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भारत
राजनीति
विशेष : पांडिचेरी के आज़ादी आंदोलन में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका
आज एक नवंबर के दिन ही 1954 में पांडिचेरी फ्रांस से आज़ाद हुआ था। पांडिचेरी फ्रांस की गुलामी से आज़ाद कैसे हुआ और उसका भारत में विलय कैसे हुआ यह कहानी आम भारतीय जनमानस से कोसो-कोस दूर है। आइए जानते हैं आज यही कहानी
हर्षवर्धन
01 Nov 2021
Puducherry

“पांडिचेरी में ट्रेड यूनियन संघर्ष का महत्व यह था कि इसने भारत में ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में पहली बार 8 घंटे काम का नियम, श्रमिकों के लिए पेंशन लाभ और सामूहिक श्रम समझौते का अधिकार जीता।”

आज जब भी पांडिचेरी (पुडुचेरी) की बात होती है तो उसको हम मुख्यत: एक पर्यटन स्थल और अरविंद आश्रम के केंद्र के तौर पर देखते हैं। हमारे दिमाग में यह बात आती भी नहीं है की यह कभी फ़्रांसीसी साम्राज्यवाद का एक महत्त्वपूर्ण अंग था, और वहाँ की जनता ने भी अपनी आज़ादी के लिए उतना ही संघर्ष किया और कुर्बानियां दीं जितनी की ब्रिटिश उपनिवेशवाद से त्रस्त भारत की जनता ने।   पांडिचेरी फ्रांस की गुलामी से आज़ाद कैसे हुआ और उसका भारत में विलय कैसे हुआ यह कहानी आम भारतीय जनमानस से कोसो-कोस दूर है।

आज जब पूरा देश आज़ादी के 'अमृत महोत्सव' की तैयारी कर रहा है, तो यह जरूरी हो जाता है की हम पांडिचेरी की जनता की भूली-बिसरी आज़ादी की लड़ाई की कहानी को याद करे और देश के समक्ष पेश करें।  

फ्रांस भारत में प्रवेश करने वाला अंतिम प्रमुख यूरोपीयान महाशक्ति था और भारत से बाहर जाना वाला दूसरा आखिरी। फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी पहली फैक्ट्री सन 1668 में सूरत में लगाई। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने अपना विस्तार कर मछलीपट्टनम (1672), पांडिचेरी (1673)  चन्दननगर (कोलकाता) (1692), यनम (1723), माहे (1725) और कराईकल (1739) को अपने अधीन किया।

ब्रिटिश, फ्रांसीसी और डच साम्राज्यवादियों के बीच इन क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए कई लड़ाइयां हुई जिसमे ब्रिटेन कई बार विजयी हुआ। लेकिन सन 1816 में 'नेपोलियन युद्धों' की समाप्ति के उपरांत सारे विजित इलाके प्रान्त फ्रांस को लौटा दिए गए। इसके बाद करीब 138 सालों तक इन इलाकों पर फ्रांस का स्थाई राज रहा।

हालाँकि `फ़्रांसीसी भारत’ कुल क्षेत्रफल के हिसाब से मात्र 510 वर्ग किलोमीटर में ही फैला हुआ  था लेकिन फ्रांस की औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं के सिलसिले में बहुत ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी था। पांडिचेरी फ्रांसीसियों के लिए एक महत्वपूर्ण नौसेना अड्डा था जहाँ से उन्होंने इंडो-चीन देशों में अपना वर्चस्व कायम किया। साथ ही साथ पांडिचेरी के वस्त्र उद्योग का फ्रांस की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान था। `फ्रांसीसी भारत’ से फ्रांस को सन् 1949 तक सालाना 195,000 डॉलर्स की कमाई होती थी।     

पांडिचेरी का मज़दूर आंदोलन

“पांडिचेरी में फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के खिलाफ जनता का प्रतिरोध हथकरघा और कपड़ा श्रमिकों के ट्रेड यूनियन आंदोलन के माध्यम से सामने आया।”

सन 1914  में जब प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हुई तब तक पांडिचेरी दक्षिण भारत में कपड़ा उद्योग का एक प्रमुख केंद्र बन गया था। पर यहां के कपड़ा मिलों में काम करने वाले मज़दूरों की हालत बहुत ख़राब थी। यहां के अधिकतर मज़दूर दलित समुदाय से आते थे जिसमे से ज्यादातर निरक्षर थे। उनसे सप्ताह में छह दिन 11-11 घंटे और सातवें दिन छह घंटे काम करवाया जाता था। मासिक वेतन दस आने से ले कर एक रुपया था और बिना किसी रोक-टोक के बाल मज़दूरी कराई जाती थी।    

चूंकि पांडिचेरी एक फ्रांसीसी क्षेत्र था इसलिए अंग्रेज सरकार के ख़िलाफ़ सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों और कार्यकर्ताओं के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल बन गया था। सन् 1908 में सुब्रमण्यम भारती मद्रास से भागकर पांडिचेरी आ गए और वहां से उन्होंने 'इंडिया' नाम की एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन  शुरू किया जिसका वितरण ब्रिटिश भारत के साथ ही साथ पांडिचेरी में भी होता था। सन् 1910 में वी.वी.एस अय्यर भी पांडिचेरी आ गए। हालाँकि इन दोनों का पांडिचेरी के मज़दूर आंदोलन से सीधा लेना-देना नहीं था, लेकिन उनके द्वारा लिखे हुए पर्चों और पत्रिकाओं का प्रभाव पांडिचेरी के शोषित मज़दूरों पर काफी प्रभाव पड़ा।    

पांडिचेरी में श्रमिक आंदोलन का बिगुल सन् 1908 में बजा जब रोडिएर कपड़ा मिल के मज़दूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल की जो दस दिनों तक चली। मिल मालिकों ने मज़दूरों की मांग मान ली। इसके बाद सन 1910 में सवाना कपड़ा मिल के मज़दूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल की जिसको पुलिसिया दमन से कुचल दिया गया। सन् 1908 से पहले विश्व युद्ध के अंत तक पांडिचेरी में कई  हड़तालें और प्रदर्शन हुए लेकिन अधिकतर या तो कुचल दिए गए या आधे अधूरे समझौते के साथ खत्म हुए। अगले दस वर्षों तक यानी पहले विश्व युद्ध की समाप्ति और सन् 1929 की वैश्विक महामंदी तक, मिल मालिकों और फ्रांसीसी औपनिवेशिक प्रशासन ने संयुक्त रूप से पांडिचेरी के मजदूर आंदोलन का दमन किया जो 'मद्रास लेबर यूनियन' (1919) और सिंगरावेलु चेट्टियार के नेतृत्व में मद्रास सूबे में चल रहे श्रमिक आन्दोलनों के प्रभाव ने आ कर काफी आक्रामक हो गया था। मज़दूर कभी काम रोके देते, कभी धीरे-धीरे काम करते और कभी पूर्ण रूप से हड़ताल कर देते।

मज़दूर जिस भी मिल में हड़ताल करते मिल मालिक उसको अनिश्चित काल तक बंद कर देते।  पुलिस मज़दूर नेताओं को पकड़ कर जेल में बंद कर देती और प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों और उनके परिवारों पर अत्याचार करती। पिछले दशक में मज़ूदरों ने जो अधिकार जीते थे उन सब पर इस दौरान  हमले हुए।यह रस्साकशी सन् 1934-35 तक चलती रही। 

वरदराजुलु सुब्बैया की भूमिका

सन् 1934 -35 में पांडिचेरी के श्रमिक आंदोलन को निर्णायक मोड़ वरदराजुलु सुब्बैया के नेतृत्व में मिला। सुब्बैया कालवे कॉलेज, पांडिचेरी के मशहूर छात्र नेता थे।  छात्रों के लिए हॉस्टल, रीडिंग रूम, लाइब्रेरी आदि मांगों को ले कर उनके नेतृत्व में कई प्रदर्शन और हड़तालें हुईं जिसकी वजह से उनको सन् 1928 में कॉलेज से छह महीने से लिए निष्कासित कर दिया गया था। उसके बाद भी उनकी राजनीतिक गतिविधियों में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने सन् 1929 में पांडिचेरी में 'यीथ लीग' की स्थापना की जो कम्युनिस्ट यूथ लीग के तर्ज पर बना था।  

दसवीं की परीक्षा पास कर नौकरी की तलाश में सुब्बैया मद्रास (आज के चैन्नई) गए थे जहाँ उनकी मुलाकात 'सेल्फ-रेस्पेक्ट आंदोलन' से जुड़े लोगो से हुई। वहीं उनका परिचय कम्युनिस्ट नेता आमिर हैदर खान से हुआ जो मेरठ षडयंत्र केस में फ़रार थे। फिर पुचालपल्ली सुंदरय्या से भी उनकी मुलाक़ात हुई। सन् 1933 में सुब्बैया पांडिचेरी आ गए और उन्होंने मज़दूरों को संगठित करने का प्रयास आरम्भ कर दिया। साथ ही साथ उन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा स्थापित 'हरिजन सेवक संघ' की एक शाखा पांडिचेरी में भी खोली। सामाजिक सुधार कार्यक्रम को सुब्बैया ने बहुत ही कुशलतापूर्वक दलितों और मज़दूर वर्ग आंदोलन के साथ जोड़ दिया।  उन्होंने 'सुदंतीरम' नाम की एक मासिक पत्रिका भी निकाली जिसका मुख्य उद्देश्य मज़दूरों के अधिकार, समाज सुधार और उपनिवेशवाद विरोधी चेतना फैलाना था।

सुब्बैया के नेतृत्व में पांडिचेरी के सवाना मिल में मज़दूरों ने 14 फ़रवरी सन् 1935 को हड़ताल की घोषणा कर दी। मांगे थी काम के घंटे 10 घंटे तय करना, बाल मज़दूरी पर प्रतिबन्ध, दैनिक वेतन तीन आने से बढाकर छह आना करना, गर्भवती महिलाओं को आधे महीने का वेतन व छुट्टी। 84 दिनों के हड़ताल के बाद मज़दूरों की मांगे मान ली गईं। इस आंदोलन की सफलता के बाद पांडिचेरी में कपड़ा मज़दूरों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ जिसमें दो मांगे की गईं। पहला कि पांडिचेरी में मज़दूरों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार मिले और दूसरा पांडिचेरी के मज़दूरों को अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार  ही सुविधाएं और अधिकार मिले। इन मांगों को फ़्रांसीसी सरकार और अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ तक पहुंचाया गया। परिणामस्वरूप कुछ नियम लागू हुए लेकिन ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार नहीं दिया गया।     

लेकिन लड़ाई जारी रही। ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार को ले कर जुलाई 1936 में पांडिचेरी के तीनों बड़े मिल,  रोडिए, सवाना और एली के मिल मजदूर हड़ताल पर बैठे। 29 जुलाई को   सुब्बैया ने इन मज़दूरों के सामने एक जोशीला भाषण दिया। इसके अगले दिन पांडिचेरी प्रशासन ने मज़दूरों पर गोलियाँ चलवा दी जिसमें बारह मज़दूरों को मृत्यु हो गयी और कई घायल हो गए। सुब्बैया के खिलाफ पुलिस ने गिरफ़्तारी का वारंट निकाल दिया।  

इस गोली कांड के बाद फ्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी ने फ़्रांसीसी संसद में पांडिचेरी के मज़दूरों के संघर्ष का मुद्दा उठाया और तत्कालीन सरकार पर मज़दूरों को मांग को मानने का दबाव बनाया। सन् 1936 में ही फ्रांस के मज़दूरों ने अपने लिए ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार जीता था। सुब्बैया और बाकी मज़दूर नेताओं ने पांडिचेरी के मज़दूरों के लिए भी यही अधिकार का दावा किया और आखिरकार 31 अक्टूबर सन 1936  को उनको मांगे मान ली गयी। यह पांडिचेरी के मज़दूर आंदोलन की बहुत बड़ी जीत थी।  उन्होंने भारत में ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में पहली बार 8 घंटे काम का नियम, श्रमिकों के लिए पेंशन लाभ और सामूहिक श्रम समझौते का अधिकार जीता था।

मिल मज़दूरों की इस ऐतिहासिक जीत के बाद पांडिचेरी में किसान सभा, शिक्षक संघ, रिक्शा चालक संघ, छोटे दुकानों में काम करने वालो मज़दूरों का संघ इत्यादि कई ट्रेड यूनियन बने। इन ट्रेड यूनियन समूहों ने पूरे पांडिचेरी में 64 रीडिंग रूम, सांस्कृतिक और समाज सुधारक केंद्र स्थापित किये। साथ ही साथ जनता में जागृति फैलाने के लिए संस्कृति कर्मियों की मंडली बनाई जो गांव-गांव घूमकर प्रचार करती।     

सुब्बैया ने सभी श्रमिक संघो को एकजुट कर एक राजनीतिक पार्टी बनाई जिसका नाम 'महाजन सभा' था। सार्वभौमिक मताधिकार और पांडिचेरी के गवर्नर के तानाशाही शासन को मुद्दा बना कर `महाजन सभा’ ने अक्टूबर 1937 का नगरपालिका चुनाव फ़्रांसीसी समर्थित 'फ्रांको हिन्दू पार्टी' के खिलाफ लड़ा। चुनाव के दौरान पांडिचेरी प्रशासन ने खुल कर 'फ्रांको हिन्दू पार्टी' के लिए मतदाता केन्द्रो पर कब्ज़ा किया और उसे विजयी घोषित कर दिया।  इस फैसले का विरोध करते हुए पांडिचेरी के कई इलाको में जनता ने समानांतर सरकारों बना लीं।  पांडिचेरी प्रशासन भारी इस जन विरोध के सामने झुक गई और नगरपालिका आयोग का पुनर्गठन किया जिसमे सिर्फ महाजन सभा के प्रतिनिधि थे।   

पांडिचेरी की आज़ादी का आंदोलन

“पांडिचेरी को फ्रांस से आज़ाद कराने और उसका भारत से विलय कराने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वहां के कम्युनिस्ट पार्टी की थी जिसकी स्थापना वरदराजुलु सुब्बैया ने सन 1942 में की थी।”

14 अप्रैल सन 1938 को फ्रांस में सत्ता परवर्तन हुआ। नई सरकार के फरमान पर पांडिचेरी में हर प्रकार की राजनितिक गतिविधिओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और सारे मज़दूर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सुब्बैया को वेल्लोर जेल भेज दिया गया जहाँ वह 1942 तक रहे। इसी दौरान पांडिचेरी की जनता ने दूसरे विश्व युद्ध के शुरुआत होने के बाद युद्ध विरोधी अभियान चलाया जिसको बुरी तरह कुचल दिया गया। सन् 1942 में सुब्बैया जब जेल से बाहर आये तो उन्होंने ''फ्रांसीसी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी'' की स्थापना की। 

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पांडिचेरी और बाकी भारतीय  फ्रांसीली इलाकों के सारे श्रमिक संघों ने फासीवादी विरोधी 'कॉम्बैट' नाम का संगठन का निर्माण किया और  फासीवाद के विरोध में प्रदर्शन किए। इसी दौरान सुब्बैया को फ़्रांसीसी भारत से अप्रैल 1944 में निष्कासित कर दिया गया। पांडिचेरी में उनकी वापसी विश्व युद्ध के समाप्ति के बाद सितम्बर 1945 में हुई।  उन्होंने 1946 में फ़्रांसीसी भारत में सभी राजनीतिक दलों और श्रमिक संघों का एक संयुक्त मोर्चा 'राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा' नाम से गठित किया जिसका उद्देश्य फ्रांस से आज़ादी था। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के पहले सम्मलेन में ये घोषणा हुई - "फ़्रांसीसी भारत की जनता अब फ़्रांस की गुलामी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी।"     

15 अगस्त 1947 के बाद फ्रांसीसी भारत की आज़ादी और उसके शेष भारत में विलय होने का आंदोलन तेज हो गया। सुब्बैया के खिलाफ 1948 में पुलिस ने गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं पर पुलसिया दमन हुआ। सुब्बैया के घर को, जो कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यालय भी था, जला दिया गया। इसी दौरान भारत और फ्रांस सरकार के बीच फ़्रांसीसी भारत को आज़ाद करने के मसले पर कई बैठके हुई, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला।        

1952 के मध्य  में सुब्बैया के खिलाफ गिरफ्तारी का आदेश वापस ले लिया गया। उनके नेतृत्व में फ़्रांसीसी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने आज़ादी के सवाल पर कई बड़े प्रदर्शन किये।  कम्युनिस्ट पार्टी ने अप्रैल 1954 में 'डायरेक्ट एक्शन' की घोषणा की जिसके बाद फ्रांस ने पांडिचेरी की सड़कों को सेना से पाट दिया। 7 अप्रैल 1954 को कम्युनिस्ट पार्टी ने  तिरूबुवानी नाम के एक गांव को आज़ाद करा लिया। इस घटना का उल्लेख करते हुए अमेरिकी अख़बार 'न्यू यॉर्क टाइम्स' ने चेताया कि फ्रांसीसी भारत समाजवादी क्रांति की ओर अग्रसर है।      

7 अप्रैल की इस घटना के बाद भारत, फ्रांस और फ़्रांसीसी भारत में काम कर रहे दलों की कई बैठके हुईं जिसमे शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन चलने की बात तय हुई। फ्रांसीसी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने 9 अगस्त 1954 को पूरे पांडिचेरी में हड़ताल की घोषणा कर दी और फ्रांस को अविलम्ब बाहर जाने को कहा। आखिरकार 1 नवंबर 1954 को फ्रांसीसियों को भारी जन-दबाव में भारत छोड़ना पड़ा और आखिरकार पांडिचेरी इत्यादि फ़्रांसिसी क्षेत्रों का भारत में विलय हुआ। 

(लेखक जेएनयू के शोधार्थी हैं।)

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