश्चित भविष्य की एकाकी प्रतीक्षा करने की बाध्यता भी निश्चित ही रोगियों की जीवनी शक्ति को कमजोर करती होगी। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन एलोपैथी की विश्वसनीयता को स्वीकारता है और इस तरह उन पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की अनदेखी होती रही है जो अनुभव पर आधारित हैं और सैकड़ों वर्षों से लोगों के जीवन का एक भाग रही हैं। एलोपैथी और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के बीच अविश्वास और शत्रुता का संबंध रहा है। यही कारण है ये चिकित्सा पद्धतियां स्वयं को विज्ञान की कसौटी पर कसे जाने से परहेज करती रही हैं और एलोपैथी इन चिकित्सा पद्धतियों के लाभकारी पक्ष को अनदेखा करती रही है। यदि हम एलोपैथी के इतिहास पर नजर डालें तो अनेक रोगों के निदान और चिकित्सा के विषय में उसने अपनी ही पुरानी पद्धतियों और सिद्धांतों को एकदम खारिज किया है। लेकिन यह भी सच है कि जब यह पद्धतियां एवं सिद्धांत प्रचलित थे तब एलोपैथी इन्हें उसी तरह अंतिम सत्य मानती थी जैसी वह आज अपने सिद्धांतों और निष्कर्षों को समझती है। ज्ञान के किसी भी अनुशासन में कार्यरत शोधकर्ता के आत्म विश्वास को अंधविश्वास में बदलते देर नहीं लगती विशेष कर तब जब वह अपनी सीमाओं को स्वीकार करने में संकोच करने लगता है और ज्ञान प्राप्त करने की अपनी पद्धति को एकमात्र उपयुक्त पद्धति मान कर अन्य पद्धतियों को नकारने लगता है। एलोपैथी के चिकित्सा दर्शन में कहीं न कहीं मनुष्य द्वारा प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का भाव समाहित है जबकि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां प्रकृति को मित्र बनाकर चलती हैं बल्कि यह तो मनुष्य को प्रकृति का एक अंग मानती हैं। एलोपैथी आज के तकनीकी विकास के साथ संगति बैठाती है।

आज जब कोरोना के कारण वैश्विक लॉक डाउन की स्थिति है और घटते प्रदूषण के आंकड़े तथा प्रमुदित प्रकृति की तस्वीरें  सुर्खियों में हैं तब भी हम अपनी विकास प्रक्रिया की समीक्षा के लिए तैयार नहीं हैं। हम कोरोना एपिसोड के जल्द खात्मे की कामना कर रहे हैं ताकि पुरानी गलतियों को दुहरा सकें। शायद हम आत्मघाती विकास के मार्ग पर इतना दूर निकल आए हैं कि वापसी नामुमकिन है।

आज भी एलोपैथी का सारा जोर संक्रमण को खत्म करने की दवा बनाने पर है। वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियां  इम्युनिटी और वाइटल फ़ोर्स की बात करती हैं जिनके कारण शरीर बड़ी आसानी से इस तरह के आक्रमणों का सामना कर पाता है। बिना इलाज या मामूली इलाज़ के बाद कोरोना से ठीक हो जाने वाले अस्सी प्रतिशत लोगों का अध्ययन भी उतना ही जरूरी है जितना उन 20 प्रतिशत लोगों का जो इस संक्रमण से गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं।

विश्व के विकसित और इनका अनुकरण करने वाले विकासशील देशों में स्वास्थ्य व्यवस्था पर निजी क्षेत्र का प्रभाव बढ़ता गया है। सरकारें जन स्वास्थ्य के प्रति अपने उत्तरदायित्व से किनारा करती रही हैं। कोविड-19 ने चिकित्सा व्यवस्था पर सरकार के नियंत्रण की जरूरत को रेखांकित किया है। पूरी चिकित्सा प्रणाली बाज़ारवाद की मुनाफ़ा केंद्रित सोच से ग्रस्त है। चिकित्सा विज्ञान विषयक शोध पर भी दवा निर्माता कंपनियों का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है क्योंकि शोध में होने वाले विशाल व्यय का वित्त पोषण इनके द्वारा ही होता है। कोविड-19 ने यह बड़ी शिद्दत से अनुभव कराया है कि किस तरह जन स्वास्थ्य की उपेक्षा आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।      

कोविड-19 ने लोगों की आस्थाओं को झकझोरा है। जब मानवीय प्रयत्नों की सीमाएं उजागर होती हैं, जब वर्षों से परीक्षित और भरोसेमंद प्रणालियां परिणाम देना बंद कर देती हैं तब इन पर विश्वास खंडित होता है और हम आस्तिकों को नास्तिक और नास्तिकों को आस्तिक बनते देखते हैं। अपने अपने अनुशासन की सीमा का बोध धर्म और विज्ञान को किसी चमत्कारिक समाधान की आशा में एक दूसरे का मुंह देखने के लिए बाध्य कर देता है। बहुत बार मनुष्य एकदम विपरीत प्रतिक्रिया देता है। अज्ञात का भय धर्मांधता को बढ़ावा देता है और लोग आत्मघाती रूप से कर्मकांडों का पालन करने लगते हैं। यह देखना आश्चर्यजनक है कि  वैज्ञानिक अपनी ज्ञान मीमांसा की सीमाओं के बोध के कारण विकल्प की तलाश में धर्म की ओर उन्मुख होता है जबकि आम नासमझ आदमी धर्म से आश्वासन और आत्मविश्वास प्राप्त करने के लिए  इसकी शरण में जाता है। 

कोरोना वायरस से भी अधिक खतरनाक उसका भय है जो मानवीय संबंधों की परीक्षा ले रहा है। कोरोना दया, प्रेम, करुणा, सहयोग, सहकार, साहचर्य, त्याग जैसे बुनियादी जीवन मूल्यों और अवधारणाओं को त्यागने का आह्वान कर रहा है। वह मनुष्य को एक स्वार्थी, आत्मकेंद्रित, संदेही अस्तित्व में बदल देना चाहता है- एक ऐसा अस्तित्व जो मनुष्य की छाया से भी भय खाता है, जो निर्जीव वैज्ञानिक एकांत का उपासक है। लेकिन मनुष्य है कि भयभीत होने को तैयार नहीं है। वह कोरोना से संघर्ष कर रहा है। डॉक्टर, नर्स, सफाई कर्मचारी, पुलिस कर्मी, प्रशासनिक कर्मचारी और अधिकारी, समाज सेवी, वैज्ञानिक, व्यवसायी- हर आम और खास आदमी- कोरोना के इरादों को नाकाम करने में लगा है। कोरोना मनुष्यों को जरूर मार रहा है किंतु मनुष्यता को समाप्त करने की उसकी कोशिश कभी कामयाब नहीं होगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

Coronavirus COVID-19 testing india
india coronavirus testing
Coronavirus Pandemic
WHO
Social Distancing

Related Stories

वैक्सीन युद्ध, आसियान और क्वॉड

इस बार ख़ुद मोदी जी ने क्यों नहीं की तीसरे लॉकडाउन की घोषणा?

कोरोना संकट : कृपया, पीड़ित को ही अपराधी मत बनाइए!


बाकी खबरें

  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध
    02 Feb 2022
    पिछले दिनों झारखंड सरकार के कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रदेश के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों की नियुक्तियों के लिए भोजपुरी, मगही व अंगिका भाषा को धनबाद और बोकारो जिला की स्थानीय भाषा का दर्जा…
  • ukraine
    पीपल्स डिस्पैच
    युद्धोन्माद फैलाना बंद करो कि यूक्रेन बारूद के ढेर पर बैठा है
    02 Feb 2022
    मॉर्निंग स्टार के संपादक बेन चाकों लिखते हैं सैन्य अस्थिरता बेहद जोखिम भरी होती है। डोंबास में नव-नाजियों, भाड़े के लड़ाकों और बंदूक का मनोरंजन पसंद करने वाले युद्ध पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ है।…
  • left candidates
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल
    02 Feb 2022
    “…वामदलों ने ये चुनौती ली है कि लूट-खसोट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ एक ध्रुव बनना चाहिए। ये ध्रुव भले ही छोटा ही क्यों न हो, लेकिन इस राजनीतिक शून्यता को खत्म करना चाहिए। इस लिहाज से वामदलों का…
  • health budget
    विकास भदौरिया
    महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
    02 Feb 2022
    कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो
  • 5 election state
    रवि शंकर दुबे
    बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन
    02 Feb 2022
    पूरा देश भारत सरकार के आम बजट पर ध्यान लगाए बैठा था, खास कर चुनावी राज्यों के लोग। लेकिन सरकार का ये बजट कल्पना मात्र से ज्यादा नहीं दिखता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License