NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
नौकरी देने से पहले योग्यता से ज़्यादा जेंडर देखना संविधान के ख़िलाफ़ है
केरल हाई कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में भारतीय संविधान के कई प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें कार्यस्थल को बेहतर और समानता वाला बनाना है न कि परिस्थितियों का हवाला देकर महिलाओं को रोजगार के मौकों से वंचित करना है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
17 Apr 2021
नौकरी देने से पहले योग्यता से ज़्यादा जेंडर देखना संविधान के ख़िलाफ़ है
Image courtesy : Wilson Center

“किसी योग्य उम्मीदवार को सिर्फ इस आधार पर नियुक्त करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह एक महिला है और रोजगार की प्रकृति के अनुसार उसे रात में काम करना होगा। जबकि महिला का योग्य होना ही उसकी नौकरी के लिए सुरक्षात्मक प्रावधान है।”

ये बातें केरल हाई कोर्ट ने एक कंपनी द्वारा सिर्फ पुरुष उम्मीदवारों को ही आवेदन करने की अनुमति वाली अधिसूचना को पलटते हुए कहीं। अपने फैसले में हाई कोर्ट ने भारतीय संविधान के कई प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें कार्यस्थल को बेहतर और समानता वाला बनाना है न कि परिस्थितियों का हवाला देकर महिलाओं को रोजगार के मौकों से वंचित करना है। हमें आधी आबादी को हर क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा अवसर देना है।

क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार, 16 अप्रैल को केरल हाई कोर्ट में जस्टिस अनु शिवरामन की पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केरल मिनरल्स एंड मेटल्स लिमिटेड द्वारा सिर्फ पुरुष उम्मीदवारों को ही आवेदन करने की अनुमति दी गई थी। कंपनी के इस प्रावधान को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ट्रेजा जोसफीन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वह कंपनी में ग्रेजुएट इंजीनियर ट्रेनी (सेफ्टी) हैं। उन्होंने अदालत से कहा कि यह अधिसूचना भेदभावपूर्ण है। 

सिर्फ़ पुरुष उम्मीदवारों के लिए आवेदन की अनुमति संविधान के ख़िलाफ़ है

अपने फैसले में कोर्ट ने कंपनी द्वारा नौकरी के लिए जारी इस अधिसूचना को पलटते हुए कहा कि इस तरह की अधिसूचना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव के खिलाफ निषेध) और 16 (सार्वजनिक पदों पर अवसर की समानता) के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। जबकि फैक्ट्रीज एक्ट 1948 के प्रावधान महिलाओं को कार्यस्थल पर शोषण से बचाने के लिए हैं।

कोर्ट की तरफ से कहा गया, ‘दुनिया आगे बढ़ रही है। ऐसे में महिलाओं को केवल घर के काम में ही क्यों लगाए रखें। हम ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां आर्थिक विकास के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा, उड्डयन और सूचना प्रौद्योगिकी सहित कई उद्योगों में सभी समय पर काम करने के लिए लगाया जा रहा है। इस तरह की चुनौतियों का सामना कर महिलाओं ने साबित किया है कि वे हर समय किसी भी तरह का कार्य करने में सक्षम हैं।

बड़ी संख्या में रात की नौकरी के लिए योग्य महिलाएं रोजगार से वंचित हैं

गौरतलब है कि देश में आज भी कई संस्थान ऐसे हैं जो रात के समय महिलाओं से काम नहीं कराते हैं। वे रात के समय काम करने के लिए महिलाओं की जगह पुरुषों को नौकरी देने में वरीयता देते हैं। इसके चलते बड़ी संख्या में रात की नौकरी के लिए योग्य महिलाएं रोजगार से वंचित हो जाती हैं। ऐसे में केरल हाई कोर्ट का ये फैसला उन महिलाओं के लिए एक राहत और उम्मीद है जो अपने दम पर तमाम चुनौतियां का सामने करते हुए नौकरी की दहलीज़ पर पहुंचती हैं और सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दी जाती हैं की वो एक महिला हैं।

ये कैसी बराबरी जहां उम्मीदवार की योग्यता से ज़्यादा उसका जेंडर देखा जाता है!

महिलाओं से अक्सर इंटरव्यू में पूछ ही लिया जाता है कि क्या वो नाइट शिफ्ट में काम कर सकती हैं, वो शादी के बाद घर-परिवार और नौकरी कैसे मैनेज करेंगी, उनकी प्राथमिकता क्या रहेगी वैगरह-वैगरह। ये सवाल बराबरी और मार्डनिटी का ढकोसला भरने वाली तमाम बड़ी-छोटी कंपनियों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में आम है। आज 21वीं सदी में भी नौकरी देने से पहले कई बार उम्मीदवार की योग्यता से ज्यादा उसका जेंडर देखा जाता है।

आपको बता दें कि श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी और महिला सुरक्षा का मुद्दा कई बार उठता रहा है लेकिन इसके बावजूद कई कंपनियां इसे गंभीरता से नहीं लेतीं। 16 दिसंबर, 2012 के निर्भया गैंगरेप के बाद दिल्ली पुलिस ने निजी कंपनियों के लिए महिला कर्मचारियों को घर तक छोड़ने की सुविधा देना अनिवार्य कर दिया था। लेकिन अक्सर कंपनियां अपनी जवाबदेही से बचने के लिए महिलाओं को नाइट शिफ्ट की नौकरियों से दूर रखना ही ज्यादा आसान विकल्प समझती हैं।

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी बजट पेश करते हुए कहा था कि महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा के साथ सभी सेक्टर्स में और रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति होगी। महिलाओं के रात की शिफ्ट में काम करने से जुड़े नियम पहले ही बन गए थे। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 को अधिसूचित किया जा चुका है और समिति का गठन भी हुआ है।

इन नियमों के मुताबिक़ सुबह छह बजे से पहले और शाम को सात बजे के बाद महिलाओं के काम करने पर कंपनी को इन नियमों का पालन करना होगा।

- महिला कर्मचारी की सहमति ली जाएगी। उनकी सुरक्षा, छुट्टियां और काम के घंटों का ध्यान रखना ज़रूरी है।

- सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (36 एफ 2020) के तहत मातृत्व लाभ प्रावधानों के ख़िलाफ़ किसी भी महिला को नियुक्त नहीं किया जाएगा।

- शौचालय, वॉशरूम, पेयजल, महिला कर्मचारी के प्रवेश और निकास से संबंधित जगहों सहित कार्यस्थल पर पूरी तरह रोशनी होनी चाहिए।

- जहां महिलाएं काम करती हैं वहां नज़दीक ही शौचालय और पीने के पानी की सुविधा भी होनी चाहिए।

- सुरक्षित और स्वस्थ कार्य स्थितियां प्रदान करें ताकि कोई महिला कर्मचारी अपनी नौकरी के संबंध में किसी चीज़ से वंचित न रहे।

- कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (2013 के 14) के प्रावधान का अनुपालन किया जाएगा।

नाइट शिफ्ट में सुरक्षा और सुविधाओं पर ज़ोर देना इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि महिलाएं इसके कारण कई मौक़ों से वंचित हो जाती हैं। रात की शिफ्ट न मिलने से लड़कियों से कई मौक़े भी छिन जाते हैं। जैसे रात की शिफ्ट का अलाउंस, रात को कम लोग होने के कारण बड़ी जिम्मेदारी संभालने का मौका और एक बराबरी का अहसास। ये अहसास बहुत मायने रखता है वरना ये भावना हमेशा रहती है कि लड़के तो आपसे कठिन काम कर रहे हैं। कई जगह लड़कों को नौकरी में इस कारण भी प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि लड़कियाँ रात को काम नहीं कर सकतीं।

पुरुषों की तुलना में नौकरी पेशा महिलाओं का प्रतिशत बेहद कम

विश्व बैंक के मुताबिक़ भारत में साल 2020 में महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी लगभग 19 प्रतिशत है जबकि पुरुषों की 76 प्रतिशत है। इस भागीदारी को बढ़ाने के लिए भी महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे लाना ज़रूरी है। रात की शिफ्ट को बेहतर बनाना भी कार्यस्थल की स्थितियों को सुधारने का ही हिस्सा है जिससे महिला कर्मचारी सहज महसूस कर सकें और उन्हें प्रोत्साहन मिल सके।

मालूम हो कि भारत में परंपरागत रूप से फैक्ट्रीज़ एक्ट के तहत कानून लागू थे। इसमें कुछ राज्य के क़ानून से और कुछ केंद्र के क़ानून से निर्धारित होते हैं। अगर सुरक्षा की बात करें तो क़ानून और व्यवस्था राज्य का विषय है। केंद्र ने क़ानून बना दिया है लेकिन कर्मचारियों को सुरक्षित पहुंचाना इसमें राज्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है। लेकिन, कंपनियां वैश्विक स्तर पर अलग-अलग देशों में काम कर रही हैं। उनका ठीक से कोई स्थायित्व ही नहीं है। उनके लिए सिंगल रजिस्ट्रेशन या सिंगल लाइसेंसिंग की व्यवस्था होने से है। उनका राज्य सरकारों से कोई खास तालमेल नहीं बन पाता।

सरकार बराबरी की जवाबदेही तय करे

ऐसे में पूंजीवादी व्यवस्था में समाजवादी दृष्टिकोण को संतुलित नहीं हो पाता और कंपनियों को पूरी छूट मिल जाती है। नियमों का पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई की तस्वीर साफ नहीं है। जिसके चलते रात की शिफ्ट में कई कंपनियां बिना सुविधा और सहमति के महिलाओं को रखती हैं और वो मज़बूरी में काम भी करती हैं। कोर्ट का ये फैसला निश्चित तौर पर एक अच्छा कदम है लेकिन महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए भी कई और पक्षों पर गौर करना ज़रूरी है और इसके लिए सरकार द्वारा कंपनियों की जवाबदेही भी तय करना, जिससे आने वाले समय में एक बेहतर समानता वाला वर्कस्पेस तैयार हो सके।

Kerala high court
gender discrimination
Discrimination on Jobs
job opportunities
patriarchal society
male dominant society
Constitution of India
Fundamental right

Related Stories

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

एमपी ग़ज़ब है: अब दहेज ग़ैर क़ानूनी और वर्जित शब्द नहीं रह गया

मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सैलून वाले आज भी नहीं काटते दलितों के बाल!

यति नरसिंहानंद : सुप्रीम कोर्ट और संविधान को गाली देने वाला 'महंत'

अदालत ने ईसाई महिला, डीवाईएफआई के मुस्लिम नेता के अंतरधार्मिक विवाह में हस्तक्षेप से किया इनकार

भारतीय लोकतंत्र: संसदीय प्रणाली में गिरावट की कहानी, शुरुआत से अब में कितना अंतर?

बीएचयू: लाइब्रेरी के लिए छात्राओं का संघर्ष तेज़, ‘कर्फ्यू टाइमिंग’ हटाने की मांग

लोकतंत्र के सवाल: जनता के कितने नज़दीक हैं हमारे सांसद और विधायक?

बाबा साहेब की राह पर चल देश को नफ़रती उन्माद से बचाने का संकल्प


बाकी खबरें

  • corona
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के मामलों में क़रीब 25 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई
    04 May 2022
    देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 3,205 नए मामले सामने आए हैं। जबकि कल 3 मई को कुल 2,568 मामले सामने आए थे।
  • mp
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सिवनी : 2 आदिवासियों के हत्या में 9 गिरफ़्तार, विपक्ष ने कहा—राजनीतिक दबाव में मुख्य आरोपी अभी तक हैं बाहर
    04 May 2022
    माकपा और कांग्रेस ने इस घटना पर शोक और रोष जाहिर किया है। माकपा ने कहा है कि बजरंग दल के इस आतंक और हत्यारी मुहिम के खिलाफ आदिवासी समुदाय एकजुट होकर विरोध कर रहा है, मगर इसके बाद भी पुलिस मुख्य…
  • hasdev arnay
    सत्यम श्रीवास्तव
    कोर्पोरेट्स द्वारा अपहृत लोकतन्त्र में उम्मीद की किरण बनीं हसदेव अरण्य की ग्राम सभाएं
    04 May 2022
    हसदेव अरण्य की ग्राम सभाएं, लोहिया के शब्दों में ‘निराशा के अंतिम कर्तव्य’ निभा रही हैं। इन्हें ज़रूरत है देशव्यापी समर्थन की और उन तमाम नागरिकों के साथ की जिनका भरोसा अभी भी संविधान और उसमें लिखी…
  • CPI(M) expresses concern over Jodhpur incident, demands strict action from Gehlot government
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जोधपुर की घटना पर माकपा ने जताई चिंता, गहलोत सरकार से सख़्त कार्रवाई की मांग
    04 May 2022
    माकपा के राज्य सचिव अमराराम ने इसे भाजपा-आरएसएस द्वारा साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश करार देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं अनायास नहीं होती बल्कि इनके पीछे धार्मिक कट्टरपंथी क्षुद्र शरारती तत्वों की…
  • एम. के. भद्रकुमार
    यूक्रेन की स्थिति पर भारत, जर्मनी ने बनाया तालमेल
    04 May 2022
    भारत का विवेक उतना ही स्पष्ट है जितना कि रूस की निंदा करने के प्रति जर्मनी का उत्साह।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License