NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
दिल्ली-एनसीआर में दम घुटता है! कौन लेगा ज़िम्मेदारी? कौन निकालेगा हल?
वायु प्रदूषण के चलते दिल्ली-एनसीआर में हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया जाना बेहद गंभीर है। यह स्थिति दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और संबंधित सरकारी एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करती है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
02 Nov 2019
delhi enviroment
दिल्ली में शनिवार, 2 नवंबर शाम की तस्वीर। फोटो : न्यूज़क्लिक

दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण से हालात इतने भयंकर हो गए हैं कि अब ये लोगों से सेहत की भारी कीमत वसूल रहा है। शुक्रवार को पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (ईपीसीए) ने साफ कहा कि दिल्ली-एनसीआर गैस चैंबर बन गए हैं। इसे देखते हुए राज्य में हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी गई। ईपीसीए ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने को लेकर दिल्ली समेत पूरे एनसीआर में लागू सभी पाबंदियों को 5 नवंबर तक बढ़ा दिया है। वहीं, स्कूल भी 5 नवंबर तक बंद कर दिए गए हैं।

ईपीसीए का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की यह स्थिति स्थानीय कारकों, दिवाली की रात प्रतिबंध के बावजूद जलाए गए पटाखों, पराली के धुएं और मौसमी परिस्थितियों का मिश्रित परिणाम हैं।

इसे भी पढ़ें : दिल्ली : हवा में प्रदूषण स्तर कुछ कम हुआ लेकिन एक्यूआई अब भी ‘गंभीर’

लेकिन ईपीसीए के इसी बयान के बाद ढेरों सवाल खड़े हो जाते हैं और इस पर सियासत भी खूब हो रही है। सबसे पहले यह स्थिति दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों को कठघरे में खड़ा करती है। इसके बाद यह भी आशंका होती है कि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए जो कदम उठाए गए थे वो सही दिशा में चल रहे हैं या नहीं।

इसके अलावा सबसे बड़ी बात कि राजधानी की हवा प्रदूषित करने के जिम्मेदार कारकों पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकी। यदि हरियाणा, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश में पराली जलाए जाने से वायु प्रदूषण में इजाफा हुआ तो उसे रोका क्यों नहीं गया। आखिर पराली जलाने पर रोक लगाने और पटाखे जलाने पर रोक लगाने के ईपीसीए और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर उचित ढंग से अमल क्यों नहीं हुआ?

जब तक इन सवालों के हल नहीं खोजे जाएंगे और योजनाओं पर प्रभावी अमल नहीं सुनिश्चित किया जाएगा तब तक वायु प्रदूषण का कोई हल निकल पाएगा, संभव नहीं लगता है। लेकिन इन्हीं सवालों में जब सियासत घुल जाती है तो इन सवालों का जवाब मिल पाएगा इस पर भी संदेह होने लगता है।
IMG-20191102-WA0008 (1).jpg
अब एक बड़ा सियासी वर्ग मानता है कि दिवाली में पटाखे जलाने से वायु प्रदूषण पर कोई खास असर नहीं होता है ये हिंदुओं का त्योहार है और पटाखे छुड़ाने हैं। ऐसे में उनके लिए जवाब है कि आप चाहे ‘आस्थावान हिंदू’ हों या ‘जनेऊधारी ब्राह्मण’ या फिर पांच वक्त के नमाज़ी मुस्लिम या और कोई भी धर्म के हों, धुंध और वायु प्रदूषण आप पर बराबर ही हमला करेगा। और यह कर रहा है।

बीबीसी की एक ख़बर के अनुसार दुनिया भर के अलग अलग शहरों में वायु प्रदूषण की हालत बताने वाली वेबसाइट एयर क्वालिटी इंडेक्स के मुताबिक़, 28 अक्टूबर की सुबह दस बजे दिल्ली दुनियाभर में दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन गया।

दिवाली पर 27 अक्टूबर की शाम के बाद से 28 अक्टूबर सुबह तक दिल्ली में आनंद विहार से लेकर तमाम दूसरे इलाकों में वायु प्रदूषण के आंकड़े अपने उच्चतम स्तर पर रहे। उत्तर भारत में दिवाली के बाद पीएम 2.5 कई जगहों पर अपने उच्चतम स्तर पर रहा।
इन सब आंकडो़ं को लेकर सियासी वर्ग चुप रहेगा। क्योंकि प्रदूषण फैलाने की उसकी अपनी जिम्मेदारी पूरी हो चुकी है।

इसी तरह दूसरा वर्ग मानता है कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण नहीं होता है। किसानों को इसके लिए जिम्मेदार बता दिया जाता है जबकि दिल्ली के वाहनों और फैक्टरियों का प्रदूषण इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन यह वर्ग भी ईपीसीए द्वारा जारी चेतावनी, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और तमाम आंकड़ों को सुनने से इनकार कर देगा।
सरकारी एजेंसी ‘सफर’ के मुताबिक दिल्ली में प्रदूषण में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की हिस्सेदारी शुक्रवार को बढ़कर 46 प्रतिशत हो गई।
इसी तरह एक तीसरा वर्ग है जो कहता है कि सम विषम फार्मूला बेकार का आइडिया है। ये पहले भी फ्लॉप हो चुका है! गाड़ियों से प्रदूषण नहीं फैलता है। लेकिन यह वर्ग भी गाड़ियों को लेकर ईपीसीए की चेतावनी या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को नहीं मानेगा। जबकि ईपीसीए साफ साफ कह रहा है कि ये सभी कारक मिलकर वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है।

इसके चलते वायु प्रदूषण पर रोकथाम लगाने वाली जो मशीनरी है उस पर सवाल उठना बंद हो जाता है। हम यह समीक्षा कर ही नहीं पाते हैं कि वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बनाई गई योजनाएं क्या वास्तव में कारगर हैं? या फिर उन योजनाओं के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित कराने के लिए पुख्ता और प्रभावी तंत्र हमारे पास है भी या नहीं? इसी की आड़ में जिम्मेदार प्रशासनिक तंत्र भी बच निकलता है।

जबकि हालात यह है कि आईआईटी बॉम्बे की एक स्टडी के मुताबिक, वायु प्रदूषण से 2015 में अकेले दिल्ली को ही 6.4 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था। 2017 में ख़राब और प्रदूषित हवा की वजह से 12 लाख लोगों की जान चली गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में भारत में प्रदूषण की वजह से लगभग एक लाख दस हजार बच्चों की मौत हो गई थी।

इसके अलावा अभी चंद दिनों पहले ही शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर समेत भारत के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में वायु प्रदूषण की वजह से लोगों की जिंदगी 9 साल तक कम होती जा रही है। अगर इन शहरों में प्रदूषण कम हो जाए, तो यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी 9 साल तक बढ़ जाएगी।

वायु प्रदूषण के खिलाफ हमारी लड़ाई कमजोर होने की एक बड़ी वजह ये है कि इसमें जनता सक्रिय रूप से भागीदार नहीं बन रही है जबकि बाजार तक इसका फायदा उठा रहा है। वायु प्रदूषण को लेकर एक नया बाजार शक्ल ले रहा है। इस बाजार के तहत एंटी-पल्यूशन मास्क, एयर-प्यूरीफाइंग मशीनें, हवा की गुणवत्ता नापने वाले डिजिटल मॉनिटर और कार एयर प्यूरीफायर जैसे उत्पाद शामिल हैं।

ई-कॉमर्स वेबसाइट एमजॉन के मुताबिक, साल 2016 में लोगों ने 2015 के मुकाबले चार सौ प्रतिशत ज्यादा एयर प्यूरिफायर खरीदे थे। वहीं, 2017 में लोगों ने 2016 के मुकाबले 500 प्रतिशत ज्यादा एयर प्यूरिफायर खरीदे थे। यही नहीं, एमजॉन पर साल 2018 में होम/कार प्यूरिफायर्स की बिक्री में सितंबर महीने के मुकाबले अक्टूबर में 450 फीसदी ज्यादा बिक्री दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का दावा है कि एयर प्यूरीफाइंग बाजार हर साल 45 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।
IMG-20191102-WA0011.jpg
हालांकि, हमें ये बात पक्के तौर पर पता है कि वायु प्रदूषण रूपी ये राक्षस, दिनों-दिन हमारी कल्पना से भी ज्यादा विशाल समस्या का रूप धरता जा रहा है। सवाल ये है कि ये इतनी बड़ी समस्या है, फिर भी वायु प्रदूषण को महामारी क्यों नहीं माना जा रहा है? इससे निपटने के लिए तेज़ी से जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? आखिर, सरकार या इसके असर के बारे में बताने वाली एजेंसियां, प्रदूषण से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने से क्यों हिचक रही हैं? क्यों साल-दर-साल हालात जस के तस बने रहते हैं?

'द ग्रेट स्मॉग ऑफ इंडिया’ नाम की किताब के लेखकों ने दावा किया है कि आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध में जितने लोग मारे गए, उनसे कहीं ज्यादा लोगों की जान एक हफ्ते में वायु प्रदूषण से चली जाती है। अगर समस्या इतनी गंभीर है, तो इससे निपटने के लिए एक आंदोलन की शुरुआत हो जानी चाहिए थी। लेकिन यह नहीं हो रहा है। यहीं पर हम देखते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए उठाए गए कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं। हमें तो वायु प्रदूषण की गंभीरता को लोगों को समझाने के लिए माहौल बनाने में ही काफी मशक्कत करनी पड़ी है।

हालांकि सोशल मीडिया पर इसे लेकर एक कैंपेन चल रहा है। जहां पर लोग वायु प्रदूषण से जुड़े तमाम तरह के पोस्ट शेयर कर रहे हैं। ऐसे ही एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस हालात पर व्यंग्य किया गया था, 'दिल्ली में हवा इतनी जहरीली हो गई है कि अगर किसी को गहरी सांस लेने की सलाह दी जाए तो आपके ऊपर अटेंप्ट टू मर्डर का केस दर्ज हो सकता है।' ये पोस्ट हमें व्यंग्य के साथ साथ हालात की गंभीरता के बारे में भी बता रहा है।

इसे भी पढ़ें : सावधान! प्रदूषण बेहद गंभीर श्रेणी में पहुंचा : दिल्ली-एनसीआर में जन स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा 

Delhi-NCR
Air Pollution
Health emergency declared
Central Government
Narendera Modi
diwali crackers
Supreme Court
Supreme Court Verdict on Crackers
Arvind Kejriwal

Related Stories

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

बिहार की राजधानी पटना देश में सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर

विश्व जल दिवस : ग्राउंड वाटर की अनदेखी करती दुनिया और भारत

दिल्ली: क्या कोरोना के नए मामलों में आई है कमी? या जाँच में कमी का है असर? 

चुनावी कुंभ:  उत्तराखंड के डॉक्टरों की अपील, चुनावी रैलियों पर लगे रोक

दिल्ली में ओमीक्रॉन के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र शनिवार-रविवार का कर्फ़्यू

जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?

हर नागरिक को स्वच्छ हवा का अधिकार सुनिश्चित करे सरकार

वायु प्रदूषण: दिल्ली में स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय 29 नवंबर से फिर खुलेंगे

दिल्ली ही नहीं गुरुग्राम में भी बढ़ते प्रदूषण से सांसों पर संकट


बाकी खबरें

  • Ambedkar
    राज वाल्मीकि
    वर्तमान संदर्भ में डॉ. अंबेडकर की प्रासंगिकता
    06 Dec 2021
    बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की आज पुण्यतिथि है। 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनका निधन हुआ। उन्होंने हमें सफलता के तीन मंत्र दिए थे – ‘शिक्षित हो,  संगठित हो, संघर्ष करो।’ हाल ही में हमें किसान आंदोलन…
  • Alphons
    द लीफ़लेट
    संविधान की प्रस्तावना में संशोधन के लिहाज़ से प्राइवेट मेंबर बिल: एक व्याख्या
    06 Dec 2021
    झा के मुताबिक़, संविधान के बुनियादी ढांचे का एक हिस्सा होने के नाते प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया जा सकता।
  •  Indian constitution
    डॉ. राजू पाण्डेय
    भारतीय संविधान पर चल रहे अलग-अलग विमर्शों के मायने!
    06 Dec 2021
    क्या संविधान से हमें कुछ भी हासिल नहीं हुआ? जब हमारे साथ स्वतंत्र हुए देशों में लोकतंत्र असफल एवं अल्पस्थायी सिद्ध हुआ और हमारे लोकतंत्र ने सात दशकों की सफल यात्रा पूरी कर ली है तो इस कामयाबी के पीछे…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,306 नए मामले, 211 मरीज़ों की मौत
    06 Dec 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.28 फ़ीसदी यानी 98 हज़ार 416 हो गयी है।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में तनाव व अव्यवस्था की आंखमिचौली, नगालैंड में गोलीकांड और विनोद दुआ को श्रद्धांजलि
    06 Dec 2021
    यूपी के पश्चिमी हिस्से में किसान आंदोलन के सामाजिक राजनीतिक असर की काट के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की पुरजोर कोशिश हो रही है. क्या मथुरा में तनाव पैदा करने की मुहिम चला रहे कुछ हिन्दुत्ववादी संगठनों…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License