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हाथरस मामला: क्या एएमयू के दो डॉक्टरों को मिली सच बोलने की सज़ा?, फैक्ट फाइंडिंग टीम ने भी कई सवाल उठाए
फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट और एएमयू के दो डॉक्टरों की सेवाओं को मीडिया से बातचीत के बाद रद्द करने की कार्रवाई यूपी सरकार और प्रशासन के निष्पक्ष जांच के दावे पर कई सवाल खड़े करती है।
सोनिया यादव
21 Oct 2020
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उत्तर प्रदेश का हाथरस कांड इन दिनों लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मंगलवार यानी 20 अक्टूबर को इस संबंध में दो और नए मामले सामने आए। एक ओर इस घटना पर फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट जारी कर उत्तर प्रदेश सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए। तो वहीं दूसरी ओर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के दो डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि उन्हें हाथरस के मामले में मीडिया से बात करने की वजह से नौकरी से हटा दिया गया है। दोनों ही मामले यूपी सरकार और प्रशासन के निष्पक्ष जांच के दावे पर कई सवाल खड़े करते हैं।

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने हाथरस जिले में 19 वर्षीय युवती के साथ कथित गैंगरेप और मौत के मामले फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि चूंकि जांच के दौरान शरीर पर वीर्य नहीं पाया गया है, इसलिए ये साफ है कि रेप नहीं हुआ था।

इस बयान के उलट एएमयू के अस्थायी मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. अज़ीम मलिक ने कहा था कि फॉरेंसिक रिपोर्ट के लिए 11 दिन बाद सैंपल लिए जाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इससे रेप होने की पुष्टि नहीं हो सकती है, जबकि सरकारी दिशानिर्देशों के मुताबिक, फॉरेंसिक रिपोर्ट में सही परिणाम आने के लिए घटना के 96 घंटे के भीतर सैंपल लिया जाना चाहिए।

अब इन्हीं डॉ. अज़ीम मलिक और उनके सहयोगी ओबैद हक को एएमयू प्रशासन द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया है। सीएमओ-इंचार्ज एस.ए.एच ज़ैदी के हस्ताक्षर वाले पत्र में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि कुलपति ने इन दोनों डॉक्टरों की नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है।

बता दें कि घटना के बाद युवती का इलाज इसी अस्पताल में हो रहा था। हालांकि द हिंदू की ख़बर के मुताबिक, एएमयू के अधिकारियों का कहना है कि यह एक रूटीन मामला है, इसका हाथरस केस से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन बतौर कैज़ुअल्टी मेडिकल ऑफ़िसर कार्यरत रहे डॉ. मोहम्मद अज़ीमुद्दीन मलिक और उनके सहकर्मी डॉ. ओबैद इम्तियाज़ुल हक़ का आरोप है कि मीडिया में बयान देने की वजह से उनकी नौकरी छीन ली गई है।

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक एएमयू प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ रेजिडेंट डॉक्टर्स ने हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है।

रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. हमजा मलिक ने कहा है कि अगर दोनों डॉक्टरों को वापस नहीं लिया गया तो सभी रेजीडेंट डॉक्टर हड़ताल पर चले जाएंगे। हमजा के मुताबिक, इन दोनों डॉक्टरों ने कोविड फेज के दौरान खूब मेहनत से काम किया। अब केवल अखबार में आए एक बयान के कारण इन्हें हटाया जा रहा है जो कि सरासर गलत है।

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फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में सरकार और प्रशासन पर कई आरोप!

हाथरस मामले पर नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपल्स मूवमेंट यानी एनएपीएम की ओर से मंगलवार, 20 अक्टूबर को एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, एक्टिविस्ट और लेखिका मणि माला, सुप्रीम कोर्ट के वकील एहतेशाम हाशमी और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के संदीप पांडेय सहित नौ सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम ने नौ अक्टूबर को गांव का दौरा कर, पीड़ित परिवार और उनके रिश्तेदारों से बातचीत की थी।

मंगलवार को इस संबंध में एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कहा कि हमने इस मामले में राज्य सरकार के उत्पीड़न, पुलिस और अस्पताल अधिकारियों की लापरवाही देखी है। यह मामला क्रूर तरीके से पितृसत्तात्मक व्यवस्था का उदाहरण है जिसमें जाति व्यवस्था कैसे महिलाओं को दबाती है ये दिखाई पड़ता है।

जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने मीडिया से कहा, “हाथरस की घटना पर हमारी रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ये है कि इस अत्याचार की क़ानूनी प्रक्रिया चाहे वो जाँच की हो या अत्याचारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, पूरे हेरफेर में राज्य शासन का समर्थन है।"

इस रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

हाथरस मामले में फैक्ट फाइंडिंग टीम की इस रिपोर्ट ने कई पहलुओं को सामने रखा हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य ने सच को दबाने और मामले को हमेशा के लिए बंद करने की कोशिश की, लेकिन सिविल सोसाइटी और मीडिया के एक समूह ने जब मामले को उठाना और सच बाहर लाना शुरू किया तो चीज़ें बदलीं।

यूपी पुलिस के काम करने के तरीक़े पर सवाल

इस मामले में शुरुआत से ही सवालों के घेरे में रही उत्तर प्रदेश पुलिस को एक बार फिर कठघरे में खड़ा किया गया है। रिपोर्ट में यूपी पुलिस के काम करने के तरीक़े पर सवाल उठाया गया है और ये कहा गया है कि पुलिस का ये कहना कि हिंसा की आशंका को देखते हुए शव का दाह संस्कार देर रात में कर दिया गया, "इस बात पर कोई भरोसा नहीं करेगा, क्योंकि इससे पुलिस पीड़िता की सुरक्षा की अपनी ख़ुद की अक्षमता दिखाती है और ये भी बताती है कि वो ख़ुद कोई अप्रिय घटना रोकने में सक्षम नहीं है।"

रिपोर्ट के मुताबिक इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की 'हिंसा से लेकर भद्दी राजनीति' को सामने ला दिया है, "जो तथाकथित ऊंची जाति के दमनकारी बलों समेत समाज के उन तबक़ों को प्रोत्साहित करने और संरक्षण देने का काम करती है, जो खुले तौर पर क़ानून, संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।"

घटना वाले दिन का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में लिखा गया है कि 14 सिंतबर के बाद पीड़िता को जब ज़िला अस्पताल ले जाया गया तो वहां पुलिस ने डॉक्टरों को कुछ नहीं बताया। परिवार के हवाले से कहा गया है कि न तो किसी पुलिसकर्मी ने न ही किसी अधिकारी ने कोई जाँच की। जबकि प्रशासन को अच्छे से पता है कि बलात्कार से जुड़ी आईपीसी की धारा 375 के तहत आगे की जाँच और कार्रवाई के लिए ये बहुत ज़रूरी है।

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डॉक्टर और कर्मचारी दबाव में थे!

रिपोर्ट के मुताबिक़ परिवार को शुरुआत से ही ऐसा लग रहा था जैसे डॉक्टर और कर्मचारी किसी दबाव में हैं, हालांकि पीड़िता को मूल उपचार दिया गया था। वारदात के 24 घंटे बाद पीड़िता को बेहोशी की हालत में अलीगढ़ के जेएलएनएमसीएच अस्पताल में शिफ्ट किया गया। जहां पीड़िता एक या दो दिन बाद जब होश में आई तो अपनी मां को पूरी बात बताई और बलात्कार और क्रूर हमले का ज़िक्र करते हुए चारों अभियुक्तों के नाम लिए। जिसके बाद परिवार ने वार्ड में मौजूद डॉक्टरों, सिस्टरों और दूसरे मरीज़ों के रिश्तेदारों को इस बारे में बताया।

रिपोर्ट में कहा गया कि पीड़िता को एम्स के बजाय सफ़दरजंग अस्पताल ले जाया गया और पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें कहा गया कि दोनों अस्पतालों में कोई फ़र्क़ नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में अस्पताल में भर्ती होने के बाद परिवार को ज़्यादा उसके बारे में बताया नहीं गया और परिवार को परेशान भी किया गया। फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में उन आरोपों को भी एकदम ग़लत बताया गया है कि पीड़िता के परिवार ने प्रशासन को उसे एम्स नहीं ले जाने दिया।

‘यौन हमले के पहलू से जाँच नहीं हुई’

रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टरों ने यौन हमले से जुड़ी कोई जाँच नहीं की और न ही पीड़िता के ख़ुद सच सामने लाने से पहले तक परिवार से इस बारे में कुछ पूछा। रिपोर्ट में बलात्कार के मामले को दबाने की आशंका भी जताई गई है। क्योंकि देरी से जाँच करने पर बलात्कार का पता नहीं चलता इसलिए हो सकता है कि जान बूझ कर वक़्त बर्बाद किया गया हो। ताकि सबूत कभी मिल ही न सकें।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मेडिको लीगल केस रिपोर्ट की कॉपी, जो परिवार को तुरंत मुहैया नहीं करवाई गई थी, उसमें वेजाइना में पेनिस के पेनिट्रेशन की बात कही गई थी, लेकिन उसी यूनिवर्सिटी की फोरेंसिक डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में इस संभावना को ख़ारिज कर दिया गया।

ऑनर किलिंग का रंग देने की कोशिश

रिपोर्ट के मुताबिक़, इस मामले को ऑनर किलिंग का रंग देने की कोशिश हुई, जिसे परिवार ने पूरी तरह ख़ारिज किया है। एक अभियुक्त और पीड़िता के बीच संबंध के आरोप भी लगे हैं और कहा गया है कि दोनों के बीच फ़ोन पर बात होती थी, इसलिए पीड़िता के परिवार ने ही उसे मार दिया। जबकि पीड़िता को अभियुक्त पिछले छह महीने से परेशान कर रहे थे। एक अभियुक्त पहले भी पीड़िता को नज़दीक के खेत में खींच ले गया था, जहां से वो भाग निकली थी।

रिपोर्ट में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को हाथरस जाने से रोके जाने और केरल के यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के तीन एक्टिव लीडर्स की गिरफ़्तारी की भी आलोचना की गई है।

परिवार पर दबाव बनाने का आरोप

परिवार ने फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम को बताया कि हाथरस में ज़िला मजिस्ट्रेट की पूछताछ में उनकी बात ठीक से न सुनकर ये अस्पष्ट संकेत दिया गया कि परिवार कहे कि वो जाँच और इलाज दोनों से संतुष्ट हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक़, अस्पताल में पीड़िता की मौत के बाद पोस्टमार्टम के लिए सहमति माँगी गई थी, लेकिन इसके अलावा कुछ साझा नहीं किया गया। इसके बाद उन्हें शवगृह में बुलाकर युवती का शव दिखाया गया। जिसके कुछ घंटे बाद ख़बर आई कि पुलिस परिवार से पूछे बग़ैर शव को दाह संस्कार के लिए ले गई है।

इसके बाद पुलिस परिवार को एक गाड़ी में हाथरस ले गई लेकिन गाड़ी को दाह संस्कार वाली जगह से दूर ही रोक दिया गया। परिवार की महिलाएं रोती रहीं लेकिन उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया।

घटना पर भारी ग़ुस्सा और कई जगह प्रदर्शन होने के बाद उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने पीड़ित परिवार के लिए 25 लाख मुआवज़े का एलान किया। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक़ अपुष्ट ख़बर ये है कि परिवार को सिर्फ़ 8-10 लाख रुपये मिले हैं। जो एससी/एसटी (पीओए) के तहत मामला रजिस्टर होने के बाद ही मिल जाने चाहिए थे।

इस संबंध में फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम को परिवार ने बताया कि उन्हें पैसा नहीं चाहिए। उन्होंने अपने अकाउंट चेक नहीं किए हैं। उन्होंने कहा कि "जब न्याय ही ना मिला तो पैसा किस काम का।" उसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर परिवार इसे स्वीकार नहीं करता तो डीएम इसे अलग खाते में रखें और इसका सही इस्तेमाल करने के तरीक़े पर सोचें।

‘अभियुक्त और पीड़ित परिवार के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं’

इस रिपोर्ट में गांव के जातीय ताने-बाने का ज़िक्र भी किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता और अभियुक्तों के गांव में 600 से ज़्यादा परिवार हैं, जिनमें लगभग 15 परिवार ही दलित हैं।

दलित वहां पीढ़ियों से रह रहे हैं लेकिन दशकों से बहुत कुछ झेल रहे हैं। दलित परिवार तथाकथित ऊंची जाति के परिवारों के यहां खेतिहर मज़दूर रहे हैं और उनके और भी कई काम करते रहे हैं।

अभियुक्त पीड़ित परिवार के नज़दीक ही रहते हैं और इन पड़ोसियों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। क़रीब 20 साल पहले एक अभियुक्त के तथाकथिक ऊंची जाति वाले परिवार ने मृत युवती के दादा पर हमला किया था।

रिपोर्ट के मुताबिक़, हाथरस के पुलिस प्रमुख रहे विक्रांत वीर ने कहा कि एक अभियुक्त मृत युवती के दादा पर हमले में शामिल था। वहीं एक अभियुक्त बहुत ज़्यादा शराब पीने का आदी रहा है और पहले वाले अभियुक्त के पिता ने तो बताया भी कि मृत युवती के दादा पर हमले के सिलसिले में उन्हें जेल भी हो गई थी।

हालांकि रिपोर्ट में ये भी लिखा गया है कि पिछले दो दशकों में मृत युवती और अभियुक्तों के परिवारों के बीच कोई लड़ाई या संघर्ष नहीं हुआ था। इसलिए 14 सिंतबर की घटना के बारे में परिवार को कोई अंदाज़ा नहीं था।

गौरतलब है कि फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जारी करने के मौक़े पर सुप्रीम कोर्ट के वकील एहतेशाम हाशमी ने कहा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में बलात्कार के 55 हज़ार मामले पेंडिंग ट्रायल में हैं, जिसमें अभी तक पूरी सुनवाई या फ़ैसला या न्याय नहीं हो पाया है।एक अहम बात ये है कि देश में इतने अपराध होते हैं पीड़ित परिवार के नार्को एनेलेसिस टेस्ट की बात नहीं होती, लेकिन ये अनोखा और भयावह उदाहरण था कि यहां पर सरकार ने कहा कि नार्को एनेलेसिस टेस्ट कराएंगे।

एहतेशाम हाशमी के अनुसार "क्रीमिनल लॉ का सबसे अहम हिस्सा होता है कि एफ़आईआर रजिस्ट्रेशन करने में कोई देरी न हो। लेकिन इस मामले में एफ़आईआर बहुत देरी से रजिस्टर की गई। जिससे लोगों को सबूत मिटाने का भी वक़्त मिला और शव को जलाना भी सबूत मिटाने की एक प्रक्रिया थी। क्रियाकर्म के वक़्त भी उसका चेहरा परिवार को नहीं दिखाया गया। ये मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।"

संदीप पांडेय ने मौजूदा सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह से विफल रहने का आरोप लगाते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की मांग की। तो वहीं सामाजिक कार्यकर्ता मणि माला ने कहा कि हालात बहुत बुरे हैं और समाज का एक हिस्सा जिस तरह अपराधियों को बचाने के लिए खड़ा हो गया है, ये बहुत भयानक स्थिति है।

मणि माला ने कठुआ मामले का उल्लेख करते हुए कहा, “कई बार लोग कहते हैं कि बलात्कार का कोई धर्म या जाति नहीं होती लेकिन हमारे देश में ये होता है। बलात्कारियों का भी धर्म और जाति होती है, नहीं तो जिस तरह से इस मामले में तथाकथिक एक ऊंची जाति के लोग अपराधियों के पक्ष में खड़े हो गए हैं, वो अजीब सी बात है। ये एक नया ट्रेंड हमारे समाज में पैदा हुआ है कि हम निर्लजता के साथ हत्या और बलात्कार के पक्ष में खड़े हैं।"

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