NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
एनआरसी के खिलाफ दार्जिलिंग पहाड़ पर उठी आइएलपी की मांग
जो लोग एनआरसी को सिर्फ मुसलमानों की समस्या के रूप में देख रहे हैं, उन्हें बता दें कि इसके विरोध में गोरखाओं ने भी कमर कस ली है। दार्जिलिंग पहाड़ में आंदोलन शुरू हो चुका है और क्रिसमस के बाद केंद्रीय कार्यालयों के सामने जोरदार विरोध प्रदर्शन की तैयारी है।
सरोजिनी बिष्ट
24 Dec 2019
GORKHA
प्रतीकात्मक फाइल फोटो। साभार : सत्याग्रह  

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), 2019 अधिसूचित होने के बाद अब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर विभिन्न समुदायों व क्षेत्रों में आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं। भाजपा के समर्थक और मुख्यधारा का मीडिया इन आशंकाओं को सायास ढंग से केवल मुसलमानों तक सीमित रखने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि जैसे-जैसे लोग आनेवाले दिनों में एनआरसी से होनेवाली दुश्वारियों को समझ पा रहे हैं वैसे-वैसे दलितों, आदिवासियों और अन्य समुदायों की ओर से भी विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। विरोध की ऐसी ही एक जोरदार आवाज उठी है पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र से।

असम में एनआरसी की अंतिम सूची 31 अगस्त 2019 को जारी हुई, जिसमें शामिल नहीं हो पानेवाले 19 लाख लोगों में से एक लाख के आसपास संख्या गोरखाओं की है। उनका हाल देखते हुए बंगाल के गोरखाओं को भी अपने भविष्य को लेकर चिंता सताने लगी है। इसी चिंता का नतीजा है कि बीते हफ्ते 20 दिसंबर को दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र के सभी प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिला।

पश्चिम बंगाल राज्य के उत्तर में स्थित पर्वतीय क्षेत्र में अलग राज्य गोरखालैंड की मांग काफी पुरानी है। भाजपा खुद को गोरखालैंड का हमदर्द बताकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के जमाने से ही वहां अपना सांसद गोरखा जन-मुक्ति मोर्चा (गोजमुमो) के सहयोग से जितवा रही है। 2017 के गोरखालैंड आंदोलन के दौरान ही गोजमुमो का विभाजन हो गया। बिनय तामंग गुट अभी तृणमूल कांग्रेस के साथ है, जबकि बिमल गुरुंग गुट भाजपा के साथ। गोजमुमो के एक धड़े के तृणमूल के साथ जाने के बावजूद, 2019 के लोकसभा चुनाव में दार्जिलिंग लोकसभा सीट भाजपा ने जीती। इसके बाद हुए दार्जिलिंग विधानसभा क्षेत्र के उप-चुनाव में भी भाजपा प्रत्याशी की जीत हुई। मगर, अब तस्वीर बदलती दिख रही है।

गोरखाओं में पहले से ही इस बात को लेकर नाराजगी शुरू हो गयी है कि केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद भाजपा गोरखालैंड के लिए पहल क्यों नहीं कर रही? क्या गोरखाओं के सपने को अपना सपना बताना नरेंद्र मोदी का चुनावी दांव भर था? यह नाराजगी पल ही रही थी कि रही-सही कसर असम में प्रकाशित एनआरसी की अंतिम सूची ने पूरी कर दी। उस पर गृह मंत्री अमित शाह का बार-बार यह बयान देना कि अब बंगाल समेत पूरे देश में एनआरसी लागू की जायेगी, गोरखाओं के ज़ख़्मों को गहरा बना रहा है। संसद से सीएए पारित होने के बाद उन्हें तलवार अपने सिर पर लटकती दिख रही है।

गोजमुमो के संस्थापक अध्यक्ष बिमल गुरुंग, जो भाजपा समर्थक हैं, 2017 के आंदोलन में कई मामलों में नामजद होने के बाद से फरार चल रहे हैं। ऐसे में, दार्जिलिंग पहाड़ पर एनआरसी के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई अब गोजमुमो का तृणमूल समर्थक धड़ा कर रहा है।

बीते 20 दिसंबर को कर्सियांग में गोजमुमो ने एनआरसी के खिलाफ विशाल रैली निकालने के बाद जनसभा की। इसे संबोधित करते हुए कर्सियांग के विधायक डॉ. रोहित शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार एनआरसी लागू करने की तैयारी करके पूरे देश को सुलगा रही है। इसके विरोध में चल रहे आंदोलनों का पुलिसिया दमन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सन 1870 से भारत में गोरखा रह रहे हैं और उन्होंने देश के लिए हर कुर्बानी दी है। ऐसे देशभक्त गोरखाओं को अब केंद्र सरकार एनआरसी के जरिये से डिटेन्शन कैंपों में डालने का प्रयास कर रही है। गोजमुमो नेता ने कहा कि केंद्र सरकार ने एक रात में अलग केंद्र शासित लद्दाख राज्य का गठन कर दिया, जबकि गोरखाओं को भाजपा वाजपेयी सरकार के समय से ही केवल आश्वासन देकर वोट ठग रही है। दार्जिलिंग और कालिम्पोंग शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों में भी इसी तरह के स्वर सुनने को मिले।

हिंदू ध्रुवीकरण के लिए केंद्र की भाजपा सरकार जो सीएए और एनआरसी ला रही है, उसने न सिर्फ देश में कई पुरानी समस्याओं को जिंदा किया है, बल्कि कई नयी समस्याओं को भी जन्म दिया है। लगभग दो दशकों से शांति की ओर अग्रसर असम को वह फिर से अशांत कर रही है। सीएए को लेकर मणिपुर के गुस्से से बचने के लिए, 'एक देश एक कानून' की पैरवीकार इस सरकार ने उसे इनरलाइन परमिट (आइएलपी) का प्रावधान दे दिया है। यानी दूसरे राज्य के लोगों को अब मणिपुर जाने के लिए परमिट लेना होगा। मणिपुर को आइएलपी व्यवस्था मिलने के बाद ऐसी ही मांग उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र व डुआर्स के लिए गोजमुमो ने उठायी है। गोजमुमो (बिनय गुट) के अध्यक्ष बिनय तामंग कहते हैं, ''दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में 1955 में आइएलपी व्यवस्था लागू की गयी, जिसे 1990 में हटा लिया गया था। इसे फिर से लागू करने की हमारी मांग है।''

गोरखा नेताओं का कहना है कि वे लोग नेपाली-भाषी जरूर हैं, लेकिन देशभक्त भारतीय हैं। अक्सर उन लोगों पर विदेशी (नेपाली) होने का लांछन लगाया जाता रहा है। लंबे संघर्ष के बाद 1992 में नेपाली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह मिली, जिससे भारतीय गोरखाओं को भारतीय होने का गौरव हासिल हुआ। अब फिर से एनआरसी के जरिये उन लोगों के भारतीय होने पर सवालिया निशान लगाया जायेगा। यह आशंका बेबुनियाद भी नहीं है। लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने असम के दिवंगत पूर्व-सांसद मणि कुमार सुब्बा को नेपाली नागरिक और लोकसभा में 'घुसपैठिया' बताया। इसे लेकर समस्त भारतीय गोरखाओं में गुस्से के साथ चिंता है कि क्या उनकी नागरिकता पर इसी तरह सवाल उठेंगे।

दार्जिलिंग के गोरखाओं की चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि चाय बागानों और सिन्कोना बागानों में रहनेवाले लाखों लोगों के पास जमीन का कोई काग़ज़ नहीं है। ये लोग वर्षों से जमीन के पट्टे के लिए संघर्षरत हैं, लेकिन ज्यादातर को आज तक मालिकाना हक नहीं मिल पाया है। जिनके पास जमीन के काग़ज़ात नहीं हैं उन्हें एनआरसी के चलते अपनी जमीन और अपने देश से बेदखल होने का डर सता रहा है।

एनआरसी के खिलाफ गोजमुमो (बिनय गुट) ने 23 से 27 दिसंबर तक धारावाहिक आंदोलन की योजना बनायी है। इस दौरान केंद्र सरकार के कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन किया जायेगा। क्रिसमस के बाद आंदोलन को तेज करने की योजना है। एनआरसी के खिलाफ गोरखाओं का उद्वेलित होना बताता है कि इस मसले को सिर्फ मुसलमानों या फिर बांग्लादेश घुसपैठियों तक सीमित कर देखना ठीक नहीं है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

CAA
ILP
darjeeling
NRC
Citizenship Amendment Act
BJP
Hindutva
hindu-muslim
Religion Politics

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?


बाकी खबरें

  • jammu and kashmir
    लव पुरी
    जम्मू-कश्मीर में आम लोगों के बीच की खाई को पाटने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं
    17 Mar 2022
    इन भाषाई एवं जातीय रूप से विविध क्षेत्र की अपनी विशिष्ट समस्याएं हैं, जिनके लिए अनुकूलित विशेष पहल की दरकार है, जिन पर लगता है कोई भी काम नहीं कर रहा है। 
  • अरुण कुमार त्रिपाठी
    केजरीवाल के आगे की राह, क्या राष्ट्रीय पटल पर कांग्रेस की जगह लेगी आप पार्टी
    17 Mar 2022
    मोदी-आरएसएस से सीधे भिड़े बिना कांग्रेस को निपटाती आप पार्टी, क्या एक बार फिर केजरीवाल की ‘अस्पष्ट’ विचारधारा के झांसे में आएगा देश?
  • राहुल कुमार गौरव
    ग्राउंड रिपोर्ट: कम हो रहे पैदावार के बावजूद कैसे बढ़ रही है कतरनी चावल का बिक्री?
    17 Mar 2022
    विश्व में अपनी स्वाद और जिस खुशबू के लिए कतरनी चावल को प्रसिद्धि मिली। आज उसी खुशबू का बिजनेस गलत तरीके से किया जा रहा है। कतरनी चावल जैसे ही महीन चावल में सुगंधित इत्र डालकर कतरनी के नाम पर बेचा जा…
  • अनिल अंशुमन
    ‘बिहार विधान सभा पुस्तकालय समिति’ का प्रतिवेदन प्रस्तुत कर वामपंथ के माले विधायक ने रचा इतिहास
    17 Mar 2022
    ‘पुस्तकालय-संस्कृति’ विकसित कर ‘शिक्षा में क्षरण’ से निजात पाने के जन अभियान का दिया प्रस्ताव
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    छत्तीसगढ़: आदिवासियों के फ़र्ज़ी एनकाउंटर वाले एड़समेटा कांड को 9 साल पूरे, माकपा ने कहा दोषियों पर दर्ज हो हत्या का मामला 
    17 Mar 2022
    छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले स्थित एड़समेटा गांव में,  पुलिस गोलीबारी के दौरान चार नाबालिग समेत 8 लोगों की मौत हुई थी। पुलिस ने इस नक्सली ऑपरेशन के तौर पर पेश किया था, परन्तु अब जाँच रिपोर्ट आई जिसने साफ…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License