NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
क्या दिहाड़ी मज़दूरों को बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण के माध्यम से धोखा दिया गया है?
सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक ज़रूरी सामाजिक सुरक्षा उपाय है, ख़ासकर कोविड-19 महामारी जैसे संकट के दौरान यह सुविधा और भी ज़रूरी हो जाती है, लेकिन बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण इसमें एक बड़ी बाधा बन कर उभरा है।
न्यूज़क्लिक टीम, रोड स्कॉलर्ज़
06 May 2020
Translated by महेश कुमार
 Daily Wage Earners

पिछले कुछ हफ़्तों में, दैनिक वेतन भोगियों की स्थिति विशेष रूप से निराशाजनक रही है। रोड स्कॉलर्ज़ ने छह राज्यों (छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश) के ग्रामीण इलाकों में 100 से अधिक लोगों से टेलीफोन के माध्यम से दो चरणों (26-31 मार्च और 4-7 अप्रैल) का सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण में पता चला कि ज्यादातर लोग इस बात से वाकिफ हैं कि कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए उन्हे किस तरह की सावधानी बरतने की जरूरत है, लेकिन अकेले यह ज्ञान उन्हें सुरक्षित नहीं रख पाएगा। स्थिति वास्तव में विडंबनापूर्ण है।

2_39.jpg

 और यह सिर्फ वह किसान ही नहीं है जो इस स्थिति से प्रभावित हुए हैं। बल्कि वे लोग भी हैं जो लोग हिमाचल में होम-स्टे, पैराग्लाइडिंग सेवा, टैक्सी, नाई की दुकान और अन्य किस्म के स्वरोजगार की गतिविधियां चलाते है, कोविड के बाद ये सब धीमी पड़ गई है।

सार्वजनिक सेवाओं के बंद होने का मतलब यहाँ यह भी है कि बीमार लोगों को अब डॉक्टर के पास ले जाने या यहां तक कि बैंक से पैसे निकालने के लिए परिवहन मिलना मुश्किल हो गया है। एक उत्तरदाता ने कहा कि वह पासबुक का इस्तेमाल कर बैंक से 1,000 रुपया भी नहीं निकाल पाया जबकि दूसरे व्यक्ति को पुलिस ने उस वक़्त प्रताड़ा जब वह केमिस्ट की दुकान से दवाएं खरीदने जा रहा था।

कई लोग अपने घरों में स्टोर किए सामान से गुज़ारा करने की कोशिश कर रहे हैं, और ऐसा वे वास्तव में अपने दैनिक भोजन कोटा में कटौती करके कर रहे हैं। कुछ लोगों के पास केवल एक सप्ताह का राशन बचा हैं। और भले ही उनमें से कुछ के पास अनाज या चावल लंबे समय तक के लिए हो, लेकिन उनके पास अन्य खाद्य सामग्री जैसे सब्जियां, तेल और मसाले नहीं है।

इस समय, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) जैसे सामाजिक सुरक्षा के उपाय, मुख्य जनसमर्थन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। 2013 में बने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत, भारत की लगभग 63 प्रतिशत आबादी जिसमें कम से कम 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 50 प्रतिशत शहरी आबादी-प्रति माह 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सब्सिडी वाले अनाज की हकदार है, जिस पर भारत जीडीपी का लगभग एक प्रतिशत खर्च करता है। और कोविड-19 के चलते लॉकडाउन के कारण लोगों को परेशानी से उबारने के लिए, केंद्र सरकार ने अगले तीन महीनों तक, अनाज की पात्रता या हक़ को 10 किलो प्रति व्यक्ति यानि दोगुना कर दिया है और एक किलो अतिरिक्त दाल मुफ्त में देने के राहत उपायों की घोषणा की है।

 3_28.jpg

“हालांकि, वितरण थोड़ा विचित्र ढंग से हो रहा है, जिसके चलते कुछ राशन कार्ड धारकों को अप्रैल महीने का राशन अब तक नहीं मिला है। गुजरात, झारखंड और उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी ख़राब होती दिख रही है।”

पीडीएस के साथ चल रही समस्या ने कार्डधारकों तक इन वस्तुओं की पहुंच को और कठिन बना दिया है। 2014 के बाद से, राज्य सरकारों ने पीडीएस को आधार प्रणाली से जोड़ अनिवार्य कर दिया है, जिससे दो संख्याओं को एक साथ जोड़ दिया है, और बिक्री के लिए आधार-आधारित बॉयोमीट्रिक प्रमाणीकरण (एबीबीए) को अनिवार्य बना दिया है। आधार को कल्याणकारी अधिकारों से जोड़ने को सर्वोच्च न्यायालय ने उस वक़्त अनुमति दे दी थी, जब एक मामले में आधार एक्ट और परियोजना को पुट्टुस्वामी बनाम भारत संघ (2019 1 एससीसी 1) में चुनौती दी गई थी,  लेकिन न्यायालय की बहुमत पीठ ने यह भी कहा था कि सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आधार लिंक या बायोमेट्रिक विफलता के कारण किसी को राशन से बाहर नहीं किया जाए।

 4_20.jpg

इसके बावजूद, कई लोगों को पीडीएस प्रणाली से बाहर रखा जा रहा है। जहां पहले राशन लेने के लिए केवल राशन कार्ड की जरूरत होती थी, लेकिन आज इसे आधार प्रणाली से अनिवार्य रूप से जोड़ने से बहुत से लोगों राशन नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि केवल आधार संख्या से जुड़े राशन कार्ड ही राशन के हकदार हैं। एबीबीए प्रणाली को चलाने के लिए एक मजबूत तकनीकी व्यवस्था होनी चाहिए – ऐसा होने पर आधार का सर्वर कभी भी विफल नहीं होगा, प्वाइंट ऑफ़ सेल ("पीओएस") फिंगरप्रिंट मशीन में कोई कमी न होगी, कोई इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या या हार्डवेयर विफलता नहीं होगी तो यह व्यबस्था चलेगी। लेकिन ऐसा नहीं है, इसलिए आधार को पीडीएस से जोड़ने के और इसे अधिक कुशल और धोखाधड़ी मुक्त बनाने का दावा करने से सिस्टम ने कई को राशन की सुविधा से बाहर कर दिया है।

 nu.PNG

वास्तविकता यह है कि प्रौद्योगिकी अविश्वसनीय है। टेक-सेवी हैदराबाद में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि कई लोगों को इंटरनेट कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों, पॉइंट ऑफ सेल  मशीनों की खराबी, फिंगरप्रिंट प्रमाणीकरण में कमी आदि का सामना करना पड़ा है। जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, अधिक दूरदराज के गांवों में तो काफी अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है - इससे बहुत से लोग राशन प्रणाली से बाहर हो रहे हैं, क्योंकि जिनके पास आधार नहीं है उन लोगों के नाम सूची से बाहर हो जाते हैं, या उन्हें तब राशन से इनकार कर दिया जाता है जब एबीबीए प्रक्रिया में उपयोग की जाने वाली पॉइंट ऑफ सेल मशीन में फ़िंगरप्रिंट्स, उनके डेटाबेस के फिंगरप्रिंट से मेल नहीं खाते हैं, या यदि किसी बिंदु पर अन्य तकनीकी विफलता इसका कारण बन जाती हैं। इस प्रकार, आधार लिंकेज लोगों की बड़ी संख्या को उनके राशन के अधिकार का उपयोग करने से बाहर कर देता हैं।

इसके अतिरिक्त, एबीवीए का उपयोग करना खासकर जब भारत कोविड-19 से जूझ रहा है, और उस पर लोगों से एक ही मशीन पर उनकी उंगलियों के निशान को प्रमाणित करना अपने आप में कोविड-19 के प्रसारण की संभावना या जोखिम को बढ़ा सकता है और सामाजिक दूरी के प्रयासों को खतरे में डाल सकता है। हालांकि कई राज्यों ने कुछ महीनों के लिए पीडीएस के मामले में एबीबीए प्रणाली को रोक दिया है, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के उत्तरदाताओं ने दूसरे चरण में बताया कि उन्हें अभी भी एबीएसए का उपयोग अपने पीडीएस राशन के लिए अपनी पहचान को प्रमाणित करने के लिए करना पड़ रहा है।

इस तरह की हालत देखते हुए, यह वह समय है जब हमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली में एबीबीए और अन्य बायोमेट्रिक और तकनीक पर निर्भर तरीकों का सही मूल्यांकन करना चाहिए - क्योंकि वे जिस तरह की बाधा खड़ी करते हैं, वह केवल उस संकट को बढ़ाएगी जिससे हम वर्तमान में गुज़र रहे हैं।

शोइली कानूनगो द्वारा चित्रित। रोड स्कॉलर्ज़ स्वतंत्र विद्वानों और स्टूडेंट्स का कलेक्टिव है जो एक्शन-ओरिएंटेड रिसर्च, सामाजिक-आर्थिक अधिकारों और संबंधित मुद्दों में रुचि रखते हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

अंग्रेजी में लिखे गए इस मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

Have Daily Wage Earners Been Betrayed By Biometric Authentication?

COVID 19
Biometric Attendance
Migrant Labour
PDS
PoS

Related Stories

कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह

महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  

यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

खाद्य सुरक्षा से कहीं ज़्यादा कुछ पाने के हक़दार हैं भारतीय कामगार

निर्माण मज़दूरों का प्रदर्शन, निजी अस्पतालों को टीका आवंटन को लेकर सवाल और अन्य ख़बरें

तमिलनाडु में रह रहे प्रवासी मजदूरों की परेशानी 

देशभर में 'काला दिवस' को मिला व्यापक समर्थन, मोदी सरकार के पुतले जलाए गए

सेंट्रल विस्टा परियोजना : कोरोना क़हर के बीच मज़दूरों की जान को जोखिम डालकर निर्माण जारी!

किसान विरोध प्रदर्शन: ज़मीन केवल आर्थिक मामला ही नहीं बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी है!


बाकी खबरें

  • hisab kitab
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश में क्यों पनपती है सांप्रदायिक राजनीति
    24 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले वहां सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत फिर से हो गयी है। सवाल यह है कि उप्र में नफ़रत फैलाना इतना आसान क्यों है? इसके पीछे छिपी है देश में पिछले दस सालों से बढ़ती बेरोज़गारी
  • night curfew
    रवि शंकर दुबे
    योगी जी ने नाइट कर्फ़्यू तो लगा दिया, लेकिन रैलियों में इकट्ठा हो रही भीड़ का क्या?
    24 Dec 2021
    देश में कोरोना महामारी फिर से पैर पसार रही है, ओमिक्रोन के बढ़ते मामलों ने राज्यों को नाइट कर्फ़्यू लगाने पर मजबूर कर दिया है, जिसके मद्देनज़र तमाम पाबंदिया भी लगा दी गई है, लेकिन सवाल यह है कि रैलियों…
  • kafeel khan
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोरखपुर ऑक्सिजन कांड का खुलासा करती डॉ. कफ़ील ख़ान की किताब
    24 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के इस वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार परंजोय गुहा ठाकुरता डॉ कफ़ील ख़ान की नई किताब ‘The Gorakhpur Hospital Tragedy, A Doctor's Memoir of a Deadly Medical Crisis’ पर उनसे बात कर रहे हैं। कफ़ील…
  • KHURRAM
    अनीस ज़रगर
    मानवाधिकार संगठनों ने कश्मीरी एक्टिविस्ट ख़ुर्रम परवेज़ की तत्काल रिहाई की मांग की
    24 Dec 2021
    कई अधिकार संगठनों और उनके सहयोगियों ने परवेज़ की गिरफ़्तारी और उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामलों को कश्मीर में आलोचकों को चुप कराने का ज़रिया क़रार दिया है।
  •  boiler explosion
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    गुजरात : दवाई बनाने वाली कंपनी में बॉयलर फटने से बड़ा हादसा, चपेट में आए आसपास घर बनाकर रह रहे श्रमिक
    24 Dec 2021
    गुजरात के वडोदरा में बॉयलर फटने से बड़ा हादसा हो गया, जिसकी चपेट में आने से चार लोगों की मौत हो गई, जबकि कई घायल हुए जिनका इलाज अस्पताल में जारी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License