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भारत
राजनीति
जलती हुई दिल्ली ने फिर दिला दी 1984 की दहशत की याद
यदि जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ज़रूरी संस्थानों पर संविधान को बनाए रखने का भरोसा नहीं किया जा सकता है, तब हम एक ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं, जहां लोग स्थापित मानदंडों से अपनी पीठ फेर लेंगे और अन्य विकल्पों की खोज शुरू कर देंगे। 1984 के नरसंहार के बाद दिल्ली ने जिस हालात का सामना किया था, उन्हें दोहराया जा सकता है।
गौतम नवलखा
29 Feb 2020
 1984 के दहशत की याद

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA), अजीत डोभाल का उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सड़कों पर घूमना इस बात की याद दिलाने वाला एक अप्रत्याशित दृश्य है कि भारत की राजधानी वाले इस शहर की पुलिस जहां सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा नियंत्रित की जाती है, वहां पुलिस व्यवस्था ध्वस्त हो गयी है या उसके हाथ बांध दिये गये हैं। इस प्रक्रिया में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा से जुड़े ग्लैमर और चमक-दमक वाले जनसंपर्क कार्यक्रम की चमक को खोने से नहीं बचाया जा सका। यह सब कुछ हिंदुत्व के कारण हुआ, पैदल सैनिकों का क़हर बरपा देने वाले इस अवतार से डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा से जुड़े महत्व को उनके ही नेताओं ने फीका कर दिया। एक बार शुरू होने के बाद, यह एक दूसरे से झड़प करने वाली भीड़ में बदल गया, क्योंकि अफ़सरों ने इस पूरे घटनाक्रम को अलग नज़रिये से देखा।

बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के साथ काम करने वाले एनएसए को भी इस मामले में घसीटे जाने का मतलब यह है कि यह "मज़बूत" सरकार क़ानून और व्यवस्था को संभाल पाने में असमर्थ है, इस प्रकार इस बात पर चिंता जताई जा रही है कि क्या एक सीमा से आगे कुछ भी संभाल पाने को लेकर उस पर भरोसा किया जा सकता है। चार दिनों के लिए धारा 144 नहीं लगायी जा सकी, लेकिन जैसे ही राजनीतिक असंतोष और नागरिक प्रदर्शनकारी सार्वजनिक रूप से बाहर आए, उसे रोकने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा बिना देर किये इस धारा को थोप दिया। लगभग 96 घंटे तक कोई फ्लैग मार्च नहीं हुआ। देखते ही गोली मारने का कोई आदेश नहीं था। वास्तव में ऐसी स्थितियों को संभालने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया कहीं नहीं दिखाई दी। स्थिति को बिगड़ने और आंतरिक सुरक्षा की दहलीज़ तक पहुंचने वाली क़ानून और व्यवस्था की बिगड़ी हालत को लेकर हुई चूक के माध्यम से पुलिस की जटिलता ही सामने आती है।

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाक़े, जिनमें मौजपुर, ज़ाफ़राबाद, गोकुलपुरी, भजनपुरा और अन्य उपनगर शामिल हैं, वहां चार दिनों के तक पुलिस या तो अपर्याप्त रूप से तैनात थी या फिर बिल्कुल भी मौजूद नहीं थी। जिस समय यह सब लिखने के लिए मैं बैठा हुआ हूं, उस समय तक 34 लोग मारे जा चुके थे (अपडेट : अब तक 42 लोगों की मौत हो चुकी है) और 300 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं; एक मस्जिद और एक मज़ार को तबाह कर दिया गया है, संपत्ति और घरों को लूट लिया गया है और उन्हें जला दिया गया है। 1984 के सिख विरोधी नरसंहार की तरह, दिल्ली पुलिस या तो मुस्लिम विरोधी बलवाइयों की मदद कर रही थी या उनके साथ खड़ी थी।

हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से ही यह स्थिति बनने लगी थी, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सबसे वहशी अभियान चलाया था, जिसे दिल्ली ने कभी नहीं देखा था। दिल्ली में चुनाव से पहले भी एबीवीपी के अलावा अन्य छात्रों पर हुए हमले में पुलिस की भूमिका सभी के लिए ग़ौर करने वाली थी। इस तरह की ढीठ पक्षपातपूर्ण भूमिका के लिए प्रधान मंत्री और गृह मंत्री, दोनों  ने दिल्ली पुलिस की तारीफ़ की थी।

हालांकि जामिया मिलिया इस्लामिया या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों पर हमला करने में दिल्ली पुलिस की भूमिका को देखते हुए यह आश्चर्य की बात नहीं है, जहां उन्होंने एबीवीपी के हथियारबंद गुंडों को परिसर में प्रवेश करने की अनुमति देने के लिए जेएनयू के मुख्य द्वार पर स्ट्रीट लाइट तक बंद कर दी थी और फिर गिरफ़्तारी से बेख़ौफ़ उन लोगों को छोड़ भी दिया गया। दिल्ली पुलिस ने गार्गी कॉलेज के उत्सव के दौरान लड़कियों से छेड़छाड़ करने और छात्राओं को परेशान करने वाले नशे में धुत्त मावालियों को गार्गी गर्ल्स कॉलेज में प्रवेश करने दिया।

ये घटनायें अच्छी तरह से दर्ज हैं और इन्हें लेकर बहुत अधिक चर्चा भी हुई है। जो बातें दर्ज नहीं की गयी या जिस पर चर्चा नहीं हो पायी, वह यह है कि दिल्ली पुलिस अल्पसंख्यकों, हिंदुत्व का विरोध करने वाले हिंदुओं को किस तरह अलग करके देखती है, और किस तरह घेरकर उन लोगों पर हमला करती है और उन्हें आघात तक पहुंचाती हैं, लेकिन वहीं उन ग़ुंडों के साथ सावधानी से पेश आती है। कहीं ऐसा तो नहीं था कि चार दिन तक गुंडों द्वारा की गयी खुली आगजनी, लूटपाट और हत्या बीजेपी के पराजित नेताओं की एक सोची समझी योजना का हिस्सा रहे हों, जिसमें दिल्लीवासियों को आम आदमी पार्टी (आप) को वोट देने के लिए दंडित किया गया हो या फिर विरोध करने और अपने अधिकारों का दावा करने की हिम्मत दिखाने वाले अल्पसंख्यकों पर उत्तर प्रदेश जैसा संगठित हमला करने वाली पुलिस, महज़ एक ऐसी ताक़त बनकर रह गयी है, जो विश्वास दिलाती है कि वे हर नागरिक के साथ हैं।

सही मायने में यही आज की सच्चाई है, जिससे नागरिकों का सामना है। सेवानिवृत्त और सेवारत पुलिस अधिकारियों ने अक्सर बताया है कि किसी भी दंगा जैसी स्थिति को 24 घंटे के भीतर नियंत्रण में लाया जा सकता है। और यह कि यदि दंगा उससे आगे भी जारी रहता है, तो यह कमांड स्तर पर या तो जटिलता का संकेत देता है या फिर इस बात का इशारा है कि पुलिस बल अक्षम हो गया है। लेकिन, सच्चाई यह है कि राजधानी दिल्ली के एक हिस्से को 1984 के सिख विरोधी नरसंहार की कड़वी यादों को फिर से ज़िंदा कर देने के लिए 96 घंटे से अधिक समय तक जलने दिया गया।

कोई शक नहीं कि हर पुलिस कर्मी क्रूर और बेहरम नहीं होता। ऐसे पुलिसकर्मियों के भी उदाहरण हैं, जो असहाय नागरिकों की सहायता के लिए सामने आते रहे हैं। लेकिन हमे बड़े पैमाने पर जो दिखाई देता है, वह यही कि ‘बेकार’ तत्व पुलिस बल पर हावी है और वही हुक्म चलाता है। निश्चित रूप से, यहां तक कि अगर इस तरह के एक पुलिस बल को भी आगजनी और हत्या को रोकने का आदेश दिया जाए, तो यह इन्हें रोकने में सक्षम है। लेकिन सवाल तो यही है कि गृह मंत्रालय द्वारा इस तरह का कोई आदेश क्यों नहीं जारी किया गया?

इसलिए, दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि पुलिस बल,केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा चलाया जाता है, और जो कुछ हो रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि या तो इसकी बनावट या संपूर्ण अयोग्यता के कारण,  या फिर गृहमंत्री की क़ानूनी अज्ञानता के कारण उन्होंने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी का एक बेहद ख़राब प्रदर्शन किया है,जिसका परिणाम ख़राब प्रशासन रहा है। इसलिए यह दुखद है कि शासक, नागरिकों को उनके फ़र्ज़ की याद दिलाये, और वह भी उस समय,जब उनके पास संवैधानिक मूल्यों, विशेष रूप से हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर उनमें ज़िम्मेदारी को याद दिलाने वाले साहस और प्रतिबद्धता की कमी हो। 

इसलिए, जब गृहमंत्री ने लोगों से यह कहकर पुलिस की "अनावश्यक और अनुचित आलोचना" न करने की अपील की, क्योंकि यह "पुलिस बल का मनोबल गिरायेगा" या जब सॉलिसिटर जनरल ने शीर्ष अदालत से प्रतिकूल टिप्पणी नहीं करने के लिए कहा,क्योंकि इससे पुलिस बल का मनोबल टूटेगा,तभी स्पष्ट हो गया कि ऐसी सलाह उस पुलिस बल को सुरक्षा कवच देने के लिए दी गयी थी, जिनके पूर्वाग्रह और भेदभावपूर्ण आचरण ने दिल्ली के नागरिकों को शर्मसार कर दिया है। न तो गृहमंत्री और न ही सॉलीसिटर जनरल ने नागरिकों के टूटते मनोबल पर तिल मात्र की भी चिंता जतायी।

यह भी उल्लेखनीय है कि दिल्ली पुलिस ने कितनी तेज़ी से असहमत होने वाले का शिकार किया है और छात्रों, लड़कियों और लड़कों के ख़िलाफ़ कितनी तेज़ी से कार्रवाई की गयी है, जबकि इसके ठीक उलट, वही दिल्ली पुलिस हिंदुत्व के गुंडों  का पीछे करने को लेकर किस तरह सुस्त होने के लिए मजबूर हो गयी। उदाहरण के लिए, उन्हें दो महीने से अधिक समय हो गया है, और पुलिस, जेएनयू हमले में शामिल गुंडों का पीछा करने में शिथिलता बरत रही है, जबकि उनमें से कुछ की पहचान भी की जा चुकी है। सोचिए, गार्गी गर्ल्स कॉलेज की छात्राओं के साथ यौन उत्पीड़न करने वाले उन गुडों को लेकर यह पुलिस कितनी उदार थीं कि उनके खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत होने के बावजूद उन्हें ज़मानत दे दी गयी।

अचरज की बात तो यह है कि हिंदुत्व के ग़ुडों की निगाहें उस वक्त भी बिना दबाव के अपने शिकार पर टिकी हुई थी,जब उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति की मेजबानी कर रही थी। हालांकि, डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा ने संगठित भीड़ को अपना रास्ता बनाने के लिए एक आदर्श पृष्ठभूमि प्रदान की। क्या यह स्वतःस्फूर्त था,जैसा कि अमित शाह ने दावा किया था, या फिर इसे उकसाया गया था,जैसा कि उनके ही राज्य मंत्री ने दावा किया है ? आख़िर ख़ुफिया इनपुट कहां था ? या फिर यह ख़ुफ़िया विभाग की कोई कमी थी,जैसा कि क़ानून को लागू करने वालों को यह इशारा कर दिया गया था कि वे हिंदुत्ववादियों की योजनाओं और गतिविधियों की रिपोर्ट नहीं करें और इसीलिए, वे इस बात से अनजान रहे कि आख़िर क्या होने जा रहा था?

जब पुलिस एक अराजक बल या पक्षपातपूर्ण बल के रूप में व्यवहार करने लगती है,तो सवाल उठता है कि ऐसे हालात में एक नागरिक को फिर क्या करना चाहिए ? मदद और सहायता के लिए उसे किसकी तरफ़ देखना चाहिए? एक तरफ़ पीड़ितों की तरफ़ से कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की जाती है,लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ हिंदुत्ववादियों की ओर से किसी भी शिकायत को दर्ज कर लिया जाता है,तो ऐसे हालात में हमें क्या करना चाहिए ? खासतौर पर वैसे हालात में,जब AAP सरकार भी अपने स्वयंसेवकों और विधायकों से उत्तरपूर्वी दिल्ली के अशांत हिस्सों में विश्वास बहाली के उपाय करने के लिए कह रही हो।

आज जो सवाल हमें सबसे ज्यादा परेशान करता है, वह यही है कि मदद के लिए किसका मुंह देखें ? इसी कठिन परिस्थिति का सामना दिल्ली के नागरिकों को 1984 में भी करना पड़ा था। यदि जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अनिवार्य संस्थानों पर संविधान को बनाये रखने का भरोसा नहीं किया जा सकता है, तो हम एक ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं, जहां लोग स्थापित मानदंडों से अपना मुंह फेर लेंगे और अन्य विकल्पों की खोज शुरू कर देंगे। ऐसे हालात में वही सबकुछ दोहराया जा सकता है,जिसका सामना दिल्ली ने 1984 के नरसंहार के बाद किया था। नतीजतन, यह मानते हुए कि इन चीज़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता,सबकुछ ठीक हो जायेगा,तो हम भ्रम में हैं।

अगर कोई भीड़ घरों में घुस सकती है या लोगों को छतों से गोली से उड़ाया जा सकता है या फेंके गए पत्थरों का सामना किया जा सकता है, यह सब इस आशंका के साथ कि पुलिस अपराधियों का साथ देगी, तो महज शांति बनाये रखने के लिए हर किसी से बात कर पाना संभव नहीं होगा। दिल्ली को हिलाकर रख देने वाले ये चार दिन इस बात की चेतावनी है कि जब तक लोग पुलिस की भूमिका और भाजपा सरकार के खिलाफ अपना आक्रोश और ग़ुस्सा नहीं दिखाते हैं, तब तक उन लोगों के लिए फिर से लौट पाना मुमकिन नहीं होगा, जो अपने आप को इस बात को लेकर असहाय, असुरक्षित और डरा हुआ महसूस करते हैं कि उनके अस्तित्व को ख़तरा है। यही वह लचारी है,जिसे हिंदुत्ववादी बढ़ावा देना चाहते है, ताकि कुछ लोग उग्र हिंसा के लिए प्रेरित हों, इस तरह, हम एक ऐसे चरण में प्रवेश करने जा रहे हैं, जहां संघर्ष टलेगा नहीं, बल्कि बढ़ेगा।

अगर भाजपा सरकार इससे सीख लेना चाहती है,तो उसके लिए भी एक सबक है। सांप्रदायिक घृणा के बाघ की सवारी करना आसान है, लेकिन उस सवारी से उतर पाना मुश्किल है। यही कारण है कि जब उन्होंने घृणा फैलाने वालों को ज़हर उगलने और इसे व्यापक रूप से फैलाने के लिए प्रोत्साहित किया है, तो वही तत्व अमेरिकी राष्ट्रपति के तड़क-भड़क और आडंबर वाली यात्रा के माध्यम से सरकार को अपने प्रचार-प्रसार करने की राह में रोड़ा बनकर आ खड़ा होते हैं। लिहाज़ा चुनाव उनका है कि वे अपने हिंदुत्व के उन गुर्गों पर नकेल कसेंगे, जो नपुंसकता दिखाते हैं या फिर उनके प्रति नरम रवैया अख़्तियार करेंगे। बहरहाल, फ्रेंकस्टीन राक्षस बना रहा है और पर्याप्त क़ानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे की ख़राब होती हालत अब आंतरिक सुरक्षा की हद तक पहुंच गयी है, सत्तारूढ़ बीजेपी ने भारत के एक समावेशी विचार और उनके जीवन की चिंता और सभी नागरिकों की स्वतंत्रता के संकट में पड़ने के संकेत दे दिए हैं।

लेखक एक कार्यकर्ता हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Delhi Burns, Rekindling Memories of 1984

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