NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप
सम्मेलन में वक्ताओं ने उन तबकों की आज़ादी का दावा रखा जिन्हें इंसान तक नहीं माना जाता और जिन्हें बिल्कुल अनदेखा करके आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। उन तबकों की स्थिति सामने रखी जिन तक आज़ादी की कोई झलक नहीं पहुंची है।
राज कुमार
10 May 2022
Sanskrit Sammelan

सावंतवाड़ी, महाराष्ट्र में दो दिवसीय जनवादी साहित्य संस्कृति सम्मेलन 9 मई को संपन्न हुआ। सम्मेलन की शुरुआत 7 मई शाम को शोभायात्रा के साथ हुई। प्रसिद्ध फ़िल्मकार और कवि नागराज मंजुले ने 8 मई को औपचारिक तौर पर सम्मेलन की शुरुआत की और अपनी बात रखी। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका संध्या नरे पवार ने की। प्रसिद्ध उर्दू लेखक रहमान अब्बास और विचारक वंदना सोनालकर ने भी मौजूदा दौर के बारे में अपनी बातचीत रखी। इसके अलावा विकास सावंत, किशोग जाधव, चंद्रकांत जाधव और सुबोध मोरे ने भी सत्र को संबोधित किया।

इस दो दिवसीय सम्मेलन में कोल्हापुर, सिंधुदुर्ग और गोवा से बड़ी संख्या में लेखक, संस्कृतिकर्मी, कार्यकर्ता और कलाकारों ने हिस्सा लिया।

देश में फासीवाद के ख़तरे के बीच इस सम्मेलन का आयोजन एक महत्वपूर्ण घटना है। गौरतलब है कि हिंदूत्ववादी ताकतें देश के संविधान को ताक पर रखकर हिंदू राष्ट्र बनाने का आह्वान कर रही हैं। मुस्लिम आबादी को योजनाबद्ध ढंग से निशाना बनाया जा रहा है। तमाम वंचित तबकों को हाशिये से भी बाहर धकेला जा रहा है। ऐसे समय में ये सम्मेलन दलित, आदिवासी, और तमाम वंचित तबकों की मुक्ति के नारे के साथ संपन्न हुआ। ये सम्मेलन वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।

देश की जनता महंगाई की मार झेल रही है, लोगों का रोजगार जा रहा है, कोविड महामारी की मार से लोग उभरे तक नहीं हैं, प्रवासी मज़दूरों के पैर छाले भी नहीं सूखे हैं, नफ़रत की आग में देश को झोंक दिया गया है, महामारी में हुई मौतों के वर्ल्ड रिकॉर्ड के बीच भाजपा सरकार देश में आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रही हैं। सम्मेलन में इस मुद्दे पर एक पूरा सत्र रखा गया जिसका शीर्षक था “आज़ादी का अमृत महोत्सव- मेरी आज़ादी का क्या हुआ?”

सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ इतिहासकार उमेश बगाड़े ने की। सत्र में डॉ. प्रदीप आवटे, सरफराज अहमद, धम्मसंगिनी रमागोरख और शैला यादव ने अपनी बातचीत रखी। वक्ताओं ने उन तबकों की आज़ादी का दावा रखा जिन्हें इंसान तक नहीं माना जाता और जिन्हें बिल्कुल अनदेखा करके आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। उन तबकों की स्थिति सामने रखी जिन तक आज़ादी की कोई झलक नहीं पहुंची है।

इस मौके पर कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। सम्मेलन में बीच-बीच में जनवादी और अंबेडकरवादी गीतों की धूम रही। मुंबई से आए नाटक समूहों ने रात को दलित पंथर कविता का नाट्य रूपांतरण और नाटक मोस्ट वेलकम की प्रस्तुति की। ये सम्मेलन इस मायने में भी खास है कि इसमें इस समय के तमाम ज़रूरी और ज्वलंत मुद्दों पर ना सिर्फ गंभीर चर्चा हुई बल्कि भविष्य की रणनीति भी बनाई गई। सम्मेलन में कश्मीर फाइल के जरिये धार्मिक ध्रुवीकरण, नई शिक्षा नीति, तीन कृषि कानूनों से लेकर परिवार, धर्म और सांस्कृतिक क्षेत्र में महिलाओं का हस्तक्षेप और आज़ादी आदि विषयों पर चर्चाएं हुई। 9 मई को संविधान बचाने और समानता की लड़ाई को तेज करने के आह्वान का साथ सम्मेलन का समापन हुआ।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं। )

Democratic Sahitya-Sanskrit Sammelan
जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन
Inflation
COVID-19
unemployment
Migrant workers

Related Stories

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

मध्य प्रदेश : एलपीजी की क़ीमतें बढ़ने के बाद से सिर्फ़ 30% उज्ज्वल कार्ड एक्टिव

हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है

​गत 5 वर्षों में पदों में कटौती से सरकारी नौकरियों पर छाए असुरक्षा के बादल

हम भारत के लोग : इंडिया@75 और देश का बदलता माहौल

हम भारत के लोग : हम कहां-से-कहां पहुंच गये हैं

संविधान पर संकट: भारतीयकरण या ब्राह्मणीकरण

हम भारत के लोग:  एक नई विचार श्रृंखला

कैसे भाजपा की डबल इंजन सरकार में बार-बार छले गए नौजवान!


बाकी खबरें

  • समीना खान
    ज़ैन अब्बास की मौत के साथ थम गया सवालों का एक सिलसिला भी
    16 May 2022
    14 मई 2022 डाक्टर ऑफ़ क्लीनिकल न्यूट्रीशन की पढ़ाई कर रहे डॉक्टर ज़ैन अब्बास ने ख़ुदकुशी कर ली। अपनी मौत से पहले ज़ैन कमरे की दीवार पर बस इतना लिख जाते हैं- ''आज की रात राक़िम की आख़िरी रात है। " (राक़िम-…
  • लाल बहादुर सिंह
    शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा
    16 May 2022
    इस दिशा में 27 मई को सभी वाम-लोकतांत्रिक छात्र-युवा-शिक्षक संगठनों के संयुक्त मंच AIFRTE की ओर से दिल्ली में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित कन्वेंशन स्वागत योग्य पहल है।
  • आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: किसानों की दुर्दशा बताने को क्या अब भी फ़िल्म की ज़रूरत है!
    16 May 2022
    फ़िल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी का कहना है कि ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि किसान का बेटा भी एक फिल्म बना सके।
  • वर्षा सिंह
    उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!
    16 May 2022
    “किसी स्थान की वहनीय क्षमता (carrying capacity) को समझना अनिवार्य है। चाहे चार धाम हो या मसूरी-नैनीताल जैसे पर्यटन स्थल। हमें इन जगहों की वहनीय क्षमता के लिहाज से ही पर्यटन करना चाहिए”।
  • बादल सरोज
    कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी
    16 May 2022
    2 और 3 मई की दरमियानी रात मध्य प्रदेश के सिवनी ज़िले के गाँव सिमरिया में जो हुआ वह भयानक था। बाहर से गाड़ियों में लदकर पहुंचे बजरंग दल और राम सेना के गुंडा गिरोह ने पहले घर में सोते हुए आदिवासी धनसा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License