NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
इतिहास का टर्निंग पॉइंट ; जलियांवाला बाग़ @101 
जलियांवाला बाग़ नरसंहार जिसकी आज 101वीं बरसी है - एक तरह से उस हिन्दुस्तान का बीज है जिसे हजार लोगों ने अपनी जान देकर अपने खून से सींचा था। आज जब  रौलेट एक्ट जैसे हालात हैं तो जलियांवाला बाग़ जैसे जमावड़े और उसके बाद की 29 सालों के तजुर्बे भी मौजूद हैं,  रास्ता सुझाने के लिए।
बादल सरोज
13 Apr 2020
जलियांवाला बाग़ नरसंहार
फोटो : साभार Patrika

इतिहास के साथ एक सुविधा है, इसे आराम से देखा जा सकता है।  दुविधा यह है कि दीवार पर लटकी तस्वीरों को बदलकर इसे बदला नहीं जा सकता।  इतिहास हमेशा मैक्रो रूप में होता है, एक सूर्य के दीप्तिमान पिंड पुंज की तरह।  इसे नैनो  या माइक्रो करके नहीं देखा जा सकता।  किरण या प्रकाश के आभासीय रेशे में तोड़कर या किसी व्यक्ति या दल से जोड़कर नहीं समझा जाता।  यह प्रवृत्ति और धारा में ही समझ आता है। 

1757 में प्लासी के अनहुए युद्ध में हुयी हार से भारत का गुलाम बनना आरम्भ हुआ।  पूरे सौ साल लग गए देशव्यापी प्रतिरोध संगठित करने में।  1857 का पहला स्वतन्त्रता संग्राम एक महाविस्फोट था। एक धमाका जिसने करोड़ों की नींद खोल दी, ब्रिटिश राज की चूल हिला दीं।  किन्तु अपनी अनेक महानताओं के बावजूद यह निरन्तरित नहीं रहा - अंग्रेज हिन्दू-मुस्लिम कार्ड खेलकर अगले 90 साल गुजारने में सफल हो गए।  

आज आराम से बैठकर पुनरावलोकन करते हुए समझा जा सकता है कि भारतीय इतिहास, खासकर स्वतन्त्रता संग्राम का असली इग्निशन पॉइंट था जलियांवाला बाग़ ; जहां 13 अप्रैल 1919 को आजादी की लड़ाई और रौलेट एक्ट के खिलाफ आंदोलन के दो बड़े नेताओं - सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू - को कालापानी की सजा सुनाये जाने के विरोध में हुयी सभा पर डायर की अगुआई में हुए गोलीचालन में कोई 1000 लोग मारे गए थे, 2000 से अधिक घायल हुए थे।  इस अभूतपूर्व अमानुषिक हत्याकांड के बाद राजनीतिक घटना विकास इतनी तेजी से बदला कि महज  29 साल में ही अंग्रेजों को बोरिया बिस्तरा बाँध कर जाना पड़ा।   

बेहद निर्णायक गुणात्मक बदलावों का प्रस्थान बिंदु बना यह हत्याकांड। यहां इसके सिर्फ दो आयाम देखे जा रहे हैं।  

पहला आयाम  था स्वतन्त्रता संग्राम का  भावनात्मक मुद्दे से ऊपर उठकर गंभीर राजनीतिक वैचारिक विमर्श तक पहुंचना।  कांग्रेस के 1921 के अधिवेशन में पहली बार पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव आया। कम्युनिस्ट पार्टी  की तरफ से मौलाना  हसरत मोहनी और स्वामी कुमारानन्द द्वारा रखे इस प्रस्ताव में पहली दफा - 5000 वर्ष में पहली बार - सबके बालिग़ मताधिकार के आधार पर संसदीय लोकतंत्र और अलग अलग प्रदेशों के संघ के रूप में - नए भारत की परिकल्पना किसी कागज़ में नज़र आयी। 1924 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (बाद में आर्मी) बनी जिसके नायक सरदार भगत सिंह के समाजवादी विचारों ने देश की दिशा ही बदल कर रख दी।  कराची में 1931 में हुए कांग्रेस अधिवेशन का मूलगामी प्रस्ताव आया  जिसमें आजादी प्राप्त करने के बाद  किस तरह की नीतियां अपनाई जाएंगी इसका ब्यौरा सूत्रबद्ध हुआ। इसी बीच  हिन्दुस्तान के तब के  उदीयमान पूंजीपतियों का बॉम्बे प्लान (1944) आया जिसने कांग्रेस के लिए आजादी के बाद के आर्थिक रास्ते को सूत्रबद्ध किया। 

थोड़ा ध्यान से निगाह डालें तो पता चलता है कि यह दौर उस समय के सबसे बड़े नेता गांधी के असाधारण रूप से इवॉल्व होने का दौर है - दिल में 1909 में लिखी खुद की किताब : “हिन्द स्वराज” सहेजे बैठे गांधी का कराची प्रस्तावों वाले गांधी के रूप में विकसित होने का दौर।  यही 1919 के बाद का समय है जब ज्योतिबा फुले का जाति विरोधी सुधार आंदोलन एक संगठित और सर्वसमावेशी एजेंडे वाले राजनीतिक आंदोलन के रूप में सामने आया; डॉ. अम्बेडकर और पेरियार इसके प्रतीक बने।  बाकी जो हुआ सो ताज़ा इतिहास है। 

दूसरा आयाम, बड़ा और युगांतरकारी बदलाव स्वतन्त्रता संग्राम के चरित्र बदलने के रूप में हुआ।  पढ़े लिखे भद्रजनों, वकीलों, उच्च मध्यमवर्गियों तक ही इसे सीमित रखने की समझ के बरक्स आम जनों को इसमें उतारने के ठोस प्रयास हुए।  देश के मजदूर 1920 में आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के रूप में संगठित हुए।  सोलह साल में तो जैसे काया ही पलट गयी, 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा, प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा से होती हुयी यह जगार 1946 में नौसैनिकों की बगावत और उसकी हिमायत में हिन्दुस्तानी मेहनतकशों की शहादत तक पहुँची।  आज़ादी की लड़ाई में अब शब्दशः करोड़ों लोग शामिल थे।  इसने धजा  कैसी बदली यह अक़बर इलाहाबादी का एक शेर  समझा देता है कि; 

“गो मुश्ते-खाक हैं मगर आंधी के साथ हैं 

बुद्धू मियां भी हज़रत-ए-गांधी के साथ हैं।”  

एक बात और न जलियांवाला बाग़ अनायास हुआ था,  न ही उसके बाद का यह घटनाविकास स्वतःस्फूर्त था।  उसकी एक बड़ी देशी पृष्ठभूमि थी ; दुनिया के साम्राज्यवादी बंटवारे के लिए 1914-1918 का पहला विश्वयुद्ध हुआ था। इसमें बिना किसी वजह के  भारत के 13 लाख सैनिक उन देशों की जनता से लड़ने गए थे जिनके साथ उनका कोई झगड़ा तो दूर जान पहचान तक नहीं थी। इनमें से 74 हजार मारे भी गए थे। मगर 12 लाख 26 हजार वापस भी लौटे थे।  ये सब दुनिया देख कर आये थे।  इतने बड़े पैमाने पर भारतीयों का विश्व से साक्षात्कार पहले कभी नहीं  हुआ था।  इसने उन देहाती भारतीयों के सोच-विचार का फलक ही बदल दिया था।  दूसरी  बड़ी घटना थी 1917 की रूसी क्रान्ति जिसने भारत सहित दुनिया के सभी गुलाम देशी की उम्मीद ही नहीं जगाई थी - एक बिलकुल नयी दुनिया असल में संभव है यह बनाकर भी दिखाई थी। 

जलियांवाला बाग़ जिसका आज 101वां वर्ष है - एक तरह से उस हिन्दुस्तान का बीज है जिसे हजार लोगों ने अपनी जान देकर अपने खून से सींचा था।  जिसके चलते अगले 29 वर्षों में वह एक नए संविधान से सज्जित लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, एक नए सूचित और वैज्ञानिक रुझान के नागरिकों वाले विकसित और सभ्य समाज वाला देश बनने की राह पर आकर खड़ा हुआ।  

इतिहास कथा कहानी भर नहीं होता।  वर्तमान की चुनौतियों से जूझने और भविष्य की ओर यात्रा का औजार भी होता है। किसी अँधेरे मोड़ पर ठहराव सा दिखने पर उसे तोड़ने का फावड़ा भी होता है। एक जैसे हालात एक जैसी कार्यनीति का अवसर देते हैं। आज जब  रौलेट एक्ट जैसे हालात हैं तो जलियांवाला बाग़ जैसे जमावड़े और उसके बाद की 29 सालों के तजुर्बे भी मौजूद हैं,  रास्ता सुझाने के लिए।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और किसान-मज़दूर नेता हैं।)

jaliyawala massacre 1919
jallianwala bagh
101 years Jallianwala Bagh
Jallianwala Bagh Massacre
जलियांवाला बाग़ नरसंहार

Related Stories

जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान

जलियांवाला बागः सांप्रदायीकरण का मोदी-आरएसएस एजेंडा

‘नेहरु की स्मृति मिटाओ’ योजना भाजपा के हिन्दू राष्ट्र मंसूबे के लिए बेहद ज़रूरी है

जलियांवाला बाग़ परिसर पुनर्निर्माण पर विपक्ष, इतिहासकार उठा रहे सवाल, कहा शहीदों का अपमान

शहीद उधम सिंह: सिर्फ़ जलियांवाला बाग़ हत्याकांड का बदला लेना उनका मक़सद नहीं था!

भारत में ओ'डायरवाद: गांधी और प्रशांत भूषण के साहस और 'अवमानना'

कौन थे Frontier Gandhi ?

जलियांवाला स्मारक संशोधन विधेयक :  विपक्ष का सरकार पर इतिहास बदलने का आरोप

विरोध करें और लड़ाई लड़ें, अंधेरा ख़त्म हो जाएगा

'खूनी वैसाखी' : नानक सिंह की कविता जिसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था


बाकी खबरें

  • spain
    डीडब्ल्यू
    स्पेन : 'कंप्यूटर एरर' की वजह से पास हुआ श्रम सुधार बिल
    08 Feb 2022
    स्पेन की संसद ने सरकार के श्रम सुधार बिल को सिर्फ़ 1 वोट के फ़ासले से पारित कर दिया- विपक्ष ने कहा कि यह एक वोट उनके सदस्य ने ग़लती से दे दिया था।
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव 2022 : बदहाल अस्पताल, इलाज के लिए भटकते मरीज़!
    08 Feb 2022
    भारतीय रिजर्व बैंक की स्टेट फाइनेंस एंड स्टडी ऑफ़ बजट 2020-21 रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड सरकार के द्वारा जन स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च किया गया है।
  • uttarakhand
    न्यूज़क्लिक टीम
    चमोली जिले का थराली विधानसभा: आखिर क्या चाहती है जनता?
    07 Feb 2022
    उत्तराखंड चुनाव से पहले न्यूज़क्लिक की टीम ने चमोली जिले के थराली विधानसभा का दौरा किया और लोगों से बातचीत करके समझने का प्रयास किया की क्या है उनके मुद्दे ? देखिए हमारी ग्राउंड रिपोर्ट
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    धर्म का कार्ड नाजी दौर में ढकेलेगा देश को, बस आंदोलन देते हैं राहत : इरफ़ान हबीब
    07 Feb 2022
    Exclusive इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने देश के Living Legend, विश्व विख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब से उनके घर अलीगढ़ में बातचीत की और जानना चाहा कि चुनावी समर में वह कैसे देख रहे हैं…
  • Punjab
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाबः बदहाल विश्वविद्यालयों पर क्यों नहीं बात करती राजनैतिक पार्टियाँ !
    07 Feb 2022
    पंजाब में सभी राजनैतिक पार्टियाँ राज्य पर 3 लाख करोड़ के कर्ज़े की दुहाई दे रही है. इस वित्तीय संकट का एक असर इसके विश्वविद्यालयों पर भी पड़ रहा है. अच्छे रीसर्च के बावजूद विश्वविद्यालय पैसे की भारी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License