NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दादरी लिंचिंग के पांच साल: कहां है क़ानून?
मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या को पांच साल हो गए। 28 सितंबर 2015 को भीड़ ने दादरी स्थित उनके घर के बाहर उनको मौत के घाट उतार दिया था। इस दिन को याद करते हुए हम पिछले कुछ वर्षों में हुए लिंचिंग कुछ मामलों के पर चर्चा कर रहे हैं और आर्काइव्स से कुछ सामग्री साझा कर रहे हैं जो लिंचिंग मामलों में न्याय की कमी को लेकर सवाल खड़े करती है।
आईसीएफ़
29 Sep 2020
मोहम्मद अख़लाक़

28 सितंबर 2015 को एक भीड़ ने मोहम्मद अख़़लाक़ को उत्तर प्रदेश में दादरी के बिसाहड़ा गांव स्थित उनके घर से बाहर निकाल लिया और उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। एक स्थानीय हिंदू मंदिर से घोषणा की गई थी कि अख़़लाक़़ के परिवार ने गोमांस का सेवन किया है और इसे घर में रखा हुआ है जिससे भीड़ भड़क गई और उनके परिवार पर जानलेवा हमला किया। इस हमले में अख़लाक़ के बेटे को भी गंभीर चोटें आई जो इलाज के बाद बच गया लेकिन कुछ दिनों बाद अख़लाक़़ की मौत हो गई। इस घटना के पांच साल बाद अख़लाक़ के परिवार को क्या न्याय मिला है? साल 2018 तक इस परिवार के सदस्य ’फास्ट ट्रैक’ कोर्ट की 45 सुनवाई में शामिल हुए और ट्रायल शुरू होना अभी भी बचा था।

भीड़ हिंसा की घटनाओं को द क्विंट द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2015 से सितंबर 2019 के बीच लिंचिंग की वजह से कुल 113 मौतें हुई हैं। सवाल यह है कि इनमें से कितने मामलों की उचित जांच और ट्रायल हुए? इसके विपरीत कई मामलों में पीड़ितों के परिवार के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए, जबकि अपराधी या तो ज़मानत पर बाहर थे या बीजेपी की रैलियों में शामिल हो रहे थे।

साल 2015 में अख़लाक़ की हत्या के एक साल बाद अदालत ने आदेश दिया कि उसके परिवार के ख़िलाफ़ यूपी गौ संरक्षण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की जाए। पहलू ख़ान का मामला यह समझने के लिए एक बेहतर उदाहरण है कि भीड़ की हिंसा के मामलों में अपराधियों और पीड़ितों के साथ क्या हुआ है। कौन सज़ा भुगतता है और किसे सज़ा नहीं मिलती है? अप्रैल 2017 में मवेशी लेकर जा रहे पहलू ख़ान और उनके दो बेटों पर राजस्थान के अलवर में कथित गौ-रक्षकों ने हमला किया था। दो दिन बाद पहलू खान ने दम तोड़ दिया और राजस्थान गौवंश पशु (वध प्रतिबंध और अस्थायी प्रवासन या निर्यात के नियमन) अधिनियम के तहत उनके और उनके साथ अन्य लोगों के खि़लाफ़ मामला दर्ज किया गया, जिसमें उनके दो बेटे भी शामिल थे।

इस भयावह घटना के दो साल बाद अगस्त 2019 में नौ आरोपियों में से छह को सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए, अलवर की एक स्थानीय अदालत ने बरी कर दिया था जबकि पहलू खान के बेटों का उनके ख़िलाफ़ इस मामले में आरोप पत्र सौंपा गया था। दिलचस्प बात यह है कि नौ आरोपियों में से दो आरोपी, जो घटना के समय नाबालिग थे, उनको जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने इस साल की शुरुआत में दोषी ठहराया था।

साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के एक हफ्ते बाद एक युवा आईटी पेशेवर मोहसिन शेख को पुणे में हिंदू राष्ट्र सेना की भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया था। उनके परिवार को अभी भी न्याय का इंतज़ार है।

जब कोई मॉब लिंचिंग मामले में न्याय चाहने वाले परिवारों की यात्रा की खोज करता है तो मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली का पक्षपात स्पष्ट हो जाता है। तबरेज अंसारी के एक और परेशान करने वाले मामले में पुलिस को उनकी हत्या में उलझा हुआ देखा जा सकता है। अंसारी को एक भीड़ ने चोर समझ कर पीटा था और जय श्री राम का नारा लगाने के लिए मजबूर किया था। गंभीर रूप से घायल होने के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और उन पर हमला करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज नहीं किया। झारखंड जनाधिकार महासभा की एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने उचित चिकित्सा उपचार से इनकार कर दिया। पुलिस ने उनकी मौत को हृदय आघात बताकर एफआईआर से हत्या के मामले को हटाने का फैसला किया था। सिटिजन अगेंस्ट हेट की 2017 की रिपोर्ट में भी भीड़ की हिंसा के मामलों में पुलिस की मिलीभगत की बात कही गई है, क्योंकि जांच दोषपूर्ण है और कई मामलों में एफआईआर में देरी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

जुलाई 2018 में तहसीन एस पूनावाला के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हिंसक भीड़ को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कई निर्देश जारी किए थे। न्यायालय इन दिशा-निर्देशों के लिए सरकार के अनुपालन की निगरानी भी कर रहा था।

हालांकि इस मामले की अंतिम सुनवाई 24 सितंबर 2018 को की गई थी और तब से यह मामला आगे नहीं बढ़ा है, जबकि भीड़ के हमले होते रहे। गृह मंत्रालय का कहना है कि सरकार लिंचिंग से होने वाली मौतों का आंकड़ा नहीं दे सकती क्योंकि यह देश में विशेष रूप से लिंचिंग की घटनाओं का आंकड़ा नहीं रखती है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशिक मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Five Years Since Dadri Lynching: Whither the Laws?

यह लेख पहले इंडियन कल्चरल फॉरम में प्रकाशित हो चुका है।

Mohammad Akhlaq
Akhlaq Lynching
Lynchings in India
right-wing
Hate Crimes in India

Related Stories

भारत में हर दिन क्यों बढ़ रही हैं ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएं, इसके पीछे क्या है कारण?

'जहां कई सारे वकील होते हैं, वहां अब न्याय नहीं मिलता’

दादरी लिंचिंग के 6 बरस: तुम भी कभी मिले हो? मिलना कभी ज़रूर/ कैसे है जुड़ता-टूटता अख़लाक़ का बेटा

यह एक और असाधारण प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करने का समय है 

अमित शाह के बीमार होने की कामना से हर किसी को सावधान क्यों रहना चाहिए

अख़लाक़ मॉब लिंचिंग को चार साल: इंसाफ़ तो छोड़िए, अभी आरोप भी तय नहीं

जर्मनी आज भी नाज़ी बर्बरता के पीड़ितों को याद करता है, क्या भारत दादरी के अख़लाक़ को याद करेगा?

हिंसक भीड़ (लिंच मॉब) का मनोविज्ञान


बाकी खबरें

  • Neha Singh Rathore
    न्यूज़क्लिक टीम
    ‘यूपी में सब बा’ के जवाब में नेहा सिंह राठौर का ‘ यूपी में का बा’
    23 Jan 2022
    यूपी विधानसभा चुनाव में वोटरों को रिझाने के लिए सांसद और अभिनेता रवि किशन भाजपा की तारीफ़ में एक वीडियो लेकर आए, जिसके बोल हैं ‘ यूपी में सब बा’। भाजपा की उपलब्धियों का बखान वाला यह वीडियो घर-घर…
  • pm
    अजय कुमार
    दो टूक: मोदी जी, आप ग़लत हैं! अधिकारों की लड़ाई से देश कमज़ोर नहीं बल्कि मज़बूत बनता है
    23 Jan 2022
    75 वर्षों में हम सिर्फ़ अधिकारों की बात करते रहे हैं। अधिकारों के लिए झगड़ते रहे, जूझते रहे, समय भी खपाते रहे। सिर्फ़ अधिकारों की बात करने की वजह से समाज में बहुत बड़ी खाई पैदा हुई है: प्रधानमंत्री…
  • Ethiopia
    शिरीष खरे
    इथियोपिया : फिर सशस्त्र संघर्ष, फिर महिलाएं सबसे आसान शिकार
    23 Jan 2022
    इथियोपिया, अफ्रीका महाद्वीप का यह देश पिछले दो वर्षों से अधिक समय से सुखिर्यों में है, जहां नवंबर, 2020 से शुरू हुआ सशस्त्र संघर्ष अभी भी जारी है, जहां टिग्रे अलगाववादियों और उनके खिलाफ इथियोपियाई…
  • nehru and subhash
    एल एस हरदेनिया
    नेताजी की जयंती पर विशेष: क्या नेहरू ने सुभाष, पटेल एवं अंबेडकर का अपमान किया था?
    23 Jan 2022
    नरेंद्र मोदी का यह आरोप तथ्यहीन है कि नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस, डॉ. अंबेडकर और सरदार पटेल को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया।
  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    …सब कुछ ठीक-ठाक है
    23 Jan 2022
    "क्यों, क्या सब ठीक-ठाक नहीं हैं? क्या सब ख़ैरियत से नहीं है? क्या हम हिंदू राष्ट्र नहीं बन रहे हैं? ठीक है भाई! बेरोज़गारी है, महंगाई है, शिक्षा बरबाद हो रही है और अस्पताल बदहाल। पर देश में क्या…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License