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नज़रिया
भारत
राजनीति
क्या योगेंद्र यादव और प्रताप भानु मेहता धर्मनिरपेक्षता को समझ नहीं पा रहे !
क्या हम वास्तव में जाति को संदर्भित किये बिना धर्म और धर्मनिरपेक्षता के बारे में सोच सकते हैं?, जाति व्यवस्था की विषमताओं को मंज़ूर करते हुए हम किसी हिंदू-मुस्लिम रिश्ते की उम्मीद नहीं कर सकते।
एजाज़ अशरफ़
21 Aug 2020
cast
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार: वॉल स्ट्रीट जर्नल

पांच अगस्त को अयोध्या में आयोजित राम मंदिर भूमिपूजन ने धर्मनिरपेक्षता के पतन या मौत को लेकर विश्लेषण के एक समृद्ध सिलसिले को जन्म दे दिया है। लेकिन, अचरज इस बात की है कि जाति शब्द इन विचार-विमर्शों से ग़ायब है। हालांकि एक ख़ास पीढ़ी के कुलीन उदारवादी राष्ट्रवादियों ने अक्सर "जाति और सांप्रदायिकता की बुराइयों" को एक साथ जोड़ा है। हमारे आसपास की दुनिया को बेहतर ढंग से समझने के लिए इन दोनों को जोड़कर देखना होगा।

 हमें यह समझना होगा कि पूरी तरह ग़ैर-बराबरी से बने उस सामाजिक-राजनीतिक वातावरण में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध की उम्मीद करना बिल्कुल मुमकिन नहीं है, जिसे परंपरा द्वारा मान्य "प्राकृतिक व्यवस्था" के रूप में उचित ठहराया जाता है। इस प्राकृतिक व्यवस्था को हिंसा के साधन- या इसके इस्तेमाल के ख़तरे के ज़रिये बरक़रार रखने की मांग की जाती है।

 छुआछूत को तो समाप्त किया जा सकता है, समानता के सिद्धांत को भी संविधान में प्रतिष्ठित किया जा सकता है, लेकिन भारत की इस कुख्यात जाति व्यवस्था का अब भी राज चलता है। यह मान लेना तो महज़ हमारी कल्पना से ज़्यादा कुछ भी नहीं है कि बराबरी से हिंदू-मुस्लिम सम्बन्ध क़ायम किया जा सकता है,जबकि इस समाज का सबसे बड़ा वर्ग एक पदानुक्रम वाले सामाजिक समूहों की इस व्यवस्था को स्वीकार करता है, यहां तक कि उसकी तारीफ़ भी करता है। उस समूह को इस हिंदू सामाजिक सोपान के निचले क्रम पर रखा जाता है, जिसके सदस्यों के अधिकार कम हैं। इसलिए उस सामाजिक व्यवस्था के एक हिस्से में समानता की कल्पना कर पाना नामुमिकन है, जो असमानता मान्य है और यहां तक कि आदर्श रूप में व्याप्त है।

 इसके बावजूद, निचली जातियों ने इस असमान सामाजिक बनावट को एक सदी से भी ज़्यादा समय से बदलने को लेकर संघर्ष किया है। लेकिन, वहीं दूसरी तरफ़, उनके इन प्रयासों से मिलता जुलता वह हिंदू अधिकार परियोजना भी शताब्दी पुरानी है, जिस परियोजना में सवर्णों के नेतृत्व में हिंदुओं को एकजुट करते मुख्य रूप से हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे घटक शामिल हैं। इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य सामाजिक-सांस्कृतिक यथास्थिति को बदलने वाले उस निचले नेतृत्व की चुनौती को नाकाम करना रहा है, यह एक ऐसी चुनौती है,जो पिछले चार दशकों में लोकतांत्रिक राजनीति के उदय और गहनता के साथ सबसे शानदार ढंग से तेज़ हुई है।

 जब भी इस निचले नेतृत्व की चुनौतियां सामने आती हैं, तब यह हिंदू अधिकार इस चुनौती को दरकिनार करने के लिए मुसलमानों को पिशाच दिखाने की रणनीति को आगे कर देता है। इस रणनीति ने या तो सामाजिक न्याय पाने की कोशिश करते इन निम्न जाति के आंदोलनों को नज़रअंदाज़ कर दिया है, कमज़ोर कर दिया है, या फिर ख़ुद में ही समायोजित कर लिया है और ऐसा करते हुए इस हिन्दू अधिकार ने ख़ुद को ताक़तवर बनाया है। हिंदुत्व ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से इस मामले में नयी कामयाबियां हासिल की हैं, जो अपनी ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) पहचान की हमेशा बात करते हैं और ख़ुद को चायवाले के रूप में सामने रखते हैं।

 इस नज़रिये से भारत के दो धार्मिक समुदायों के बीच का बढ़ता संघर्ष किसी अमूर्त धर्मनिरपेक्षता की नाकामी नहीं है, या फिर जैसा कि कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि भारतीयों के बीच धर्मनिर्पक्षता को लेकर किसी तरह की प्रतिबद्धता की कमी का सुबूत नहीं है। यह संघर्ष राजनीति का वह उत्पाद है, जो निचले नेतृत्व के ग़ुस्से को बहुत आसानी से धार्मिक अल्पसंख्यक की तरफ़ मोड़कर यथास्थिति को बनाये रखने और उसे मज़बूत करने की कोशिश करता है।

 फिर भी हमारी लोकतांत्रिक राजनीति के इन पहलुओं को राजनीतिक वैज्ञानिक योगेंद्र यादव ने अनदेखी कर दी है। योगेंद्र यादव ने हाल ही में अपने एक लेख में कहा था कि धर्मनिरपेक्षता "इसलिए पराजित हुई है, क्योंकि यह परंपराओं की भाषा से जुड़ने में नाकाम रही है, क्योंकि इसने हमारे धर्मों की उस भाषा को सीखने या बोलने से इनकार कर दिया था।" लेकिन, सवाल है कि यह तो परंपराओं और धर्मों की वही भाषा है,जिसने सामाजिक असमानता को प्रतिष्ठित किया है।

 यादव का यह भी कहना है कि "धर्मनिरपेक्षता की हार इसलिए भी हुई है, क्योंकि इसने हमारे दौर के अनुकूल हिंदू धर्म की नयी व्याख्या विकसित करने के बजाय हिंदू धर्म का मज़ाक उड़ाने को चुना।" मगर, सवाल है कि क्या हिंदू धर्म की कोई नयी व्याख्या उन सभी जातियों, और यहां तक कि सबसे निचली जातियों का उतने ही समान रूप से सम्मान दे पायेगी,  जितना कि सभी धर्मों के लिए ? क्या हम वास्तव में जाति को संदर्भित किये बिना धर्म और धर्मनिरपेक्षता के बारे में सोच सकते हैं?

 यादव के तर्क के विरोध में स्तंभकार और शिक्षाविद,प्रताप भानु मेहता कहते हैं, "धर्म को किसी राजनीतिक मामले के रूप में गंभीरता से लेना सांप्रदायिक समस्या को हल कर पायेगा, ऐतिहासिक रूप से यह एक संदिग्ध धारणा है।" मेहता ने अपनी बात को मज़बूती देने को लेकर उदाहरण दिया है। वह साफ़ तौर पर आगे बताते हैं,"वह जो कुछ भी है, हमें उस भेड़िये को चिह्नित करना चाहिए और जिसे धर्मनिरपेक्षता या धर्म के पंथों के पीछे नहीं छुपाना चाहिए।" और मेहता के मुताबिक़ वह भेड़िया "पूर्वाग्रह को लेकर बढ़ती वह सहिष्णुता" है, जो "भारतीय अवधारणा से मुसलमानों को बड़े पैमाने पर अलग-थलग कर दिये  जाने को लेकर है।"

 लेकिन, मेहता यह नहीं समझा पाते कि आख़िर इस भेड़िये ने मानवता की पूरी तरह से अनदेखी क्यों शुरू कर दी है। असल में धर्मनिरपेक्षता के पतन पर किसी भी चर्चा के लिए जो कुछ मुनासिब है, वह सटीक ऐतिहासिक मोड़ की पहचान करना है, जहां मेहता के इस भेड़िये का उभार आया था और इसका व्यवहार तेज़ी से अनियंत्रित और डरावना क्यों होता गया है।

 कई लेखक इस भेड़िये के उद्भव की तलाश इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के क्रमिक शासन काल में करते हैं। उन्होंने ठीक ही कहा है कि हिंदुत्व ने विश्वसनीयता हासिल कर ली है, क्योंकि श्रीमती गांधी ने 1980 में जनता पार्टी के प्रयोग के पतन के बाद सत्ता में लौटते ही हिंदू कार्ड खेला था।

 इंदिरा गांधी ने पंजाब की समस्या को हिंदू-सिख मुद्दे में बदल दिया था, 1983 में जम्मू-कश्मीर में चुनावों के दौरान खुलेआम हिंदुओं को रिझाया था और बहुसंख्यक समुदाय की चिंताओं को खुलकर हवा दी थी। इन चिंताओं को 1984 में स्वर्ण मंदिर में ज़बरदस्ती दाखिल होने और उसी साल बाद में उनकी हत्या से सिखों के ख़िलाफ़ तबाही ने बढ़ा दिया था।

 अपनी मां के बाद सत्तासीन होने वाले राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया था, सलमान रुश्दी की द सैटेनिक वर्सेज पर प्रतिबंध लगा दिया था, और इसके बाद यह दावा किया जाता है रूढ़िवादी मुस्लिम नेतृत्व पर ज़्यादा ध्यान दिये जाने को संतुलित करने के लिए कि उन्होंने बाबरी मस्जिद में लगे ताले को खुलवा दिया था।

यह कथानक 1980 से गांधी और कांग्रेस के रूपांतरण की व्याख्या नहीं कर पाता है। जैसा कि ऐसा लगता है कि उनके इस रूपांतरण की व्याख्या बहुत मुश्किल नहीं थी।

 श्रीमती गांधी के लिए हिंदू के लिए इस धर्मनिरपेक्ष कार्ड की जगह किसी और और कार्ड का इस्तेमाल करना असल में कांग्रेस के बड़े पैमाने पर सिकुड़ते जनाधार को रोकने की एक रणनीति थी, और यह रणनीति असल में निचली जातियों, विशेष रूप से ओबीसी के समर्थन के खिसकते जाने और मुखर होने का नतीजा थी। कांग्रेस के उच्च जाति के नेतृत्व से गठित या समायोजित होने की वजह से ही इन समूहों में अपने दम पर सत्ता हासिल करने की ख्वाहिश पैदा हुई।

 इस जातिगत संघर्ष के शुरुआती संकेत 1967 के चुनावों में दिखायी देने लगे थे, जब उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बेदखल कर दी गयी थी। अपने पत्र, द राइज़ ऑफ़ द अदर बैकवर्ड क्लासेस इन द हिंदी बेल्ट  में क्रिस्टोफ़ जैफ़रलोट बताते हैं कि 1967 में कई निचली जाति के विधायक, ख़ास तौर पर यादव जाति के विधायक चुने गये थे, जिनकी तादाद बढ़ते हुए राजपूत विधायकों की संख्या के थोड़े ही पीछे (24.8 प्रतिशत के मुक़ाबले 14.8 प्रतिशत) रह गयी थी। फ़रवरी 1968 में बीपी मंडल बिहार के पहले ओबीसी मुख्यमंत्री बने; मार्च 1967 से दिसंबर 1971 तक राज्य का शासन चलाने वाले नौ मुख्यमंत्रियों में से केवल दो ही उच्च जातियों से थे।

 लेकिन, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान पर भारत की जीत की पटकथा के चलते राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता के लिए तेज़ी से बढ़ते निम्न जातियों के दावे थम गये। वह भारतीय राजनीति पर छा गयीं, उनका क़द तब और ज़्यादा बढ़ गया, जब उन्होंने प्रिवी पर्स और बैंकों और खदानों के राष्ट्रीयकरण जैसे उपायों को अंजाम दे दिया, इन सभी को "ग़रीबी हटाओ" अभियान के साथ निर्बाध रूप से जोड़ दिया गया। इन नीतियों ने कांग्रेस की सड़न को एक तरह से थाम लिया।

 हालांकि, 1978 के चुनावों ने इस बात का अकाट्य सबूत पेश कर दिया कि उनकी पार्टी का सिकुड़ता जनाधार अस्थायी नहीं था, क्योंकि मुसलमानों और दलितों ने उनके ख़िलाफ़ की गयी आपातकालीन ज़्यादतियों के जवाब में कांग्रेस और गांधी से दूर जाने के संकेत देने शुरू कर दिये थे। आपातकाल के बाद एक बार फिर बिहार में कर्पूरी ठाकुर और उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव जैसे नीचली जातियों के नेताओं की मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी हुई। उन्होंने सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए कोटा प्रणाली को लागू कर दिया।

 उच्च जाति के आधिपत्य को चुनौती मिली, और इस सच्चाई को इंदिरा गांधी ने पहचान लिया। उन्होंने हिंदू समूहों की जातिगत पहचान को बड़ी हिंदू पहचान में बदलने के लिए हिंदू कार्ड खेलना शुरू कर दिया और निजली जातियों के उभार को ज़ोरदार तरीक़े से नाकाम कर दिया। सिख उग्रवाद का मुक़ाबला करने के लिए राष्ट्रवाद की खुराक दी गयी। उनकी राजनीति ने 1980 के दशक को दंगों के दशक में तब्दील कर दिये जाने की पृष्ठभूमि तैयार की,सिखों के ख़िलाफ़ हुए नरसंहार के अलावा, मेरठ, मुरादाबाद, भागलपुर, नेल्ली, आदि में होने वाले रक्तपात के पीछे भी यही राजनीति थी।

 हिंदुओं को संगठित करने वाले आरएसएस की मूल परियोजना मुस्लिम या एम-फ़ैक्टर ने अब वैधता हासिल कर ली थी। यह महज़ कोई संयोग नहीं था कि अस्सी के दशक में आरएसएस और उसके राजनीतिक सहयोगी, भारतीय जनता पार्टी ने रामजन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत करने का फ़ैसला किया था।

 इसलिए, जब वीपी सिंह सरकार ने ओबीसी के लिए 27% आरक्षण लागू करने का फ़ैसला किया, तो सरकारी नौकरियों और देश की सत्ता संरचना पर निचली जातियों के एकाधिकार को तोड़ने की कोशिशों में कांग्रेस की तरफ़ से सवर्णों के अधिक सटीक विरोध किये जाने की उम्मीद थी। लेकिन,कांग्रेस इसलिए ऐसा नहीं कर सकी, क्योंकि अगर कांग्रेस की तरफ़ से ऐसा कुछ भी होता,तो सभी पक्षों पर अपनी पकड़,सभी के लिए कुछ न कुछ होने की विरासत वाली यह पार्टी निचले समूहों, ख़ासकर दलितों के बीच अपने समर्थकों को गंवा देती।

 ऊंची जातियों ने उस हिंदी पट्टी में आरएसएस-भाजपा की ओर अपना रुख कर लिया, जहां 1989 में हिंदुओं को एकजुट करने की पहले असफल परियोजना को शिलान्यास कार्यक्रम, 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की यात्रा, और फिर अगले दो वर्षों के दौरान अयोध्या में हुए कई कारसेवाओं के आयोजन के ज़रिये पुनर्जीवित किया गया था, आख़िरकार,जिसका नतीजा 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के रूप में सामने आया। यह हिंदुत्व की तरफ़ से मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकजुट होने को लेकर सभी जातियों के हिंदुओं के लिए एक तरह की ऐसी दावत थी, जो उच्च जातियों और निचली जातियों के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई के लिहाज से नुकसान पहुंचाने वाली रही।

 यह पूर्वाग्रह के उस भेड़िये को खुला छोड़ देने की भी निशानी थी। यह भेड़िया अब पिंजरे से बाहर था और पूरी तरह आज़ाद था, ऐसा होने के पीछे धर्मनिरपेक्षता की नाकामी नहीं थी, बल्कि ऐसा इसलिए था,क्योंकि हम जाति व्यवस्था के अंतर्निहित अनुदारवाद के साथ हो गये।

 ख़ून का स्वाद चखने के बाद इस भेड़िया को न तो आसानी से पिंजरे में बंद किया जा सकता है और न ही तीन कारणों से जंज़ीर में जकड़ा जा सकता है। पहला कारण, हिंदी पट्टी के ओबीसी नेताओं ने सामाजिक न्याय के लिए जाति की राजनीति को व्यापक आंदोलन में ढालने की कभी कोशिश ही नहीं की। मिसाल के तौर पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने तमिलनाडु में दशकों से ऐसा ही किया है। उसने दलितों और ओबीसी के बीच की खाई को पाटने की कोशिश नहीं की है। वहां के ओबीसी, दलितों को चुप कराने के लिए हिंसा करते रहते हैं।

 इससे भी बदतर बात तो यह है कि ओबीसी नेताओं ने अपने संगठनों से उन नेताओं को एक तरह से खदेड़ दिया है,जो उनके लिए एक चुनौती बन सकते हैं। इस कारण से ये ओबीसी पार्टियां परिवार के नेतृत्व वाले संगठनों में बदल गयी हैं। ये पार्टियां मुख्य रूप से किसी एक ओबीसी जाति पर निर्भर हैं, प्रत्येक पार्टी मुसलमानों के समर्थन हासिल करने के लिए एक दूसरे मुक़ाबला कर रही है। इससे उनकी ऊर्जा छिन्न-भिन्न हो गयी है।

 इसके साथ ही कांग्रेस के उच्च जाति के नेतृत्व को अब भी इस बात का यक़ीन है कि उनकी जाति के भाजपा समर्थक, भाजपा से एक दिन ऊब जायेंगे और फिर उनके पास लौट आयेंगे। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता पक्षपात के इस भेड़िये के ख़िलाफ़ बोलने से बचते रहते हैं। इसलिए, जिन ओबीसी नेताओ को भी महसूस होता है कि मुसलमान भाजपा के साथ नहीं जा सकते, और यही कारण है कि यह उनके चुनावी हित में दिखायी देता है कि इस भेड़िये से घिरे लोगों को उससे अलग नहीं किया जाये।

 दूसरा कारण तो ख़ुद नरेंद्र मोदी हैं, जिनकी अपना अति पिछड़ी जाति वाली एक शख़्सियत है, और जिस शख़्सियत को वह हिंदी पट्टी में प्रदर्शित करने से कभी नहीं चूकते, उनकी यह शख़्सियत हिंदुत्व से जुड़े उन लोगों को खींचने के लिए किसी चुंबक की तरह काम करता है,जो परंपरागत रूप से सामाजिक न्याय की ताक़त का गठन करते हैं। ख़ुद को चायवाले के रूप में पेश किया जाना, अति पिछड़ी जातियों को आकर्षित करने वाली उनकी ताक़त में इज़ाफ़ा कर देता है।

 तीसरा कारण, चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था तेज़ी से लड़खड़ा रही है, हर तरह की तरक़ीब नाकाम होती जा रही है, और चूंकि भारत के लोग संकट से लगातार घिरते जा रहे रहे हैं, ऐसे में न सिर्फ़ मुसलमानों, बल्कि जो उदारवादी-वाम विचारधारा से सहमत हैं, उनके ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह और घृणा के इस भेड़िये के दहाड़ने के लिए उस पर लगातार कोड़े बरसाये जायेंगा। यह उसी चीज़ का एक आवश्यक तत्व था और रहेगा, जिसे अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने "उच्च जातियों का विद्रोह" कहा है। जब तक इसे चिह्नित नहीं कर लिया जाता और जबतक इसके ख़िलाफ़ मोर्चा नहीं लिया जाता, और जबतक जातिगत समानता की तलाश केंद्रीय मक़सद नहीं बन जाती, तब तक धर्मनिरपेक्षता एक नाकाम विचारधारा बनी रहेगी और मुसलमान इस पूर्वाग्रह वाले भेड़िये का शिकार होते रहेंगे।

 

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं इनके विचार व्यक्तिगत हैं।

 अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
 

What Yogendra Yadav, Pratap Bhanu Mehta Don’t Get About Secularism

 

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