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करोना संकट: “हां सुना है कि सरकार हमें पैसे देने जा रही है, लेकिन ये पैसे कब और कैसे मिलेंगे?”
लॉकडाउन के चलते दूसरे राज्यों में काम कर रहे दिहाड़ी मजदूरों के सामने संकट खड़ा हो गया है। इन मजदूरों के पास काम नहीं है। ट्रेन और बस समेत सभी परिवहन सेवाएं बंद होने के बाद अब घर वापसी का भी कोई विकल्प नहीं बचा है।
सोनिया यादव
26 Mar 2020
Daily wage workers
Image courtesy: The Daily Star

“घर में रहें और एक ही काम करें कि अपने घर में रहें।”

मंगलवार, 24 मार्च को देश के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा करते हुए ये बात कही। सभी को घरों में रहने की सलाह के साथ उल्लंघन  करने वालों पर सख्त कार्रवाई की बात भी हुई। इसके साथ ही ट्विटर पर हैशटैग स्टे ऐट होम ट्रेंड करने लगा। लेकिन सवाल ये है कि उनका क्या जिनके पास रहने को घर ही नहीं है, वो क्या करें?

भारत में एक बड़ा तबका दिहाड़ी मज़दूरों और छोटे कामगारों का है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़, भारत में कम से कम नब्बे फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। ये लोग सिक्योरिटी गार्ड, सफाई करने वाले, रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोगों को पेंशन, बीमार होने पर छुट्टी, पेड लीव और किसी भी तरह का बीमा नहीं मिलता है। कई लोगों के बैंक अकाउंट नहीं हैं।

ऐसे में इनकी और इनके परिवार की ज़िंदगी उसी नकद आमदनी पर टिकी होती है जिसे ये पूरे दिन काम करने के बाद घर लेकर जाते हैं। इनमें से कई सारे प्रवासी मजदूर हैं। इसका मतलब ये है कि ये असल में किसी दूसरे राज्य के निवासी हैं और ये काम करने कहीं और आए हैं। ऐसे में जहां ये काम करते हैं वहीं रहते भी हैं। अब जब काम बंद हो गया, तो इनके रहने का ठिकाना भी छीन गया है। ऐसे में ये लोग कैसे घरों में रहें और सिर्फ घरों में ही रहने का काम करें ये सरकार को सोचना चाहिए।

झारखंड के डुमरी जिले के मूल निवासी राजेंद्र बीते दो सालों से मुंबई के एक कारखाने में काम करते हैं। लॉकडाउन के बाद उनका कारखाना बंद हो गया है क्योंकि वो और उनके जैसे कई और मज़दूर कारखाने के पास ही रहते थे, तो अब उनके पास न रहने की जगह और नाही जेब में पैसे है।

राजेंद्र कहते हैं, "हमें मदद चाहिए, हम लोग मुम्बई में बहुत बुरी तरह फंसे हुए हैं। काम बंद हो गया तो मालिक ने रहने की जगह भी खाली करवा ली, खाने-पीने की सुविधा भी नहीं है। महीने के आखिरी दिन चल रहे हैं, पैसे भी नहीं हैं हम लोगों के पास। हमें अपने गांव जाना है, हमारी मदद कीजिए।"

लॉकडाउन के चलते दूसरे राज्यों में काम कर रहे दिहाड़ी मजदूरों के सामने संकट खड़ा हो गया है। इन मजदूरों के पास काम नहीं है। ट्रेन और बस समेत सभी परिवहन सेवाएं बंद होने के बाद अब घर वापसी का भी कोई विकल्प नहीं बचा है, वहीं बंदी की वजह से खाने-पीने के लिए वे दूसरों पर निर्भर हैं। हरियाणा के अंबाला में यूपी के एक मजूदर का वीडियो वायरल हुआ जो 24 घंटे से भूखा था। मजदूर के मुताबिक उसके साथ 26 लोग और हैं।

नोएडा के लेबर चौक से रोज़ाना काम तलाशने वाले मुकेश और उनके जैसे कई दिहाड़ी मज़दूर अब निराश बैठे हैं। इस इलाके में घर और बिल्डिंग बनाने वाले ठेकेदार सस्ते मजदूर लेने आते हैं। लेकिन कोरोना का कहर इन पर खूब बरसा है। अब न इनके पास काम है और न ही मकान मालिक को देने के लिए पैसे।

मुकेश बताते हैं, "मैं बिहार के छपरा से दिल्ली अपने रिश्तेदार के साथ काम की तलाश में आया था। पहले एक गाड़ी की फैक्ट्ररी में नौकरी लगी थी लेकिन फिर नवंबर में वहां काम कम हो गया तो हमें निकाल दिया। उसके बाद परिवार का पेट भरने के लिए मज़दूरी का काम शुरू कर दिया। हर रोज़ छह सौ रुपये मिल जाते थे। अब काम पूरा ही बंद हो गया, ट्रेंन और बस भी बंद हो गई है, घर भी नहीं जा सकते। ऐसे में मैं क्या खाऊंगा और क्या घर पर भेजूंगा।”

योगी सरकार के मज़दूरों को एक-एक हजार की मदद पर मुकेश कहते हैं, “हां सुना तो है कि सरकार हमें पैसे देने जा रही है, लेकिन ये पैसे कब और कैसे मिलेंगे, इसकी हमें कोई जानकारी नहीं है। अगर सरकार को मदद करनी ही है तो जल्दी करे, ऐसा ना हो की हम जैसे लोगों का परिवार भूख से ही मर जाएं।''

भारत में ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो सड़क किनारे ठेला, गुमटी या साईकल लगाकर अपना छोटा-मोटा व्यापार करते हैं। ये लोग कहीं औपचारिक तौर पर पंजीकृत भी नहीं होते। ऐसे में सरकार इन लोगों की मदद कैसे करेगी और इनके ठप्प हुए कारोबार के नुकसान की भरपाई कौन करेगा ये भी चिंता का विषय है।

दिल्ली के कनॉट प्लेस में साईकल पर गोलगप्पे बेचने वाले राम कुमार कहते हैं, " मैं दिल्ली में बीते 15 सालों से हूं। मेरे पिता जी एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे उनके देहांत के बाद हम दोनों भाईयों ने रिक्शा चलाने और गोलगप्पे बेचने का काम शुरू कर दिया। हमारा परिवार यूपी के कुशीनगर में रहता है। जब खेती का समय होता तो हम वहां चले जाते हैं, इसके बाद यहां आ जाते हैं। लॉकडाउन से हम यहीं फंस गए, ऊपर से पूरी खेती ओले गिरने की वजह से बरबाद हो गई है। ऐसे में गांव में परिवार को भी हमसे उम्मीद है। अब हम क्या करेंगे। हम तो न दिल्ली के रह गए ना यूपी के।”

सेंट्रल पार्क में पानी की बोतल बेचने वाले धीरज बताते हैं, "कोरोना वायरस ख़तरनाक है। ये फैल गया तो सब मर जाएंगे। इसलिए घर में रहने को बोला जा रहा है लेकिन जिन लोगों को पास ठौर-ठिकाना है, वो घर के अंदर रह सकते हैं, हम गरीब लोग कैसे घर में बैठ सकते हैं जब हमें पता है कि हमारे पास आगे के 21 दिन कुछ नहीं होगा करने को, पैसे कमाने को। सरकार को जब इस बीमारी का पता था तो पहले ही लोगों को बाहर देश से आने से क्यों नहीं रोका, पहले ही जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए। अमीरों का कुछ नहीं बिगड़ेगा, हम गरिबों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी।”

मीडिया खबरों के मुताबिक 23 मार्च की रात कई मज़दूरों ने जब लॉकडाउन की खबर सुनी तो दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर दूर आगरा, मथुरा अपने घर जाने के लिए बड़ी संख्या में पैदल ही निकल पड़े। रोज कमा कर अपना पेट भरने वाले देश के इन प्रवासी मजदूरों के सामने भूखे रहने की नौबत आ गयी है।

दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे में पिछले तीन दिनों से बस न मिलने के कारण परेशान एक मजदूर के फूट-फूट कर रोने का वीडियो वायरल हो रहा है। एडीटीवी से बातचीत में उसने रोते हुए बताया कि “बिहार में अपने घर जाने के लिए तीन दिनों से बस अड्डे के चक्कर काट रहा हूँ, मगर कोई बस नहीं मिली, बस अड्डे में खड़े होने पर पुलिस मारने के लिए दौड़ाती है, खड़े भी नहीं रहने देती।”

राजस्थान में प्रवासी मजदूरों के लिए काम कर रही संस्था आजीविका ब्यूरो के अभिषेक बताते हैं, " मज़दूरों की स्थिति बहेद गंभीर है। सरकारी मोर्चे पर इनके लिए कोई तैयारी फिलहाल नज़र नहीं आती। राजस्थान और गुजरात की सीमाओं से आवाजाही पर रोक है, इसके बावजूद पिछले 48 घंटों से लगातार प्रवासी मजदूर आ रहे हैं। हमारे पास अब तक 200 से ज्यादा फ़ोन कॉल आ चुकी हैं। जो मजदूर आ रहे हैं, उनके पास पैसों की कमी है। इसके अलावा खाने के लिए भी उन्हें बहुत जद्दोजहद करनी पड़ रही है। सरकार को इनकी परेशानी जल्द दूर करनी चाहिए।"

समाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार ऋचा सिंह कहती हैं, “आप लॉकडाउन के फैसले को लेकर सरकार की पीठ मत थपथपाइए, सवाल करिए कि जब 15 दिसंबर 2019 तक ही चीन में करोना के कहर से दुनिया कांप उठी थी तो अब तक भारत सरकार इसे गंभीरता से क्यों नहीं ले पाई। जब 30 जनवरी 2020 को ही देश में पहले करोना वायरस संक्रमित व्यक्ति की पुष्टी हो गई थी तो सरकार लगभग ढेड़ महीने से हाथ पर हाथ धरे निश्चिंत क्यों बैठी रही? क्यों नहीं पहले जरूरी कदम उठाए गए? क्या इस लॉकडाउन से हम अमीरों की गलती की सज़ा गरीबों को नहीं दे रहे? क्या सरकार इतने बड़े स्तर पर बंदी के लिए पहले से तैयार थी?

बता दें कि भारत के 50 से अधिक समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों ने केंद्र और राज्य सरकारों को ख़त लिखकर लगभग 40 करोड़ से अधिक दिहाड़ीदारों, खेतिहर मज़दूरों, छोटे किसानों, वृद्धा पेंशन भोगियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवालों विशेष वित्तीय मदद दिए जाने की अपील की है।

ख़त भेजनेवाले लोगों में से एक समाजसेवी रीतिका खेड़ा ने मीडिया से बातचीत में कहा, “काम बंद हो जाने और रोज़ कमाने, रोज़ खानेवाला ये वर्ग महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है लेकिन हुकूमत के ज़रिए दी गई राहतों में 'क्लास बाएस' यानी एक ख़ास वर्ग के लिए पूर्वाग्रह साफ़ देखा जा सकता है। कामबंदी के बाद इनमें से बहुत के पास तो खाने को नहीं और सात-आठ फ़ुट लंबी और शायद उससे भी कम चौड़ी झुग्गियों में रहनेवालों के लिए सोशल डिस्टैंसिंग महज़ एक लफ़्ज़ है।"

इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी मंगलवार, 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भेजकर असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा नीति के तहत विशेष भत्ता देने की बात कही। सोनिया गांधी के अनुसार इस आपदा से राहत के लिए जमा की गई राशी वेलफेयर फंड से ख़र्च की जा सकती है।

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार और राज्य सरकारें अपनी ओर से लोगों को तमाम आश्वासन दे रही हैं। कई करोड़ रुपयों के साथ कई योजनाओं की बातें कही जा रही हैं। लेकिन इन सब दावों और वादों के बीच गरीब और मज़दूर वर्ग का संघर्ष कितना लंबा होगा ये किसी को नहीं पता।

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